उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८० उपदेशसाहस्री प्रतिपादन कर देना ही प्रतिपत्तिकर्म कहा गया है । वह प्रतिपत्तिकर्म अपने वस्तुस्वभाव की महिमा से परानुग्रहता के रूप को पा लेता है । इस प्रकार का परानुग्रहाकांक्षी आचार्य आये हुए शिष्य को उपदेश दे । किन्तु प्रथमतः कौन-सा उपदेश दे, यह जिज्ञासा होने पर उपदेश के क्रम को बताया गया है कि आत्मैकत्वप्रतिपादक वाक्यों का उपदेश करें । उन वाक्यों को मूल ग्रन्थ में दिया गया है। इस प्रकार आत्मैकत्वप्रतिपादनपरक श्रुतियों का पहले उपदेश देना चाहिये । “यत्र नान्यत्पश्यति” का “नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा” यह वाक्यशेष है । कुछ लोग “ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्”१ इसे वाक्यशेष बताते हैं। यहाँ पर सत्, भूमन्, आत्मन्, ब्रह्म—सभी शब्द पर्यायरूप हैं। अनेक शाखागत वाक्यों का उदाहरण “गतिसामान्यात्”२ इस न्याय से अविरोधतः स्वार्थपरत्वख्यापन के लिये है ॥ ६ ॥
उपदिश्य च ग्राहयेद्ब्रह्मणो लक्षणम्— “य आत्माऽपहतपाप्मा”, “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म”, “योऽशनायापिपासे”, “नेति नेति”, “अस्थूलमनणु”, “स एष नेति नेति”, “अदृष्टं द्रष्टृ”, “विज्ञान- मानन्दम्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तम्”, “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते”, “स वा एष महानज आत्मा”, “अप्राणो ह्यमनाः”, “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”, “विज्ञानघन एव”, “अनन्तरमबाह्यम्”, “अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि”, “आकाशो वै नाम” इत्यादिश्रुतिभिः ॥७॥
हृदयस्पर्शिनी उपदिश्य चेति । ‘ब्रह्म’ शब्द से कौनसी वस्तु बताई जाती है, और उसे अद्वितीय कैसे जाना जाता है ? इस प्रश्न पर बताया जा रहा है कि पूर्वोक्त क्रम से उपदेश करने के बाद “जो आत्मा पापरहित है”, “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है”, “जो क्षुधा और पिपासा से अतीत है”, “न कार्य है, न कारण है”, “न स्थूल है, न सूक्ष्म है”, “वह यह आत्मा ऐसा नहीं है”, “वह अदृष्ट किन्तु देखने वाला है”, “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है”, “ब्रह्म सत्य, ज्ञान, अनन्त है”, “अदृश्य और अशरीर में”, “वह यह आत्मा निश्चय ही महान् और अजन्मा है”, “यह अप्राण और अमना है”, “यह बाहर-भीतर व्याप्त और अजन्मा है”, “यह विज्ञानघन ही है”, “यह न भीतर है न बाहर”, “यह विदित और अविदित से भी अन्य है”, “आकाश ही नाम और रूप का निर्वाह करने वाला है” इत्यादि श्रुतियों से ब्रह्म का लक्षण ग्रहण करावे । अर्थात् उपदेश देने के बाद ब्रह्म का लक्षण ग्रहण करावे । ‘योऽशनायापिपासे’ इसके बाद ‘शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ यह शेष जोड़ा जाता है । “आनन्दम्” “अनन्तम्” दोनों जगह “ब्रह्म” इस प्रकार वाक्यशेष समझना चाहिये । इसी प्रकार सर्वत्र वाक्यों में शेष अक्षरों को परिचित श्रुतियों के अनुसार पूर्ण कराने के निमित्त जोड़ना चाहिये । ‘य आत्माऽपहतपाप्मा’३ इत्यादि प्राजापत्यवाक्य से जाग्रदादि अवस्थाओं में द्रष्टा होकर अनुगत रहने वाला अवस्थाधर्म से रहित, अशरीर, प्रिय-अप्रिय दोनों से असंस्पृष्ट प्रत्यगात्मा ही परं ज्योति अर्थात् परं ब्रह्म उपास्य है और वही ज्ञेय है, इस प्रकार प्रकरणार्थ का उपन्यास करते हुए प्रत्यग्ब्रह्मैक्य का ज्ञान करावे । जो आत्मा सर्वान्तर (सबके भीतर) है, वही बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टि (ज्ञान) का द्रष्टा, प्राणनादि व्यापार से जाना जाने वाला है, वही अशनायादि प्राणान्तः- करण शरीरधर्मों से परे साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, यह “यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म”४ इस द्वितीय वाक्य का अर्थ है । नेति- नेति इत्यादि वाक्यों का सकलदृश्यप्रविलापन पूर्वक अद्वितीय आत्मतत्त्व की सूचना देने में तात्पर्य है । “अदृष्टं द्रष्टृ”५ इत्यादि वाक्य से “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ” इत्यादि वाक्यों से एक साथ ही सर्वसाक्षिप्रत्यगात्मा ही अक्षर है, जिसमें अव्याकृत आकाश से लेकर धरित्री (पृथिवी) तक जगत् ओत-प्रोत है, यह सूचित किया गया है, अर्थात् वही तत्त्व है।
१. (मुं. उ. २।२।११) २. (ब्र. सू. १।१।११) ३. (छां. उ. ८।७।१) ४. (बृ. उ. ३।४।१) ५. (बृ. उ. ३।८।११)