उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ उपदेशसाहस्री इसी प्रकार भेदनिषेधक अन्यान्य श्रुति-स्मृतियों को भी देखना चाहिये। विष्णुसहस्रनामस्तोत्र के १० वे मंत्र का भाष्य, तथा सनत् सुजातीय के २० वे श्लोक का भाष्य अवलोकनाहँ है ॥ १०॥ मिथश्च भिन्ना यदि ते हि चेतनाः क्षयस्तु तेषां परिमाणयोगतः । ध्रुवो भवेद्वेनवतां हि दृष्टतो जगत्क्षयश्चापि समस्तमोक्षतः ॥११॥ मिथश्चेति—वे आत्मा यदि एक-दूसरे से परस्पर भिन्न हैं, तो वे ‘परिमित’ सिद्ध होते हैं, और ‘परिमित’ होने के कारण उनका ‘क्षय’ (नाश) होना भी निश्चित रहेगा। क्योंकि जो पदार्थ ‘भेदयुक्त’ (भिन्न-भिन्न) होते हैं, उनका ‘क्षय’ होना देखा गया है, अर्थात् सर्वलोकप्रत्यक्ष है। तथा समस्त प्राणियों की मुक्ति होने पर ‘संसार’ का भी क्षय हो जायगा ॥११॥ हृदयस्पर्शिनी अब आगमबाह्यों की आत्मभेदकल्पना का युक्ति से निराकरण कर रहे हैं—यदि वे चेतनरूप आत्मा परस्पर भिन्न हों तो वे मूलांकुरादिकों के समान परिमित होंगे। और जो परिमित होते हैं, वे विनाशी होते हैं—ऐसा नियम है। इस नियम के अनुसार उनका (आत्माओं का) विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा, क्योंकि भेदयुक्त पदार्थों का क्षय देखा जाता है। और समस्त प्राणियों की मुक्ति हो जाने पर संसार का भी उच्छेद हो जायगा। भेद पक्ष में एक-एक कल्प में एक-एक की मुक्ति होनेपर भी अनन्त गतकल्पों में अनन्त जीवों की मुक्ति होना संभव है, तब समस्त जीवों का मोक्ष हो जाने से किसी भोक्ता के ही न रहनेपर तदर्थ जो भोग्य जगत् है, उसकी आवश्यकता ही न रहने से उसका भी क्षय हो जायगा। अतः भेदपक्ष को स्वीकारना उचित नहीं है ॥ ११ ॥ न मेऽस्ति कश्चिन्न च सोऽस्मि कस्यचिद्यतोऽद्वयोऽहं न हि चास्ति कल्पितम् । अकल्पितश्चास्मि पुरा प्रसिद्धितो विकल्पनाया द्वयमेव कल्पितम् ॥१२॥ न मै इति—कोई भी वस्तु (पदार्थ) मेरी नहीं है, और न मैं ही किसी का हूँ, क्योंकि ‘मैं’ तो अद्वय हूँ। दूसरी बात यह भी है कि ‘कल्पित पदार्थ’ की ‘सत्ता’ नहीं हुआ करती, किन्तु ‘मै’ तो कल्पना के पूर्व से ही सिद्ध हूँ। अतः ‘मैं’ अकल्पित हूँ। कल्पित तो ‘द्वैत’ ही है, मैं नहीं हूँ ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी तब सिद्धान्ती से भेदवादी पूछता है कि तुम्हारे मत में भी जगत्-जीव-ईश्वर यह भेद तो विद्यमान है ही, तब तुम्हारे मत में उक्त दोष का परिहार कैसे होगा? इस पर सिद्धान्ती कहता है—मेरे मत में दोष इसलिये नहीं है, क्योंकि मैं अद्वय हूँ, वस्तुतः मेरा गुणभूत (अंगभूत) अथवा प्रधानभूत, अथवा मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है। कोई भी पदार्थ मेरा नहीं है, और न ही मैं किसी का हूँ, क्योंकि मैं अद्वय हूँ। जो जगत् है, वह तो कल्पित है, कल्पित पदार्थ की सत्ता नहीं होती। तथाच जीव-ईश्वर-जगत् का भेद बताने वाला कोई प्रमाण नहीं है। वह भेद प्रमाणाऽ- सहिष्णु है, वह तो केवल अलंकारमात्र है। अतः हमारे मत में दोष का कोई प्रसंग ही नहीं है। इस पर पुनः प्रश्न हो सकता है कि जैसे ‘द्वैत’ एक पदार्थ है, वैसे ही ‘अद्वैत’ भी एक पदार्थ है, अतः दोनों में कोई विशेष न होने से कल्पितत्व तो पूर्व की तरह ही स्थित रहा। तब उत्तर देते हैं कि निरधिष्ठान कल्पना नहीं हुआ करती और निरवधिक बाध भी नहीं हुआ करता। अतः समस्त कल्पनाओं के पहले से ही जो सिद्ध है, तथा कल्पितबाध की कोई-न-कोई अवधि रहने के पश्चात् जो अवशिष्यमाण होगा, उसे कल्पित नहीं कहा जाता, अपितु वह स्वतःसिद्ध रहता है। उसी स्वतःसिद्ध रहनेवाली वस्तु को ‘अद्वय’ शब्द से कहते हैं। तात्पर्य यह है कि विकल्पना के पूर्व भी मेरी प्रसिद्धि रहने से मैं अकल्पित हूँ, और मूलगत ‘च’ शब्द से अवधिभूत होने से कल्पना के अनन्तर (पश्चात्) भी हूँ, और बीच में उसका साक्षी होने से मैं अकल्पित ही हूँ। परिशेषात् सापेक्ष होने से जगत् और जीव ये दो ही कल्पित हैं। अतः द्वैत ही कल्पित है, अद्वैत नहीं ॥ १२ ॥