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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४७ तत्रैवं संभवत्यर्थे श्रुतहानाश्रुतार्थधीः । नैव कल्पयितुं युक्ता पदवाक्यार्थकोविदैः ॥१८४॥ तत्रेति—इस रीति से ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का पूर्वोक्त अर्थ संभव होने पर पद और वाक्य का रहस्य जानने वालों को श्रुत अर्थ का त्याग और अश्रुत अर्थ की कल्पना करनी उचित नहीं है ॥ १८४ ॥ प्रत्यक्षादीनि बाधेरन् कृष्णलादिषु पाकवत् । अक्षजादिनिभैरेतैः कथं स्याद्वाक्यबाधनम् ॥१८५॥ प्रत्यक्षादीनीति—पूर्वपक्षी का कहना है कि जैसे कृष्णल ( सुवर्ण खण्ड ) आदि का पाक नहीं हो सकता, वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उक्त अखण्डार्थ का बाध हो जायगा । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इन प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणों से उक्त महावाक्य के अखण्डार्थ का बाध कैसे हो पायगा ? ॥ १८५ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्यक्षादिविरुद्ध अर्थ में वाक्य का बाधदर्शन होने से पूर्ववादी दृष्टान्त देकर शंका कर रहा है । जैसे 'कृष्णलान् श्रपयेत्'१ वाक्य से कृष्णल (सुवर्णमय कण) का पाक श्रुत रहनेपर भी प्रत्यक्ष प्रमाण से उसका बाध किया जाता है, क्योंकि सुवर्ण कणों में विक्लित्ति होना संभव ही नहीं है । अतः पाकक्रियासाध्य संस्कारमात्र ही अदृष्टफल के लिये किया जाता है । उसी तरह यहाँ भी भेदग्राहक प्रत्यक्षादि प्रमाण, वाक्य की अखण्डार्थता का बाध कर देंगे । आत्मा का ब्रह्मत्व श्रुत रहने पर भी उसमें पूर्णता नहीं दिखाई देती । इसलिये प्रसंख्यान होने से वाक्य को आत्म- संस्कारार्थ ही मान लिया जाय । तब सिद्धान्ती उत्तर देता है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का प्रतिभास यदि होता हो तो आपके कथनानुसार हो भी सकता है, किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कर्तृत्ववादि का ज्ञान (प्रतिभास) नहीं होता । क्योंकि आत्मा में दुःखित्वादि धर्मों की प्रतीति, अध्यस्त अहंकार आदि के सम्बन्ध से ही होती है । दुःखित्वादि धर्म, स्वतः आत्मा के नहीं हैं । अतः प्रत्यक्षाभासादि प्रमाणाभासों से प्रमाणभूत वाक्य का बाध कैसे किया जा सकता है ? अर्थात् उसका बाध कभी नहीं किया जा सकेगा । तथा 'प्रयाजे कृष्णलं जुहोति'२ के समान ब्रह्मज्ञान में संस्कृत हुए आत्मा का अन्यत्र विनियोग भी नहीं है, इसलिये वाक्य को संस्कारार्थ भी नहीं कहा जा सकता । और आत्मा की पूर्णता अर्थात् तत्काल ब्रह्मत्व, जो उसमें नहीं प्रतीत होता है, वह पदार्थ की दृढ़ बुद्धि न होने से है । तात्पर्य यह है कि प्रमाणाभास से महावाक्य का बाध नहीं होगा ॥ १८५ ॥ दुःख्यस्मीति सति ज्ञाने निर्दुःखोति न जायते । प्रत्यक्षादिनिभत्वेऽपि वाक्यान्न व्यभिचारतः ॥१८६॥ दुःखीति—पूर्वपक्षी कहता है कि आपके कथनानुसार दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध रहने पर भी 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान होने पर उक्त वाक्य से 'मैं दुःखरहित हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तुम ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि 'दुःखित्वज्ञान' का व्यभिचार दिखाई देता है ॥ १८६ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी पुनः शंका करता है कि दुःखित्वाभिमान का प्रत्यक्षाभासत्व सिद्ध होने पर भी 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान तो होता है, किन्तु वाक्य से 'मैं दुःखहीन हूँ' यह ज्ञान नहीं होता । तब सिद्धान्ती कहता है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस दुःखित्वज्ञान का व्यभिचार दिखाई देता है । पूर्वपक्षी के कहने का अभिप्राय यह है कि विरोधिता- लक्षण अप्रामाण्य के न रहने पर भी अनुपपत्तिलक्षण अप्रामाण्य तो वाक्य में है ही । प्रत्यक्ष तो पूर्व से ही सिद्ध रहने से असंजातविरोधी है, इसलिये वही प्रबल है, वाक्य प्रबल नहीं है । तब सिद्धान्ती व्यभिचारप्रदर्शन कर रहा है ॥ १८६ ॥ १. ( जै. सू. १०।१।१-३, २।१-२ ) २. ( तै. सं. २।३।२।३ )

२४८ उपदेशसाहस्री स्वप्ने दुःख्यहमध्यासं दाहच्छेदादिहेतुतः । तत्कालभाविभिर्वाक्यैर्न बाधः क्रियते यदि ॥१८७॥ स्वप्न इति—व्यभिचार इस प्रकार है कि स्वप्नावस्था में मैं दाह-छेदन आदि कारणों से दुःखी था, उसके बाद आप्त जनों के उपदेश से दुःखरहित हो गया—यह अनुभव रहने से समझ में आता है कि दुःखित्व धर्म 'आत्मा' का नहीं है। यदि स्वप्न के वाक्यों से उसका बाध न भी हुआ हो तो......॥ १८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी व्यभिचार को दिखा रहे हैं—स्वप्नावस्था में दाह-छेदनादि कारणों से मैं दुःखी था । पश्चात् आप्त के उपदेश से दुःखहीन हो गया—यह अनुभव होता है, उस कारण यह दुःखित्व, आत्मा का धर्म नहीं है ॥१८७॥ समाप्तेस्तर्हि दुःखस्य प्राक्च तद्बाध इष्यताम् । न हि दुःखस्य सन्तानो भ्रान्तेर्वा दृश्यते क्वचित् ॥१८८॥ समाप्तेरिति—उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसके बाध का स्वीकार करो। क्योंकि शुक्ति-रजतादि के भ्रम के समान आत्मा में दुःखपरम्परा का रहना भी किसी ने देखा नहीं है ॥ १८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी तथापि पूर्वपक्षी के अभिनिवेश के अनुसार कहें कि स्वप्नावस्था के वाक्यों से उसका बाध न भी किया गया हो तो उस दुःख की समाप्ति में और उससे पूर्व उसका बाध स्वीकार करना ही चाहिये, क्योंकि दुःख के पूर्व और उसकी समाप्ति में तो दुःख का अभाव ही है। शुक्तिरजतादि भ्रम के तुल्य आत्मा में दुःखपरम्परा के भी कभी दर्शन नहीं होते । वह भी आरोपित ही है। अतः उसे आत्मा का स्वरूप नहीं कह सकते, क्योंकि वह आगन्तुक है किन्तु आत्मा नित्यसिद्ध है। इसलिये वाक्य के असामर्थ्य की शंका भी नहीं की जा सकती है ॥ १८८ ॥ प्रत्यगात्मन आत्मत्वं दुःख्यस्मीत्यस्य बाधया । दशमं नवमस्येव वेद चेदविरुद्धता ॥१८९॥ प्रत्यगात्मनेति—जिस प्रकार लोक में नवम का बाध करके दशम व्यक्ति का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि महावाक्य से 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तब भी वाक्यार्थ के प्रबल रहने में कोई विरोध नहीं हो सकता ॥ १८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार लोकव्यवहार में नवम का बाध करके दशम पुरुष का ज्ञान होता है, उसी प्रकार यदि महावाक्य द्वारा 'मैं दुःखी हूँ' इस ज्ञान का बाध करके प्रत्यगात्मा के आत्मत्व का अनुभव हो जाता है, तथापि वाक्यार्थ की प्रबलता में कोई विरोध नहीं हो सकता । अतः वाक्य को प्रत्यक्ष से दुर्बल नहीं कह सकते ॥ १८९ ॥ नित्यमुक्तत्वविज्ञानं वाक्याद्भवति नान्यतः । वाक्यार्थस्यापि विज्ञानं पदार्थस्मृतिपूर्वकम् ॥१९०॥ नित्येति—विस्तार से कहे गये न्यायार्थ को चार श्लोकों के द्वारा संक्षेप में कह रहे हैं। आत्मा के नित्य- मुक्तत्व का ज्ञान भी वाक्य से ही होता है, किसी अन्य प्रमाण से नहीं। तथा वाक्यार्थ का ज्ञान भी पदों के अर्थ की स्मृति के द्वारा ही हो सकता है ॥ १९० ॥ अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पदार्थः स्मर्यते ध्रुवम् । एवं निर्दुःखमात्मानमक्रियं प्रतिपद्यते ॥१९१॥

अन्वयेति—और पदों के अर्थ का स्मरण अन्वय-व्यतिरेक से ही होता है। इस रीति से दुःखहीन तथा निष्क्रिय आत्मा की प्राप्ति होती है ॥ १९१ ॥ सदेवेत्यादिवाक्येभ्यः प्रमा स्फुटतरा भवेत् । दशमस्त्वमसीत्यस्माद्यथैवं प्रत्यगात्मनि ॥१९२॥ सदेवेति—जिस प्रकार 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) ज्ञान होता है, उसी प्रकार 'सदेव सोम्येद्- मग्र आसीत्' इत्यादि वाक्यों द्वारा प्रत्यगात्मा का अपरोक्ष ज्ञान होता है ॥ १९२ ॥ प्रबोधेन यथा स्वाप्नं सर्वदुःखं निवर्तते । प्रत्यगात्मधिया तद्वद्दुःखित्वं सर्वदाऽऽत्मनः ॥१९३॥ प्रबोधेनेति—जिस प्रकार प्रबोध होने पर (जागने पर ) स्वप्न में प्राप्त हुआ समस्त दुःख दूर हो जाता है, उसी प्रकार प्रत्यगात्मबुद्धि से सर्वदा ही आत्मा के दुःखित्व की निवृत्ति हो जाती है ॥ १९३ ॥ कृष्णलादौ प्रमाऽजन्म तदन्यार्थाऽमृदुत्वतः । तत्त्वमस्यादिवाक्येषु न त्वेवमविरोधतः ॥१९४॥ कृष्णलादाविति—पूर्वं दिये गये कृष्णलपाक दृष्टान्त के वैषम्य को स्फुट करते हैं। 'कृष्णलान् श्रपयेत्' इत्यादि वाक्य से जो प्रमा की अनुत्पत्ति है, वह अन्य कारण से है। अर्थात् कृष्णलों की अमृदुलता (कठोरता) ही उसमें कारण है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में वैसी बात नहीं है, क्योंकि उसमें कोई ऐसा विरोध नहीं है। अर्थात् कृष्णलों के उबाले जाने पर भी उनमें पाकक्रिया नहीं होती, किन्तु तत्त्वमस्यादि वाक्यों में ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनमें ऐसा कोई विरोध नहीं है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से प्रमा की अनुत्पत्ति होती है, यह नहीं कह सकते ॥ १९४ ॥ वाक्ये तत्त्वमसीत्यस्मिन् ज्ञातार्थं तदसिद्वयम् । त्वमर्थे सत्यसाहाय्याद्वाक्यं नोत्पादयेत्प्रमाम् ॥१९५॥ वाक्य इति—प्रकृत में वैसा विरोध नहीं है। पूर्वोक्त श्लोक (१८१) में जो कहा गया था, उसी को विस्तृत करते हुए त्वं-पदार्थ के विवेचन में अधिक प्रयत्न करने के लिये कहा जा रहा है—'तत्त्वमसि' वाक्य में 'तत्' और 'असि' इन दो पदों का अर्थ तो ज्ञात है, किन्तु 'त्वम्' पद का अर्थ ज्ञात न होने पर उसकी सहायता न होने के कारण उस वाक्य से अपरोक्ष निश्चयरूप प्रमा की उत्पत्ति नहीं हो सकती। अतः 'त्वम्' पद का शोधन करने के लिये विशेष प्रयत्न की आवश्यकता है ॥ १९५ ॥ तत्त्वमोस्तुल्यनीडार्थमसीत्येतत्पदं भवेत् ॥१९६॥ तत्त्वमोरिति—'तत्' और 'त्वम्' पदों का सामानाधिकरण्य प्रदर्शित करने के लिये ही 'असि' पद का उपयोग किया गया है। तुल्यनीडार्थ अर्थात् 'कुरु' 'चिन्तय' इत्यादि क्रिया की आकांक्षा का निवारण हो जाने से सामानाधिकरण्य की सिद्धि हो जाती है। अतः ऐक्यावलम्बनत्व के स्पष्टीकरणार्थ 'असि' और 'अस्मि' इत्यादि पदों का उपयोग किया गया है ॥ १९६ ॥ तच्छब्दः प्रत्यगात्मार्थस्तच्छब्दार्थस्त्वमस्तथा । *दुःखित्वाप्रत्यगात्मत्वं वारयेतामुभावपि ॥१९७॥ तच्छब्द इति—सामानाधिकरण्य के निराकांक्ष होने से क्या लाभ है? लाभ यह है कि 'तत्' और 'त्वम्' पदों का सामानाधिकरण्य होने से ही 'तत्' शब्द का अर्थ प्रत्यगात्मा है, और 'त्वम्' शब्द का अर्थ 'तत्' शब्दार्थभूत वस्तु है।

  • दुःखित्वात्—पाठान्तरम् । ३२

२५० - उपदेशसाहस्री - इस रीति से 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थ का अभेद होने के कारण वे दोनों पद 'त्वम्' पदार्थ के दुःखित्व और 'तत्' पदार्थ के अनात्मत्व तथा परोक्षत्व का बाध करते हैं ॥ १९७ ॥ एवं च नेति नेत्यर्थं गमयेतां परस्परम् ॥१९८॥ एवमिति—इस प्रकार वाक्यार्थ करने पर अद्वितीयत्वपरक श्रुति से अविरोध सम्पन्न हो जाता है। अर्थात् वे परस्पर 'नेति-नेति' वाक्य के अर्थ का बोध कराते हैं ॥ १९८ ॥ एवं तत्त्वमसीत्यस्य गम्यमाने फले कथम् । अप्रमाणत्वमस्यो*क्त्वा क्रियापेक्षत्वमुच्यते ॥१९९॥ एवं तत्त्वमसीति—पूर्वपक्षी के मत में अकारण (प्रमाणरहित) ही श्रुतहानि और अश्रुतकल्पना करनी पड़ती है। इस तरह 'तत्त्वमसि' वाक्य के फल का ज्ञान हो जाने पर उसका अप्रामाण्य अथवा क्रियापेक्षत्व कैसे कहा जा सकता है ? उसके प्रामाण्य को पूर्व बता चुके हैं ॥ १९९ ॥ तस्मादाद्यन्तमध्येषु कुर्वित्येतद्विरोध्यतः । न कल्पाऽमोऽश्रुतत्वाच्च श्रुतत्यागोऽप्यनर्थकः ॥२००॥ तस्मादिति—आरंभ में 'तत्त्वमसि' इस प्रथमोपदेश में, मध्य में अर्थात् पदार्थ परिशोधन के अन्वय-व्यतिरेक- ग्रहण काल में और अन्त में अर्थात् निर्विचिकित्स ब्रह्मानुभाव के काल में 'कुरु'=करो—इस प्रकार की विधि का विरोध होने से और उसके श्रुतिमूलक न होने के कारण इसके क्रियापेक्षत्व की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी अवस्था में ब्रह्मात्मैक्य रूप श्रुत अर्थ का त्याग करना भी व्यर्थ ही है ॥ २०० ॥ यथानुभूयते तृप्तिर्भुजेर्वाक्यान्न गम्यते । वाक्यस्य विधित्तिस्तद्वद्गोशकृत्पायसीक्रिया ॥२०१॥ यथेति—उक्त अर्थ को न समझ कर पुनः आक्षेप कर रहा है—जिस प्रकार भोजन करने से ही तृप्तिरूप फल का अनुभव होता है, केवल वाक्यार्थ के ज्ञान मात्र से नहीं, तथा जैसे गोशकृत् (गोमय) से पायस (खीर) नहीं बनती, क्योंकि वह पायस का साधन नहीं है। उसी प्रकार वाक्यार्थ के अवधारण मात्र से ब्रह्मात्मैक्य साक्षात्कार नहीं हो सकता। क्योंकि वह भी उसका साधन नहीं है ॥ २०१ ॥ सत्यमेवमनात्मार्थवाक्यात्पारोक्ष्यबोधनम् । प्रत्यगात्मनि न त्वेवं संख्याप्राप्तिवदध्रुवम् ॥२०२॥ सत्यमेवमिति—इस प्रकार सिद्धान्ती कहता है कि अनात्म वस्तु के प्रतिपादक वाक्य से परोक्ष ज्ञान ही होता है, यह कहना तो ठीक है, किन्तु 'दशमस्त्वमसि' वाक्य से दशम संख्या की प्राप्ति के समान प्रत्यगात्मा के विषय में वैसा अनिश्चित ज्ञान नहीं होता, अपितु निश्चित ही होता है। एवंच वाक्य, निश्चित रूप से अपरोक्ष ज्ञान का साधन है ॥२०२॥ †स्वसंवेद्यत्वपर्यायः स्वप्रमाणक इष्यताम् । निवृत्ता‡वहम्ः सिद्धः स्वात्मनोऽनुभवश्च नः ॥२०३॥ स्वयमिति—'आत्मा' को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो, जिसका अहंकार नष्ट हो गया है, उसे आत्मा का अनुभव होना सिद्ध ही है—यह हमारा सिद्धान्त है ॥ २०३ ॥ हृदयस्पशिनी 'स्वतः अपरोक्ष प्रत्यगात्मा ही ब्रह्म है',—इस उपदेश से अपरोक्ष ज्ञान होता है। आत्मा को स्वयंप्रकाश और स्वतःप्रमाण समझो। क्योंकि 'स्वयं ज्योतिष्ट्वादि' श्रुति १ इसमें प्रमाण है। तथाच वाक्य से ब्रह्मभेदक अहंकार १. (बृ. उ. ४।३।९, १४)

  • क्त्वा—पाठान्तरम् । † स्वयं वे०—पाठान्तरम् । ‡ विदमः—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५१ की निवृत्ति होनेपर हमारे मत में स्वात्मानुभव तो सिद्ध ही है। कोई किसी प्रकार की अनुपपत्ति नहीं है। पूर्वपक्षी के अनुमान 'विमतं परोक्षार्थज्ञानजनकं वाक्यत्वात् संमतवत्' में 'अनात्मविषयत्व' उपाधि है, और दशमस्त्वमसि में व्यभिचार भी है ॥ २०३ ॥ बुद्धीनां विषयो दुःखं नो यस्य विषया मताः । कुतोऽस्य दुःखसंबन्धो दृशेः स्यात्प्रत्यगात्मनः ॥२०४॥ बुद्धीनामिति—दुःख तो बुद्धिवृत्तियों का विषय है। तब जिसको विषय अभिमत ही नहीं है, उस साक्षीरूप प्रत्यगात्मा का दुःख के साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है ? ॥ २०४॥ हृदयस्पर्शिनी पहले की हुई दुःखानुभवविरोध की आशंका भी उचित नहीं है, क्योंकि दुःख तो व्यभिचारी होने से वह आत्मा का धर्म नहीं है, वह तो विषय का धर्म है। दुःख तो बुद्धिवृत्तियों का विषय है। जिसे विषय अभिमत नहीं है, उस साक्षी प्रत्यगात्मा का दुःख से संबंध कैसे हो सकता है। 'दुःखी अहमस्मि' सुनने पर अहंकार ही दुःखधर्मवान् है, ऐसा अनुभव होता है, अतः वह उसीका विषय है। बुद्धिवृत्त्याश्रय अहंकार का साक्षी जो आत्मा है, उसका वह धर्म नहीं है ॥ २०४ ॥ दृशिरेवाऽनुभूयेत स्वेनैवाऽनुभवात्मना । तदाभासतया जन्म धियोऽस्याऽनुभवः स्मृतः ॥२०५॥ दृशिरेवेति—ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं अनुभवरूप है, वह अपने द्वारा ही अनुभव किया जाता है। चिदाभास की व्याप्ति से बुद्धिवृत्ति का उत्पन्न होना ही उसका अनुभव माना गया है ॥ २०५॥ हृदयस्पर्शिनी यदि प्रत्यगात्मा सर्वधर्मरहित है, तो उसका अनुभव कैसे हो पाता है ? ज्ञानस्वरूप आत्मा स्वयं अनुभव- स्वरूप है, अतः उसके स्वरूप के लिये अन्य किस अनुभव की अपेक्षा होगी ? अर्थात् वह अपने द्वारा ही अनुभव किया जाता है। चिदाभास की व्याप्ति से बुद्धिवृत्ति का उदय होना ही उसका विशेष अनुभव (आगन्तुक अनुभव) कहा गया है ॥ २०५ ॥ अशनायादिनिर्मुक्तः सिद्धो मोक्षस्त्वमेव सः । श्रोतव्यादि तवेत्येतद्विरुद्धं कथमुच्यते ॥२०६॥ अशनायादीति—क्षुधा-तृष्णा आदि से रहित जो नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) है, वह तुम ही हो। तब 'तुम्हारे लिये श्रवणादि अनुष्ठेय हैं'—यह विरुद्ध बात क्यों कह रहे हैं ? ॥ २०६॥ हृदयस्पर्शिनी क्षुधादि से रहित जो नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्मत्व) है, वह तुम ही हो अर्थात् सर्वसंसारविनिर्मुक्त नित्यसिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) तुम ही हो, इस प्रकार आचार्य के द्वारा उपदेश दिये जानेपर पुनः यह कहना कि तुम्हारे लिये श्रवणादि अनुष्ठेय हैं, ऐसी विरुद्ध बात क्यों कही जाती है ? इससे तो यही अभिप्राय होगा कि 'तुम अविक्रिय ब्रह्म नहीं हो', और 'तुम कर्ता हो' आदि वाक्य ही प्रमाण होंगे ॥ २०६ ॥ सेत्स्यतीत्येव चेत्तत्स्याच्छ्रवणादि तदा भवेत् । मोक्षस्यानित्यता स्याद्विरोधे नान्यथा वचः ॥२०७॥ सेत्स्यतीति—यदि यह कहो कि 'आत्मा' में क्रिया तो सिद्ध ही है, इसलिये श्रवणादि को अनुष्ठेय कहा गया है। तब तो 'मोक्ष' को अनित्य कहना पड़ेगा। यह विरोध होने से उक्त महावाक्य की अन्य प्रकार से योजना नहीं कर सकते ॥ २०७॥

२५२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पार्शिनी यदि कहो कि 'तत्त्वमसि' इस उपदेशवाक्य में 'तत् त्वं सेत्स्यसि' ऐसा विपरिणाम करके उक्त महावाक्य की योजना कर लेंगे, तो 'एकं सन्धित्सतः अपरं प्रच्यवते'१—न्याय से मोक्ष की अनित्यता प्राप्त होगी । इस प्रकार उभयथा विरोध होने के कारण वाक्य में विपरिणाम करना उचित नहीं है । अभिप्राय यह है कि आत्मा में क्रिया सिद्ध होने के कारण श्रवणादि किये जाते हैं, ऐसा यदि कहें तो उस अवस्था में मोक्ष की अनित्यता का प्रसंग प्राप्त होगा । इस प्रकार विरोध उपस्थित होने के कारण उक्त वाक्य की योजना किसी अन्य प्रकार से नहीं करनी चाहिये ॥ २०७ ॥ श्रोतृत्वश्रोतव्ययोर्भेदो यदीष्टः स्याद्भवेदिदम् । इष्टार्थकोप एवं स्यान्न युक्तं सर्वथा वचः ॥२०८॥ श्रोत्रिति—श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट रहने पर ही प्रसंख्यान (श्रवणादि कर्म) का अनुष्ठान हो सकता है, किन्तु ऐसा मानने पर अभीष्ट अर्थ की हानि हो जायगी । इसलिये भेद की अभीष्टता किसी प्रकार भी उचित नहीं है ॥ २०८ ॥ हृदयस्पार्शिनी यदि श्रोता और श्रोतव्य विषय का भेद अभीष्ट हो तो इस प्रकार का प्रसंख्यान अर्थात् श्रवणादि कर्म का संभव हो भी सकेगा, क्योंकि कार्य की उपपत्ति, कर्तृ-कर्म के भिन्न होनेपर ही हो पाती है, अन्यथा नहीं । कार्योपपत्ति के लिये भेद माननेपर इष्ट अर्थ (जीव का ब्रह्मभाव) का विनाश हो जायगा । क्योंकि अन्य में अन्य भाव नहीं होता । अतः प्रसंख्यान पक्ष में वाक्य सर्वथैव अप्रमाण होगा । एवं च प्रसंख्यानवाद भी उपपन्न नहीं है ॥ २०८ ॥ सिद्धो मोक्षोऽहमित्येवं ज्ञात्वाऽऽत्मानं भवेद्यदि । चिकीर्षुर्यः स मूढात्मा शास्त्रं चोद्घाटयत्यपि ॥२०९॥ सिद्ध इति—जो व्यक्ति 'मैं नित्य सिद्ध मोक्ष हूँ' इस प्रकार आत्मा को जानकर भी पुनः कर्मानुष्ठान की इच्छा करता है, वह मूढमति तो शास्त्र का उच्छेद ही कर रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ २०९ ॥ न हि सिद्धस्य कर्तव्यं सकार्यस्य न सिद्धता । उभयालम्बनं कुर्वन्नाऽऽत्मानं वञ्चयत्यपि† ॥२१०॥ न हीति—सिद्ध वस्तु का कोई कर्तव्य नहीं होता तथा सक्रिय वस्तु (साध्य वस्तु) की सिद्धता नहीं हुआ करती। जो लोग दोनों का एकसाथ (युगपत्) आलम्बन (आश्रय) करते हैं, वे स्वयं ही अपने को धोखे में डालते हैं ॥२१०॥ हृदयस्पार्शिनी सिद्ध और साध्य के भेद से वस्तु दो प्रकार की होती है । घट-पटादि वस्तु विद्यमान रहती है, इस कारण वह सिद्ध है, और धर्मादि वस्तु अनुष्ठेय होने से साध्य कहलाती है । 'मोक्ष' तो आत्मा का स्वरूप ही है, अतः वह सिद्ध वस्तु है । सिद्ध वस्तु भी नित्य और अनित्य भेद से दो प्रकार की रहती है । नित्य वस्तु 'जन्य' नहीं हुआ करती । अतः जो लोग मोक्ष को जन्य मानते हैं, उनके मत से तो वह अनित्य सिद्ध होता है । अतः उनका इस प्रकार मानना कोरा भ्रम ही है । सिद्ध वस्तु कर्तव्य कोटि में नहीं आती, और कर्तव्य कोटि में आनेवाली वस्तु की सिद्धता नहीं कही जाती । किन्तु यह मूढ़बुद्धि व्यक्ति दोनों का एकसाथ आलम्बन करके अपनी ही वञ्चना करता रहता है ॥ २१० ॥ सिद्धो मोक्षस्त्वमित्येतद्वस्तुमात्रं प्रदर्श्यते । श्रोतुस्तथात्वविज्ञाने प्रवृत्तिः स्यात्कथं ‡न्त्विति ॥२११॥ १. इस न्याय का प्रयोग खण्डनखण्डखाद्य में अनैकान्तिक खण्डन के अवसर पर किया गया है । 'अनुसन्धित्सतः' इस पाठ भेद से उक्त न्याय का उपयोग सर्वदर्शनसंग्रह के आर्हत और अक्षपाददर्शन में भी हुआ है ।

  • त्येव०—पाठान्तरम् । † त्यसो०—पाठान्तरम् । ‡ त्विति०—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५३ सिद्ध इति—पूर्वपक्षो कहता है कि 'तुम नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) हो'—यह कहकर केवल वस्तुमात्र को प्रद- र्शित कर रहे हो तो श्रोता की वस्तु त्व विज्ञानमात्र में प्रवृत्ति कैसे हो पायेगी ? ।। २११ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती के द्वारा की गई निन्दा को सुनकर पूर्वपक्षी अपने अभिप्राय को प्रकट कर रहा है—'तुम नित्य सिद्ध मोक्ष (ब्रह्म) हो' ऐसा कह कर केवल वस्तुमात्र को प्रदर्शित किया जाता है । ऐसी स्थिति में वस्तुत्वविज्ञान मात्र में श्रोता की प्रवृत्ति कैसे होगी ? तात्पर्य यह है कि 'मुमुक्षु पुरुष की आत्मविज्ञान में प्रवृत्ति होने के लिये सिद्ध ब्रह्म रूप मोक्ष तुम हो' यह कथन वस्तुमात्रकथनपरक है, तत्त्व में उसका कोई तात्पर्य नहीं है ।। २११ ।। कर्ता दुःख्यहमस्मीति प्रत्यक्षेणाऽनुभूयते । कर्ता दुःखी च माभूवमिति यत्नो भवेत्ततः ॥२१२॥ कर्तेति—अपने अभिप्राय को ही और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं—जब यह प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', तभी 'मैं कर्ता एवं दुःखी न होऊँ' ऐसा ज्ञान हो तो उसके लिये प्रयत्न हो सकेगा ।। २१२ ।। तद्विज्ञानाय युक्त्यादि कर्तव्यं श्रुतिरब्रवीत् । कर्तृत्वाद्यनुवादेन सिद्धत्वानुभवाय तु ॥२१३॥ तद्विज्ञानायेति—भगवती श्रुति ने उसके बोध के लिये ही कर्तृत्व आदि का अनुवाद करते हुए सिद्धत्व का अनुभव कराने के लिये युक्ति आदि की कर्तव्यता को बताया है ।। २१३ ।। हृदयस्पर्शिनी वाक्यश्रवण के अनन्तर 'मन्तव्यः' १ श्रुति से कर्तव्य को बताया गया है, इसलिये भी हमारा कथन स्वीकार करना चाहिये, यह पूर्वपक्षी का अभिप्राय है । श्रुति ने कर्तृत्वादि का अनुवाद करते हुए सिद्धत्व का अनुभव कराने के लिये ही युक्ति आदि की कर्तव्यता का निरूपण किया है । अर्थात् 'श्रोतव्यः' कहकर श्रुति 'निदिध्यासितव्यः' का विधान करती है। इस प्रकार श्रवण-मननादि की कर्तव्यता का उपदेश होने के कारण निश्चय किया जाता है कि आत्मज्ञान के लिये क्रिया की आवश्यकता है । 'त्वम्' से कर्तृत्व का अनुवाद करके वस्तुगत्या तुम सिद्ध मोक्ष ब्रह्मरूप हो, अतः उसके ज्ञानार्थ प्रयत्न करो—यह वाक्य का तात्पर्य है ।। २१३ ।। निर्दुःखो निष्क्रियोऽकामः सिद्धो मोक्षोऽहमित्यपि । गृहीत्वैव* विरुद्धार्थमादध्यात्कथमेव सः ॥२१४॥ निर्दुःख इति—सिद्धान्ती कहता है कि 'मैं दुःखरहित, निष्क्रिय, निष्काम, नित्यसिद्ध मोक्ष ही हूँ'—ऐसा समझने के बाद, कौन ऐसा होगा कि जो इसके विपरीत स्वभाववाले पदार्थों का ग्रहण करेगा ? ।। २१४ ।। हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती कहता है कि पूर्वपक्षी की यह कल्पना श्रुत्यनुसारिणी नहीं है । "मैं दुःखरहित, निष्क्रिय, निष्काम, नित्यसिद्ध मोक्ष ही हूँ" ऐसा ग्रहण करके भी मनुष्य, उक्तार्थ के विपरीत स्वभाववाले पदार्थों को कैसे ग्रहण कर सकता है ? अतः वाक्य से वाक्यार्थ का ज्ञान होता ही नहीं—यह कथन उचित नहीं है । अन्यथा उसे अप्रमाण कहना होगा, और अनुभवविरोध भी होगा । तथाच ज्ञान के उत्पन्न होने पर तद्विरुद्ध प्रतिपत्ति ( ज्ञान ) होना संगत नहीं है ।। २१४ ।। सकामः सक्रियोऽसिद्ध इति मेऽनुभवः कथम् । अतो मे विपरीतस्य तद्ब्रूवान् वक्तुमर्हति ॥२१५॥ १. ( बृ. उ. २।४।५, ४।५।६ )

  • न्वैत्वं—पाठान्तरम् ।

२५४ उपदेशसाहस्री सकाम इति—इस पर पूर्वपक्षी का कहना है कि यदि गुरुपदिष्ट वाक्य के श्रवण मात्र से ही दुःखरहित आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो आप ही बताइये कि सकामत्वादि से विपरीत स्वभाववाले मुझको 'मैं सकाम, सक्रिय और असिद्ध हूँ'—यह अनुभव क्यों होता है ? ॥ २१५ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर पूर्वपक्षी कहता है कि यदि वाक्यश्रवणमात्र से ही निर्दुःखादिरूप आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, तो बताओ कि सकामत्वादि से विपरीत स्वभाववाले मुझ ब्रह्मरूप हुए को 'मैं सकाम, सक्रिय और असिद्ध हूँ'— ऐसा अनुभव क्यों होता है ? ॥ २१५ ॥ इहैव घटते प्रश्नो न मुक्तत्वानुभूतये । प्रमाणेन विरोधी यः सोऽत्रार्थः प्रश्नमर्हति ॥२१६॥ इहैवेति—उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि 'मैं अपने स्वभाव से अन्य स्वभाव वाला कैसे लगता हूँ ?' इस प्रकार का प्रश्न तो हो सकता है, तथापि 'मुक्तत्व' की अनुभूति के सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं पैदा होता । क्योंकि जो वस्तु प्रमाणविरुद्ध होती है, उसी के विषय में लोग प्रश्न किया करते हैं ॥ २१६ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर सिद्धान्ती कहता है कि 'मैं एक स्वभाव का होते हुए भी अन्य स्वभाव का कैसे जान पड़ता हूँ ?'— इस विषय में तो प्रश्न हो सकता है । किन्तु मुक्तत्व की अनुभूति के विषय में कोई प्रश्न नहीं हो सकता, क्योंकि जो वस्तु प्रमाण से विरुद्ध होती है, उसी के विषय में प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१६ ॥ अहं निर्मुक्त इत्येव सदसीत्यन्यमानजः । प्रत्यक्षाभासजन्यत्वादुःखित्वं प्रश्नमर्हति ॥२१७॥ अहमिति—'मैं मुक्त हूँ', तथा 'तू सत् है'—यह ज्ञान श्रुतिप्रमाण से हुआ है । किन्तु 'मैं दुःखी हूँ' यह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाणाभास से उत्पन्न होता है। अतः दुःखित्व के विषय में तो प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१७ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'प्रमाण' का स्वभाव तो अज्ञात का ज्ञापन करना है । ऐसे प्रमाण के द्वारा अपूर्वार्थ बोधित होने पर तद्विरोधी अर्थात् प्रमाणाभास के द्वारा गृहीत जो अर्थ है, उसके विषय में प्रश्न किया जा सकता है । 'मैं मुक्तस्वरूप हूँ' यह ज्ञान तथा 'तू सत् है' यह ज्ञान, अन्य प्रमाण (श्रुतिप्रमाण) से होता है। और दुःखित्व आदि का ज्ञान, प्रत्यक्षा- भास से होता है। अतः दुःखित्वादि के विषय में प्रश्न किया जा सकता है ॥ २१७ ॥ पृष्टमाकाङ्क्षितं वाच्यं दुःखाभावमभीप्सितम् ॥२१८॥ पृष्टमिति—अभिलषित ( अभीप्सित ) विषय का ही प्रश्न किया जाता है । अभिलषित विषय (वस्तु) क्या है ? यह पूछने पर यही कहा जायगा कि सबको अभिलषित वस्तु एक ही है, जिसे 'दुःखाभावरूप ब्रह्म' कहते हैं ॥ २१८ ॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य की आकांक्षा को देखते हुए भी कार्य की कल्पना करना उचित प्रतीत नहीं हो रही है । जिस वस्तु के विषय में प्रश्न किया जाता है, उसे अभिलषित कहते हैं । शिष्य की आकांक्षित क्या है ? तो कहना होगा कि उसे 'दुःखाभाव' ही अभिलषित ( आकांक्षित ) है । दुःख का अभाव है जिसमें, ऐसा दुःखाभाव, ब्रह्मरूप (मोक्षस्वरूप) ही है ॥ २१८ ॥ कथं हीदं निवर्तेत दुःखं सर्वात्मना मम । इति प्रश्नानुरूपं यद्वाच्यं दुःखनिवर्तकम् ॥२१९॥

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५५ कथमिति—मेरे इस संसाररूप दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति किस प्रकार होगी ? यही प्रश्न किया गया है, अतः उसके अनुरूप ही उत्तर देना चाहिये । अतः दुःखनिवृत्ति के उपाय को बताना ही उचित है। एवं च दुःखनिवृत्ति का उपाय एकमात्र 'ज्ञान' ही है, 'कर्म' नहीं—यह श्रुति ने बताया है ॥ २१९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्य का जैसा प्रश्न हो, तदनुकूल ही उत्तर (प्रतिवचन) होना चाहिये—मेरा यह संसाररूप दुःख, सर्वथा निवृत्त (दूर) कैसे होगा ? इस प्रश्न के अनुरूप जो दुःख की निवृत्ति करने वाला हो, उसी का वर्णन करना उचित है । इससे भी स्पष्ट होता है कि दुःखनिवृत्ति का साधनभूत ज्ञान ही श्रुति का प्रतिपाद्य है, कर्म नहीं ॥२१९॥ श्रुतेः स्वात्मनि नाशङ्का प्रामाण्ये सति विद्यते । तस्मादात्मविमुक्तत्वं* प्रत्याययति तद्वचः । वक्तव्यं तत्तथार्थं स्याद्विरोधेऽसति केनचित् ॥२२०॥ श्रुतेरिति—भगवती श्रुति तो 'स्वतःप्रमाण' है। अतः अपने प्रतिपाद्य प्रमेय के विषय में उसे किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। अतः वह शब्द के द्वारा आत्मा की मुक्तता का बोध करा देती है। भगवती श्रुति सबकी परम आप्त है, इसलिये किसी प्रमाण का विरोध न रहने पर यथार्थ अर्थ का प्रतिपादन करना उसका कर्तव्य हो जाता है ॥ २२० ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रसंख्यान के द्वारा प्रश्न के अनुरूप कहा, यह तो ठीक है, क्योंकि तद्व्यतिरेक से (तद्विपरीत) यदि कहेंगे तो श्रुति में दुःखापनोदन का सामर्थ्य नहीं है, यह शंका होती है। उसके उत्तर में कहते हैं कि प्रमेयावबोधन करना ही प्रमाण का कार्य है; उसके अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं। श्रुति का प्रामाण्य स्वतःसिद्ध है, अतः उसे अपने प्रमेय के विषय में कोई सन्देह नहीं है। अतः स्वप्रमेयावभास सामर्थ्याभाव की आशंका नहीं कर सकते । अतः श्रुतिवाक्य से आत्मा की मुक्तता का परिचय प्राप्त होता है। और किसी प्रमाण के साथ विरोध न रहने पर उसे अपना समुचित अर्थ ही बताना चाहिये ॥ २२० ॥ इतोऽन्योऽनुभवः कश्चिदात्मनो नोपपद्यते । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातारमिति श्रुतेः ॥२२१॥ इत इति—उक्त अर्थ का अनुभव करानेवाला 'वाक्य' ही है, यदि उसका परित्याग करें तो अन्य कोई प्रकार नहीं है, जो अनुभव करावे और प्रकारान्तर की कल्पना भी श्रुति विरोध के कारण नहीं की जा सकती ॥ २२१ ॥ हृदयस्पर्शिनी “ज्ञानियों की दृष्टि में आत्मा अविज्ञात है¹” तथा “विज्ञाता को किस प्रमाण के द्वारा जाने²”—इन श्रुतियों के अनुसार इससे भिन्न आत्मा का कोई और अनुभव होना संभव नहीं है ॥ २२१ ॥ त्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम् । साधनत्वं व्रजत्येवं शान्तो दान्तानुशासनात् ॥२२२॥ त्वमिति—'त्वम्' पदार्थ का विवेक करने के लिये श्रुति ने समस्त कर्मों के त्याग को ही 'साधन' बताया है ॥ २२२ ॥ १. (के. उ. ११) २. (बृ. उ. २।४।१४)

  • त्वप्रत्ययं याति—पाठान्तरम् ।

२५६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी "शान्तो१ दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति" ऐसी श्रुति होने के कारण 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक करने के लिए समस्त कर्मों का त्याग, साधन बन जाता है। अतः वह अशास्त्रसंवेद्य नहीं है, जिससे उसका परित्याग नहीं किया जा सकता। तथाच, पदार्थाज्ञान से पूर्व वाक्यार्थज्ञान होने से पदार्थावधारण तक आश्रमधर्मों का विधिपूर्वक अनुष्ठान करना ही होगा। उसके पश्चात् वेदान्तवाक्य से ब्रह्मात्मतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर 'मया इदं अस्मै कर्तव्यम्' इस प्रकार नियोज्य विषय का ज्ञान न होने से उस व्यक्ति के लिये कहीं भी विधि में प्रवृत्ति नहीं होगी। किन्तु साधक अवस्था में ज्ञान के अविरुद्ध निवृत्तिरूप आश्रमधर्म का अभ्यास रहने के कारण संस्कारमात्र शेष रहने से अनुवृत्तिमात्र होती रहती है, उस कारण यथेष्टाचरण के लिए कोई अवकाश नहीं है। अतः सिद्धान्ती के मत में कोई किसी प्रकार का दोष नहीं है ॥ २२२ ॥ त्वमर्थं प्रत्यगात्मानं पश्येदात्मानमात्मनि । वाक्यार्थं तत आत्मानं सर्वं पश्यति केवलम् ॥२२३॥ त्वमर्थमिति—शम-दमादि साधनसम्पत्ति से सम्पन्न पुरुष, 'त्वम्' पद के अर्थभूत 'प्रत्यगात्मा' को अपने अन्तः- करण में ही देखने का अभ्यास करता रहे। ऐसा अभ्यास करने से कालान्तर में वह सर्वत्र सभी को वाक्यार्थभूत 'शुद्ध आत्मा' के रूप में देखने लगता है ॥ २२३ ॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त कथन का ही विस्तार करते हुए श्रौत वाक्यार्थज्ञान की उत्पत्ति के प्रकार को बता रहे हैं। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान और श्रद्धा से सम्पन्न होकर जिज्ञासु व्यक्ति आत्माभास से व्याप्त हुए स्वकार्य-कारण संघात (शरीर) में ही, 'त्वं' पद के अर्थभूत प्रत्यक्चेतयितास्वरूप आत्मा को ही देखता रहे। इस प्रकार शोधित प्रत्यगात्मा को वह सर्वत्र देखने लगता है ॥ २२३ ॥ सर्वमात्मेति वाक्यार्थे विज्ञातेऽस्य प्रमाणतः । असत्त्वे ह्यन्यमानस्य विधिस्तं योजयेत्कथम् ॥२२४॥ सर्वमिति—श्रुति प्रमाण के बल पर 'सब आत्मा ही है'—इस वाक्यार्थ को अच्छी तरह से जान लेने पर अन्य अतिरिक्त प्रमाणों का मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है। तब उन मिथ्याभूत प्रमाणों की कौन-सी विधि उस मुमुक्षु को किसी कर्तव्य में नियुक्त कर सकेगी ? ॥ २२४ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रमाण के द्वारा 'सब आत्मा ही है'—इस वाक्यार्थ को विशेष रूप से जान लेने पर तथा अन्य प्रमाणों का मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर उसे कोई विधिवाक्य किस प्रकार नियोजित कर सकेगा ? क्योंकि विधिविषयता तो भेद में ही होती है। ज्ञानी की भेददृष्टि तो समाप्त हो चुकी है। अतः उसके लिये कोई विधि-निषेध नहीं होते ॥ २२४ ॥ तस्माद्वाक्यार्थविज्ञानान्नोध्वं कर्मविधिर्भवेत् । नहि ब्रह्मास्मि कर्तेति विरुद्धे भवतो धियौ ॥२२५॥ तस्मादिति—श्रुत्युक्त ब्रह्मात्मैक्यप्रतिपादक वाक्य का अर्थ जान लेने पर मुमुक्षु पुरुष के लिये कोई कर्मविधि नहीं रह जाती। क्योंकि 'मैं ब्रह्म हूँ', और 'मैं कर्म का कर्ता हूँ'—ये दोनों ज्ञान परस्पर विपरीत हैं। दो विपरीत बुद्धियां (ज्ञान) एक साथ नहीं रह सकती ॥ २२५ ॥ १. बृ. उ. ४।४।२३—'समाहितः' तथा 'पश्यति'—यह काण्वपाठ है और 'श्रद्धावित्तः', तथा 'पश्येत्'—यह माध्यन्दिनपाठ है।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५७ हृदयस्पशिंनी वाक्यार्थज्ञान होने के पूर्व ही विधियों के लिए अवकाश रहता है, वाक्यार्थज्ञान हो जाने के पश्चात् नहीं । तात्पर्य यह है कि वाक्यार्थज्ञान हो जाने के अनन्तर कोई कर्मविधि नहीं रहती। क्योंकि 'मैं ब्रह्म हूँ' और 'मैं कर्ता हूँ' ये दो परस्परविरुद्ध बुद्धियाँ (ज्ञान) कभी एकसाथ नहीं रह सकती ॥ २२५ ॥ ब्रह्मास्मीति च विद्येयं नैव कर्तेति बाध्यते । सकामो बद्ध इत्येवं प्रमाणाभासजातया ॥२२६॥ ब्रह्मास्मीति—'मैं ब्रह्म हूँ'—इस ज्ञान (बुद्धि) को ही 'विद्या' कहते हैं। इसका बाध (निवृत्ति) प्रमाणा- भास से पैदा हुई बुद्धि के द्वारा नहीं हो सकता । अर्थात् 'मैं कर्ता हूँ', मैं सकाम हूँ', 'मैं बद्ध हूँ',—यह ज्ञान (बुद्धि) प्रमाणा- भास से होती है, यह सब अविद्या है। अतः 'अविद्या' से 'विद्या' का बाध नहीं हो सकता ॥ २२६ ॥ हृदयस्पशिनी फिर भी यह शंका हो सकती है कि ऐक्यज्ञान से भेदज्ञान का ही क्यों बाध होता है ? विपरीत बाध्य - बाधकभाव को ही क्यों न कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसी बुद्धि को ही ज्ञान कहते हैं और 'मैं कर्ता हूँ', 'मैं सकाम हूँ', 'मैं बद्ध हूँ' यह प्रमाणाभासजनित ज्ञान है। अतः विपरीत बाध्य-बाधकभाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'बोधवृत्ति' तो प्रमाणजनित है, और 'कर्तृत्वादि बुद्धि' भ्रमजनित है। अतः ज्ञान से ही भ्रम का बाध होता है, भ्रम से ज्ञान का बाध नहीं होता ॥ २२६ ॥ शास्त्रादब्रह्मास्मि नान्योऽहमिति बुद्धिर्भवेद्दृढा । यदा युक्ता तदैवंधीर्यथा देहात्मधीरिव ॥२२७॥ शास्त्रादिति—शास्त्रप्रमाण से मुमुक्षु को जब 'मैं ब्रह्म हूँ, अन्य कोई नहीं हूँ'—यह निश्चित (सुदृढ़) ज्ञान (बुद्धि) हो जाता है, तब उसे 'देहात्मबुद्धि' नहीं होती, उसी तरह 'मैं कर्ता हूँ'—यह बुद्धि भी उसे नहीं होती ॥ २२७ ॥ हृदयस्पशिनी स्वभावप्रवृत्त बुद्धि का प्रमाणजनित बुद्धि से ही बाध होता है, इसे दृष्टान्त देकर बताते हैं। जैसे— शास्त्र के द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ, अन्य कोई नहीं हूँ'—यह बुद्धि जब दृढ़ हो जाती है, तब देहात्मबुद्धि अर्थात् 'मैं मनुष्य हूँ, कर्ता हूँ'—इस प्रकार की बुद्धि नहीं हुआ करती ॥ २२७ ॥ सभयाद्भयं प्राप्तस्तदर्थं यतते च यः। स पुनः सभयं गन्तुं स्वतन्त्रश्चेन्न *होच्छति ॥२२८॥ सभयादिति—जो व्यक्ति भय के स्थान से निकल कर भयरहित स्थान पर पहुँच गया हो, और उसी निर्भ- यता के लिये जो सतत प्रयत्न करता रहता हो वह यदि आने-जाने में स्वतन्त्र है, तो भी वह पुनः भय के स्थान में नहीं जा सकता ॥ २२८ ॥ हृदयस्पशिंनी जो आदमी भय से युक्त स्थान से निकल कर भयरहित स्थान में पहुँच गया है, और उसी के लिए वह प्रयत्न भी करता रहा है, वह आदमी जाने-आने की क्रिया में स्वतन्त्र रहता हुआ भी पुनः भय से युक्त स्थान में नहीं जाता ॥ २२८ ॥ यथेष्टाचरणप्राप्तिः संन्यासादिविधौ कुतः। पदार्थाज्ञानबुद्धस्य वाक्यार्थानुभवाथिनः१ ॥२२९॥ १. नै. सि. ४।६१-६२, तथा भ. गी. ४।१९, १४।२२ से तुलना की जा सकती है ।

  • गच्छति—पाठान्तरम् । ३३

२५८ उपदेशसाहस्री यथेष्टेति—'तत्' और 'त्वम्' पदों के अर्थ का सम्यक् विचार करके जिस मुमुक्षु को बोध (ज्ञान) हुआ है, और जो महावाक्यार्थ का अनुभव करना चाहता है, उसके लिये तो 'संन्यास' आदि का विधान किया गया है। ऐसी स्थिति में उसका स्वेच्छाचार (यथेष्टाचार) हो ही कैसे सकता है ? ॥ २२९ ॥ हृदयस्पर्शिनी विधि-निषेध से रहित होनेपर वह ज्ञानी पुरुष यथेष्ट आचरण करने लगेगा, ऐसी शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि जिसे 'तत्' और 'त्वम्' पद का सम्यक् विचार करने से ज्ञान प्राप्त हुआ है, तथा जो वाक्यार्थ का अनुभव करने में लगा हुआ है, उसके लिए संन्यासविधि, श्रवणादि विधि बतायी गयी है। उससे वह देहाभिमान- शून्य हो जाता है। वह तो वाक्यार्थ का अनुभव करने में तत्पर रहता है। अतः उसके लिए यथेष्ट आचरण करने का कोई निमित्त ही नहीं है और अवसर भी नहीं है। उस ज्ञानी में मिथ्याज्ञान का लेश तक नहीं रहता। अतः वह मिथ्याज्ञानमूलक यथेष्टाचरण कैसे करेगा ? ॥ २२९ ॥ अतः सर्वमिदं सिद्धं यत्प्रागस्माभिरीरितम् ॥ २३०॥ अत इति-अतः पूर्व जो कुछ बताया गया है, वह सभी सिद्ध हो गया ॥ २३० ॥ यो हि यस्माद्विरक्तः स्यान्नासौ तस्मै प्रवर्तते । लोकत्रयाद्विरक्तत्वान्मुमुक्षुः किमितीहते ॥ २३१॥ योहीति-जो व्यक्ति, जिस वस्तु से विरक्त हो जाता है, वह पुनः उस वस्तु के प्रति प्रवृत्त नहीं होता । तब जो मुमुक्षु पुरुष तीनों लोकों से विरक्त हो चुका हो, वह किस वस्तु को चाहेगा ? अर्थात् उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं होती ॥ २३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी जबकि मुमुक्षु को भी यथेष्ट चेष्टा नहीं किया करता, तब मुक्त पुरुष के यथेष्टाचरण की शंका ही कैसे की जा सकती है ? जो व्यक्ति जिससे विरक्त हो जाता है, उसके प्रति वह पुनः प्रवृत्त नहीं हुआ करता । फिर तीनों लोकों से विरक्त हुआ मुमुक्षु पुरुष किस वस्तु की इच्छा करेगा ? अर्थात् वह सर्वथैव निरिच्छ ही रहेगा ॥ २३१ ॥ क्षुधया पीड्यमानोऽपि न विषं ह्यत्तुमिच्छति । *मृष्टान्नध्वस्ततृड् जानन् नामूढस्तज्जिघत्सति ॥२३२॥ क्षुधयेति-भूख से व्याकुल होने पर भी कोई आदमी विष खाना नहीं चाहता । उसी तरह जिस ज्ञानी पुरुष की भूख (अन्न की इच्छा) सुस्वादु मधुर अन्न से शान्त हो चुकी है, वह पुनः उसे खाने की इच्छा नहीं करता । अर्थात् साधना के समय सभी विषयों में उसने दोष-दर्शन कर लिया है, अतः वह ज्ञानी पुरुष पुनः उन विषयों को कैसे स्वीकार करेगा ? ॥ २३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि विद्वान् ज्ञानी पुरुष यद्यपि नियोग (विधि) के परतन्त्र न भी रहे, तो भी भिक्षाटनादि- प्रवृत्ति की तरह विषयान्तरों में भी उसकी प्रवृत्ति कदाचित् होना संभव है। इस शंका का समाधान यह है कि जितने भी विषय हैं, वे सभी दुःख के साधन हैं, ऐसा जिसका निश्चय हो चुका है, वह उन्हें विष की तरह त्याग देता है, अतः वह उन्हें पुनः ग्रहण नहीं करता। भिक्षाटनादि की जो प्रवृत्तियाँ हैं, वे ज्ञाननिष्ठा की विरोधी नहीं हैं। वे तो केवल शरीरस्थिति मात्र की साधनरूपा हैं, इसलिए वे आवश्यक हैं। उनसे कोई अपूर्वोपचय नहीं होता । अर्थात् जो पुरुष क्षुधा से पीड़ित (व्याकुल) है, वह भी विषभक्षण करना नहीं चाहता। तब जिसकी इच्छा मधुर अन्न से तृप्त हो चुकी है, वह ज्ञानी पुरुष उसे खाने की इच्छा कभी कर ही नहीं सकता। संस्कारवशात् भिक्षाटनादि प्रवृत्ति की अनुवृत्तिमात्र होती है ॥ २३२ ॥

  • मिष्टान्न—पाठान्तरम् ।

तत्त्वमसिप्रकरणम् २५९ वेदान्तवाक्यपुष्पेभ्यो ज्ञानामृतमधूत्तमम् । उज्जहारालिवद्यो नस्तस्मै सद्गुरवे नमः ॥२३३॥ वेदान्तेति—जिन्होंने हमारे लिये वेदान्त के वाक्य रूपी पुष्पों से मधुकर (भ्रमर) के समान ज्ञानामृतरूपी मधु निकाल कर दिया, उन सद्गुरु के लिये हमारा प्रणाम है ॥ २३३ ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञानी पुरुष के लिए यद्यपि कोई कार्य शेष नहीं है, तथापि गुरु और शास्त्र के प्रति आदरबुद्धि रखनी ही होगी, इसलिए शिष्य-शिक्षार्थ यह बता रहे हैं कि जिन्होंने भ्रमर के समान वेदान्तवाक्यरूप पुष्पों से हमारे लिए ज्ञानामृतरूप उत्तम मधु निकालकर पान कराया है, उन सद्गुरुदेव के लिए प्रणाम है ॥ २३३ ॥ ॥ इत्यष्टादशं तत्त्वमसिप्रकरणं समाप्तम् ॥

पद्यभाग १९: तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् (मनःसंवाद)

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् प्रयुज्य तृष्णाज्वरनाशकारणं चिकित्सितं ज्ञानविरागभेषजम् । न याति कामज्वरसन्निपातजां शरीरमालां शतयोगदुःखिताम् ॥१॥ प्रयुज्येति—तृष्णा रूपी ज्वर को नष्ट करने वाली ज्ञान-वैराग्य रूपी औषधि को जिसमें दिया जाता है, उस चिकित्सा का प्रयोग करने से मनुष्य को यह दुःखमयी शरीर-परम्परा प्राप्त नहीं होती¹, जो काम ज्वर की मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के सम्बन्ध से हुआ करती है ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकरण का नाम उसके प्रतिपाद्य विषय को ध्यान में रखकर दिया गया है । कुछ लोगों ने इस प्रकरण का नाम ‘भेषजप्रयोग प्रकरण' तथा कुछ लोगों ने 'आत्म-मनःसंवाद प्रकरण' भी रखा है। 'तत्' और 'त्वं' पदार्थ का शोधन संक्षिप्त तथा विस्तृत रूप से किया गया; और ब्रह्मात्मैक्यलक्षण वाक्यार्थज्ञान सफल है, समस्त वेदान्त वाक्यों से उसकी प्रतीति होती है, यह प्रमाण और युक्ति से भी बता चुके । नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त, सत्य, ज्ञान, अनन्त आनन्द स्वरूप प्रत्यगात्मा के सम्बन्ध में भेद-विपर्यासादि अनेक अनर्थों के होते रहने में अहंकार, मन, बुद्धि, एवं चित्त का संघातारूप अन्तःकरण ही हेतुभूत है—यह भी बता चुके हैं। अब हम मुख्यतया यह बता रहे हैं कि आत्मा का संसार मनोऽध्यासमूलक ही होता है, अतः उस मन का स्वरूप और उसकी चेष्टाओं का अनुसन्धान करते हुए उसका विलापन करने में प्रयत्नशील होना चाहिये । इसी अभिप्राय से 'आत्म-मनःसंवादरूप प्रकरण' का प्रारंभ करने की इच्छा से ग्रंथकार प्रथमतः प्रकरण के प्रयोजन को बता रहे हैं—यह मानव प्राणी तृष्णारूपी ज्वर की नाशक ज्ञान-वैराग्यरूपी औषधि का प्रयोग करने से कामज्वरजनित मूर्छा तथा सैकड़ों विषयों के संबंध से प्राप्त होनेवाली दुःखमयी शरीर- परम्परा को प्राप्त नहीं होता है ॥ १ ॥ अहं ममेति त्वमनर्थमीहसे परार्थमिच्छन्ति तवान्य ईहितम् । न तेऽर्थबोधो न हि मेऽस्ति चार्थिता ततश्च युक्तः शम एव ते मनः ॥२॥ अह्मिति—हे मन ! तू 'अहम्-मम'-मैं और मेरा इस आकार से व्यर्थ चेष्टा करता रहता है । सांख्यवादी विद्वान् तेरी चेष्टा को परार्थ (पुरुष के भोगापवर्गार्थ) मानते हैं । तू मुझपर उपकार कर ही कैसे सकता है ? क्योंकि तू अचेतन है, अतः तुझे अर्थज्ञान का होना संभव नहीं है, और मुझमें कोई किसी प्रकार की अर्थिता नहीं है । ऐसी स्थिति में हे मन ! तेरा शान्त रहना ही समुचित है ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस औषधिप्रयोग प्रकरण का आत्ममनःसंवाद के रूप में विस्तार करते हुए बता रहे हैं—हे मन ! तू 'मैं, मेरा' इस प्रकार की व्यर्थ चेष्टा कर रहा है । यदि कहो कि मैं तुम्हारे लिये ही चेष्टा कर रहा हूँ, अतः उस चेष्टा को व्यर्थ क्यों कह रहे हो ? अन्य सांख्यवादी लोग तुम्हारी चेष्टा को परार्थ अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिये मानते हैं । किन्तु हम वेदान्त सिद्धान्तवादी यह नहीं मानते । तुझे मेरा प्रयोजनीय विषय ही ज्ञात नहीं है, क्योंकि तू अचेतन है, और न मुझे तुझसे कुछ माँगना ही है । ऐसी स्थिति में, रे मन ! तेरा शान्त हो जाना ही उचित है ॥२॥ १. इस १९ वे प्रकरण को 'भेषज प्रकरण' भी कहते हैं, क्योंकि इसमें देहप्राप्ति रूप रोग को नष्ट करने वाली औषधि को बताया जा रहा । उसी तरह यह औषधोपचार, 'आत्म-मनःसंवाद' के रूप में किया जा रहा है, इसलिये इस प्रकरण को 'आत्म-मनःसंवाद' प्रकरण भी कहते हैं ।

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६१ यतो न चान्यः परमात् सनातनात् सदैव तृप्तोऽहमतो न मेऽर्थिता । सदैव तृप्तश्च न कामये हितं यतस्व चेतः प्रशमाय *ते हितम् ॥३॥ यत इति—मैं (प्रत्यगात्मा) सनातन अर्थात् पूर्णानन्दस्वरूप ‘परमात्मा’ से भिन्न नहीं हूँ, और सर्वदा ही तृप्त हूँ हूँ, अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। सर्वदा ही तृप्त रहने के कारण स्वयं के लिये किसी प्रकार के हित की भी इच्छा नहीं करता। अतः हे चित्त (मन) ! तू शान्त होने के लिये ही प्रयत्न (चेष्टा) कर, यही तेरे लिये हितकर होगा ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा के अर्थित्वाभाव को सिद्ध कर रहे हैं—मैं (आत्मा) तो सनातन पूर्णानन्दस्वरूप परमात्मा से पृथक् नहीं हूँ, मैं तो सदा-सर्वदा ही तृप्त हूँ। अतः मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है। मैं सर्वदा तृप्त होने के कारण अपने लिए किसी हित की कामना भी नहीं करता। इसलिए हे मन ! तू शान्त हो जाने का प्रयत्न कर। यही तेरे हित में होगा ॥ ३ ॥ षडूर्मिमालाभ्यतिवृत्त एव यः स एव चात्मा जगतश्च नः श्रुतेः । प्रमाणतश्चापि मया प्रवेद्यते मुधैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥४॥ षडूर्मिमालेति—जो पुरुष 'क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्यु'—इन छह ऊर्मिमाला (ऊर्मियों) से पार हो जाता है, वही पुरुष हमारा और जगत् का 'आत्मा' है। उसे हम 'यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म'—इस श्रुति से तथा 'य आत्मा सर्वान्तरः'—इस श्रुति से और 'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः'—इस स्मृति प्रमाण से भी सम्यक्तया (यथार्थरूप से) समझते हैं। अतः हे मन ! तेरी दौड़-धूप की चेष्टा करना व्यर्थ है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी परमात्मा से अभिन्न होने के कारण अपने अर्थित्वाभाव को बताया। अब परमात्मा से अपनी अभिन्नता का उपपादन कर रहे हैं—अशनाया (क्षुधा), पिपासा, शोक, मोह, जरा, मृत्यु ये छह ऊर्मियां कहलाती हैं। ये छह ऊर्मियाँ प्राण, मन, और देह की धर्मरूप हैं। ये छहों धर्म, नदी की ऊर्मि (तरंग) की तरह आविर्भाव-तिरोभावरूप हैं। यह आत्मा उक्त छह ऊर्मिमाला अर्थात् ऊर्मिपरम्परा को पार किये हुए है, वही हमारा और जगत् का आत्मा है। अर्थात् वह आत्मा निष्प्रपञ्च है। उसे हम श्रुति¹-स्मृति² के प्रमाणों से अच्छी तरह जानते हैं। अतः हे मन ! तेरी सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं ॥ ४ ॥ त्वयि प्रशान्ते नहि चास्ति भेदधीर्यतो जगन्मोहमुपैति मायया । ग्रहो हि मायाप्रभवस्य कारणं ग्रहाद्विमोके नहि साऽस्ति कस्यचित् ॥५॥ त्वयीति—तू जब शान्त हो जायगा, तब 'भेदबुद्धि' नहीं रह पायेगी। उस भेदबुद्धि से ही यह संसार, 'माया' के अधीन होकर 'मोह' को प्राप्त हो रहा है, क्योंकि 'भेदबुद्धि' से ही 'माया' की उत्पत्ति होती है। उस 'भेदबुद्धि' के निवृत्त होते ही वह 'माया' भी उसके लिये नहीं रह पाती ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी तेरे शान्त हो जाने पर भेदबुद्धि नहीं रहती। भेदबुद्धि से ही यह संसार, माया के कारण मोह को प्राप्त होता है। क्योंकि अकृतार्थताभिमानलक्षणा माया की उत्पत्ति का कारण भेदज्ञान ही है। उस भेदज्ञान के निवृत्त होते ही वह माया भी किसी के लिये नहीं रहती। मन के प्रशांत होने पर वह भेदबुद्धि नहीं रह पाती, क्योंकि सुषुप्ति में मन का अभाव रहता है, तब भेदबुद्धि भी नहीं रहती, यह अन्वय-व्यतिरेक से सिद्ध है। सुषुप्ति में भेद- बुद्धि के न रहने पर माया-मोह भी नहीं रहता ॥ ५ ॥ १. (बृ. उ. ३।४।१) ‘यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म’, ‘य आत्मा सर्वान्तरः’ । २. (भ. गी. १०।२०) ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ॥’

  • तेऽधिकम्—पाठान्तरम् ।

२६२ उपदेशसाहस्री न मेऽस्ति मोहस्तव चेष्टितेन हि प्रबुद्धतत्त्वस्ववसितो ह्यविक्रियः । न पूर्वतत्त्वोत्तरभेदता हि नो वृथैव तस्माच्च मनस्तवेहितम् ॥६॥ नेति—तेरी चेष्टा से मुझ पर मोह का कोई प्रभाव नहीं पड़ पाता क्योंकि मैं 'ज्ञाततत्त्व, बन्धनरहित तथा अविकारी' हूँ, क्योंकि हमारी दृष्टि में तत्त्वज्ञान के पूर्व और उत्तर काल में कोई अन्तर नहीं है। अतः हे मन ! तेरी सम्पूर्ण चेष्टा व्यर्थ ही है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अरे मन ! तेरी चेष्टा से मुझे मोह नहीं हो सकता, क्योंकि मैं बन्धरहित, प्रबुद्धतत्त्वस्वरूप, और विकार- शून्य हूँ। मेरी दृष्टि में तत्त्वज्ञान होने के पूर्व और उसके उत्तर काल में कोई भी विशेष (भेद) लक्षित नहीं हो रहा है। इसलिये हे मन ! तेरी चेष्टा व्यर्थ ही है, क्योंकि तुम्हारी चेष्टा से मुझमें कोई अतिशय नहीं हो सकता ॥ ६ ॥ यतश्च नित्योऽहमतो न चान्यथा विकारयोगे हि भवेदनित्यता । सदा प्रभातोऽहमतो हि चाद्वयो विकल्पितं चाप्यसदित्यवस्थितम् ॥७॥ यत इति—'मैं नित्य हूँ', अतः मुझमें 'अनित्यता' नहीं है। 'विकार' का योग होने पर ही वह (अनित्यता) हो पाती है (परन्तु मैं अविकारी होने से नित्य हूँ)। 'मैं सर्वदा प्रकाशस्वरूप हूँ', अतः 'अद्वय' हूँ। जो कुछ 'दृश्य' है, वह सब 'असत्' है। यह बात निश्चित है ॥ ७ ॥ हृदयस्पर्शिनी समस्त दृश्यवर्ग से परे रहनेवाले इस आत्मा में आगन्तुक अतिशय का सम्बन्ध कभी नहीं हो सकता । अन्यथा आत्मा में अनित्यता प्राप्त होगी । अनित्यता की प्राप्ति किस कारण होगी, जो कि उसका निषेध किया जा रहा है ? मैं तो नित्य हूँ, अतः मुझ में अनित्यता नहीं है। अनित्यता तो विकार का संबन्ध होनेपर ही होती है। यदि कहो कि परिस्पन्द-परिणामादिरूप विकार के न रहने पर भी प्रकाशाप्रकाशसंसर्गरूप विकार हो सकता है, तो उसका उत्तर यह है कि मैं सर्वदा ही प्रकाशस्वरूप हूँ। इस विषय में¹ श्रुति प्रमाण है। मैं अद्वय हूँ। यदि कहो कि दृश्यभेद के विद्यमान रहते अद्वय कैसे हो सकते हो ? उत्तर यह है कि आगन्तुक रज्जु-सर्प की तरह जो कुछ भी दृश्य है, वह सब असत् है, इसे निश्चित समझो ॥ ७ ॥ अभावरूपं त्वमसीह हे मनो निरीक्ष्यमाणे न हि युक्तितोऽस्तिता । सतो ह्यनाशादसतोऽप्यजन्मतो द्वयं च चेतस्तव नास्तितेष्यते ॥८॥ अभावरूपमिति—हे मन ! तू अभावरूप है। युक्तिपूर्वक विचार करने पर तेरा 'अस्तित्व' सिद्ध नहीं होता। क्योंकि जो वस्तु 'सत्' होती है, उसका कभी 'नाश' नहीं होता, तथा जो वस्तु 'असत्' होती है, उसकी 'उत्पत्ति' नहीं होती। किन्तु हे चित्त ! तुझमें ये दोनों (उत्पत्ति और नाश) हैं। अतः तेरी परमार्थसत्ता नहीं है। तुझे अभावरूप मानना ही इष्ट है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी मन के होने से तो आत्मा की सद्वितीयता अवगत हो रही है, अतः उसे अद्वितीय कैसे मान लिया जाय ? रे मन ! तू तो अभावरूप है, युक्तिपूर्वक विचार करने पर तुम्हारा अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि गीता में भगवान कहते हैं²—'सत् वस्तु' का कभी नाश नहीं होता, और 'असत् वस्तु' की कभी उत्पत्ति नहीं होती। रे मन ! तुझ में तो उत्पत्ति और विनाश दोनों हैं। इस कारण तेरी पारमार्थिक (वास्तविक) सत्ता नहीं मानी जा सकती ॥ ८ ॥ १. सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ।—(छां. उ. ८।४।२) तथा पश्यन्वै तन्न पश्यति ।—(बृ. उ. ४।३।२३) २. "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"—(भ. गी. २।१६)

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६३ द्रष्टा च दृश्यं च तथा च दर्शनं भ्रमस्तु सर्वस्तव कल्पितो हि सः । दृशेश्च भिन्नं न हि दृश्यमीक्ष्यते स्वपन् प्रबोधेन तथा न भिद्यते ॥९॥ द्रष्टेति—हे मन ! 'द्रष्टा' 'दृश्य' और 'दर्शन' इस प्रकार से लोगों को जो 'भ्रम' होता है, वह सब तेरी ही कल्पना का खेल है। क्योंकि 'द्रष्टा' से भिन्न 'दृश्य' नहीं देखा गया है। तथा स्वप्नगत 'आत्मा', जाग्रत् अवस्था के द्वारा भेद को प्राप्त नहीं होता है, अर्थात् दोनों अवस्थाओं में 'आत्मा' एक ही है, भिन्न-भिन्न नहीं। तथापि भिन्नवत् प्रतीति हुआ करती है,—यह तेरा ही तो खेल है ॥९॥ हृदयस्पर्शिनी 'बीजाभावे कुतः फलम्'—बिना बीज के फल कहाँ ? इस न्याय से आत्मा की अद्वितीयता को स्पष्ट कर रहे हैं—रे मन ! द्रष्टा, दृश्य, और दर्शनरूप जो भ्रम है, वह सब तुम्हारे द्वारा ही कल्पना किया हुआ है। क्योंकि 'दृश्य' को 'द्रष्टा' से भिन्न नहीं देखा जाता, तथा स्वप्नगत आत्मा जाग्रत् अवस्था के द्वारा भेद को प्राप्त नहीं होता। अर्थात् स्वप्नकाल में भिन्नवत् प्रतीत होनेपर भी वह अभिन्न ही है, उसी प्रकार जाग्रत्काल में भी उसमें कोई भेद नहीं होता है। स्वप्न में उसकी अद्वितीयता श्रुतिसिद्ध है¹॥ ९॥ विकल्पना वाऽपि तथाऽद्वया भवेदवस्तुयोगादललातचक्रवत् । न शक्तिभेदोऽस्ति यतो न चाऽऽत्मनां ततोऽद्वयत्वं श्रुतितोऽवसीयते ॥१०॥ विकल्पनेति—इसी प्रकार 'अवस्तु' से योग (सम्बन्ध) होने के कारण 'विकल्प' भी अलात चक्र के सदृश 'अद्वय' ही होता है। जो शब्द से होने वाले ज्ञान का तो अनुगमन करता है किन्तु वस्तुशून्य रहता है, उसे 'विकल्प' कहते हैं। महर्षि पतञ्जलि ने कहा भी है—"शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः" । आत्माओं का परस्पर शक्तिभेद नहीं है, इसलिये श्रुतिप्रमाण से उनका अभेद ही सिद्ध होता है ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहो कि विकल्पाभाव रहने पर भी विकल्पना तो सत्य है ही, इसलिए अद्वैत की उपपत्ति नहीं हो पा रही है। तो सुनो कि अवस्तु से सम्बन्धित होने के कारण विकल्प भी अलातचक्र के समान अद्वय ही है, क्योंकि आत्माओं का परस्पर शक्तिभेद नहीं है। अतः श्रुति के द्वारा उनका अभेद सिद्ध होता है। जैसे दृश्य भिन्न नहीं, वैसे ही विकल्पना भी भिन्न नहीं है। किन्तु अवस्तु के योग से अवस्तुविषयकत्वेन उसका निरूपण किया जाता है। जैसे परिभ्रमणशील अलात की चक्राकारता अलात से पृथक् वस्तु नहीं, उसी तरह विकल्पना भी चिदात्मा के अतिरिक्त कोई पृथक् वस्तु नहीं। इस रीति से उसकी अद्वयता का उपपादन करने पर भी पुनः शंका होती है कि दृष्टि, श्रुति, मति आदि शक्तिरूप स्वगत भेद के विद्यमान होने से आत्मा की अद्वयता नहीं बन पा रही है, तथा प्रत्येक शरीर में आत्मभेद (भिन्न-भिन्न आत्मा) के प्रसिद्ध रहने से सजातीय भेद भी है, तब उसे अद्वय कैसे कहा जाय ? तुम्हारी शंका के अनुसार मानने में श्रुति का विरोध होता है। श्रुति कहती है—"अकृत्स्नो हि सः प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक् पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव²"—यह श्रुति चिदात्मा के दृष्टत्वादि भेद को औपाधिक बता रही है। अन्यान्य श्रुतियों ने सर्वत्र आत्मा की एकता को ही बताया है। जैसे—"एको देवो बहुधाः निविष्टः³", "एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति⁴", "एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा⁵" ये सभी श्रुतियाँ आत्मा की एकता को ही बता रही है। १. "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैत भवति" तथा (बृ. उ. ४।३।३२) "अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति ।" (कौ. ३।३) २. (बृ. उ. १।४।७) ३. (तै. आ. ३।१४) ४. (ऋ. सं. १०।११४।५) ५. (कठ. उ. ५।९)

२६४ उपदेशसाहस्री इसी प्रकार भेदनिषेधक अन्यान्य श्रुति-स्मृतियों को भी देखना चाहिये। विष्णुसहस्रनामस्तोत्र के १० वे मंत्र का भाष्य, तथा सनत् सुजातीय के २० वे श्लोक का भाष्य अवलोकनाहँ है ॥ १०॥ मिथश्च भिन्ना यदि ते हि चेतनाः क्षयस्तु तेषां परिमाणयोगतः । ध्रुवो भवेद्वेनवतां हि दृष्टतो जगत्क्षयश्चापि समस्तमोक्षतः ॥११॥ मिथश्चेति—वे आत्मा यदि एक-दूसरे से परस्पर भिन्न हैं, तो वे ‘परिमित’ सिद्ध होते हैं, और ‘परिमित’ होने के कारण उनका ‘क्षय’ (नाश) होना भी निश्चित रहेगा। क्योंकि जो पदार्थ ‘भेदयुक्त’ (भिन्न-भिन्न) होते हैं, उनका ‘क्षय’ होना देखा गया है, अर्थात् सर्वलोकप्रत्यक्ष है। तथा समस्त प्राणियों की मुक्ति होने पर ‘संसार’ का भी क्षय हो जायगा ॥११॥ हृदयस्पर्शिनी अब आगमबाह्यों की आत्मभेदकल्पना का युक्ति से निराकरण कर रहे हैं—यदि वे चेतनरूप आत्मा परस्पर भिन्न हों तो वे मूलांकुरादिकों के समान परिमित होंगे। और जो परिमित होते हैं, वे विनाशी होते हैं—ऐसा नियम है। इस नियम के अनुसार उनका (आत्माओं का) विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा, क्योंकि भेदयुक्त पदार्थों का क्षय देखा जाता है। और समस्त प्राणियों की मुक्ति हो जाने पर संसार का भी उच्छेद हो जायगा। भेद पक्ष में एक-एक कल्प में एक-एक की मुक्ति होनेपर भी अनन्त गतकल्पों में अनन्त जीवों की मुक्ति होना संभव है, तब समस्त जीवों का मोक्ष हो जाने से किसी भोक्ता के ही न रहनेपर तदर्थ जो भोग्य जगत् है, उसकी आवश्यकता ही न रहने से उसका भी क्षय हो जायगा। अतः भेदपक्ष को स्वीकारना उचित नहीं है ॥ ११ ॥ न मेऽस्ति कश्चिन्न च सोऽस्मि कस्यचिद्यतोऽद्वयोऽहं न हि चास्ति कल्पितम् । अकल्पितश्चास्मि पुरा प्रसिद्धितो विकल्पनाया द्वयमेव कल्पितम् ॥१२॥ न मै इति—कोई भी वस्तु (पदार्थ) मेरी नहीं है, और न मैं ही किसी का हूँ, क्योंकि ‘मैं’ तो अद्वय हूँ। दूसरी बात यह भी है कि ‘कल्पित पदार्थ’ की ‘सत्ता’ नहीं हुआ करती, किन्तु ‘मै’ तो कल्पना के पूर्व से ही सिद्ध हूँ। अतः ‘मैं’ अकल्पित हूँ। कल्पित तो ‘द्वैत’ ही है, मैं नहीं हूँ ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी तब सिद्धान्ती से भेदवादी पूछता है कि तुम्हारे मत में भी जगत्-जीव-ईश्वर यह भेद तो विद्यमान है ही, तब तुम्हारे मत में उक्त दोष का परिहार कैसे होगा? इस पर सिद्धान्ती कहता है—मेरे मत में दोष इसलिये नहीं है, क्योंकि मैं अद्वय हूँ, वस्तुतः मेरा गुणभूत (अंगभूत) अथवा प्रधानभूत, अथवा मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है। कोई भी पदार्थ मेरा नहीं है, और न ही मैं किसी का हूँ, क्योंकि मैं अद्वय हूँ। जो जगत् है, वह तो कल्पित है, कल्पित पदार्थ की सत्ता नहीं होती। तथाच जीव-ईश्वर-जगत् का भेद बताने वाला कोई प्रमाण नहीं है। वह भेद प्रमाणाऽ- सहिष्णु है, वह तो केवल अलंकारमात्र है। अतः हमारे मत में दोष का कोई प्रसंग ही नहीं है। इस पर पुनः प्रश्न हो सकता है कि जैसे ‘द्वैत’ एक पदार्थ है, वैसे ही ‘अद्वैत’ भी एक पदार्थ है, अतः दोनों में कोई विशेष न होने से कल्पितत्व तो पूर्व की तरह ही स्थित रहा। तब उत्तर देते हैं कि निरधिष्ठान कल्पना नहीं हुआ करती और निरवधिक बाध भी नहीं हुआ करता। अतः समस्त कल्पनाओं के पहले से ही जो सिद्ध है, तथा कल्पितबाध की कोई-न-कोई अवधि रहने के पश्चात् जो अवशिष्यमाण होगा, उसे कल्पित नहीं कहा जाता, अपितु वह स्वतःसिद्ध रहता है। उसी स्वतःसिद्ध रहनेवाली वस्तु को ‘अद्वय’ शब्द से कहते हैं। तात्पर्य यह है कि विकल्पना के पूर्व भी मेरी प्रसिद्धि रहने से मैं अकल्पित हूँ, और मूलगत ‘च’ शब्द से अवधिभूत होने से कल्पना के अनन्तर (पश्चात्) भी हूँ, और बीच में उसका साक्षी होने से मैं अकल्पित ही हूँ। परिशेषात् सापेक्ष होने से जगत् और जीव ये दो ही कल्पित हैं। अतः द्वैत ही कल्पित है, अद्वैत नहीं ॥ १२ ॥

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६५ विकल्पना चाप्यभवे न विद्यते सदन्त्यदित्येवमतो न नास्तिता । यतः प्रवृत्ता तव चापि कल्पना पुरा प्रसिद्धेर्न च तद्धि कल्पितम् ॥१३॥ विकल्पनेति—आत्मा 'नित्य' है, उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुआ करती । उस नित्य आत्मा में 'सत्' एवं 'असत्' की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इसलिये पूर्व सिद्ध होने के कारण उस रे मन ! आत्मा में तुम्हारी कल्पना की जाने मात्र से उसको ( आत्मा को ) कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा तो कल्पना का विषय ही नहीं है। जिसकी कभी उत्पत्ति ही नहीं होती, ऐसे नित्य आत्मा में सत् और असत् की कल्पना भी नहीं है । इसलिये उसका अभाव भी नहीं है। तुम्हारी कल्पना जिससे प्रवृत्त हुई है, वह आत्मा पूर्वसिद्ध होने के कारण उसे कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥ असद्द्वयं तेऽपि हि यद्यदीक्ष्यते न दृष्टमित्येव न चैव नास्तिता । यतः प्रवृत्ता सदसद्विकल्पना विचारवद्वाऽपि तथाऽद्वयं च सत् ॥१४॥ असदिति—हे मन ! तेरे द्वारा जो भी देखा जाता है, वह सभी द्वैत समुदाय 'असत्' ही है। दिखाई नहीं देता, इस कारण किसी पदार्थ का अभाव सिद्ध नहीं होता । विचार का पर्यवसान जैसे निर्णय में होता है, वैसे ही जिससे 'सत्' और 'असत्' की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह 'अद्वय' एवं 'सत्' ही है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत 'वस्तु' है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर पूर्वपक्षवादी कहता है कि जो उपलब्ध होता है उसकी सत्ता मानी जाती है, और जो उपलब्ध नहीं होता उसकी सत्ता नहीं मानी जाती । द्वैत की तो उपलब्धि होती है, अद्वैत की नहीं, तब अद्वैत की सत्ता कैसी मानी जाय ? इस शंका के समाधान में सिद्धान्ती कहता है कि किसी वस्तु की सत्ता या असत्ता में उसका दीखना या न दीखना कारण नहीं है । किन्तु वस्तु की सत्ता या असत्ता में निश्चायक कोई अन्य ही हेतु है। इसलिये रे मन ! तुम्हारे द्वारा जो-जो देखा जाता है, वह द्वैत ही देखा जाता है, वह तो स्वप्नदृष्ट वस्तु की तरह विनष्टस्वरूपवाला होने से असत् ही है । उसी तरह दिखाई नहीं देती, इसलिये वह वस्तु है ही, नहीं ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि नीरूप वायु का चाक्षुष प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी (वायु की) असत्ता नहीं कही जाती । अपितु उसकी सत्ता ही मानी जाती है । वस्तु के विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा के असामर्थ्य से, अथवा दर्शनयोग्यता के न रहने से उसका दर्शन होना असंभव हो जाता है । अतः किसी वस्तु के दर्शन या अदर्शन मात्र से उसकी सत्ता या असत्ता का निर्णय नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार विचार का पर्यवसान निर्णय में होता है, उसी तरह जिससे सत् और असत् की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत वस्तु अद्वय है और वही सत् है ॥ १४ ॥ सदभ्युपेतं भवतोपकल्पितं विचारहेतोर्यदि तस्य नास्तिता । विचारहानाच्च तथैव संस्थितं न चेत्तदिष्टं नितरां सदिष्यते ॥१५॥ सदिति—यदि तुम यह कहते हो कि 'सद्' वस्तु कोई है ही नहीं किन्तु इसका निर्णय करने के लिये तुम्हें विचार करना पड़ता है या नहीं ? यदि तुम्हें विचार करना पड़ता है, तो तुमने 'सत् वस्तु' की सत्ता को स्वीकार कर ही लिया है, यह मानना होगा, क्योंकि विचार करने के लिये किसी आधारभूत पदार्थ की सत्ता को स्वीकार किया जाता है । यदि आधार को स्वीकार न किया जाय तो विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी। तब 'तत्त्व' का निर्णय ही नहीं हो पायगा । इस प्रकार 'तत्त्व' का अनिर्णय यदि अभीष्ट नहीं है- तो यह निश्चित ही है कि 'सद्वस्तु' तुम्हें स्वीकार्य है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी विचार करने के लिए वादी और प्रतिवादी को अपने विवाद की आश्रयभूत किसी वस्तु का अवलंब (स्वीकार) करना ही पड़ता है; नहीं तो विवाद हो ही नहीं सकता । जैसे—आत्मा की सगुणता अथवा निर्गुणता का ३४

२६६ उपदेशसाहस्री निर्णय करना हो तो दोनों पक्षों को धर्मिस्वरूप आत्मा की सत्ता का स्वीकार तो करना ही पड़ेगा, अन्यथा उसके सगुणत्व या निर्गुणत्व धर्म का विचार ही कैसे प्रवृत्त हो सकेगा ? तुम्हारा कहना है कि कोई सत् वस्तु नहीं है, किन्तु उसके निर्णयार्थ तुम्हें विचार करना होगा कि नहीं ? निर्णयार्थ यदि तुम विचार करना आवश्यक समझते हो तो तुमने 'सत्' वस्तु की सत्ता को पहले स्वीकार कर ही लिया। क्योंकि उसके बिना विचार का आरंभ ही नहीं हो सकेगा। यदि उसका अस्तित्व न माना जाय तो विचार की प्रवृत्ति न होने के कारण निर्णय न हो पाने से वह तत्त्व अनिर्णीत ही रह जाता है। यदि ऐसा होना इष्ट नहीं है तो 'सत्' को निश्चित रूप से स्वीकार करना ही होगा ॥ १५ ॥

असत्समं चैव सदित्यपीति चेदनर्थवत्त्वान्नग्शृङ्गतुल्यतः । अनर्थवत्त्वं त्वसति ह्यकारणं न चैव तस्मान्न विपर्ययेऽन्यथा ॥१६॥

असत्सममिति—इस पर पूर्व पक्षी का कहना है कि 'सत्' वस्तु का स्वीकार करनेपर भी वह (सद्वस्तु) अर्थक्रिया- शून्य होने के कारण नरशृङ्ग के समान उसको 'अलीक' ही कहना होगा। तब सिद्धान्ती कहता है कि वस्तु की अर्थक्रिया- शून्यता उसकी 'असत्ता' में कारण नहीं है, तथा अर्थक्रियाकारित्व से 'वस्तु' की 'सत्ता' सिद्ध नहीं हुआ करती। अतः इससे विपरीत अवस्था में 'वस्तु' का अभाव रहना भी संभव नहीं है ॥ १६ ॥

हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी बौद्ध का कथन है कि जो वस्तु सत् होती है, वह सक्रिय होने से दीपशिखा के तुल्य क्षणिक होती है। और जो सक्रिय नहीं होती, वह असत् होती है। अतः परमार्थ वस्तु सत् नहीं हो सकती। यदि 'सत्' है ऐसा स्वीकार किया भी जाय तो अर्थक्रियाशून्य होने के कारण नरशृंग के तुल्य होने से वह अलीक (मिथ्या) ही होगी। इसपर सिद्धान्ती का कहना है कि वस्तु की असत्ता में 'अर्थक्रियाशून्यत्व' को कारण नहीं कहा जा सकता। 'अर्थक्रिया- कारित्व' से 'वस्तु की सत्ता' सिद्ध नहीं होती। क्योंकि कण्टकादि के अभाव में भी पादन्यासरूप क्रिया हो सकती है तथा क्रिया की उत्पत्ति से पूर्व भी वस्तु की सत्ता देखी जाती है। अतः अर्थक्रियाकारित्व से रहित होनेपर भी वस्तु 'सत्' हो सकती है। उसका अभाव संभव नहीं है ॥ १६ ॥

असिद्धतश्चापि विचारकारणाद्द्वयं च तस्मात्प्रसृतं च मायया । श्रुतेः स्मृतेश्चापि तथा हि युक्तितः प्रसिद्धयतीत्थं न तु युज्यतेऽन्यथा ॥१७॥

असिद्धतश्चेति—इसके अतिरिक्त तुम्हारे द्वारा किये गये अनुमान— 'श्रोतं सत् असत्समं अर्थक्रियाशून्यत्वात्, नरशृङ्गवत्' में 'असिद्धि' दोष के कारण उक्त हेतु हेत्वाभासरूप है। विचार के कारणभूत 'आत्मा' से ही मायावश 'द्वैत' का विस्तार हुआ है। श्रुति, स्मृति और युक्ति से भी यही सिद्ध हो रहा है। और कोई अन्य प्रकार बताना युक्तिविरुद्ध है ॥ १७ ॥

हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व के श्लोक में व्यभिचार-दोष का प्रदर्शन करते हुए बौद्धमत का खण्डन किया है। अब इस श्लोक में पक्षासिद्धिरूप दोष को बता रहे हैं। तुम्हारा अनुमान असिद्धिदोष से दूषित होने के कारण भी ठीक नहीं है। विचार के हेतुभूत आत्मा से ही मायावश द्वैत का विस्तार हुआ है। क्योंकि "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्"१ तथा 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्'२ इत्यादि श्रुति-स्मृति तथा कार्य का वाचारंभणत्व भी किसी सद्रूप अधिष्ठान के रहने पर ही संभव हो सकता है, इस युक्ति३ से भी सर्वाधिष्ठानभूत परमार्थतत्व सत् ही हो सकता है, असत् नहीं। अतः 'अर्थक्रियाकारित्व का अभाव वस्तु की असत्ता का कारण है'-यह हेतु असिद्ध है। यदि

१. (श्वे. उ. ४।१०) २. (भ. गी. ९।१०) ३. (ब्र. सू. २।१।१४)