उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८२ उपदेशसाहस्री स यदि ब्रूयात्—ब्राह्मणपुत्रोऽदोनन्वयो ब्रह्मचार्यासम्, गृहस्थो वा, इदानीमस्मि परमहंस- परिव्राट् संसारसागराज्जन्ममृत्युमहाग्राहादुत्तितीर्षुरिति ॥१०॥ हृदयस्पर्शिनी सयदीति—इस प्रकार गुरु के पूछने पर यदि वह शिष्य, प्रतिपत्त्यादि दोष के प्रतिबन्धवशात् यह कहे कि मैं ब्राह्मणपुत्र हूँ, या अमुकदीक्षित कुल का हूँ, (असौ अन्वयः वंशः यस्य सः अहम् अदोनन्वयः), ब्रह्मचारी या गृहस्थ हूँ, तब आचार्य उससे कहे कि 'हूँ' न कह कर 'था' कहो। और अब मैं जन्म-मृत्युरूप नक्र, तिमिङ्गिलादि महाग्राहों से परिपूर्ण इस संसार सागर को पार करने की इच्छा से परमहंस परिव्राजक हो गया हूँ ॥ १० ॥ आचार्यो ब्रूयात्—इहैव तव सोम्य मृतस्य शरीरं वयोभिरद्यते, मृद्भावं वाऽऽपद्यते । तत्र कथं संसारसागरादुत्तर्तुमिच्छसीति* । नहि नद्या अवरे कूले भस्मीभूतो नद्याः पारं तरिष्यतीति ॥११॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—अहो, अद्यापि इसका ज्ञान देहाभिमान से प्रतिबद्ध है, अतः उसे दूर कराना चाहिये, यह विचार कर उससे आचार्य कहे—हे सोम्य ! मर जाने पर तेरे शरीर को गृध्रादि पक्षिगण यहीं भक्षण कर जायेंगे अथवा वह मृत्तिकारूप हो जायेगा। ऐसी अवस्था में तू संसार को पार करना कैसे चाहता है? क्योंकि नदी के इसी तीर पर भस्मीभूत हो जाने पर तू उसके पार नहीं जा सकता ॥ ११॥ स यदि ब्रूयात्—अन्योऽहं शरीरात् । शरीरं तु जायते, म्रियते, वयोभिरद्यते, मृद्भावमापद्यते, शस्त्राग्न्यादिभिश्च विनाश्यते, व्याधिभिश्च† युज्यते । तस्मिन्नहं स्वकृतधर्माधर्मवशात् पक्षी नीडमिव प्रविष्टः । पुनः पुनः शरीरविनाशे धर्माधर्मवशाच्छरीरान्तरं यास्यामि, पूर्वनिोडविनाशे पक्षीव नीडान्तरम् । एवमेवाह्मनादौ संसारे देवतिर्यङ्मनुष्यनिरयस्थानेषु स्वकर्मवशादुपात्तमुपात्तं शरीरं त्यजन्, नवं नवं चान्यदुपाददानः, जन्ममरणप्रबन्धचक्रे घटीयन्त्रवत् स्वकर्मणा भ्राम्यमाणः, क्रमेणेदं शरीरमासाद्य, संसार- चक्रभ्रमणादस्मान्निर्विण्णः, भगवन्तमुपसन्नोऽस्मि संसारचक्रभ्रमणप्रशमाय । तस्मान्नित्य एवाहं शरीरादन्यः—शरीराण्यागच्छन्त्यपगच्छन्ति च वासांसीव पुरुषस्येति ॥१२॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—इस प्रकार स्थूल देहाभिमान का त्याग कराने पर अपने आत्मा को उस स्थूल देह से पृथक् समझनेवाला वह शिष्य यदि कहे कि मैं तो शरीर से भिन्न हूँ, तो 'आत्मा, शरीर से भिन्न है, यह तुमने कैसे जाना ?'— ऐसा पूछने पर वह कहता है—शरीर तो उत्पन्न होता है, मरता है, पक्षियों से खाया जाता है, शस्त्र और अग्नि आदि से नाश किया जाता है तथा रोगादि से युक्त होता है। उसमें घोंसले में घुसे हुए पक्षी के समान, मैं अपने किये हुए धर्म और अधर्म के कारण प्रवेश किये हुए हूँ, तथा जिस प्रकार पहले घोंसले का नाश होने पर पक्षी दूसरे घोंसले में चला जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक शरीर का नाश होने पर मैं अपने पुण्य-पाप के अधीन पुनः-पुनः अन्य शरीर धारण कर लूँगा । उसी प्रकार इस अनादि संसार में अपने कर्मवश देवता, मनुष्य, तिर्यक् एवं नारकीय योनियों में ग्रहण किये हुए शरीरों को छोड़ता तथा अन्य नवीन-नवीन शरीरों को ग्रहण करता मैं अपने कर्म के द्वारा घटीयन्त्र के समान जन्म-मृत्युरूप चक्र में भ्रमित होता हुआ क्रमशः इस शरीर में आकर इस संसारचक्र में भ्रमण करने से खिन्न होकर अब इस संसारचक्र में भ्रमण की शान्ति के लिये आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ, अतः मैं इस शरीर से भिन्न अर्थात् नित्य ही हूँ। क्योंकि पुरुष के वस्त्रों के समान शरीर तो आते हैं और चले जाते हैं ॥ १२ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—साधुवादीः, सम्यक् पश्यसि, कथं मृषाऽवादीः—ब्राह्मणपुत्रोऽदोनन्वयो ब्रह्मचार्यासम्, गृहस्थो वा, इदानीमस्मि परमहंसपरिव्राडिति ॥१३॥
- उद्धर्तुं०—पाठान्तरम् । † व्याध्यादिभिश्च, व्याध्यादिभिश्च०—पाठौ ।