भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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शिष्यानुशासनप्रकरणम् २७५ है। विवरणस्थ ‘शास्त्रप्रसिद्धशिष्यगुणसम्पन्नाय’ के कहने से मूलस्थ ‘अर्थिनाम्’ की व्याख्या हो गई। इतना ही नहीं, अधिकारप्राप्त्यर्थं बाह्य पवित्रता और आभ्यन्तर पवित्रता भी आवश्यक है। क्योंकि शास्त्र बता रहा है—‘नाशुचिर्ब्रह्म कीर्तयेत्’ तथा ‘त्रिसन्ध्यादौ स्नानमाचरेत्’ इति ! यद्यपि अद्वैत तत्त्वज्ञान के इच्छुक क्षत्रियादिक भी होते हैं, तथापि उनका संन्यास धर्म (पारमहंस्य) में अधिकार नहीं है। अतएव अद्वैत तत्त्वज्ञान से सम्पन्न रहते हुए भी जनकादि ने गार्हस्थ्य का परित्याग नहीं किया था। यह अद्वैत वेदान्त शास्त्र, यथोक्त (शास्त्रविहित) संन्यासाधिकारी ब्राह्मण के लिये ही है, आश्रमान्तर के अधिकारी के लिये नहीं। क्योंकि अन्य आश्रम (आश्रमान्तर), प्रवृत्तित्वधर्मपरक हैं, उनका त्याग किये बिना तद्विरुद्ध निवृत्ति में निष्ठा होना असंभव है। यदि ब्राह्मणानतिरिक्त विविदिषु लोग अपने आश्रम का त्याग करते हैं तो उनके लिये आश्रमान्तर (संन्यासाश्रम) का विधान नहीं है, तब उन्हें अनाश्रमी रहना होगा किन्तु ‘अनाश्रमी न तिष्ठेत’ के अनुसार अनाश्रमी रहने का निषेध किया गया है, उसका उल्लंघन करना पड़ेगा। भगवान् भाष्यकार ने कहा है— “अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च भोक्ता चास्मीति ये विदुः। ते नष्टा ज्ञानकर्मभ्यां नास्तिकाः स्युर्न संशयः२॥ इति, “संन्यासिभ्यः प्रवक्तव्यः शान्तेभ्यः शिष्यबुद्धिना३”। अतः कुछ लोगों का जो यह कथन है कि ‘पारिव्राज्य’ विशेषण, नित्याधिकारित्व का ख्यापन करने के लिये है, आश्रमान्तर की व्यावृत्ति के लिये नहीं', वह चिन्त्य है। एवञ्च “ब्राह्मणो निर्वेदमायात्४”, “एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे (ब्राह्मणा अनूचाना) विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते५”, “एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः६” इत्यादि वचनों से पूर्वोक्त विशेषणविशिष्ट ब्राह्मण-संन्यासी को ही अद्वैततत्त्वज्ञानोपदेश प्राप्त करने का अधिकार स्पष्ट बताया गया है। उपर्युक्त विशेषणों से विशिष्ट शिष्य को उपदेशक गुरु के समीप यथाविधि आना चाहिये, यह श्रुति ने बताया है—‘‘तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभि- गच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्७”। ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप आकर विद्या (ज्ञान) ग्रहणार्थ उनके चरणों को यथाविधि स्पर्श करते हुए उनका अभिवादन करते समय “अधीहि भगवः८” इत्यादि मन्त्र का उच्चारण करें। इस रीति से मन्त्रोच्चारणपूर्वक अभिवादन को ही 'उपसत्ति' (समीप आना) कहते हैं। एवंगुणविशेषणविशिष्ट ‘शिष्य’ अर्थात् शासन के योग्य अर्थात् पूर्वं बहुश्रुत रहने पर भी औद्धत्य से रहित यानी विनीत होना आवश्यक है। तथा उसके जाति- कर्म-वृत्त-विद्या और अभिजन की भी परीक्षा कर लेनी चाहिये। जातिपरीक्षण से कुण्ड, गोलक, क्षत्रियादि की व्यावृत्ति बताई गई है। कर्मपरीक्षण से उसमें पतितत्व, अभिशप्तत्व आदि न होना अपेक्षित है, जिससे शिष्य की शिष्टता का ज्ञान हो सके। वृत्त (शील, आचार) की परीक्षा कर लेने से विद्या (ज्ञान) ग्रहण कर लेने के पश्चात् भी उसके परिपालन करने की योग्यता का ज्ञान हो सकता है। ये सब परीक्षण श्रुतिप्रमाणसिद्ध हैं९, किसी की कल्पना मात्र नहीं हैं। 'विद्या'= पूर्व अधीत वेद-शास्त्रादिरूप अथवा उपास्य देवताविशेषविषयक विद्या, उसकी भी परीक्षा कर लेनी चाहिये, जिससे उक्त अर्थ के ग्रहण-धारण की योग्यता अथवा अयोग्यता का निश्चय किया जा सके। क्योंकि श्रुति बता रही है—‘‘नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः”—(श्वे. उ. ६।२२)। इसके बाद 'अभिजन' = कुल १. (अरु. उ. २) २. (उप. सा. पद्यप्रबन्ध १९।८) ३. (वहीं पर—१३।२७) ४. (मुं. उ. १।२।१२-१३) ५. (बृ. उ. ४।४।२२) ६. (बृ. उ. ३।५।१) ७. (मुं. उ. १।२।१२) ८. (छां. उ. २।१।१) ९. “किं गोत्रो नु सोम्यासि”—(छां. उ. ४।४।४), तथा “तान् ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा श्रद्धया ब्रह्मचर्येण संवत्सरं संवत्स्यथ”—(प्र. उ. १।२), तथा “नाऽसंवत्सरवासिने प्रब्रूयात् ।" इति श्रुतिः।