उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
२६४ उपदेशसाहस्री इसी प्रकार भेदनिषेधक अन्यान्य श्रुति-स्मृतियों को भी देखना चाहिये। विष्णुसहस्रनामस्तोत्र के १० वे मंत्र का भाष्य, तथा सनत् सुजातीय के २० वे श्लोक का भाष्य अवलोकनाहँ है ॥ १०॥ मिथश्च भिन्ना यदि ते हि चेतनाः क्षयस्तु तेषां परिमाणयोगतः । ध्रुवो भवेद्वेनवतां हि दृष्टतो जगत्क्षयश्चापि समस्तमोक्षतः ॥११॥ मिथश्चेति—वे आत्मा यदि एक-दूसरे से परस्पर भिन्न हैं, तो वे ‘परिमित’ सिद्ध होते हैं, और ‘परिमित’ होने के कारण उनका ‘क्षय’ (नाश) होना भी निश्चित रहेगा। क्योंकि जो पदार्थ ‘भेदयुक्त’ (भिन्न-भिन्न) होते हैं, उनका ‘क्षय’ होना देखा गया है, अर्थात् सर्वलोकप्रत्यक्ष है। तथा समस्त प्राणियों की मुक्ति होने पर ‘संसार’ का भी क्षय हो जायगा ॥११॥ हृदयस्पर्शिनी अब आगमबाह्यों की आत्मभेदकल्पना का युक्ति से निराकरण कर रहे हैं—यदि वे चेतनरूप आत्मा परस्पर भिन्न हों तो वे मूलांकुरादिकों के समान परिमित होंगे। और जो परिमित होते हैं, वे विनाशी होते हैं—ऐसा नियम है। इस नियम के अनुसार उनका (आत्माओं का) विनाश होने का प्रसंग प्राप्त होगा, क्योंकि भेदयुक्त पदार्थों का क्षय देखा जाता है। और समस्त प्राणियों की मुक्ति हो जाने पर संसार का भी उच्छेद हो जायगा। भेद पक्ष में एक-एक कल्प में एक-एक की मुक्ति होनेपर भी अनन्त गतकल्पों में अनन्त जीवों की मुक्ति होना संभव है, तब समस्त जीवों का मोक्ष हो जाने से किसी भोक्ता के ही न रहनेपर तदर्थ जो भोग्य जगत् है, उसकी आवश्यकता ही न रहने से उसका भी क्षय हो जायगा। अतः भेदपक्ष को स्वीकारना उचित नहीं है ॥ ११ ॥ न मेऽस्ति कश्चिन्न च सोऽस्मि कस्यचिद्यतोऽद्वयोऽहं न हि चास्ति कल्पितम् । अकल्पितश्चास्मि पुरा प्रसिद्धितो विकल्पनाया द्वयमेव कल्पितम् ॥१२॥ न मै इति—कोई भी वस्तु (पदार्थ) मेरी नहीं है, और न मैं ही किसी का हूँ, क्योंकि ‘मैं’ तो अद्वय हूँ। दूसरी बात यह भी है कि ‘कल्पित पदार्थ’ की ‘सत्ता’ नहीं हुआ करती, किन्तु ‘मै’ तो कल्पना के पूर्व से ही सिद्ध हूँ। अतः ‘मैं’ अकल्पित हूँ। कल्पित तो ‘द्वैत’ ही है, मैं नहीं हूँ ॥ १२ ॥ हृदयस्पर्शिनी तब सिद्धान्ती से भेदवादी पूछता है कि तुम्हारे मत में भी जगत्-जीव-ईश्वर यह भेद तो विद्यमान है ही, तब तुम्हारे मत में उक्त दोष का परिहार कैसे होगा? इस पर सिद्धान्ती कहता है—मेरे मत में दोष इसलिये नहीं है, क्योंकि मैं अद्वय हूँ, वस्तुतः मेरा गुणभूत (अंगभूत) अथवा प्रधानभूत, अथवा मेरे जैसा दूसरा कोई नहीं है। कोई भी पदार्थ मेरा नहीं है, और न ही मैं किसी का हूँ, क्योंकि मैं अद्वय हूँ। जो जगत् है, वह तो कल्पित है, कल्पित पदार्थ की सत्ता नहीं होती। तथाच जीव-ईश्वर-जगत् का भेद बताने वाला कोई प्रमाण नहीं है। वह भेद प्रमाणाऽ- सहिष्णु है, वह तो केवल अलंकारमात्र है। अतः हमारे मत में दोष का कोई प्रसंग ही नहीं है। इस पर पुनः प्रश्न हो सकता है कि जैसे ‘द्वैत’ एक पदार्थ है, वैसे ही ‘अद्वैत’ भी एक पदार्थ है, अतः दोनों में कोई विशेष न होने से कल्पितत्व तो पूर्व की तरह ही स्थित रहा। तब उत्तर देते हैं कि निरधिष्ठान कल्पना नहीं हुआ करती और निरवधिक बाध भी नहीं हुआ करता। अतः समस्त कल्पनाओं के पहले से ही जो सिद्ध है, तथा कल्पितबाध की कोई-न-कोई अवधि रहने के पश्चात् जो अवशिष्यमाण होगा, उसे कल्पित नहीं कहा जाता, अपितु वह स्वतःसिद्ध रहता है। उसी स्वतःसिद्ध रहनेवाली वस्तु को ‘अद्वय’ शब्द से कहते हैं। तात्पर्य यह है कि विकल्पना के पूर्व भी मेरी प्रसिद्धि रहने से मैं अकल्पित हूँ, और मूलगत ‘च’ शब्द से अवधिभूत होने से कल्पना के अनन्तर (पश्चात्) भी हूँ, और बीच में उसका साक्षी होने से मैं अकल्पित ही हूँ। परिशेषात् सापेक्ष होने से जगत् और जीव ये दो ही कल्पित हैं। अतः द्वैत ही कल्पित है, अद्वैत नहीं ॥ १२ ॥
तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६५ विकल्पना चाप्यभवे न विद्यते सदन्त्यदित्येवमतो न नास्तिता । यतः प्रवृत्ता तव चापि कल्पना पुरा प्रसिद्धेर्न च तद्धि कल्पितम् ॥१३॥ विकल्पनेति—आत्मा 'नित्य' है, उसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुआ करती । उस नित्य आत्मा में 'सत्' एवं 'असत्' की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इसलिये पूर्व सिद्ध होने के कारण उस रे मन ! आत्मा में तुम्हारी कल्पना की जाने मात्र से उसको ( आत्मा को ) कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा तो कल्पना का विषय ही नहीं है। जिसकी कभी उत्पत्ति ही नहीं होती, ऐसे नित्य आत्मा में सत् और असत् की कल्पना भी नहीं है । इसलिये उसका अभाव भी नहीं है। तुम्हारी कल्पना जिससे प्रवृत्त हुई है, वह आत्मा पूर्वसिद्ध होने के कारण उसे कल्पित नहीं कहा जा सकता ॥ १३ ॥ असद्द्वयं तेऽपि हि यद्यदीक्ष्यते न दृष्टमित्येव न चैव नास्तिता । यतः प्रवृत्ता सदसद्विकल्पना विचारवद्वाऽपि तथाऽद्वयं च सत् ॥१४॥ असदिति—हे मन ! तेरे द्वारा जो भी देखा जाता है, वह सभी द्वैत समुदाय 'असत्' ही है। दिखाई नहीं देता, इस कारण किसी पदार्थ का अभाव सिद्ध नहीं होता । विचार का पर्यवसान जैसे निर्णय में होता है, वैसे ही जिससे 'सत्' और 'असत्' की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह 'अद्वय' एवं 'सत्' ही है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत 'वस्तु' है ॥ १४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर पूर्वपक्षवादी कहता है कि जो उपलब्ध होता है उसकी सत्ता मानी जाती है, और जो उपलब्ध नहीं होता उसकी सत्ता नहीं मानी जाती । द्वैत की तो उपलब्धि होती है, अद्वैत की नहीं, तब अद्वैत की सत्ता कैसी मानी जाय ? इस शंका के समाधान में सिद्धान्ती कहता है कि किसी वस्तु की सत्ता या असत्ता में उसका दीखना या न दीखना कारण नहीं है । किन्तु वस्तु की सत्ता या असत्ता में निश्चायक कोई अन्य ही हेतु है। इसलिये रे मन ! तुम्हारे द्वारा जो-जो देखा जाता है, वह द्वैत ही देखा जाता है, वह तो स्वप्नदृष्ट वस्तु की तरह विनष्टस्वरूपवाला होने से असत् ही है । उसी तरह दिखाई नहीं देती, इसलिये वह वस्तु है ही, नहीं ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि नीरूप वायु का चाक्षुष प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी (वायु की) असत्ता नहीं कही जाती । अपितु उसकी सत्ता ही मानी जाती है । वस्तु के विद्यमान रहने पर भी द्रष्टा के असामर्थ्य से, अथवा दर्शनयोग्यता के न रहने से उसका दर्शन होना असंभव हो जाता है । अतः किसी वस्तु के दर्शन या अदर्शन मात्र से उसकी सत्ता या असत्ता का निर्णय नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार विचार का पर्यवसान निर्णय में होता है, उसी तरह जिससे सत् और असत् की कल्पना प्रवृत्त हुई है, वह कल्पना की अधिष्ठानभूत वस्तु अद्वय है और वही सत् है ॥ १४ ॥ सदभ्युपेतं भवतोपकल्पितं विचारहेतोर्यदि तस्य नास्तिता । विचारहानाच्च तथैव संस्थितं न चेत्तदिष्टं नितरां सदिष्यते ॥१५॥ सदिति—यदि तुम यह कहते हो कि 'सद्' वस्तु कोई है ही नहीं किन्तु इसका निर्णय करने के लिये तुम्हें विचार करना पड़ता है या नहीं ? यदि तुम्हें विचार करना पड़ता है, तो तुमने 'सत् वस्तु' की सत्ता को स्वीकार कर ही लिया है, यह मानना होगा, क्योंकि विचार करने के लिये किसी आधारभूत पदार्थ की सत्ता को स्वीकार किया जाता है । यदि आधार को स्वीकार न किया जाय तो विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी। तब 'तत्त्व' का निर्णय ही नहीं हो पायगा । इस प्रकार 'तत्त्व' का अनिर्णय यदि अभीष्ट नहीं है- तो यह निश्चित ही है कि 'सद्वस्तु' तुम्हें स्वीकार्य है ॥ १५ ॥ हृदयस्पर्शिनी विचार करने के लिए वादी और प्रतिवादी को अपने विवाद की आश्रयभूत किसी वस्तु का अवलंब (स्वीकार) करना ही पड़ता है; नहीं तो विवाद हो ही नहीं सकता । जैसे—आत्मा की सगुणता अथवा निर्गुणता का ३४
२६६ उपदेशसाहस्री निर्णय करना हो तो दोनों पक्षों को धर्मिस्वरूप आत्मा की सत्ता का स्वीकार तो करना ही पड़ेगा, अन्यथा उसके सगुणत्व या निर्गुणत्व धर्म का विचार ही कैसे प्रवृत्त हो सकेगा ? तुम्हारा कहना है कि कोई सत् वस्तु नहीं है, किन्तु उसके निर्णयार्थ तुम्हें विचार करना होगा कि नहीं ? निर्णयार्थ यदि तुम विचार करना आवश्यक समझते हो तो तुमने 'सत्' वस्तु की सत्ता को पहले स्वीकार कर ही लिया। क्योंकि उसके बिना विचार का आरंभ ही नहीं हो सकेगा। यदि उसका अस्तित्व न माना जाय तो विचार की प्रवृत्ति न होने के कारण निर्णय न हो पाने से वह तत्त्व अनिर्णीत ही रह जाता है। यदि ऐसा होना इष्ट नहीं है तो 'सत्' को निश्चित रूप से स्वीकार करना ही होगा ॥ १५ ॥
असत्समं चैव सदित्यपीति चेदनर्थवत्त्वान्नग्शृङ्गतुल्यतः । अनर्थवत्त्वं त्वसति ह्यकारणं न चैव तस्मान्न विपर्ययेऽन्यथा ॥१६॥
असत्सममिति—इस पर पूर्व पक्षी का कहना है कि 'सत्' वस्तु का स्वीकार करनेपर भी वह (सद्वस्तु) अर्थक्रिया- शून्य होने के कारण नरशृङ्ग के समान उसको 'अलीक' ही कहना होगा। तब सिद्धान्ती कहता है कि वस्तु की अर्थक्रिया- शून्यता उसकी 'असत्ता' में कारण नहीं है, तथा अर्थक्रियाकारित्व से 'वस्तु' की 'सत्ता' सिद्ध नहीं हुआ करती। अतः इससे विपरीत अवस्था में 'वस्तु' का अभाव रहना भी संभव नहीं है ॥ १६ ॥
हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी बौद्ध का कथन है कि जो वस्तु सत् होती है, वह सक्रिय होने से दीपशिखा के तुल्य क्षणिक होती है। और जो सक्रिय नहीं होती, वह असत् होती है। अतः परमार्थ वस्तु सत् नहीं हो सकती। यदि 'सत्' है ऐसा स्वीकार किया भी जाय तो अर्थक्रियाशून्य होने के कारण नरशृंग के तुल्य होने से वह अलीक (मिथ्या) ही होगी। इसपर सिद्धान्ती का कहना है कि वस्तु की असत्ता में 'अर्थक्रियाशून्यत्व' को कारण नहीं कहा जा सकता। 'अर्थक्रिया- कारित्व' से 'वस्तु की सत्ता' सिद्ध नहीं होती। क्योंकि कण्टकादि के अभाव में भी पादन्यासरूप क्रिया हो सकती है तथा क्रिया की उत्पत्ति से पूर्व भी वस्तु की सत्ता देखी जाती है। अतः अर्थक्रियाकारित्व से रहित होनेपर भी वस्तु 'सत्' हो सकती है। उसका अभाव संभव नहीं है ॥ १६ ॥
असिद्धतश्चापि विचारकारणाद्द्वयं च तस्मात्प्रसृतं च मायया । श्रुतेः स्मृतेश्चापि तथा हि युक्तितः प्रसिद्धयतीत्थं न तु युज्यतेऽन्यथा ॥१७॥
असिद्धतश्चेति—इसके अतिरिक्त तुम्हारे द्वारा किये गये अनुमान— 'श्रोतं सत् असत्समं अर्थक्रियाशून्यत्वात्, नरशृङ्गवत्' में 'असिद्धि' दोष के कारण उक्त हेतु हेत्वाभासरूप है। विचार के कारणभूत 'आत्मा' से ही मायावश 'द्वैत' का विस्तार हुआ है। श्रुति, स्मृति और युक्ति से भी यही सिद्ध हो रहा है। और कोई अन्य प्रकार बताना युक्तिविरुद्ध है ॥ १७ ॥
हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व के श्लोक में व्यभिचार-दोष का प्रदर्शन करते हुए बौद्धमत का खण्डन किया है। अब इस श्लोक में पक्षासिद्धिरूप दोष को बता रहे हैं। तुम्हारा अनुमान असिद्धिदोष से दूषित होने के कारण भी ठीक नहीं है। विचार के हेतुभूत आत्मा से ही मायावश द्वैत का विस्तार हुआ है। क्योंकि "मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्"१ तथा 'मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्'२ इत्यादि श्रुति-स्मृति तथा कार्य का वाचारंभणत्व भी किसी सद्रूप अधिष्ठान के रहने पर ही संभव हो सकता है, इस युक्ति३ से भी सर्वाधिष्ठानभूत परमार्थतत्व सत् ही हो सकता है, असत् नहीं। अतः 'अर्थक्रियाकारित्व का अभाव वस्तु की असत्ता का कारण है'-यह हेतु असिद्ध है। यदि
१. (श्वे. उ. ४।१०) २. (भ. गी. ९।१०) ३. (ब्र. सू. २।१।१४)
तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६७ केवल 'अर्थक्रियाकारित्वाभाव' को हेतु न कहकर उसमें 'परमार्थ' विशेषण जोडकर 'परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्वाभाव' को हेतु कहें, तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्व में कोई दृष्टान्त नहीं है। अन्यथा स्थिर या क्षणिक वस्तु में परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्व संगत नहीं है, क्योंकि अक्रिय कभी कारक नहीं हो सकता। क्रियाकार्य के प्रति भी क्रियावत्त्व यदि माना जाय तो अनवस्था दोष होगा। अतः तुम्हारे अनुमान में हेतु के दूषित रहने से उससे साध्यसिद्धि नहीं हो सकती ॥ १७ ॥ विकल्पनात्त्वाच्चापि विधर्मकं श्रुतेः पुरा प्रसिद्धेश्च विकल्पतोऽद्वयम् । न चेति नेतीति यथा विकल्पितं निषिद्धयतेऽत्राप्यविशेषसिद्धये ॥१८॥ विकल्पनादिति- यदि यह कहो कि 'आत्मा' सर्वविकल्पविशिष्ट है, क्योंकि वह समस्त विकल्पों का कारण है। किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि श्रुति प्रमाण से तथा विकल्प से पूर्व भी उसके विद्यमान रहने के कारण यह अद्वितीय आत्मा, विकल्प से भिन्न स्वभाव का है। जिस प्रकार अवशिष्ट वस्तु को बताने के लिये 'नेति-नेति' कह कर विकल्प का निषेध किया जाता है, उस तरह 'आत्मा' का निषेध नहीं किया जाता ॥ १८ ॥ हृदयस्पशिनी इस पर पूर्वपक्षी पुनः शंका कर रहा है कि जब अद्वय, समस्त विकल्पों का हेतु है, तो वह सर्व विकल्पों से युक्त हो ही जायगा। किन्तु ऐसी शंका करना उचित नहीं। क्योंकि “निष्कलं निष्क्रियम्” इस श्रुति से तथा विकल्प से पूर्व भी विद्यमान रहने के कारण अद्वितीय आत्मा विकल्प के स्वभाव से भिन्न स्वभाव का है। जिस प्रकार अवशिष्ट वस्तु की सिद्धि के लिए “नेति-नेति” वाक्य से विकल्प का निषेध किया जाता है, उस तरह अद्वय आत्मा का निषेध नहीं किया जाता। शुक्ति पर आरोपित रजत के समान प्रत्येक आरोपित वस्तु असत् होती है, तथापि उसका अधि- ष्ठान सत्य (सत्) होता है। आत्मा समस्त विकल्पों का अधिष्ठान है। अतः विकल्पमात्र मिथ्या है, अधिष्ठानस्वरूप आत्मा मिथ्या नहीं है। इसीलिए 'नेति-नेति' वाक्य से केवल आरोपित विकल्प का ही बाध किया जाता है, उसके अधिष्ठानभूत परमार्थसत्य आत्मा का नहीं ॥ १८ ॥ अकल्पितेऽप्येवमजेऽद्वयेऽक्षरे विकल्पयन्तः सदसच्च जन्मभिः । स्वचित्तमायाप्रभवं च ते भवं जरां च मृत्युं च नियान्ति संततम् ॥१९॥ अकल्पितेऽपीति- यद्यपि 'आत्मा' अकल्पित, अजन्म, अद्वय और अविनाशी है, तथापि जो मनुष्य उसमें (आत्मा में) 'सत्-असत्' कर्तृत्व की कल्पना करते हैं, वे सर्वदा स्व-बुद्धिभ्रम से कल्पित जन्म, जरा, मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं ॥ १९ ॥ हृदयस्पशिनी यथोक्त श्रुत्यर्थ में जो विकल्प करते हैं, वे अनर्थ को प्राप्त होते हैं। अर्थात् जो लोग अविकल्पित (कूटस्थ) अर्थात् भेदविकारसंसर्गशून्य अजन्म, अद्वय और अविनाशी आत्मा में सत्, असत् तथा कर्तृत्वादि की कल्पना करते हैं, वे निरन्तर तिर्यक्-मनुष्यादि योनियों के द्वारा अपने बुद्धिभ्रम से ही कल्पित जन्म, जरा एवं मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥ भवाभवत्वं तु न चेदवस्थितिर्न चास्य चान्यस्थिति जन्म नान्यथा । सतो ह्यसत्त्वादसतश्च सत्त्वतो न च क्रियाकारकमित्यतोऽप्यजम् ॥२०॥ भवाभवत्वमिति- कोई भी सद्वस्तु उत्पत्ति और अनुत्पत्ति दोनों से ही विलक्षण स्वभाव की नहीं हुआ करती। क्योंकि 'उत्पत्तिमत्त्व' और 'अनुत्पत्तिमत्त्व'-दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं। उस कारण 'द्वैत' के उत्पत्तिस्वरूप को यदि स्वीकार नहीं करते तो उसकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होगी। यदि उसकी उत्पत्ति मानते हैं तो उसकी उत्पत्ति किसी अन्य 'सत्' वस्तु से नहीं हो सकती, और न 'असत्' से ही हो सकती है, क्योंकि 'सत्' को विकारी होने के कारण 'असत्'
कहना होगा, और उपादान होने के कारण 'असत्' को 'सत्' कहना होगा। इसलिये क्रियाकारक कुछ भी नहीं है। अतः एक निर्विशेष, अजन्मा 'आत्मा' ही है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी सद्बस्तु की कूटस्थता, अद्वितीयता, जो श्रुत्यादि प्रमाणों से सिद्ध है, उसकी स्व-बुद्धिभ्रम से अन्यथा कल्पना मनुष्य किया करता है, अर्थात् वह अन्यथा कल्पना पुरुषापराधनिबन्धन है। उसी को सुदृढ़ करने के लिये अब युक्ति बताते हैं। द्वैतवादी से हम पूछते हैं कि पहले यह बताओ, तुम्हारा अभिमत 'द्वैत' - उत्पद्यमान स्वभाववाला है, या अनुत्पद्यमान स्वभाववाला है अथवा उभयस्वभाववाला है ? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित नहीं होगा, क्योंकि उत्पत्ति (जन्म) तो किसी अन्य वस्तु से ही हो सकती है, अतः वह सापेक्ष है, उस कारण शुक्ति-रजतादि के समान उसमें मिथ्यात्व आ जायगा। उसी तरह द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि तब उसे नित्य मानना होगा, परिणाम यह होगा कि उसके अभाव का व्यवहार ही कभी नहीं हो सकेगा। उसी तरह तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही वस्तु परस्परविरुद्धस्वभाव वाली नहीं होती। इसी अभिप्राय को मन में रखकर चतुर्थ पक्ष को बताकर उसे भी दूषित कर रहे हैं। भवश्च अभावश्च भावाभवौ, तयोर्भावः भवाऽभवत्वम्। परस्पर विरुद्ध होने के कारण 'द्वैत' के भवाऽभवत्व (उत्पत्ति-अनुत्पत्ति) को विरोध के कारण यदि स्वीकार नहीं करते हो तो उसकी अवस्थिति अर्थात् सत्ता ही सिद्ध न हो सकेगी। उभयस्वभावविलक्षण कोई भी वस्तु नहीं हुआ करती। यदि द्वैत की उत्पत्ति कहें तो स्वतः ही जन्म होना संभव न रहने से, किसी दूसरे से ही कहना होगा। तब भी पुनः प्रश्न हो सकता है कि उस द्वैत का जन्म 'सत्' वस्तु से है, या 'असत्' वस्तु से है ? किन्तु दोनों पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि उत्पत्तिशील होने से 'सत्' विकारी होने के कारण 'असत्' सिद्ध होगा और उपादान होने के कारण असत् 'सत्' हो जायगा। अतः क्रिया-कारक कुछ भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि एक आत्मतत्त्व ही निर्विशेष, अजन्मा है ॥ २० ॥ अकुर्वदिष्टं यदि वाऽस्य कारकं न किञ्चिदन्यन्ननु नास्त्यकारकम् । सतोऽविशेषादसत्तश्च सच्युतौ *तुलान्तयोर्यद्वदनिश्श्यान्न हि ॥२१॥ अकुर्वदिति - इस द्वैत वर्ग के कारक को यदि निष्क्रिय माना जाय तो सभी वस्तुओं को कारक कहा जा सकेगा और यदि उसे सक्रिय माना जाय तो उसका कारकत्व सिद्ध नहीं हो सकेगा, क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' दोनों ही अवस्था- ओं में समान रहेगा। यदि 'सत्' के सत्त्व की तथा 'असत्' के असत्त्व की च्युति होने पर उनका कारकत्व कहा जाय तो जिस प्रकार तराजू की डण्डी के उठने और झुकने में कौन किसका कारण है, यह निश्चय नहीं है, उसी प्रकार उनके कार्य-कारण भाव का निश्चय नहीं किया जा सकता ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि इस द्वैतवर्ग के कारक को निष्क्रिय माना जाय तो ऐसी कोई वस्तु नहीं रहती जो उसका कारक न हो सके। उस अवस्था में सभी इसके कारक हो सकते हैं, क्योंकि क्रियाहीन तो सभी वस्तु हो सकती हैं। अतः उसे यदि अन्यथा (सक्रिय) कहा जाय तो उसकी कारकता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि वह सत् और असत् दोनों ही अवस्थाओं में समान रहेगा। यदि उस 'सत्' या 'असत्' के सत्त्व या असत्त्व की च्युति होने पर उनका कारकत्व माना जाय तो जिस प्रकार तुलादण्ड के उठने और झुकने में कौन किसका कारण है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार उनके कार्य-कारण भाव का निश्चय नहीं किया जा सकता। यदि सक्रिय वस्तु को द्वैत का कारण माना जाय तो प्रश्न यह हो सकता है कि वह स्वभाव से सक्रिय है या किसी अन्य की अपेक्षा से ? यदि स्वभाव से सक्रिय है तो उसकी क्रिया नित्य होने के कारण उससे सर्वदा कार्य की उत्पत्ति होती रहेगी, और यदि अन्य किसी की अपेक्षा से उसे सक्रिय कहें तो उसके विषय में भी यही विकल्प होने के कारण अनवस्था आदि दोषों की प्राप्ति होगी। अतः वह 'सत्' हो अथवा 'असत्' दोनों ही प्रकार से उसका कारकत्व सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि सत् होने पर तो वह सर्वदा 'सत्' ही रहेगी, और 'असत्', होने पर वह सर्वदा 'असत्' ही रहेगी। यदि कार्य की उत्पत्ति के लिये उसके सत्त्व या असत्त्व की प्रच्युति स्वीकार की जाय तो उसके स्वरूप में विरूपता आ जाती है। और उस अवस्था
- तुलां तयोः - पाठान्तरम् ।
तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६९ में यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि वह अवस्थाच्युति और कार्य की उत्पत्ति, एक काल में होती है या क्रम से होती है ? इसमें भी प्रथम पक्ष उचित नहीं है, क्योंकि तराजू के पलड़ों के झुकने-उठने में जैसे यह नहीं कहा जा सकता कि कौन किसका कारण है, उसी प्रकार उनके कार्य-कारणभाव का निश्चय नहीं हो सकता, और यदि द्वितीय पक्ष माना जाय तो अनवस्था दोष होगा, क्योंकि अवस्थाच्युति भी एक कार्य ही है, अतः उसे भी पहले ऐसी ही अवस्थाच्युति की आवश्यकता होगी ॥ २१ ॥ न चेत्स इष्टः सदसद्विपर्ययः कथं भवः स्यात्सदसद्द्वयस्थितौ । विभक्तमेतद्द्वयमप्यवस्थितं न जन्म तस्माच्च मनो हि कस्यचित् ॥२२॥ न चेदिति—यदि ‘सत्’ और ‘असत्’ का विपर्यय ( वैपरीत्य ) अभीष्ट नहीं है, तो उनके स्वरूप निश्चित रहने के कारण 'द्वैत' की उत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि 'सत्' और 'असत्' दोनों ही परस्परसंसर्गरहित होकर ही स्थित हैं। इसलिये हे मन ! किसी की भी उत्पत्ति का होना संभव नहीं है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तु की अवस्थान्तरापत्ति को स्वीकार करके हमने यह कहा था, वास्तव में तो सत् या असत् का अवस्थान्तर होना उपपन्न नहीं है, इस कारण किसी में भी कार्यता-कारणता नहीं है। यदि सत् और असत् का इस प्रकार विपरीतभाव को प्राप्त होना अभिष्ट नहीं है, तो सत् और असत् का स्वरूप निश्चित रहते हुए द्वैत की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? क्योंकि ये सत् और असत् दोनों ही परस्परसंसर्गशून्य रहते हुए स्थित हैं। इसलिये हे मन ! किसी की भी उत्पत्ति संभव नहीं है ॥ २२ ॥ अथाऽभ्युपेत्याऽपि भवं तवेच्छतो ब्रवीमि नार्थस्तव चेष्टितेन मे । न हानवृद्धी न यतः स्वतोऽसतो भवोऽन्यतो वा यदि वाऽस्तिता तयोः ॥२३.। अथेति—हे मन ! यद्यपि तेरे जन्म ( उत्पत्ति ) को मान भी ले तो भी मैं यह बता रहा हूँ कि जन्म की इच्छा करने वाले तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन (हानि-लाभ) नहीं है, क्योंकि 'आत्मा' में जिनकी स्वयं सत्ता नहीं है, उन हानि-लाभों ( प्रयोजनों ) का होना, किसी अन्य कारण से संभव नहीं है। यदि आत्मा में उनकी सत्ता हो तो भी तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि जिस किसी का जन्म (उत्पत्ति) हो भी, तथापि ब्रह्मभूत हुए मेरी कोई क्षति या वृद्धि नहीं है। अरे मन ! तेरी उत्पत्ति (जन्म) स्वीकार करके भी मैं यह कह सकता हूँ कि जन्म (उत्पत्ति) की इच्छा रखनेवाले तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन (हानि-लाभ) नहीं है। क्योंकि आत्मा में अविद्यमान हानि या वृद्धि (लाभ) का उद्भव (उत्पत्ति) होना स्वतः या अन्य किसी हेतु से भी संभव नहीं है। और यदि आत्मा में उनकी सत्ता हो भी, तथापि तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २३ ॥ ध्रुवा ह्यनित्याश्च न चान्ययोगिनो मिथश्च कार्यं न च तेषु युज्यते । अतो न कस्यापि हि किञ्चिदिष्यते स्वयं च तत्त्वं न निरुक्तिगोचरम् ॥२४॥ ध्रुवेति—स्थिर और अस्थिर ( क्षणिक ) वस्तुओं ( पदार्थों ) का न तो किसी अन्य से सम्बन्ध होता है, और न परस्पर ही सम्बन्ध रहता है। तथा उनमें किसी कार्य का होना भी संभव नहीं है। अतः कोई किसी का सम्बन्धी नहीं है। अधिक क्या कहें, स्वयं 'आत्मा' भी वाक्य का विषय नहीं है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी हीयमान और उपचीयमान वस्तुओं का आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है, इस कारण भी हानि-वृद्धि का आत्मा में होना संभव नहीं है।
२७० उपदेशसाहस्री ध्रुव (स्थिर, कूटस्थ) और अनित्य (क्षणिक) वस्तुओं का न तो किसी अन्य से सम्बन्ध होता है और न ही परस्पर-सम्बन्ध होता है। उसी तरह उनमें किसी कार्य का होना भी संभव नहीं है। इसलिये परमार्थतः कोई किसी का सम्बन्धी अभीष्ट नहीं है। तात्पर्य यह है कि स्थिर पदार्थ में विकार न हो सकने के कारण और क्षणिक पदार्थों का अन्य पदार्थ के साथ सम्बन्ध होने के काल तक रहना असंभव होने के कारण स्थिर-अस्थिर पदार्थों के परस्पर सम्बन्धित्व का होना संभव नहीं है, क्योंकि सम्बन्धि-सम्बद्धत्व और असंबद्धत्व इत्यादि विकल्प उपस्थित होंगे। अतएव उनमें कार्य का होना उपपन्न नहीं है। इस पर भी यह शंका होती है कि आत्मा का अन्य किसी के साथ सम्बन्ध नहीं है, यह कैसे कहा जा रहा है ? क्योंकि आत्मा को वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण का प्रमेय मानते हैं। उक्त शंका का समाधान इस प्रकार किया गया है कि यह आत्मतत्त्व (आत्मस्वरूप) स्वयं निरुपाधिक है। वह निरुक्ति (वेदान्तवाक्य) का मुख्यवृत्ति से विषय नहीं है। क्योंकि शब्द के प्रवृत्त होने में निमित्तभूत कोई धर्म उसमें नहीं है। किन्तु उसमें शब्द का पर्यवसान लक्षणा के द्वारा मानकर उसे वेदान्तवाक्यरूप प्रमाण का प्रमेय कहा जाता है। वस्तुतः वह आत्मतत्त्व वेदान्तवाक्य का भी विषय नहीं है ॥२४॥ समं तु तस्मात्सततं विभातवद्द्वयाद्विमुक्तं सदसद्विकल्पितात् । निरीक्ष्य युक्त्या श्रुतितस्तु बुद्धिमानशेषनिर्वाणमुपैति दीपवत् ॥२५॥ सममिति—यही कारण है कि समस्वरूप, नित्य प्रकाशमय तथा 'सत्-असत्-विकल्पमय द्वैत' से शून्य जो 'आत्मा' है, उसका श्रुति और युक्ति से साक्षात्कार करके बुद्धिमान् पुरुष 'दीपक' के निर्वाण के समान सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त होकर निर्वाण को प्राप्त हो जाता है ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी सत्-असत् विकल्परूप द्वैत से रहित समस्वरूप, नित्यप्रकाशमय उस आत्मतत्त्व का श्रुति और युक्ति से साक्षात्कार करके बुद्धिमान् पुरुष, दीपक के समान सहसैव समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है। अर्थात् निरीक्षण और निर्वाण दोनों के बीच कोई व्यवधान नहीं रहता है ॥ २५ ॥ अवेद्यमेकं यदनन्यवेदिनां कुतार्किकाणां च सुवेद्यमन्यथा । निरीक्ष्य चेत्थं त्वगुणग्रहोऽगुणं न याति मोहं ग्रहदोषमुक्तितः ॥२६॥ अवेद्यमिति—किसी अन्य पदार्थ को जो लोग 'आत्मा' से भिन्न नहीं देखते, ऐसा वह अद्वितीय आत्मतत्त्व उनके ज्ञान का विषय नहीं है। अन्यथा वह कुतार्किकों के लिये भी सुवेद्य हो जायगा। शरीर आदि में अभिनिवेश न रखने वाला पुरुष निर्विशेष आत्मा का साक्षात्कार करके मिथ्याज्ञान रूप दोष से मुक्त हो जाता है, अतएव वह मोहित नहीं होता है ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त लक्षण वाले आत्मतत्त्व का निरीक्षण विषयत्वेन होता है या अविषयत्वेन ?—ऐसी जिज्ञासा होनेपर 'अविषयत्वेनैव' होता है, यह बताया जा रहा है। सर्वसाक्षीभूत प्रत्यगात्मा से भिन्न अद्वय ब्रह्म नहीं है, ऐसा जो जानते हैं, उन अनन्यवेदियों के ज्ञान का वह विषय नहीं है। अन्यथा वह आत्मतत्त्व कुतार्किकों के लिये भी परिच्छिन्नतया सुज्ञेय हो जायेगा। अर्थात् शास्त्र, युक्तिविचार आदि के प्रयास के बिना ही अपनी बुद्धि के अनुसार सुखबोध्य हो जायगा। शरीर (देह) आदि के अभिमान से रहित हुआ पुरुष इस प्रकार निर्विशेष आत्मतत्त्व का अपरोक्षतया अनुभव कर (साक्षात्कार कर) मिथ्याज्ञानरूप दोष से मुक्त होने के कारण पुनः मोह को प्राप्त नहीं होता है ॥ २६ ॥ अतोऽन्यथा न ग्रहनाश इष्यते विमोहबुद्धेर्ग्रह एव कारणम् । ग्रहोऽप्यहेतुस्त्वनलस्त्वनिन्धनो यथा प्रशान्ति परमां तथा व्रजेत् ॥२७॥
तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २७१ अत इति—मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) का नाश 'आत्मज्ञान' से ही होता है, तदतिरिक्त किसी अन्य के ज्ञान से नहीं होता। 'मोह' का कारण एकमात्र मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) ही है। जिस प्रकार ईंधन (काष्ठ-तृण आदि) से रहित अग्नि स्वयं शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अपनी उत्पत्ति के कारण से रहित हो जाने पर मिथ्या ज्ञान (अज्ञान) की भी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है॥ २७॥ हृदयस्पर्शिनी इतने महान् प्रयत्न से अविषयतया ब्रह्मात्मज्ञान का होना क्यों अभीष्ट है ? इसका समाधान यह है कि आत्मज्ञान से भिन्न किसी अन्य हेतु से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं होती है। श्रुति ने भी इसी को बताया है¹। मिथ्या- ज्ञान ही मोहबुद्धि (देह, गृह आदि में मैं-मेरा इस प्रकार की अभिनिवेशबुद्धि) का कारण है। जिस प्रकार ईंधन रहित अग्नि शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अपने कारण से रहित हुआ मिथ्या ज्ञान भी आत्यन्तिक रूप से निवृत्त हो जाता है ॥ २७ ॥ विमथ्य वेदोदधितः समुद्धृतं सुरैर्महाब्धेस्तु यथा महात्मभिः । तथाऽमृतं ज्ञानमिदं हि यैः पुरा नमो गुरुभ्यः परमीक्षितं च यैः ॥२८॥ विमथ्येति—पहिले किसी समय उदारचरित्र देवताओं ने समुद्र का मन्थन करके जिस प्रकार अमृत प्राप्त किया था, उसी प्रकार वेदसमुद्र का मन्थन कर उससे इस ज्ञानामृत को जिन्होंने निकाला तथा परमात्मा का भी साक्षा- त्कार किया, उन गुरुचरणों में हमारा प्रणाम है ॥ २८ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रकरण समाप्ति पर पुनः गुरुनमस्काररूप मङ्गलाचरण किया जा रहा है। जिस प्रकार सुदूर पूर्वकाल में महात्मा देवताओं ने क्षीरसागर का मन्थन करके अमृत प्राप्त किया था, उसी प्रकार जिस गुरुदेव ने वेदरूप महान् सागर का मन्थन करके इस ज्ञानामृत का उद्धार किया, और परमात्मा का साक्षात्कार किया, उस गुरुदेव को प्रणाम हैं। अथवा निमित्तभूत जिस गुरुदेव के कारण मैं परब्रह्म का साक्षात्कार कर पाया, उस गुरुदेव को प्रणाम हैं। श्रुति भी कह रही है कि “तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः²” तथा भागवतकार ने भी कहा है— “निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम् । अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयमङ्घ्रिरेणुभिः³ ॥” २८ ॥ ॥ इति एकोनविशंणतृष्णाज्वरनाशकप्रकर समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रीमदाद्यशंकराचार्यविरचितोपदेशसाहस्र्याः पद्यप्रबन्धस्य वैद्य-मुसलगाँवकरोपनामकेन श्रीगजानन- शास्त्रिणा विरचिता 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दीव्याख्या पूर्णताङ्गता ॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ १. “नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।”—( श्वे. उ. ३।८।६, १५ ) २. ( मुं. उ. ३।१ ) ३. ( श्रीमद्भागवद्-११।१४।१६ )
कर्मबन्धनमिदं भवेत्कथं मायया च जनितं तमः कुतः । आत्मभानमिदमेकमङ्गलं भासते यदि मनःस्वराज्यके ॥
गद्यभाग १: शिष्यप्रतिबोधविधिप्रकरणम्
उपदेशसाहस्री (गद्यभागः) शिष्यानुशासनप्रकरणम् अथ मोक्षसाधनो*पदेशविधिं व्याख्यास्यामो मुमुक्षूणां श्रद्दधानानामर्थिनामर्थाय ॥१॥ हृदयस्पर्शिनी अथेति—समस्त उपनिषदों के सारभूत अर्थ की संग्राहिका पद्य-गद्यात्मक इस उपदेशसाहस्री की रचना भगवत्पूज्यपाद भगवान् भाष्यकार (आद्य श्रीशङ्कराचार्य) ने की है ! प्रथमतः पद्यभाग को समाप्त कर गद्यभाग का आरम्भ तथा निर्विघ्नतया ग्रन्थ की परिसमाप्ति एवं लोककल्याणार्थ उसके प्रचार-प्रसार की कामना से प्रमाणभूत स्मृति के अनुसार भाष्यकार ने 'अथ' शब्द से ही मङ्गलाचरण करते हुए ग्रन्थ का आरंभ किया है। “ॐकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्यांतौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥” इस स्मृतिवचन के अनुसार 'अथ' शब्द को माङ्गलिक माना जाता है। अमरकोषकार ने 'अथ' के अनेक अर्थ बताये हैं। उन अनेक अर्थों में एक अर्थ 'अनन्तर' भी है। तदनुसार उसे आनन्तर्यार्थक स्वीकार करने पर भी उसके उच्चारण मात्र से ही मङ्गलाचरण अन्यार्थ क्रियमाण मृदङ्गादि ध्वनिश्रवण के समान अनायास सिद्ध हो जाता है। आनन्तर्यार्थक 'अथ' शब्द के द्वारा यह ज्ञात होता है कि अनेक शास्त्रार्थ-निबन्धों का सविस्तार निर्माण करने के अनन्तर अर्थात् इस ग्रन्थ के पूर्व आचार्यचरणों ने समस्त दशोपनिषद तथा अन्यान्य उपनिषदों पर भी प्रश्न, प्रतिवचन, आक्षेप, समाधान आदि की शैली से अनेक प्रमाण तथा युक्तिपुरःसर भाष्यरचना की और उसके द्वारा समस्त उपनिषदों के अर्थ का निर्धारण कर दिया, तथापि अधिकारियों के तारतम्य को देखकर अनेक वाक्य, युक्तियों के अनुसन्धान के व्यवधान को हटाकर साक्षात् औपनिषद ज्ञान कराने के लिये उसी उपनिषदर्थ का संक्षेप में निरूपण करने की ओर आचार्यचरण प्रवृत्त हो रहे हैं। संक्षेप में उपनिषदर्थप्रतिपादक इस उपदेशसाहस्री के द्वारा सरलता से परमार्थ-तत्त्व का ज्ञान हो सकता है। अपने चिकीर्षित अभीष्ट ग्रन्थ की प्रतिज्ञा करते हुए ग्रन्थप्रवृत्ति में उपकारक शास्त्रीय अनुबन्धों का संग्रह प्रारंभ में किया हुआ है। भाष्यकार “अथ मोक्षसाधनोपदेशविधि व्याख्यास्यामः, मुमुक्षूणां श्रद्दधानानामर्थिना- मर्थाय” ॥ १॥ इस वाक्य के द्वारा ग्रन्थारम्भ की प्रतिज्ञा कर रहे हैं और तद्गर्भित अनुबन्धचतुष्टय की सूचना भी दे रहे हैं। ग्रन्थगत 'मोक्ष' शब्द से 'प्रत्यक्तत्त्व ब्रह्म' रूप विषय का निर्देश किया है। 'साधन' (तत्त्वज्ञान) शब्द से तत्साध्य अज्ञानादिबन्ध की निवृत्तिरूप प्रयोजन को सूचित किया है। 'उपदेशविधि' शब्द से शास्त्र और विषय के 'बोध्य-बोधक सम्बन्ध' को प्रदर्शित किया गया है। 'मुमुक्षु' शब्द से केवल मोक्ष की ही इच्छा रखने वाले भाग्यशाली इसके अधिकारी— इस प्रकार अनुबन्धचतुष्टय सूचित किया गया है। श्रीमदाचार्यचरण प्रतिज्ञा कर रहे हैं—हम सविस्तर शास्त्रार्थ निरूपण के अनन्तर निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मकताविर्भाव के साधनभूत अद्वितीय उपनिषत्प्रोक्त आत्मतत्त्वज्ञान की उपदेशविधि को स्पष्ट रूप से बतावेंगे। उपनिषदवाक्यों का अर्थविभाग करते हुए मुमुक्षु शिष्य के प्रति प्रतिपादन करना ही 'उपदेश' है। आचार्य ने अधिकारी के तीन विशेषणों से शिष्य की साधन सम्पत्ति को बता दिया है। अधिकारी शिष्य वही होता है, जो मुमुक्षु हो, श्रद्धा रखनेवाला (श्रद्दधान) हो, और अर्थी हो । प्रथम विशेषण से यह सूचित किया है कि ऐहलौकिक तथा पारलौकिक अर्थ की तृष्णा का लव-लेश भी जिनमें हो, वे इस वेदान्तश्रवण के अधिकारी नहीं हैं। दूसरे विशेषण से यह सूचित किया है कि मुमुक्षु रहते हुए भी यदि कर्मानुष्ठान में तत्पर हों या
- साधनज्ञानो०—पाठान्तरम् । ३५
२७४ उपदेशसाहस्री अन्यान्य शास्त्रों में श्रद्धा रखते हों, वे इस वेदान्तश्रवण के अधिकारी नहीं हैं । तृतीय विशेषण से यह सूचित किया है— इस वेदान्तशास्त्र पर श्रद्धा रहते हुए भी जो अपने पाण्डित्यप्रकर्ष का प्रदर्शन करने के उत्सुक हों, वे भी इस वेदान्त- श्रवण के अधिकारी नहीं हैं। अतः इस वेदान्तशास्त्र के श्रवण का अधिकार उन्हीं को है, जो केवल एकमात्र मोक्ष ही चाहते हैं, तथा इम वेदान्तशास्त्र पर ही जिनका सर्वथा विश्वास (श्रद्धा) है, और इस वेदान्तशास्त्र के अर्थ (पद-पदार्थ-सिद्धान्त) का ज्ञान प्राप्त करने की कामना (इच्छा) जिन्हें है। इन तीन विशेषणों से विशिष्ट अधिकारी शिष्यों के उपकारार्थ हम अब मोक्षसाधनोपदेशविधि का प्रतिपादन करेंगे ॥ १ ॥
तदिदं मोक्षसाधनं ज्ञानं साधनसाध्यप्रादनित्यात्सर्वस्माद्विरक्ताय त्यक्तपुत्रवित्तलोकैषणाय प्रतिपन्न- परमहंसपारिव्राज्याय शमदमदयादियुक्ताय शास्त्रप्रसिद्धशिष्यगुणसंपन्नाय शुचये ब्राह्मणाय विधिवदुपसन्नाय जातिकर्मवृत्तविद्याभिजनैः परीक्षिताय शिष्याय ब्रूयात् पुनः पुनर्यावद्ग्रहणं दृढीभवति ॥२॥
हृदयस्पर्शिनी तदिदमिति—पूर्वोक्त अर्थ का ही संक्षेप में विवरण दे रहे हैं—विधिवत् (यथाविधि) आये हुए शिष्य को मोक्षसाधनभूत ज्ञान का उपदेश देना चाहिए । इस ज्ञान से कारणरूप अज्ञान के सहित कार्यरूप संसारात्मक बन्ध की निवृत्ति होकर ब्रह्मात्मभाव का आविर्भाव होता है। किन्तु यह उपदेश उसी शिष्य में फलीभूत होगा, जो दृष्टार्थ कृषि आदि कर्मों से और अदृष्टार्थ यागादि कर्मों से निष्पन्न होनेवाले ऐहिक तथा आमुष्मिक भोग्य फलों के पाने की अभिलाषा न करता हो, अतएव शिष्य को ब्रह्मलोक तक सभी अनित्य (अशाश्वत) फलों के प्रति अनासक्त (अभिलाषशून्य= विरक्त=वीतराग) होना आवश्यक है। नैष्कर्म्यसिद्धिकार कहते हैं—“नाविरक्ताय संसारात्, नानिरस्तैषणाय च”१ इस प्रकार के विरक्त शिष्य की पहचान विरक्ति के चिह्नों से करनी चाहिये । पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा का त्याग करना ही (इसी प्रकार की किसी एषणा=इच्छा का न होना ही) विरक्ति का चिह्न है। यहाँ पर ‘एषणा’ (काम=इच्छा) शब्द से तत्प्रयुक्त प्रवृत्ति बताई गई है। जैसे—पुत्र की इच्छा से दार (पत्नी) संग्रह की प्रवृत्ति को पुत्रैषणा, कर्मानुष्ठानार्थ अपर विद्याधन और गो आदि पशुधन, इस प्रकार उभयविध धन (वित्त) संग्रह की प्रवृत्ति को वित्तैषणा, उसी प्रकार पुत्र, कर्म, अपरविद्या से साध्य इहलोक, पितृलोक और देवलोकरूप फल सम्पादन की प्रवृत्ति को लोकैषणा कहते हैं। तात्पर्य यह है कि फल-साधनों की ओर प्रवृत्ति की उत्सुकता के त्याग से ही साध्य (फल) भिलाषशून्यता का ज्ञान हो जाता है, तभी वह मोक्षशास्त्र के श्रवण का तथा मोक्षप्राप्ति का अधिकारी बन पाता है। क्योंकि उपनिषद् में कहा है— “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” - (महाना. उ. १०।५) उसी प्रकार अधिकारी शिष्य वही है, जो परमहंस संन्यासाश्रम में अवस्थित है२ । ‘परमहंस' विशेषण से कुटीचकादि स्मार्त संन्यास की व्यावृत्ति की गई है। अर्थात् द्वैताद्वैतवादियों का अद्वितीय आत्मतत्वोपदेश ग्रहण में अधिकार नहीं है। इससे मूलगत ‘मुमुक्ष' पद की व्याख्या की गई । उपर्युक्त कथन से कोई यह न समझ ले कि संन्यासाश्रम ग्रहण करने मात्र से ही अद्वितीयोपदेशश्रवण का अधिकार प्राप्त हो जाता है। श्रवणाधिकार प्राप्त करने के लिये शम-दम-दया आदि गुणों से भी युक्त होना आवश्यक है । अनात्म विषयों से अन्तःकरण की व्यावृत्ति को ‘शम' कहते हैं। बाह्येन्द्रियों के निग्रह को ‘दम' कहते हैं । प्राणिमात्र में द्रोह न रखने को ‘दया' कहते हैं । विवरण में ‘दया आदि' कहा गया है, अतः 'आदि' पद से उपति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान का संग्रह किया गया है। इससे मूलगत ‘श्रद्दधानानाम्' की व्याख्या की गई । इतने गुणों के रहने पर भी— “अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः । असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ॥” इस पारस्परिक वचनानुसार आचार्यचरण ने बताया है कि शास्त्रप्रसिद्ध अन्यान्य गुणों से भी युक्त होना आवश्यक
१. (नै० सि० ४।७१) २. “एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिश्चन्तः प्रव्रजन्ति”-(बृ. उ. ४।४।२२) तथा “तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्”—(महाना. उ. २१।२)
शिष्यानुशासनप्रकरणम् २७५ है। विवरणस्थ ‘शास्त्रप्रसिद्धशिष्यगुणसम्पन्नाय’ के कहने से मूलस्थ ‘अर्थिनाम्’ की व्याख्या हो गई। इतना ही नहीं, अधिकारप्राप्त्यर्थं बाह्य पवित्रता और आभ्यन्तर पवित्रता भी आवश्यक है। क्योंकि शास्त्र बता रहा है—‘नाशुचिर्ब्रह्म कीर्तयेत्’ तथा ‘त्रिसन्ध्यादौ स्नानमाचरेत्’ इति ! यद्यपि अद्वैत तत्त्वज्ञान के इच्छुक क्षत्रियादिक भी होते हैं, तथापि उनका संन्यास धर्म (पारमहंस्य) में अधिकार नहीं है। अतएव अद्वैत तत्त्वज्ञान से सम्पन्न रहते हुए भी जनकादि ने गार्हस्थ्य का परित्याग नहीं किया था। यह अद्वैत वेदान्त शास्त्र, यथोक्त (शास्त्रविहित) संन्यासाधिकारी ब्राह्मण के लिये ही है, आश्रमान्तर के अधिकारी के लिये नहीं। क्योंकि अन्य आश्रम (आश्रमान्तर), प्रवृत्तित्वधर्मपरक हैं, उनका त्याग किये बिना तद्विरुद्ध निवृत्ति में निष्ठा होना असंभव है। यदि ब्राह्मणानतिरिक्त विविदिषु लोग अपने आश्रम का त्याग करते हैं तो उनके लिये आश्रमान्तर (संन्यासाश्रम) का विधान नहीं है, तब उन्हें अनाश्रमी रहना होगा किन्तु ‘अनाश्रमी न तिष्ठेत’ के अनुसार अनाश्रमी रहने का निषेध किया गया है, उसका उल्लंघन करना पड़ेगा। भगवान् भाष्यकार ने कहा है— “अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च भोक्ता चास्मीति ये विदुः। ते नष्टा ज्ञानकर्मभ्यां नास्तिकाः स्युर्न संशयः२॥ इति, “संन्यासिभ्यः प्रवक्तव्यः शान्तेभ्यः शिष्यबुद्धिना३”। अतः कुछ लोगों का जो यह कथन है कि ‘पारिव्राज्य’ विशेषण, नित्याधिकारित्व का ख्यापन करने के लिये है, आश्रमान्तर की व्यावृत्ति के लिये नहीं', वह चिन्त्य है। एवञ्च “ब्राह्मणो निर्वेदमायात्४”, “एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे (ब्राह्मणा अनूचाना) विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते५”, “एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः६” इत्यादि वचनों से पूर्वोक्त विशेषणविशिष्ट ब्राह्मण-संन्यासी को ही अद्वैततत्त्वज्ञानोपदेश प्राप्त करने का अधिकार स्पष्ट बताया गया है। उपर्युक्त विशेषणों से विशिष्ट शिष्य को उपदेशक गुरु के समीप यथाविधि आना चाहिये, यह श्रुति ने बताया है—‘‘तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभि- गच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्७”। ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप आकर विद्या (ज्ञान) ग्रहणार्थ उनके चरणों को यथाविधि स्पर्श करते हुए उनका अभिवादन करते समय “अधीहि भगवः८” इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करें। इस रीति से मन्त्रोच्चारणपूर्वक अभिवादन को ही 'उपसत्ति' (समीप आना) कहते हैं। एवंगुणविशेषणविशिष्ट ‘शिष्य’ अर्थात् शासन के योग्य अर्थात् पूर्वं बहुश्रुत रहने पर भी औद्धत्य से रहित यानी विनीत होना आवश्यक है। तथा उसके जाति- कर्म-वृत्त-विद्या और अभिजन की भी परीक्षा कर लेनी चाहिये। जातिपरीक्षण से कुण्ड, गोलक, क्षत्रियादि की व्यावृत्ति बताई गई है। कर्मपरीक्षण से उसमें पतितत्व, अभिशप्तत्व आदि न होना अपेक्षित है, जिससे शिष्य की शिष्टता का ज्ञान हो सके। वृत्त (शील, आचार) की परीक्षा कर लेने से विद्या (ज्ञान) ग्रहण कर लेने के पश्चात् भी उसके परिपालन करने की योग्यता का ज्ञान हो सकता है। ये सब परीक्षण श्रुतिप्रमाणसिद्ध हैं९, किसी की कल्पना मात्र नहीं हैं। 'विद्या'= पूर्व अधीत वेद-शास्त्रादिरूप अथवा उपास्य देवताविशेषविषयक विद्या, उसकी भी परीक्षा कर लेनी चाहिये, जिससे उक्त अर्थ के ग्रहण-धारण की योग्यता अथवा अयोग्यता का निश्चय किया जा सके। क्योंकि श्रुति बता रही है—‘‘नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः”—(श्वे. उ. ६।२२)। इसके बाद 'अभिजन' = कुल १. (अरु. उ. २) २. (उप. सा. पद्यप्रबन्ध १९।८) ३. (वहीं पर—१३।२७) ४. (मुं. उ. १।२।१२-१३) ५. (बृ. उ. ४।४।२२) ६. (बृ. उ. ३।५।१) ७. (मुं. उ. १।२।१२) ८. (छां. उ. २।१।१) ९. “किं गोत्रो नु सोम्यासि”—(छां. उ. ४।४।४), तथा “तान् ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा श्रद्धया ब्रह्मचर्येण संवत्सरं संवत्स्यथ”—(प्र. उ. १।२), तथा “नाऽसंवत्सरवासिने प्रब्रूयात् ।" इति श्रुतिः।
२७६ उपदेशसाहस्री (जन्मस्थान) की भी परीक्षा करनी चाहिये। कुलपरीक्षण से माता-पिता और गुरुओं द्वारा शिक्षित-अशिक्षित होने का ज्ञान होता है। श्रुति ने बताया है कि मातृभक्त, पितृभक्त तथा आचार्यभक्त¹ शिष्य को आचार्य उपदेश करे। तात्पर्य यह है कि आचार्य (श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु) को चाहिये कि समस्त अनित्य साध्य और साधनों से विरक्त, त्रिविध एषणाओं का त्याग करनेवाले, परमहंससंन्यासाश्रम में स्थित, शम-दम और दया से युक्त, शिष्य के शास्त्रप्रसिद्ध गुणों से सम्पन्न, बाह्याभ्यन्तर पवित्रता से युक्त, तथा शास्त्रोक्त विधि से गुरु की शरण में प्राप्त हुए ब्राह्मण शिष्य को उसकी जाति, कर्म, स्वभाव, विद्या और कुल के द्वारा परीक्षा करके इस मोक्षसाधनभूत ज्ञान का तबतक बार बार (पुनः पुनः) उपदेश करे, जबतक कि उसे इस ज्ञान का दृढ़ता से ग्रहण हो सके। क्योंकि ज्ञानोपदेश का फल दृष्ट है, इसलिये उसकी प्राप्ति होने तक बार बार उपदेश करने के लिये कहा गया है। यदि इसका अदृष्ट फल ही होता, तो एक बार ही उपदेश करने की विधि होती। इस प्रकार ब्रह्मविद्या का उपदेश करने से उस अविनाशी सत्यस्वरूप पुरुष का ज्ञान होता है ॥ २ ॥ श्रुतिश्च—"परीक्ष्य... तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्" इति। दृढगृहीता हि विद्याऽऽत्मनः श्रेयसे संतत्यै च भवति। विद्यासन्ततिश्च प्राण्यनुग्रहाय भवति, नौरिव नदीं तितीर्षोः। शास्त्रं च—"यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः" इति। अन्यथा च ज्ञानप्राप्त्यभावात् “आचार्यवान् पुरुषो वेद", "आचार्याद्धैव विद्या विदिता", "आचार्यः प्लावयिता तस्य सम्यग्ज्ञानं प्लव इहोच्यते" इत्यादिश्रुतिभ्यः, "उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्" इत्यादिस्मृतिभ्यश्च ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी श्रुतिश्चेति—उक्त विषय में श्रुति का प्रमाण भी है। वह श्रुति इस प्रकार है— “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेद मायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ।। —(मुं० उ० १।२।१२-१३) श्रुति का अर्थ—कर्म से प्राप्त हुए लोकों की परीक्षा करके यह देखकर कि किये जाने वाले कर्मों के द्वारा अकृत मोक्षपद प्राप्त नहीं हो सकता, ब्राह्मण विरक्त हो जाय, और उस ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये वह समित्पाणि होकर श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप जाय । इस प्रकार अपने समीप आये हुए उस शान्तचित्त, शमादि से सम्पन्न शिष्य को वह विद्वान् गुरु उस ब्रह्मविद्या का उपदेश करे, जिससे उसे उस अविनाशी सत्यस्वरूप पुरुष का ज्ञान हो सके। तात्पर्य यह है—"परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्" से प्रारंभ कर “येनाक्षरं पुरुषं वेद” तक के ग्रन्थ से उक्त अर्थ को बताया गया है। दृढ़तापूर्वक ग्रहण की हुई विद्या ही आत्मा के कल्याण (अविद्यादिदोषसंसारनिवृत्ति) के लिये और शिष्य-प्रशिष्य परम्परा के द्वारा विद्या के अविच्छेद में कारण बनती है। विद्या-परम्परा की रक्षा करने से प्राणियों का कल्याण होता है। जैसे नदी पार करने के लिये नदी में प्रविष्ट होने पर अगाध जल में डूबते हुए व्यक्ति को पार पहुँचाने के लिये कोई दयालु व्यक्ति नौका को उपस्थित करा देता है, वैसे ही संसारसमुद्र में डूबते हुए प्राणियों का उद्धार करने के निमित्त अर्थात् संसारसमुद्र के पार भगवान् विष्णु के परम पद की प्राप्ति कराने के लिये विद्यासन्तान (विद्या की अविच्छिन्न परम्परा) का संरक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। निष्कर्ष यह है कि 'पूर्वोक्त शिष्यगुणों से सम्पन्न, सम्यक् परीक्षित, विधिवत् आये हुए शिष्य को ही विद्या देनी चाहिये, यथाकथञ्चित् आये हुए या धनलाभ के लोभ से आये हुए को विद्या नहीं देनी चाहिये'—यह नियम गुरु के लिये बताया गया है। इस विषय में शास्त्र का वाक्य (श्रुति का शासन) भी है—"यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः" इति । -यदि इस (आत्मज्ञानो) को यह समुद्र से घिरी हुई और धनपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी भी कोई दे, तो भी यह विद्या उन सबसे बढ़कर है। तात्पर्य यह है कि अच्छी तरह से १. “मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात्"—(बृ. उ. ४।१।२)।
शिष्यानुशासनप्रकरणम् २७७ परीक्षित किये हुए शिष्य को आचार्य कृपा करके ही इस ब्रह्मविद्या को दे। यहाँ यह शंका हो सकती है कि आचार्य के पास जाने की क्या आवश्यकता है ? जिज्ञासु व्यक्ति स्वयमेव न्यायादि का अनुसरण कर ब्रह्मविद्या को पा सकेगा। किन्तु यह विचार ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति-स्मृति के वचन हैं। जिज्ञासु व्यक्ति विद्याप्राप्त्यर्थ यदि पूर्वोक्त कष्ट सहन न करे और स्वयं ही न्यायादि का अनुसरण कर विद्या प्राप्त करना चाहे, तो उससे उसे यथार्थ ज्ञानप्राप्ति न हो सकेगी। श्रुति कहती है कि—'आचार्यवान् पुरुषो वेद', १ आचार्याद्धैव विद्या विदिता', २-आचार्यवान् पुरुष को ज्ञान होता है, विद्या आचार्य से ही जानी जाती है। स्मृति कह रही है कि 'आचार्यः प्लावयिता तस्य सम्यग्ज्ञानं प्लव इहोच्यते', ३ 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्' ४ इति। 'आचार्य से प्राप्त हुई विद्या ही प्रामाणिक विश्वासार्ह होती है' ५—यह वाक्यशेष भी है। गीता में भी बताया गया है कि 'तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥' ६— उस मोक्षप्रद ज्ञान को गुरुओं से प्रणिपात, परिप्रश्न और शुश्रूषा द्वारा जानो, वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें योग्य समझकर तत्त्व का उपदेश देंगे। तथा च अतिसूक्ष्म परमार्थ का निर्णय केवल अपनी बुद्धि के बल पर कर लेना सम्भव नहीं है, यह निष्कर्ष उपर्युक्त वाक्यों से अवगत हो रहा है ॥ ३ ॥ शिष्यस्य ज्ञानाग्रहणं च लिंगैर्बुद्ध्वा तद्ग्रहणहेतूनधर्मलौकिकप्रमादनित्यानित्यवस्तुविवेक- विषयासञ्जातदृढपूर्वश्रुतत्वलोकचिन्तावेक्षणजात्याद्यभिमानादींस्तत्प्रतिपक्षैः श्रुतिस्मृतिविहितैरपनयेद- क्रोधादिभिः अहिंसादिभिश्च यमैः, ज्ञानाविरुद्धैश्च नियमैः ॥४॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्यस्येति—पूर्वोक्त विशेषणों से विशिष्ट जिज्ञासु शिष्य को एक बार के ही उपदेश से सुदृढ़ ज्ञान हो ही जायेगा, तब पुनः पुनः उपदेश करने के लिए क्यों कहा गया है ? इसके उत्तर में आचार्य बता रहे हैं कि शिष्य के मुखादि की आकृति, चेष्टा, वाग्-व्यापार आदि चिह्नों से उसे अभी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पायी है, यह जानकर ज्ञानप्राप्ति में प्रतिबन्धक जो सञ्चित, क्रियमाण पाप, यथेच्छ भाषण, यथेच्छ भक्षण एवं यथेच्छाचार आदि प्रमादरूप अधर्म का सूर्यादि देवतोपासनादि नियमों का उपदेश देकर क्षपण करना चाहिए। वर्ज्य-अवर्ज्य का धर्मशास्त्र के द्वारा उपदेश देकर प्रमाद को दूर कराना चाहिये। अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में जो प्रतिबन्धक बन रहे हैं, उनका श्रुति-स्मृतिविहित उपायों से अपनयन कराना चाहिए। नित्यवस्तु आत्मा और अनित्यवस्तु अनात्मा के विषय में जो पूर्णतया श्रवण नहीं कर पाया, उसे युक्तिविशेष आदि के द्वारा बताकर नित्यानित्यवस्तु के विवेक को दृढ़ कराना चाहिये। तथा लोगों के व्यवहार में शुभाशुभ का (साधुत्वासाधुत्व का) विचार करते रहना अथवा लोगों से पूजा-सम्मान आदि की इच्छा से उनपर अनुग्रहादि व्यवहार करना आदि लोकचिन्तावेक्षण को वक्ष्यमाण अमानित्व, अदम्भित्व आदि शास्त्रीय उपदेश देकर दूर कराना चाहिये। तथा अपनी जाति, कुल, विद्या का अभिमान और तत्प्रयुक्त अन्यधिक्करणादि दुर्व्यवहारों को त्वं-पदार्थ के परिशोधनोपदेश से दूर कराना चाहिये। इस प्रकार पूर्वोक्त प्रतिबन्धकों को उनके प्रतिपक्षी श्रुतिस्मृतिविहित अक्रोध, अकाम, अमोह आदि और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ७, इन पाँच यमों से (अक्रोधादि के साथ इनका उपायोपेय भावसम्बन्ध है। अक्रोधादि उपाय है और अहिंसादि उपेय हैं) तथा ज्ञाननिष्ठा के अविरोधी नियमों से (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान ८ पाँच इन नियमों को ज्ञाननिष्ठा के अविरोधी कहने का तात्पर्य १. (छां. उ. ६।१४।२) २. (,, ,, ४।९।३) ३. (स्मृति—तुलना मो. ध. ३२७।२३) ४. (भ. गी. ४।३४) ५. आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत् ।—(छां उ. ४।९।३) ६. (भ. गी. ४।३४) ७. (यो. सू. २।३०) ८. (,, ,, २।३२)
२७८ उपदेशसाहस्री यह है कि इनमें तीर्थयात्रा, चान्द्रायणादि कर्मकाण्डप्रधान नियम ज्ञाननिष्ठा के विरोधी हैं, क्योंकि अधिक आयास- साध्य होने के कारण वे विक्षेप के हेतु हैं) निवृत्त करावे। समस्त दोषों के निरास करने में यम-नियमादि साधारण उपाय हैं ॥ ४ ॥ अमानित्वादिगणं* च ज्ञानोपायं सम्यग्ग्राहयेत् ॥५॥ हृदयस्पर्शिनी अमानित्वादिगणमिति—इस प्रकार ज्ञानग्रहण में प्रतिबन्धकों के निवर्तक उपायों को बताकर अब ज्ञानग्रहण के उपायों को बता रहे हैं—ज्ञान के उपायभूत अमानित्व, अदंभित्व आदि गुणों को अच्छी तरह से ग्रहण करवावे। उसी तरह 'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्'१ इत्यादि वाक्यों से उक्त अद्वेष्टृत्वादि धर्मों का भी पालन करवावे। इस रीति से समस्त दोषों का परिहार होनेपर दृढ़ ज्ञान अनायास लभ्य हो जाता है। एक बार श्रवण करने मात्र से विद्या दृढ़ नहीं हो पाती। क्योंकि 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्'२ इस न्याय से तथा श्रवणोत्तरकाल में मनन का विधान करने से फल प्राप्ति तक विद्या की दृढ़ता विवक्षित है। अतः शिष्य को कृतार्थ करने में प्रवृत्त हुआ अथवा विद्या का उपयोग करने में प्रवृत्त हुआ गुरु अपने शिष्य को इतना निःसन्दिग्ध ज्ञान करा दे, जिससे कि वह फलोत्पादक हो सके। इसलिये शिष्यकल्याणार्थं आचार्य पुनः पुनः अवश्य ही उपदेश करता रहे ॥ ५ ॥ आचार्यश्चोहापोहग्रहणधारणशमदमदयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो दृष्टादृष्टभोगेष्वनासक्तस्त्यक्त- सर्वकर्मसाधनो ब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितोऽभिन्नवृत्तो दंभदर्पकुहकशाठ्यमायामात्सर्यानृताहंकारममत्वादि- दोषविवर्जितः केवलपरानुग्रहप्रयोजनो विद्योपयोगार्थी। पूर्वमुपदिशेत्— “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेक- मेवाद्वितीयम्”, “यत्र नान्यत्पश्यति”, “आत्मैवेदं सर्वम्”, “ब्रह्मैवेदं सर्वम्”, “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इत्याद्या आत्मैक्यप्रतिपादनपराः श्रुतीः ॥६॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्यश्चेति—इस प्रकार आचार्य के कर्तव्य को बताकर अब उसके लक्षण को बतलाते हुए उपदेश का क्रम बताते हैं—तत्त्वजिज्ञासु अधिकारी शिष्य एवंगुणविशिष्ट आचार्य के समीप जाय। जो वैसा न हो उसके समीप न जाय, यह प्रदर्शित करने के लिये यह बताया जा रहा है। आचार्य के लिए वह एवंविध गुणों से विशिष्ट होने का प्रयत्न करे ऐसा कोई विधान नहीं किया जा रहा है, क्योंकि वह तो कृतार्थ हो चुका है। ऊहापोह, ग्रहण, धारण, शम, दम, दया और अनुग्रह आदि गुणों से सम्पन्न, शास्त्रज्ञ, ऐहिक और पारलौकिक भोगों से विरक्त, सर्वविध कर्मसाधनों को त्यागनेवाले, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ, लोकमर्यादा का उल्लंघन न करनेवाले तथा दंभ, दर्प, कुहक (दूसरे को धोखा देना), कुटिलता, माया (दूसरे को मोह में डाल देना), मात्सर्य (गुण में दोषदृष्टि), मिथ्याभाषण, अहंकार, और ममता आदि दोषों से रहित, केवल परोपकाररूप प्रयोजनवाले एवं अपनी विद्या का उपयोग करने की इच्छावाले आचार्य सर्वप्रथम आत्मा का एकत्वप्रतिपादन करनेवाली इन श्रुतियों का उपदेश करे—"हे सोम्य ! पहले यह एक अद्वितीय सत् ही था३", "जहाँ किसी अन्य को नहीं देखता४", "यह सब आत्मा ही है५", "पहले यह एक आत्मा ही था६", "निश्चय यह सब ब्रह्म ही है७" इत्यादि। ऊहा=शिष्य के बिना पूछे ही उसका भाव जान लेना, अथवा १. (भ. गी. १२।१३-२०) २. (ब्र. सू. ४।१।१) ३. (छां. उ. ६।२।१) ४. (छां. उ. ७।२४।१) ५. (छां. उ. ७।२५।२, तथा बृ. उ, ४।४।६) ६. (ऐ. उ. १।१) ७. (छां. उ. ३।१४।१)
- गुणं-पाठान्तरम् ।
शिष्यस्यानुशासनप्रकरणम् २७९ उपदेश के समय शिष्य की समझ में आने योग्य नवीन युक्तियों की कल्पना करने की शक्ति को 'ऊहा' कहते हैं। और शिष्य के मिथ्या ग्रहण (ज्ञान) को निवृत्त करने की अथवा स्वसिद्धान्त के विरोधी विचारों का निराकरण करने की सामर्थ्य को 'अपोह' कहते हैं। ग्रहण = शिष्य के किये हुए प्रश्न और आक्षेपों को तुरन्त समझ लेने की शक्ति को 'ग्रहण' कहते हैं। धारण = शिष्य की शंका निवृत्त करने के लिये उनके सारासार का विचार करके निराकरण करते समय उन्हें स्मरण रखने को 'धारण' कहते हैं। शम = वेदान्त के श्रवण, मनन, निदिध्यासन के अतिरिक्त अन्य विषयों से अपने मन को हटा (मोड़) लेना ही 'शम' है। दम = चक्षुःश्रोत्रादि बाह्य न्द्रियों को उन वेदान्तश्रवणादि विषयों के अतिरिक्त विषयों से हटा लेना ही 'दम' है। दया = दुःखी के प्रति अनुग्रह करने की इच्छा। अनुग्रह = दुःखी के दुःख का अपाकरण करने की प्रवृत्ति। (समीप आये हुए विनीत, अनुगृहीत शिष्य का अपरित्यग 'आदि' शब्द से समझना चाहिये।) यद्यपि 'हिंसा, अनुग्रह दोनों ही न करे', इस प्रकार संन्यासी के लिये गौतम ने धर्म बताया है— “हिंसानुग्रहयोरनारम्भी”, उसी तरह “न व्याख्यानपरो यतिः”--संन्यासी व्याख्यान-प्रवचन न करे इत्यादि जो वचन हैं, वे ख्यातिलाभ, पूजा, पाण्डित्यवृद्धि आदि प्रवृत्ति निषेधक हैं, अतः कोई विरोध नहीं है। 'सम्पन्न' - शब्द से पूर्वोक्त गुणों से आद्य (युक्त) होना बताया गया है। 'लब्धागम' कहकर यह बताया है कि उसने स्वगुरु से विद्योपदेश प्राप्त किया हो। आचार्य के साथ इस विशेषण के जोड़ से यह सूचित किया है कि गुरु की साम्प्रदायिकता का भी शिष्य को अन्वेषण करना चाहिये, अर्थात् गुरु का ज्ञान, गुरुसंप्रदाय से प्राप्त रहना चाहिये। दृष्टभोग = ऐहिक भोग और अदृष्टभोग = पारलौकिक भोग, उनमें अनासक्त अर्थात् तत्साधनभूत लोकाराधन की तथा तपोयज्ञादि की प्रवृत्ति से रहित होना चाहिये, अर्थात् समस्त कर्मों के साधनभूत धन-दारसंग्रह-शिखा-यज्ञोपवीत आदि का जिसने त्याग कर दिया है, अतएव भोगों में अनासक्त रूप से प्रसिद्ध, ऐसा ब्रह्मवित् (= महावाक्यार्थभूत प्रत्यगात्मतत्त्वज्ञानवान्) आचार्य आवश्यक है। उसी तरह ब्रह्मणि स्थित = नित्य अपरोक्ष 'ब्रह्मैव अहमस्मि' इस प्रकार स्फुट अनुभव करता हुआ- इस प्रकार रहता हुआ भी यथेष्ट आचरण अर्थात् मनमाना आचरण करने वाला न हो, किन्तु अभिन्नवृत्त = लोकव्यवहार का उल्लंघ्न न करने वाला अर्थात् शिष्टविगर्हित (निन्दित) न हो। 'दंभ' = धर्मध्वजित्व अर्थात् लोक में अपनी धार्मिकता को ख्यापित करना। कुहक = परप्रतारणा। शाठ्य = निष्ठुरता। माया = परव्यामोहन। मात्सर्य = गुणों में दोष दिखाना। अनृत = मिथ्या भाषण। अहंकार = देहाभिमान। ममत्व = पुत्र-शिष्य आदि में स्वत्वाभिमान-इन दंभादि दोषों से शून्य आचार्य का अन्वेषण करना चाहिये। किन्तु ऐसा आचार्य, यदि सुकृतपुञ्जोदय से भाग्यवशात् मिल भी जाय, तब भी वह परोपदेशार्थ प्रवृत्त ही क्यों होगा ? यह आशंका हो सकती है, उसके समाधानार्थ कह रहे हैं कि ऐसे गुरु का केवल परानुग्रह करना ही एकमात्र प्रयोजन रहता है, अर्थात् संसारसागर से निर्विण्ण (विषण्ण) हुए व्यक्ति पर परमपदप्रापणरूप अनुग्रह करना ही उस गुरु का एकमात्र उद्देश्य रहता है। परानुग्रह के साथ 'केवल' विशेष जोड़कर यह बताया है कि उनकी (गुरु की) परोपदेश प्रवृत्ति में अन्य कोई आनुषङ्गिक प्रयोजनान्तर भी निमित्त नहीं रहता है। तब यह शंका हो सकती है कि विना किसी निमित्त के ही यदि परानुग्रह में प्रवृत्ति कही जाय तो क्या उसे उन्मत्त प्रवृत्ति के समान यादृच्छिक कहना होगा ? इस शंका के समाधानार्थ आचार्य के साथ 'विद्योपयोगार्थी' विशेषण जोड़ा गया है। 'उपयोग' का अर्थ है 'विनियोग'। 'चात्वाले कृष्णविषाणां प्रास्यति' १- सोमयाग में दीक्षित के हाथ में कण्डू (खुजलाहट) को मिटाने के लिये कृष्णमृग का शृंग दिया जाता है, यज्ञ समाप्ति पर 'चात्वाल' नामक गड्ढे में उस शृंग को त्याग दिया जाता है। उस त्यागने को 'प्रतिपत्तिकर्म' कहते हैं। उस प्रतिपत्तिकर्म की तरह “त्यज धर्ममधर्मञ्च उभे सत्यानृते त्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत् त्यज ॥” २ यहाँ पर धर्म आदि में प्रवृत्तिनिरोधक जिस ज्ञान से उन धर्मादि का त्याग करते हो, उस ज्ञान का भी त्याग करो-यह कहने पर ज्ञान तो अमूर्त है, स्वरूपतः उसका त्याग करना संभव नहीं, अतः विशिष्ट शिष्य को उसका १. (तै. सं. ६।१।३।८, जै. सू. ४।२।१९) उपयुक्तस्याऽऽकीर्णकरस्यावशिष्यमाणद्रव्यादेर्विहितदेशे संस्कारविशेषहेतुः प्रक्षेपः प्रतिपत्तिकर्म। ज्योतिष्टोमे यजमानेन दत्ता दक्षिणारृत्विग्भिर्यदा नीताः, तदा यजमानः स्वशिरः कण्डूतापयुक्तं स्वहस्ते धृतं कृष्णमृगस्य शृङ्गं चात्वालनामकगर्ते परित्यजति, सोऽयम्परित्यागः प्रतिपत्तिकर्म। २. (शां. प. ३२९।४०, ३३१।४४)
२८० उपदेशसाहस्री प्रतिपादन कर देना ही प्रतिपत्तिकर्म कहा गया है । वह प्रतिपत्तिकर्म अपने वस्तुस्वभाव की महिमा से परानुग्रहता के रूप को पा लेता है । इस प्रकार का परानुग्रहाकांक्षी आचार्य आये हुए शिष्य को उपदेश दे । किन्तु प्रथमतः कौन-सा उपदेश दे, यह जिज्ञासा होने पर उपदेश के क्रम को बताया गया है कि आत्मैकत्वप्रतिपादक वाक्यों का उपदेश करें । उन वाक्यों को मूल ग्रन्थ में दिया गया है। इस प्रकार आत्मैकत्वप्रतिपादनपरक श्रुतियों का पहले उपदेश देना चाहिये । “यत्र नान्यत्पश्यति” का “नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा” यह वाक्यशेष है । कुछ लोग “ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्”१ इसे वाक्यशेष बताते हैं। यहाँ पर सत्, भूमन्, आत्मन्, ब्रह्म—सभी शब्द पर्यायरूप हैं। अनेक शाखागत वाक्यों का उदाहरण “गतिसामान्यात्”२ इस न्याय से अविरोधतः स्वार्थपरत्वख्यापन के लिये है ॥ ६ ॥
उपदिश्य च ग्राहयेद्ब्रह्मणो लक्षणम्— “य आत्माऽपहतपाप्मा”, “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म”, “योऽशनायापिपासे”, “नेति नेति”, “अस्थूलमनणु”, “स एष नेति नेति”, “अदृष्टं द्रष्टृ”, “विज्ञान- मानन्दम्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तम्”, “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते”, “स वा एष महानज आत्मा”, “अप्राणो ह्यमनाः”, “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”, “विज्ञानघन एव”, “अनन्तरमबाह्यम्”, “अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि”, “आकाशो वै नाम” इत्यादिश्रुतिभिः ॥७॥
हृदयस्पर्शिनी उपदिश्य चेति । ‘ब्रह्म’ शब्द से कौनसी वस्तु बताई जाती है, और उसे अद्वितीय कैसे जाना जाता है ? इस प्रश्न पर बताया जा रहा है कि पूर्वोक्त क्रम से उपदेश करने के बाद “जो आत्मा पापरहित है”, “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है”, “जो क्षुधा और पिपासा से अतीत है”, “न कार्य है, न कारण है”, “न स्थूल है, न सूक्ष्म है”, “वह यह आत्मा ऐसा नहीं है”, “वह अदृष्ट किन्तु देखने वाला है”, “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है”, “ब्रह्म सत्य, ज्ञान, अनन्त है”, “अदृश्य और अशरीर में”, “वह यह आत्मा निश्चय ही महान् और अजन्मा है”, “यह अप्राण और अमना है”, “यह बाहर-भीतर व्याप्त और अजन्मा है”, “यह विज्ञानघन ही है”, “यह न भीतर है न बाहर”, “यह विदित और अविदित से भी अन्य है”, “आकाश ही नाम और रूप का निर्वाह करने वाला है” इत्यादि श्रुतियों से ब्रह्म का लक्षण ग्रहण करावे । अर्थात् उपदेश देने के बाद ब्रह्म का लक्षण ग्रहण करावे । ‘योऽशनायापिपासे’ इसके बाद ‘शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ यह शेष जोड़ा जाता है । “आनन्दम्” “अनन्तम्” दोनों जगह “ब्रह्म” इस प्रकार वाक्यशेष समझना चाहिये । इसी प्रकार सर्वत्र वाक्यों में शेष अक्षरों को परिचित श्रुतियों के अनुसार पूर्ण कराने के निमित्त जोड़ना चाहिये । ‘य आत्माऽपहतपाप्मा’३ इत्यादि प्राजापत्यवाक्य से जाग्रदादि अवस्थाओं में द्रष्टा होकर अनुगत रहने वाला अवस्थाधर्म से रहित, अशरीर, प्रिय-अप्रिय दोनों से असंस्पृष्ट प्रत्यगात्मा ही परं ज्योति अर्थात् परं ब्रह्म उपास्य है और वही ज्ञेय है, इस प्रकार प्रकरणार्थ का उपन्यास करते हुए प्रत्यग्ब्रह्मैक्य का ज्ञान करावे । जो आत्मा सर्वान्तर (सबके भीतर) है, वही बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टि (ज्ञान) का द्रष्टा, प्राणनादि व्यापार से जाना जाने वाला है, वही अशनायादि प्राणान्तः- करण शरीरधर्मों से परे साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, यह “यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म”४ इस द्वितीय वाक्य का अर्थ है । नेति- नेति इत्यादि वाक्यों का सकलदृश्यप्रविलापन पूर्वक अद्वितीय आत्मतत्त्व की सूचना देने में तात्पर्य है । “अदृष्टं द्रष्टृ”५ इत्यादि वाक्य से “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ” इत्यादि वाक्यों से एक साथ ही सर्वसाक्षिप्रत्यगात्मा ही अक्षर है, जिसमें अव्याकृत आकाश से लेकर धरित्री (पृथिवी) तक जगत् ओत-प्रोत है, यह सूचित किया गया है, अर्थात् वही तत्त्व है।
१. (मुं. उ. २।२।११) २. (ब्र. सू. १।१।११) ३. (छां. उ. ८।७।१) ४. (बृ. उ. ३।४।१) ५. (बृ. उ. ३।८।११)
शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८१ यह बताया गया है। अब “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”१ यह तब बताया है कि जब “कोन्वेनं जनयेत् पुनः”१, “मर्त्यः स्विन्मृत्यना वृक्षणः कस्मान्मूलात्प्ररोहति”१ इस प्रकार पूछे गये जगन्मूलकारणत्वेन उपलक्षित के स्वरूप अर्थात् “ज्ञानानन्दलक्षणम्” इससे उपलक्षित तत्पदार्थ तत्त्व को, उसी प्रकार “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”२ इससे प्रकृत ब्रह्म के “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”३ के द्वारा बताये गये स्वरूप को बताकर “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः”४ इत्यादि वाक्य से जगत्कारण के रूप में उपलक्षित कर और उसी का सृष्ट कार्य-कारण संघात में प्रवेश बताकर “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते”५ इत्यादि से प्रपञ्च का बाध करके सर्वाधार, सर्वसाक्षी, आनन्दरूप आत्मा का “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा”६, “अथ सोऽभयं गतो भवति”७, “स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः”८ इस प्रकार तत्त्व का ग्रहण करावे ॥ ७ ॥ स्मृतिभिश्च—“न जायते म्रियते वा”, “नादत्ते कस्यचित्पापम्”, “यथाकाशस्थितो नित्यम्”, “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि”, “न सत्तन्नासदुच्यते”, “अनादित्वात्निर्गुणत्वात्”, “समं सर्वेषु भूतेषु”, “उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः” इत्यादिभिः श्रुत्युक्तलक्षणाविरुद्धामिः परमात्मासंसारित्वप्रतिपादनपराभिस्तस्य सर्वानन्यत्वप्रतिपादनपराभिश्च ॥८॥ हृदयस्पर्शिनी स्मृतिभिरिति—केवल श्रुतिवाक्यों से ही ब्रह्म का लक्षण ग्रहण कराना है, ऐसी बात नहीं, अपितु स्मृति- वाक्यों से भी उसका लक्षण ग्रहण कराना है। श्रुत्युक्त अर्थ में स्मृति का उदाहरण प्रतिपत्ति (ज्ञान) की दृढ़ता के लिये है। श्रुति का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये नहीं। श्रुतिप्रतिपादित लक्षणों से अविरुद्ध, और परमात्मा का असंसारित्व प्रतिपादन करने में तत्पर तथा उसका सबके साथ अभेद बतानेवाले ये स्मृतिवाक्य हैं। उन स्मृतिवाक्यों—“न जायते म्रियते वा”९, वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है, वह किसी के पाप को ग्रहण नहीं करता, जिस प्रकार सर्वदा आकाश में स्थित वायु सर्वगत है, तू क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान, इसे न सत् कहा जाता है और न असत्, अनादि और निर्गुण होने के कारण, समस्त प्राणियों में समभाव से स्थित, उत्तम पुरुष अन्य है”—से भी ब्रह्म का लक्षण करावे ॥ ८ ॥ एवं श्रुतिस्मृतिभिर्गृहीतपरमात्मलक्षणं शिष्यं संसारसागरादुत्तितीर्षुं पृच्छेत्—कस्त्वमसि सोम्य ? इति ॥९॥ हृदयस्पर्शिनी एवमिति—इस प्रकार वाक्योपदेश से और ‘तत्’ शब्दार्थ के सूचक श्रुति-स्मृति वाक्यों के व्याख्यान से परमात्मा के लक्षण को समझनेवाले और संसारसागर से पार होने के इच्छुक शिष्य को गुरु पुनः प्रश्न करे “हे सोम्य ! तू कौन है ?” यह प्रश्न करने का कारण यह है कि अज्ञान, संशय, विपर्ययरहित बुद्धि, गुरु के द्वारा उपदिष्ट हुए अर्थ में निश्चल हो सके । शिष्य के ज्ञान की परीक्षा करने के लिए श्रुति ने भी कहा है—“यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्”१० ॥ ९ ॥ १. (बृ. उ. ३।९।२८) २. (तै. उ. १।१) ३. (तै. उ. २।१) ४. (तै. उ. २।१) ५. (तै. उ. २।७) ६. (तै. उ. २।५) ७. (तै. उ. २।७) ८. (तै. उ. २।८, ३।१०) ९. (भ. गी. २।२०) १०. (के. उ. १।२) ३६
२८२ उपदेशसाहस्री स यदि ब्रूयात्—ब्राह्मणपुत्रोऽदोनन्वयो ब्रह्मचार्यासम्, गृहस्थो वा, इदानीमस्मि परमहंस- परिव्राट् संसारसागराज्जन्ममृत्युमहाग्राहादुत्तितीर्षुरिति ॥१०॥ हृदयस्पर्शिनी सयदीति—इस प्रकार गुरु के पूछने पर यदि वह शिष्य, प्रतिपत्त्यादि दोष के प्रतिबन्धवशात् यह कहे कि मैं ब्राह्मणपुत्र हूँ, या अमुकदीक्षित कुल का हूँ, (असौ अन्वयः वंशः यस्य सः अहम् अदोनन्वयः), ब्रह्मचारी या गृहस्थ हूँ, तब आचार्य उससे कहे कि 'हूँ' न कह कर 'था' कहो। और अब मैं जन्म-मृत्युरूप नक्र, तिमिङ्गिलादि महाग्राहों से परिपूर्ण इस संसार सागर को पार करने की इच्छा से परमहंस परिव्राजक हो गया हूँ ॥ १० ॥ आचार्यो ब्रूयात्—इहैव तव सोम्य मृतस्य शरीरं वयोभिरद्यते, मृद्भावं वाऽऽपद्यते । तत्र कथं संसारसागरादुत्तर्तुमिच्छसीति* । नहि नद्या अवरे कूले भस्मीभूतो नद्याः पारं तरिष्यतीति ॥११॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—अहो, अद्यापि इसका ज्ञान देहाभिमान से प्रतिबद्ध है, अतः उसे दूर कराना चाहिये, यह विचार कर उससे आचार्य कहे—हे सोम्य ! मर जाने पर तेरे शरीर को गृध्रादि पक्षिगण यहीं भक्षण कर जायेंगे अथवा वह मृत्तिकारूप हो जायेगा। ऐसी अवस्था में तू संसार को पार करना कैसे चाहता है? क्योंकि नदी के इसी तीर पर भस्मीभूत हो जाने पर तू उसके पार नहीं जा सकता ॥ ११॥ स यदि ब्रूयात्—अन्योऽहं शरीरात् । शरीरं तु जायते, म्रियते, वयोभिरद्यते, मृद्भावमापद्यते, शस्त्राग्न्यादिभिश्च विनाश्यते, व्याधिभिश्च† युज्यते । तस्मिन्नहं स्वकृतधर्माधर्मवशात् पक्षी नीडमिव प्रविष्टः । पुनः पुनः शरीरविनाशे धर्माधर्मवशाच्छरीरान्तरं यास्यामि, पूर्वनिोडविनाशे पक्षीव नीडान्तरम् । एवमेवाह्मनादौ संसारे देवतिर्यङ्मनुष्यनिरयस्थानेषु स्वकर्मवशादुपात्तमुपात्तं शरीरं त्यजन्, नवं नवं चान्यदुपाददानः, जन्ममरणप्रबन्धचक्रे घटीयन्त्रवत् स्वकर्मणा भ्राम्यमाणः, क्रमेणेदं शरीरमासाद्य, संसार- चक्रभ्रमणादस्मान्निर्विण्णः, भगवन्तमुपसन्नोऽस्मि संसारचक्रभ्रमणप्रशमाय । तस्मान्नित्य एवाहं शरीरादन्यः—शरीराण्यागच्छन्त्यपगच्छन्ति च वासांसीव पुरुषस्येति ॥१२॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—इस प्रकार स्थूल देहाभिमान का त्याग कराने पर अपने आत्मा को उस स्थूल देह से पृथक् समझनेवाला वह शिष्य यदि कहे कि मैं तो शरीर से भिन्न हूँ, तो 'आत्मा, शरीर से भिन्न है, यह तुमने कैसे जाना ?'— ऐसा पूछने पर वह कहता है—शरीर तो उत्पन्न होता है, मरता है, पक्षियों से खाया जाता है, शस्त्र और अग्नि आदि से नाश किया जाता है तथा रोगादि से युक्त होता है। उसमें घोंसले में घुसे हुए पक्षी के समान, मैं अपने किये हुए धर्म और अधर्म के कारण प्रवेश किये हुए हूँ, तथा जिस प्रकार पहले घोंसले का नाश होने पर पक्षी दूसरे घोंसले में चला जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक शरीर का नाश होने पर मैं अपने पुण्य-पाप के अधीन पुनः-पुनः अन्य शरीर धारण कर लूँगा । उसी प्रकार इस अनादि संसार में अपने कर्मवश देवता, मनुष्य, तिर्यक् एवं नारकीय योनियों में ग्रहण किये हुए शरीरों को छोड़ता तथा अन्य नवीन-नवीन शरीरों को ग्रहण करता मैं अपने कर्म के द्वारा घटीयन्त्र के समान जन्म-मृत्युरूप चक्र में भ्रमित होता हुआ क्रमशः इस शरीर में आकर इस संसारचक्र में भ्रमण करने से खिन्न होकर अब इस संसारचक्र में भ्रमण की शान्ति के लिये आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ, अतः मैं इस शरीर से भिन्न अर्थात् नित्य ही हूँ। क्योंकि पुरुष के वस्त्रों के समान शरीर तो आते हैं और चले जाते हैं ॥ १२ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—साधुवादीः, सम्यक् पश्यसि, कथं मृषाऽवादीः—ब्राह्मणपुत्रोऽदोनन्वयो ब्रह्मचार्यासम्, गृहस्थो वा, इदानीमस्मि परमहंसपरिव्राडिति ॥१३॥
- उद्धर्तुं०—पाठान्तरम् । † व्याध्यादिभिश्च, व्याध्यादिभिश्च०—पाठौ ।
शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८३ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—यह सुनकर आचार्य शिष्य से कहे कि तुमने बहुत ठीक कहा, तुम्हारी दृष्टि ठीक है, तो तुमने असत्य क्यों कहा था कि मैं ब्राह्मण पुत्र था, अमुक गोत्र में उत्पन्न ब्रह्मचारी अथवा गृहस्थ था और अब परमहंस परिव्राजक हो गया हूँ ॥ १३ ॥ स यदि ब्रूयात् — भगवन् कथमहं मृषाऽवादिषमिति ॥१४॥ हृदयस्पर्शिनी यदि शिष्य गुरु से यह कहे कि भगवन् ! स यदीति—मैने असत्य क्या कहा था ? तो आचार्य उससे इस प्रकार कहे... ॥ १४ ॥ तं प्रति ब्रूयादाचार्यः—यतस्त्वं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारं शरीरं जात्यन्वयसंस्कारवर्जितस्यात्मनः प्रत्यभ्यज्ञासीर्ब्राह्मणपुत्रोऽदोऽन्वय* इत्यादिना वाक्येनेति ॥१५॥ हृदयस्पर्शिनी तं प्रतीति—क्योंकि तुमने 'मैं अमुक गोत्र में उत्पन्न हुआ ब्राह्मण पुत्र था' इत्यादि वाक्य से भिन्न अनात्मभूत जाति-कुल-संस्कार वाले शरीर की जाति और कुल से रहित आत्मा के स्थान में प्रत्यभिज्ञा की थी, इसलिये तुम्हारा कथन असत्य था ॥ १५ ॥ स यदि पृच्छेत्— कथं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारं शरीरं, कथं वा अहं जात्यन्वयसंस्कारवर्जितः ? इति ॥१६॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—इस पर यदि वह शिष्य पूछे कि शरीर अनात्मभूत जाति, कुल और संस्कार से किस प्रकार युक्त है और मैं किस प्रकार जाति, कुल और संस्कार से रहित हूँ ॥ १६ ॥ आचार्यो ब्रूयात् — शृणु, सोम्य, यथेदं† शरीरं त्वत्तो भिन्नं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारम्, त्वं च जात्यन्वयसंस्कारवर्जितः । इत्युक्त्वा तं स्मारयेत्—स्मर्तुमर्हसि, सोम्य परमात्मानं सर्वात्मानं यथोक्त- लक्षणं श्रावितोऽसि “सदेव सोम्येढं” इत्यादिभिः श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च, लक्षणं च तस्य श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च ॥१७॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—उसपर आचार्य को कहना चाहिये कि 'हे सोम्य ! जिस प्रकार यह शरीर (देह) तुझसे भिन्न अनात्मभूत जाति, कुल और संस्कार से युक्त है, तथा तू जाति, कुल और संस्कार से शून्य है, उसे सुन !' यह कह कर उसे स्मरण दिलावे कि हे सोम्य ! तुझे जो “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्¹”, आदि श्रुति-स्मृति वाक्यों से परमात्मा का श्रवण कराया था, सो तुझे उन लक्षणों से युक्त सबके आत्मस्वरूप परमात्मा को तथा श्रुति और स्मृतियों के अनुसार उसके लक्षण को स्मरण रखना चाहिये। इसी प्रकार “य आत्माऽपहतपाप्मा²” इत्यादि श्रुतिवाक्य तथा “न जायते³” इत्यादि स्मृतिवाक्यों के द्वारा उक्त ब्रह्म के (आत्मा के) लक्षण को याद रखना चाहिये ॥ १७ ॥ १. (छां. उ. ६।२।८) * प्रत्यभिज्ञासी ०—पाठान्तरम् । २. (छां. उ. ८।७।१) † तदेव यथेदं—पाठान्तरम् । ३. (भ. गी. २।२०)