उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६३ द्रष्टा च दृश्यं च तथा च दर्शनं भ्रमस्तु सर्वस्तव कल्पितो हि सः । दृशेश्च भिन्नं न हि दृश्यमीक्ष्यते स्वपन् प्रबोधेन तथा न भिद्यते ॥९॥ द्रष्टेति—हे मन ! 'द्रष्टा' 'दृश्य' और 'दर्शन' इस प्रकार से लोगों को जो 'भ्रम' होता है, वह सब तेरी ही कल्पना का खेल है। क्योंकि 'द्रष्टा' से भिन्न 'दृश्य' नहीं देखा गया है। तथा स्वप्नगत 'आत्मा', जाग्रत् अवस्था के द्वारा भेद को प्राप्त नहीं होता है, अर्थात् दोनों अवस्थाओं में 'आत्मा' एक ही है, भिन्न-भिन्न नहीं। तथापि भिन्नवत् प्रतीति हुआ करती है,—यह तेरा ही तो खेल है ॥९॥ हृदयस्पर्शिनी 'बीजाभावे कुतः फलम्'—बिना बीज के फल कहाँ ? इस न्याय से आत्मा की अद्वितीयता को स्पष्ट कर रहे हैं—रे मन ! द्रष्टा, दृश्य, और दर्शनरूप जो भ्रम है, वह सब तुम्हारे द्वारा ही कल्पना किया हुआ है। क्योंकि 'दृश्य' को 'द्रष्टा' से भिन्न नहीं देखा जाता, तथा स्वप्नगत आत्मा जाग्रत् अवस्था के द्वारा भेद को प्राप्त नहीं होता। अर्थात् स्वप्नकाल में भिन्नवत् प्रतीत होनेपर भी वह अभिन्न ही है, उसी प्रकार जाग्रत्काल में भी उसमें कोई भेद नहीं होता है। स्वप्न में उसकी अद्वितीयता श्रुतिसिद्ध है¹॥ ९॥ विकल्पना वाऽपि तथाऽद्वया भवेदवस्तुयोगादललातचक्रवत् । न शक्तिभेदोऽस्ति यतो न चाऽऽत्मनां ततोऽद्वयत्वं श्रुतितोऽवसीयते ॥१०॥ विकल्पनेति—इसी प्रकार 'अवस्तु' से योग (सम्बन्ध) होने के कारण 'विकल्प' भी अलात चक्र के सदृश 'अद्वय' ही होता है। जो शब्द से होने वाले ज्ञान का तो अनुगमन करता है किन्तु वस्तुशून्य रहता है, उसे 'विकल्प' कहते हैं। महर्षि पतञ्जलि ने कहा भी है—"शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः" । आत्माओं का परस्पर शक्तिभेद नहीं है, इसलिये श्रुतिप्रमाण से उनका अभेद ही सिद्ध होता है ॥ १० ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहो कि विकल्पाभाव रहने पर भी विकल्पना तो सत्य है ही, इसलिए अद्वैत की उपपत्ति नहीं हो पा रही है। तो सुनो कि अवस्तु से सम्बन्धित होने के कारण विकल्प भी अलातचक्र के समान अद्वय ही है, क्योंकि आत्माओं का परस्पर शक्तिभेद नहीं है। अतः श्रुति के द्वारा उनका अभेद सिद्ध होता है। जैसे दृश्य भिन्न नहीं, वैसे ही विकल्पना भी भिन्न नहीं है। किन्तु अवस्तु के योग से अवस्तुविषयकत्वेन उसका निरूपण किया जाता है। जैसे परिभ्रमणशील अलात की चक्राकारता अलात से पृथक् वस्तु नहीं, उसी तरह विकल्पना भी चिदात्मा के अतिरिक्त कोई पृथक् वस्तु नहीं। इस रीति से उसकी अद्वयता का उपपादन करने पर भी पुनः शंका होती है कि दृष्टि, श्रुति, मति आदि शक्तिरूप स्वगत भेद के विद्यमान होने से आत्मा की अद्वयता नहीं बन पा रही है, तथा प्रत्येक शरीर में आत्मभेद (भिन्न-भिन्न आत्मा) के प्रसिद्ध रहने से सजातीय भेद भी है, तब उसे अद्वय कैसे कहा जाय ? तुम्हारी शंका के अनुसार मानने में श्रुति का विरोध होता है। श्रुति कहती है—"अकृत्स्नो हि सः प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक् पश्यंश्चक्षुः शृण्वञ्छ्रोत्रं मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव²"—यह श्रुति चिदात्मा के दृष्टत्वादि भेद को औपाधिक बता रही है। अन्यान्य श्रुतियों ने सर्वत्र आत्मा की एकता को ही बताया है। जैसे—"एको देवो बहुधाः निविष्टः³", "एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति⁴", "एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा⁵" ये सभी श्रुतियाँ आत्मा की एकता को ही बता रही है। १. "सलिल एको द्रष्टाऽद्वैत भवति" तथा (बृ. उ. ४।३।३२) "अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति ।" (कौ. ३।३) २. (बृ. उ. १।४।७) ३. (तै. आ. ३।१४) ४. (ऋ. सं. १०।११४।५) ५. (कठ. उ. ५।९)