भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८१ यह बताया गया है। अब “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”१ यह तब बताया है कि जब “कोन्वेनं जनयेत् पुनः”१, “मर्त्यः स्विन्मृत्यना वृक्षणः कस्मान्मूलात्प्ररोहति”१ इस प्रकार पूछे गये जगन्मूलकारणत्वेन उपलक्षित के स्वरूप अर्थात् “ज्ञानानन्दलक्षणम्” इससे उपलक्षित तत्पदार्थ तत्त्व को, उसी प्रकार “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”२ इससे प्रकृत ब्रह्म के “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”३ के द्वारा बताये गये स्वरूप को बताकर “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः”४ इत्यादि वाक्य से जगत्कारण के रूप में उपलक्षित कर और उसी का सृष्ट कार्य-कारण संघात में प्रवेश बताकर “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते”५ इत्यादि से प्रपञ्च का बाध करके सर्वाधार, सर्वसाक्षी, आनन्दरूप आत्मा का “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा”६, “अथ सोऽभयं गतो भवति”७, “स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः”८ इस प्रकार तत्त्व का ग्रहण करावे ॥ ७ ॥ स्मृतिभिश्च—“न जायते म्रियते वा”, “नादत्ते कस्यचित्पापम्”, “यथाकाशस्थितो नित्यम्”, “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि”, “न सत्तन्नासदुच्यते”, “अनादित्वात्निर्गुणत्वात्”, “समं सर्वेषु भूतेषु”, “उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः” इत्यादिभिः श्रुत्युक्तलक्षणाविरुद्धामिः परमात्‍मासंसारित्वप्रतिपादनपराभिस्तस्य सर्वानन्यत्वप्रतिपादनपराभिश्च ॥८॥ हृदयस्पर्शिनी स्मृतिभिरिति—केवल श्रुतिवाक्यों से ही ब्रह्म का लक्षण ग्रहण कराना है, ऐसी बात नहीं, अपितु स्मृति- वाक्यों से भी उसका लक्षण ग्रहण कराना है। श्रुत्युक्त अर्थ में स्मृति का उदाहरण प्रतिपत्ति (ज्ञान) की दृढ़ता के लिये है। श्रुति का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये नहीं। श्रुतिप्रतिपादित लक्षणों से अविरुद्ध, और परमात्मा का असंसारित्व प्रतिपादन करने में तत्पर तथा उसका सबके साथ अभेद बतानेवाले ये स्मृतिवाक्य हैं। उन स्मृतिवाक्यों—“न जायते म्रियते वा”९, वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है, वह किसी के पाप को ग्रहण नहीं करता, जिस प्रकार सर्वदा आकाश में स्थित वायु सर्वगत है, तू क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान, इसे न सत् कहा जाता है और न असत्, अनादि और निर्गुण होने के कारण, समस्त प्राणियों में समभाव से स्थित, उत्तम पुरुष अन्य है”—से भी ब्रह्म का लक्षण करावे ॥ ८ ॥ एवं श्रुतिस्मृतिभिर्गृहीतपरमात्मलक्षणं शिष्यं संसारसागरादुत्तितीर्षुं पृच्छेत्—कस्त्वमसि सोम्य ? इति ॥९॥ हृदयस्पर्शिनी एवमिति—इस प्रकार वाक्योपदेश से और ‘तत्’ शब्दार्थ के सूचक श्रुति-स्मृति वाक्यों के व्याख्यान से परमात्मा के लक्षण को समझनेवाले और संसारसागर से पार होने के इच्छुक शिष्य को गुरु पुनः प्रश्न करे “हे सोम्य ! तू कौन है ?” यह प्रश्न करने का कारण यह है कि अज्ञान, संशय, विपर्ययरहित बुद्धि, गुरु के द्वारा उपदिष्ट हुए अर्थ में निश्चल हो सके । शिष्य के ज्ञान की परीक्षा करने के लिए श्रुति ने भी कहा है—“यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्”१० ॥ ९ ॥ १. (बृ. उ. ३।९।२८) २. (तै. उ. १।१) ३. (तै. उ. २।१) ४. (तै. उ. २।१) ५. (तै. उ. २।७) ६. (तै. उ. २।५) ७. (तै. उ. २।७) ८. (तै. उ. २।८, ३।१०) ९. (भ. गी. २।२०) १०. (के. उ. १।२) ३६