उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशिष्यस्यानुशासनप्रकरणम् २७९ उपदेश के समय शिष्य की समझ में आने योग्य नवीन युक्तियों की कल्पना करने की शक्ति को 'ऊहा' कहते हैं। और शिष्य के मिथ्या ग्रहण (ज्ञान) को निवृत्त करने की अथवा स्वसिद्धान्त के विरोधी विचारों का निराकरण करने की सामर्थ्य को 'अपोह' कहते हैं। ग्रहण = शिष्य के किये हुए प्रश्न और आक्षेपों को तुरन्त समझ लेने की शक्ति को 'ग्रहण' कहते हैं। धारण = शिष्य की शंका निवृत्त करने के लिये उनके सारासार का विचार करके निराकरण करते समय उन्हें स्मरण रखने को 'धारण' कहते हैं। शम = वेदान्त के श्रवण, मनन, निदिध्यासन के अतिरिक्त अन्य विषयों से अपने मन को हटा (मोड़) लेना ही 'शम' है। दम = चक्षुःश्रोत्रादि बाह्य न्द्रियों को उन वेदान्तश्रवणादि विषयों के अतिरिक्त विषयों से हटा लेना ही 'दम' है। दया = दुःखी के प्रति अनुग्रह करने की इच्छा। अनुग्रह = दुःखी के दुःख का अपाकरण करने की प्रवृत्ति। (समीप आये हुए विनीत, अनुगृहीत शिष्य का अपरित्यग 'आदि' शब्द से समझना चाहिये।) यद्यपि 'हिंसा, अनुग्रह दोनों ही न करे', इस प्रकार संन्यासी के लिये गौतम ने धर्म बताया है— “हिंसानुग्रहयोरनारम्भी”, उसी तरह “न व्याख्यानपरो यतिः”--संन्यासी व्याख्यान-प्रवचन न करे इत्यादि जो वचन हैं, वे ख्यातिलाभ, पूजा, पाण्डित्यवृद्धि आदि प्रवृत्ति निषेधक हैं, अतः कोई विरोध नहीं है। 'सम्पन्न' - शब्द से पूर्वोक्त गुणों से आद्य (युक्त) होना बताया गया है। 'लब्धागम' कहकर यह बताया है कि उसने स्वगुरु से विद्योपदेश प्राप्त किया हो। आचार्य के साथ इस विशेषण के जोड़ से यह सूचित किया है कि गुरु की साम्प्रदायिकता का भी शिष्य को अन्वेषण करना चाहिये, अर्थात् गुरु का ज्ञान, गुरुसंप्रदाय से प्राप्त रहना चाहिये। दृष्टभोग = ऐहिक भोग और अदृष्टभोग = पारलौकिक भोग, उनमें अनासक्त अर्थात् तत्साधनभूत लोकाराधन की तथा तपोयज्ञादि की प्रवृत्ति से रहित होना चाहिये, अर्थात् समस्त कर्मों के साधनभूत धन-दारसंग्रह-शिखा-यज्ञोपवीत आदि का जिसने त्याग कर दिया है, अतएव भोगों में अनासक्त रूप से प्रसिद्ध, ऐसा ब्रह्मवित् (= महावाक्यार्थभूत प्रत्यगात्मतत्त्वज्ञानवान्) आचार्य आवश्यक है। उसी तरह ब्रह्मणि स्थित = नित्य अपरोक्ष 'ब्रह्मैव अहमस्मि' इस प्रकार स्फुट अनुभव करता हुआ- इस प्रकार रहता हुआ भी यथेष्ट आचरण अर्थात् मनमाना आचरण करने वाला न हो, किन्तु अभिन्नवृत्त = लोकव्यवहार का उल्लंघ्न न करने वाला अर्थात् शिष्टविगर्हित (निन्दित) न हो। 'दंभ' = धर्मध्वजित्व अर्थात् लोक में अपनी धार्मिकता को ख्यापित करना। कुहक = परप्रतारणा। शाठ्य = निष्ठुरता। माया = परव्यामोहन। मात्सर्य = गुणों में दोष दिखाना। अनृत = मिथ्या भाषण। अहंकार = देहाभिमान। ममत्व = पुत्र-शिष्य आदि में स्वत्वाभिमान-इन दंभादि दोषों से शून्य आचार्य का अन्वेषण करना चाहिये। किन्तु ऐसा आचार्य, यदि सुकृतपुञ्जोदय से भाग्यवशात् मिल भी जाय, तब भी वह परोपदेशार्थ प्रवृत्त ही क्यों होगा ? यह आशंका हो सकती है, उसके समाधानार्थ कह रहे हैं कि ऐसे गुरु का केवल परानुग्रह करना ही एकमात्र प्रयोजन रहता है, अर्थात् संसारसागर से निर्विण्ण (विषण्ण) हुए व्यक्ति पर परमपदप्रापणरूप अनुग्रह करना ही उस गुरु का एकमात्र उद्देश्य रहता है। परानुग्रह के साथ 'केवल' विशेष जोड़कर यह बताया है कि उनकी (गुरु की) परोपदेश प्रवृत्ति में अन्य कोई आनुषङ्गिक प्रयोजनान्तर भी निमित्त नहीं रहता है। तब यह शंका हो सकती है कि विना किसी निमित्त के ही यदि परानुग्रह में प्रवृत्ति कही जाय तो क्या उसे उन्मत्त प्रवृत्ति के समान यादृच्छिक कहना होगा ? इस शंका के समाधानार्थ आचार्य के साथ 'विद्योपयोगार्थी' विशेषण जोड़ा गया है। 'उपयोग' का अर्थ है 'विनियोग'। 'चात्वाले कृष्णविषाणां प्रास्यति' १- सोमयाग में दीक्षित के हाथ में कण्डू (खुजलाहट) को मिटाने के लिये कृष्णमृग का शृंग दिया जाता है, यज्ञ समाप्ति पर 'चात्वाल' नामक गड्ढे में उस शृंग को त्याग दिया जाता है। उस त्यागने को 'प्रतिपत्तिकर्म' कहते हैं। उस प्रतिपत्तिकर्म की तरह “त्यज धर्ममधर्मञ्च उभे सत्यानृते त्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत् त्यज ॥” २ यहाँ पर धर्म आदि में प्रवृत्तिनिरोधक जिस ज्ञान से उन धर्मादि का त्याग करते हो, उस ज्ञान का भी त्याग करो-यह कहने पर ज्ञान तो अमूर्त है, स्वरूपतः उसका त्याग करना संभव नहीं, अतः विशिष्ट शिष्य को उसका १. (तै. सं. ६।१।३।८, जै. सू. ४।२।१९) उपयुक्तस्याऽऽकीर्णकरस्यावशिष्यमाणद्रव्यादेर्विहितदेशे संस्कारविशेषहेतुः प्रक्षेपः प्रतिपत्तिकर्म। ज्योतिष्टोमे यजमानेन दत्ता दक्षिणारृत्विग्भिर्यदा नीताः, तदा यजमानः स्वशिरः कण्डूतापयुक्तं स्वहस्ते धृतं कृष्णमृगस्य शृङ्गं चात्वालनामकगर्ते परित्यजति, सोऽयम्परित्यागः प्रतिपत्तिकर्म। २. (शां. प. ३२९।४०, ३३१।४४)