उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ उपदेशसाहस्री (जन्मस्थान) की भी परीक्षा करनी चाहिये। कुलपरीक्षण से माता-पिता और गुरुओं द्वारा शिक्षित-अशिक्षित होने का ज्ञान होता है। श्रुति ने बताया है कि मातृभक्त, पितृभक्त तथा आचार्यभक्त¹ शिष्य को आचार्य उपदेश करे। तात्पर्य यह है कि आचार्य (श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु) को चाहिये कि समस्त अनित्य साध्य और साधनों से विरक्त, त्रिविध एषणाओं का त्याग करनेवाले, परमहंससंन्यासाश्रम में स्थित, शम-दम और दया से युक्त, शिष्य के शास्त्रप्रसिद्ध गुणों से सम्पन्न, बाह्याभ्यन्तर पवित्रता से युक्त, तथा शास्त्रोक्त विधि से गुरु की शरण में प्राप्त हुए ब्राह्मण शिष्य को उसकी जाति, कर्म, स्वभाव, विद्या और कुल के द्वारा परीक्षा करके इस मोक्षसाधनभूत ज्ञान का तबतक बार बार (पुनः पुनः) उपदेश करे, जबतक कि उसे इस ज्ञान का दृढ़ता से ग्रहण हो सके। क्योंकि ज्ञानोपदेश का फल दृष्ट है, इसलिये उसकी प्राप्ति होने तक बार बार उपदेश करने के लिये कहा गया है। यदि इसका अदृष्ट फल ही होता, तो एक बार ही उपदेश करने की विधि होती। इस प्रकार ब्रह्मविद्या का उपदेश करने से उस अविनाशी सत्यस्वरूप पुरुष का ज्ञान होता है ॥ २ ॥ श्रुतिश्च—"परीक्ष्य... तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्" इति। दृढगृहीता हि विद्याऽऽत्मनः श्रेयसे संतत्यै च भवति। विद्यासन्ततिश्च प्राण्यनुग्रहाय भवति, नौरिव नदीं तितीर्षोः। शास्त्रं च—"यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः" इति। अन्यथा च ज्ञानप्राप्त्यभावात् “आचार्यवान् पुरुषो वेद", "आचार्याद्धैव विद्या विदिता", "आचार्यः प्लावयिता तस्य सम्यग्ज्ञानं प्लव इहोच्यते" इत्यादिश्रुतिभ्यः, "उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्" इत्यादिस्मृतिभ्यश्च ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी श्रुतिश्चेति—उक्त विषय में श्रुति का प्रमाण भी है। वह श्रुति इस प्रकार है— “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेद मायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ।। —(मुं० उ० १।२।१२-१३) श्रुति का अर्थ—कर्म से प्राप्त हुए लोकों की परीक्षा करके यह देखकर कि किये जाने वाले कर्मों के द्वारा अकृत मोक्षपद प्राप्त नहीं हो सकता, ब्राह्मण विरक्त हो जाय, और उस ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये वह समित्पाणि होकर श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप जाय । इस प्रकार अपने समीप आये हुए उस शान्तचित्त, शमादि से सम्पन्न शिष्य को वह विद्वान् गुरु उस ब्रह्मविद्या का उपदेश करे, जिससे उसे उस अविनाशी सत्यस्वरूप पुरुष का ज्ञान हो सके। तात्पर्य यह है—"परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्" से प्रारंभ कर “येनाक्षरं पुरुषं वेद” तक के ग्रन्थ से उक्त अर्थ को बताया गया है। दृढ़तापूर्वक ग्रहण की हुई विद्या ही आत्मा के कल्याण (अविद्यादिदोषसंसारनिवृत्ति) के लिये और शिष्य-प्रशिष्य परम्परा के द्वारा विद्या के अविच्छेद में कारण बनती है। विद्या-परम्परा की रक्षा करने से प्राणियों का कल्याण होता है। जैसे नदी पार करने के लिये नदी में प्रविष्ट होने पर अगाध जल में डूबते हुए व्यक्ति को पार पहुँचाने के लिये कोई दयालु व्यक्ति नौका को उपस्थित करा देता है, वैसे ही संसारसमुद्र में डूबते हुए प्राणियों का उद्धार करने के निमित्त अर्थात् संसारसमुद्र के पार भगवान् विष्णु के परम पद की प्राप्ति कराने के लिये विद्यासन्तान (विद्या की अविच्छिन्न परम्परा) का संरक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। निष्कर्ष यह है कि 'पूर्वोक्त शिष्यगुणों से सम्पन्न, सम्यक् परीक्षित, विधिवत् आये हुए शिष्य को ही विद्या देनी चाहिये, यथाकथञ्चित् आये हुए या धनलाभ के लोभ से आये हुए को विद्या नहीं देनी चाहिये'—यह नियम गुरु के लिये बताया गया है। इस विषय में शास्त्र का वाक्य (श्रुति का शासन) भी है—"यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः" इति । -यदि इस (आत्मज्ञानो) को यह समुद्र से घिरी हुई और धनपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी भी कोई दे, तो भी यह विद्या उन सबसे बढ़कर है। तात्पर्य यह है कि अच्छी तरह से १. “मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात्"—(बृ. उ. ४।१।२)।