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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

२७६ उपदेशसाहस्री (जन्मस्थान) की भी परीक्षा करनी चाहिये। कुलपरीक्षण से माता-पिता और गुरुओं द्वारा शिक्षित-अशिक्षित होने का ज्ञान होता है। श्रुति ने बताया है कि मातृभक्त, पितृभक्त तथा आचार्यभक्त¹ शिष्य को आचार्य उपदेश करे। तात्पर्य यह है कि आचार्य (श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरु) को चाहिये कि समस्त अनित्य साध्य और साधनों से विरक्त, त्रिविध एषणाओं का त्याग करनेवाले, परमहंससंन्यासाश्रम में स्थित, शम-दम और दया से युक्त, शिष्य के शास्त्रप्रसिद्ध गुणों से सम्पन्न, बाह्याभ्यन्तर पवित्रता से युक्त, तथा शास्त्रोक्त विधि से गुरु की शरण में प्राप्त हुए ब्राह्मण शिष्य को उसकी जाति, कर्म, स्वभाव, विद्या और कुल के द्वारा परीक्षा करके इस मोक्षसाधनभूत ज्ञान का तबतक बार बार (पुनः पुनः) उपदेश करे, जबतक कि उसे इस ज्ञान का दृढ़ता से ग्रहण हो सके। क्योंकि ज्ञानोपदेश का फल दृष्ट है, इसलिये उसकी प्राप्ति होने तक बार बार उपदेश करने के लिये कहा गया है। यदि इसका अदृष्ट फल ही होता, तो एक बार ही उपदेश करने की विधि होती। इस प्रकार ब्रह्मविद्या का उपदेश करने से उस अविनाशी सत्यस्वरूप पुरुष का ज्ञान होता है ॥ २ ॥ श्रुतिश्च—"परीक्ष्य... तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्" इति। दृढगृहीता हि विद्याऽऽत्मनः श्रेयसे संतत्यै च भवति। विद्यासन्ततिश्च प्राण्यनुग्रहाय भवति, नौरिव नदीं तितीर्षोः। शास्त्रं च—"यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः" इति। अन्यथा च ज्ञानप्राप्त्यभावात् “आचार्यवान् पुरुषो वेद", "आचार्याद्धैव विद्या विदिता", "आचार्यः प्लावयिता तस्य सम्यग्ज्ञानं प्लव इहोच्यते" इत्यादिश्रुतिभ्यः, "उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्" इत्यादिस्मृतिभ्यश्च ॥३॥ हृदयस्पर्शिनी श्रुतिश्चेति—उक्त विषय में श्रुति का प्रमाण भी है। वह श्रुति इस प्रकार है— “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेद मायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ।। —(मुं० उ० १।२।१२-१३) श्रुति का अर्थ—कर्म से प्राप्त हुए लोकों की परीक्षा करके यह देखकर कि किये जाने वाले कर्मों के द्वारा अकृत मोक्षपद प्राप्त नहीं हो सकता, ब्राह्मण विरक्त हो जाय, और उस ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये वह समित्पाणि होकर श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के समीप जाय । इस प्रकार अपने समीप आये हुए उस शान्तचित्त, शमादि से सम्पन्न शिष्य को वह विद्वान् गुरु उस ब्रह्मविद्या का उपदेश करे, जिससे उसे उस अविनाशी सत्यस्वरूप पुरुष का ज्ञान हो सके। तात्पर्य यह है—"परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान्" से प्रारंभ कर “येनाक्षरं पुरुषं वेद” तक के ग्रन्थ से उक्त अर्थ को बताया गया है। दृढ़तापूर्वक ग्रहण की हुई विद्या ही आत्मा के कल्याण (अविद्यादिदोषसंसारनिवृत्ति) के लिये और शिष्य-प्रशिष्य परम्परा के द्वारा विद्या के अविच्छेद में कारण बनती है। विद्या-परम्परा की रक्षा करने से प्राणियों का कल्याण होता है। जैसे नदी पार करने के लिये नदी में प्रविष्ट होने पर अगाध जल में डूबते हुए व्यक्ति को पार पहुँचाने के लिये कोई दयालु व्यक्ति नौका को उपस्थित करा देता है, वैसे ही संसारसमुद्र में डूबते हुए प्राणियों का उद्धार करने के निमित्त अर्थात् संसारसमुद्र के पार भगवान् विष्णु के परम पद की प्राप्ति कराने के लिये विद्यासन्तान (विद्या की अविच्छिन्न परम्परा) का संरक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। निष्कर्ष यह है कि 'पूर्वोक्त शिष्यगुणों से सम्पन्न, सम्यक् परीक्षित, विधिवत् आये हुए शिष्य को ही विद्या देनी चाहिये, यथाकथञ्चित् आये हुए या धनलाभ के लोभ से आये हुए को विद्या नहीं देनी चाहिये'—यह नियम गुरु के लिये बताया गया है। इस विषय में शास्त्र का वाक्य (श्रुति का शासन) भी है—"यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः" इति । -यदि इस (आत्मज्ञानो) को यह समुद्र से घिरी हुई और धनपूर्ण सम्पूर्ण पृथिवी भी कोई दे, तो भी यह विद्या उन सबसे बढ़कर है। तात्पर्य यह है कि अच्छी तरह से १. “मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात्"—(बृ. उ. ४।१।२)।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २७७ परीक्षित किये हुए शिष्य को आचार्य कृपा करके ही इस ब्रह्मविद्या को दे। यहाँ यह शंका हो सकती है कि आचार्य के पास जाने की क्या आवश्यकता है ? जिज्ञासु व्यक्ति स्वयमेव न्यायादि का अनुसरण कर ब्रह्मविद्या को पा सकेगा। किन्तु यह विचार ठीक नहीं है, क्योंकि श्रुति-स्मृति के वचन हैं। जिज्ञासु व्यक्ति विद्याप्राप्त्यर्थ यदि पूर्वोक्त कष्ट सहन न करे और स्वयं ही न्यायादि का अनुसरण कर विद्या प्राप्त करना चाहे, तो उससे उसे यथार्थ ज्ञानप्राप्ति न हो सकेगी। श्रुति कहती है कि—'आचार्यवान् पुरुषो वेद', १ आचार्याद्धैव विद्या विदिता', २-आचार्यवान् पुरुष को ज्ञान होता है, विद्या आचार्य से ही जानी जाती है। स्मृति कह रही है कि 'आचार्यः प्लावयिता तस्य सम्यग्ज्ञानं प्लव इहोच्यते', ३ 'उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्' ४ इति। 'आचार्य से प्राप्त हुई विद्या ही प्रामाणिक विश्वासार्ह होती है' ५—यह वाक्यशेष भी है। गीता में भी बताया गया है कि 'तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥' ६— उस मोक्षप्रद ज्ञान को गुरुओं से प्रणिपात, परिप्रश्न और शुश्रूषा द्वारा जानो, वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें योग्य समझकर तत्त्व का उपदेश देंगे। तथा च अतिसूक्ष्म परमार्थ का निर्णय केवल अपनी बुद्धि के बल पर कर लेना सम्भव नहीं है, यह निष्कर्ष उपर्युक्त वाक्यों से अवगत हो रहा है ॥ ३ ॥ शिष्यस्य ज्ञानाग्रहणं च लिंगैर्बुद्ध्वा तद्ग्रहणहेतूनधर्मलौकिकप्रमादनित्यानित्यवस्तुविवेक- विषयासञ्जातदृढपूर्वश्रुतत्वलोकचिन्तावेक्षणजात्याद्यभिमानादींस्तत्प्रतिपक्षैः श्रुतिस्मृतिविहितैरपनयेद- क्रोधादिभिः अहिंसादिभिश्च यमैः, ज्ञानाविरुद्धैश्च नियमैः ॥४॥ हृदयस्पर्शिनी शिष्यस्येति—पूर्वोक्त विशेषणों से विशिष्ट जिज्ञासु शिष्य को एक बार के ही उपदेश से सुदृढ़ ज्ञान हो ही जायेगा, तब पुनः पुनः उपदेश करने के लिए क्यों कहा गया है ? इसके उत्तर में आचार्य बता रहे हैं कि शिष्य के मुखादि की आकृति, चेष्टा, वाग्-व्यापार आदि चिह्नों से उसे अभी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पायी है, यह जानकर ज्ञानप्राप्ति में प्रतिबन्धक जो सञ्चित, क्रियमाण पाप, यथेच्छ भाषण, यथेच्छ भक्षण एवं यथेच्छाचार आदि प्रमादरूप अधर्म का सूर्यादि देवतोपासनादि नियमों का उपदेश देकर क्षपण करना चाहिए। वर्ज्य-अवर्ज्य का धर्मशास्त्र के द्वारा उपदेश देकर प्रमाद को दूर कराना चाहिये। अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में जो प्रतिबन्धक बन रहे हैं, उनका श्रुति-स्मृतिविहित उपायों से अपनयन कराना चाहिए। नित्यवस्तु आत्मा और अनित्यवस्तु अनात्मा के विषय में जो पूर्णतया श्रवण नहीं कर पाया, उसे युक्तिविशेष आदि के द्वारा बताकर नित्यानित्यवस्तु के विवेक को दृढ़ कराना चाहिये। तथा लोगों के व्यवहार में शुभाशुभ का (साधुत्वासाधुत्व का) विचार करते रहना अथवा लोगों से पूजा-सम्मान आदि की इच्छा से उनपर अनुग्रहादि व्यवहार करना आदि लोकचिन्तावेक्षण को वक्ष्यमाण अमानित्व, अदम्भित्व आदि शास्त्रीय उपदेश देकर दूर कराना चाहिये। तथा अपनी जाति, कुल, विद्या का अभिमान और तत्प्रयुक्त अन्यधिक्करणादि दुर्व्यवहारों को त्वं-पदार्थ के परिशोधनोपदेश से दूर कराना चाहिये। इस प्रकार पूर्वोक्त प्रतिबन्धकों को उनके प्रतिपक्षी श्रुतिस्मृतिविहित अक्रोध, अकाम, अमोह आदि और अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ७, इन पाँच यमों से (अक्रोधादि के साथ इनका उपायोपेय भावसम्बन्ध है। अक्रोधादि उपाय है और अहिंसादि उपेय हैं) तथा ज्ञाननिष्ठा के अविरोधी नियमों से (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान ८ पाँच इन नियमों को ज्ञाननिष्ठा के अविरोधी कहने का तात्पर्य १. (छां. उ. ६।१४।२) २. (,, ,, ४।९।३) ३. (स्मृति—तुलना मो. ध. ३२७।२३) ४. (भ. गी. ४।३४) ५. आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत् ।—(छां उ. ४।९।३) ६. (भ. गी. ४।३४) ७. (यो. सू. २।३०) ८. (,, ,, २।३२)

२७८ उपदेशसाहस्री यह है कि इनमें तीर्थयात्रा, चान्द्रायणादि कर्मकाण्डप्रधान नियम ज्ञाननिष्ठा के विरोधी हैं, क्योंकि अधिक आयास- साध्य होने के कारण वे विक्षेप के हेतु हैं) निवृत्त करावे। समस्त दोषों के निरास करने में यम-नियमादि साधारण उपाय हैं ॥ ४ ॥ अमानित्वादिगणं* च ज्ञानोपायं सम्यग्ग्राहयेत् ॥५॥ हृदयस्पर्शिनी अमानित्वादिगणमिति—इस प्रकार ज्ञानग्रहण में प्रतिबन्धकों के निवर्तक उपायों को बताकर अब ज्ञानग्रहण के उपायों को बता रहे हैं—ज्ञान के उपायभूत अमानित्व, अदंभित्व आदि गुणों को अच्छी तरह से ग्रहण करवावे। उसी तरह 'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्'१ इत्यादि वाक्यों से उक्त अद्वेष्टृत्वादि धर्मों का भी पालन करवावे। इस रीति से समस्त दोषों का परिहार होनेपर दृढ़ ज्ञान अनायास लभ्य हो जाता है। एक बार श्रवण करने मात्र से विद्या दृढ़ नहीं हो पाती। क्योंकि 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्'२ इस न्याय से तथा श्रवणोत्तरकाल में मनन का विधान करने से फल प्राप्ति तक विद्या की दृढ़ता विवक्षित है। अतः शिष्य को कृतार्थ करने में प्रवृत्त हुआ अथवा विद्या का उपयोग करने में प्रवृत्त हुआ गुरु अपने शिष्य को इतना निःसन्दिग्ध ज्ञान करा दे, जिससे कि वह फलोत्पादक हो सके। इसलिये शिष्यकल्याणार्थं आचार्य पुनः पुनः अवश्य ही उपदेश करता रहे ॥ ५ ॥ आचार्यश्चोहापोहग्रहणधारणशमदमदयानुग्रहादिसम्पन्नो लब्धागमो दृष्टादृष्टभोगेष्वनासक्तस्त्यक्त- सर्वकर्मसाधनो ब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितोऽभिन्नवृत्तो दंभदर्पकुहकशाठ्यमायामात्सर्यानृताहंकारममत्वादि- दोषविवर्जितः केवलपरानुग्रहप्रयोजनो विद्योपयोगार्थी। पूर्वमुपदिशेत्— “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेक- मेवाद्वितीयम्”, “यत्र नान्यत्पश्यति”, “आत्मैवेदं सर्वम्”, “ब्रह्मैवेदं सर्वम्”, “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इत्याद्या आत्मैक्यप्रतिपादनपराः श्रुतीः ॥६॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्यश्चेति—इस प्रकार आचार्य के कर्तव्य को बताकर अब उसके लक्षण को बतलाते हुए उपदेश का क्रम बताते हैं—तत्त्वजिज्ञासु अधिकारी शिष्य एवंगुणविशिष्ट आचार्य के समीप जाय। जो वैसा न हो उसके समीप न जाय, यह प्रदर्शित करने के लिये यह बताया जा रहा है। आचार्य के लिए वह एवंविध गुणों से विशिष्ट होने का प्रयत्न करे ऐसा कोई विधान नहीं किया जा रहा है, क्योंकि वह तो कृतार्थ हो चुका है। ऊहापोह, ग्रहण, धारण, शम, दम, दया और अनुग्रह आदि गुणों से सम्पन्न, शास्त्रज्ञ, ऐहिक और पारलौकिक भोगों से विरक्त, सर्वविध कर्मसाधनों को त्यागनेवाले, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मनिष्ठ, लोकमर्यादा का उल्लंघन न करनेवाले तथा दंभ, दर्प, कुहक (दूसरे को धोखा देना), कुटिलता, माया (दूसरे को मोह में डाल देना), मात्सर्य (गुण में दोषदृष्टि), मिथ्याभाषण, अहंकार, और ममता आदि दोषों से रहित, केवल परोपकाररूप प्रयोजनवाले एवं अपनी विद्या का उपयोग करने की इच्छावाले आचार्य सर्वप्रथम आत्मा का एकत्वप्रतिपादन करनेवाली इन श्रुतियों का उपदेश करे—"हे सोम्य ! पहले यह एक अद्वितीय सत् ही था३", "जहाँ किसी अन्य को नहीं देखता४", "यह सब आत्मा ही है५", "पहले यह एक आत्मा ही था६", "निश्चय यह सब ब्रह्म ही है७" इत्यादि। ऊहा=शिष्य के बिना पूछे ही उसका भाव जान लेना, अथवा १. (भ. गी. १२।१३-२०) २. (ब्र. सू. ४।१।१) ३. (छां. उ. ६।२।१) ४. (छां. उ. ७।२४।१) ५. (छां. उ. ७।२५।२, तथा बृ. उ, ४।४।६) ६. (ऐ. उ. १।१) ७. (छां. उ. ३।१४।१)

  • गुणं-पाठान्तरम् ।

शिष्यस्यानुशासनप्रकरणम् २७९ उपदेश के समय शिष्य की समझ में आने योग्य नवीन युक्तियों की कल्पना करने की शक्ति को 'ऊहा' कहते हैं। और शिष्य के मिथ्या ग्रहण (ज्ञान) को निवृत्त करने की अथवा स्वसिद्धान्त के विरोधी विचारों का निराकरण करने की सामर्थ्य को 'अपोह' कहते हैं। ग्रहण = शिष्य के किये हुए प्रश्न और आक्षेपों को तुरन्त समझ लेने की शक्ति को 'ग्रहण' कहते हैं। धारण = शिष्य की शंका निवृत्त करने के लिये उनके सारासार का विचार करके निराकरण करते समय उन्हें स्मरण रखने को 'धारण' कहते हैं। शम = वेदान्त के श्रवण, मनन, निदिध्यासन के अतिरिक्त अन्य विषयों से अपने मन को हटा (मोड़) लेना ही 'शम' है। दम = चक्षुःश्रोत्रादि बाह्य न्द्रियों को उन वेदान्तश्रवणादि विषयों के अतिरिक्त विषयों से हटा लेना ही 'दम' है। दया = दुःखी के प्रति अनुग्रह करने की इच्छा। अनुग्रह = दुःखी के दुःख का अपाकरण करने की प्रवृत्ति। (समीप आये हुए विनीत, अनुगृहीत शिष्य का अपरित्यग 'आदि' शब्द से समझना चाहिये।) यद्यपि 'हिंसा, अनुग्रह दोनों ही न करे', इस प्रकार संन्यासी के लिये गौतम ने धर्म बताया है— “हिंसानुग्रहयोरनारम्भी”, उसी तरह “न व्याख्यानपरो यतिः”--संन्यासी व्याख्यान-प्रवचन न करे इत्यादि जो वचन हैं, वे ख्यातिलाभ, पूजा, पाण्डित्यवृद्धि आदि प्रवृत्ति निषेधक हैं, अतः कोई विरोध नहीं है। 'सम्पन्न' - शब्द से पूर्वोक्त गुणों से आद्य (युक्त) होना बताया गया है। 'लब्धागम' कहकर यह बताया है कि उसने स्वगुरु से विद्योपदेश प्राप्त किया हो। आचार्य के साथ इस विशेषण के जोड़ से यह सूचित किया है कि गुरु की साम्प्रदायिकता का भी शिष्य को अन्वेषण करना चाहिये, अर्थात् गुरु का ज्ञान, गुरुसंप्रदाय से प्राप्त रहना चाहिये। दृष्टभोग = ऐहिक भोग और अदृष्टभोग = पारलौकिक भोग, उनमें अनासक्त अर्थात् तत्साधनभूत लोकाराधन की तथा तपोयज्ञादि की प्रवृत्ति से रहित होना चाहिये, अर्थात् समस्त कर्मों के साधनभूत धन-दारसंग्रह-शिखा-यज्ञोपवीत आदि का जिसने त्याग कर दिया है, अतएव भोगों में अनासक्त रूप से प्रसिद्ध, ऐसा ब्रह्मवित् (= महावाक्यार्थभूत प्रत्यगात्मतत्त्वज्ञानवान्) आचार्य आवश्यक है। उसी तरह ब्रह्मणि स्थित = नित्य अपरोक्ष 'ब्रह्मैव अहमस्मि' इस प्रकार स्फुट अनुभव करता हुआ- इस प्रकार रहता हुआ भी यथेष्ट आचरण अर्थात् मनमाना आचरण करने वाला न हो, किन्तु अभिन्नवृत्त = लोकव्यवहार का उल्लंघ्न न करने वाला अर्थात् शिष्टविगर्हित (निन्दित) न हो। 'दंभ' = धर्मध्वजित्व अर्थात् लोक में अपनी धार्मिकता को ख्यापित करना। कुहक = परप्रतारणा। शाठ्य = निष्ठुरता। माया = परव्यामोहन। मात्सर्य = गुणों में दोष दिखाना। अनृत = मिथ्या भाषण। अहंकार = देहाभिमान। ममत्व = पुत्र-शिष्य आदि में स्वत्वाभिमान-इन दंभादि दोषों से शून्य आचार्य का अन्वेषण करना चाहिये। किन्तु ऐसा आचार्य, यदि सुकृतपुञ्जोदय से भाग्यवशात् मिल भी जाय, तब भी वह परोपदेशार्थ प्रवृत्त ही क्यों होगा ? यह आशंका हो सकती है, उसके समाधानार्थ कह रहे हैं कि ऐसे गुरु का केवल परानुग्रह करना ही एकमात्र प्रयोजन रहता है, अर्थात् संसारसागर से निर्विण्ण (विषण्ण) हुए व्यक्ति पर परमपदप्रापणरूप अनुग्रह करना ही उस गुरु का एकमात्र उद्देश्य रहता है। परानुग्रह के साथ 'केवल' विशेष जोड़कर यह बताया है कि उनकी (गुरु की) परोपदेश प्रवृत्ति में अन्य कोई आनुषङ्गिक प्रयोजनान्तर भी निमित्त नहीं रहता है। तब यह शंका हो सकती है कि विना किसी निमित्त के ही यदि परानुग्रह में प्रवृत्ति कही जाय तो क्या उसे उन्मत्त प्रवृत्ति के समान यादृच्छिक कहना होगा ? इस शंका के समाधानार्थ आचार्य के साथ 'विद्योपयोगार्थी' विशेषण जोड़ा गया है। 'उपयोग' का अर्थ है 'विनियोग'। 'चात्वाले कृष्णविषाणां प्रास्यति' १- सोमयाग में दीक्षित के हाथ में कण्डू (खुजलाहट) को मिटाने के लिये कृष्णमृग का शृंग दिया जाता है, यज्ञ समाप्ति पर 'चात्वाल' नामक गड्ढे में उस शृंग को त्याग दिया जाता है। उस त्यागने को 'प्रतिपत्तिकर्म' कहते हैं। उस प्रतिपत्तिकर्म की तरह “त्यज धर्ममधर्मञ्च उभे सत्यानृते त्यज । उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत् त्यज ॥” २ यहाँ पर धर्म आदि में प्रवृत्तिनिरोधक जिस ज्ञान से उन धर्मादि का त्याग करते हो, उस ज्ञान का भी त्याग करो-यह कहने पर ज्ञान तो अमूर्त है, स्वरूपतः उसका त्याग करना संभव नहीं, अतः विशिष्ट शिष्य को उसका १. (तै. सं. ६।१।३।८, जै. सू. ४।२।१९) उपयुक्तस्याऽऽकीर्णकरस्यावशिष्यमाणद्रव्यादेर्विहितदेशे संस्कारविशेषहेतुः प्रक्षेपः प्रतिपत्तिकर्म। ज्योतिष्टोमे यजमानेन दत्ता दक्षिणारृत्विग्भिर्यदा नीताः, तदा यजमानः स्वशिरः कण्डूतापयुक्तं स्वहस्ते धृतं कृष्णमृगस्य शृङ्गं चात्वालनामकगर्ते परित्यजति, सोऽयम्परित्यागः प्रतिपत्तिकर्म। २. (शां. प. ३२९।४०, ३३१।४४)

२८० उपदेशसाहस्री प्रतिपादन कर देना ही प्रतिपत्तिकर्म कहा गया है । वह प्रतिपत्तिकर्म अपने वस्तुस्वभाव की महिमा से परानुग्रहता के रूप को पा लेता है । इस प्रकार का परानुग्रहाकांक्षी आचार्य आये हुए शिष्य को उपदेश दे । किन्तु प्रथमतः कौन-सा उपदेश दे, यह जिज्ञासा होने पर उपदेश के क्रम को बताया गया है कि आत्मैकत्वप्रतिपादक वाक्यों का उपदेश करें । उन वाक्यों को मूल ग्रन्थ में दिया गया है। इस प्रकार आत्मैकत्वप्रतिपादनपरक श्रुतियों का पहले उपदेश देना चाहिये । “यत्र नान्यत्पश्यति” का “नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा” यह वाक्यशेष है । कुछ लोग “ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्”१ इसे वाक्यशेष बताते हैं। यहाँ पर सत्, भूमन्, आत्मन्, ब्रह्म—सभी शब्द पर्यायरूप हैं। अनेक शाखागत वाक्यों का उदाहरण “गतिसामान्यात्”२ इस न्याय से अविरोधतः स्वार्थपरत्वख्यापन के लिये है ॥ ६ ॥

उपदिश्य च ग्राहयेद्ब्रह्मणो लक्षणम्— “य आत्माऽपहतपाप्मा”, “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म”, “योऽशनायापिपासे”, “नेति नेति”, “अस्थूलमनणु”, “स एष नेति नेति”, “अदृष्टं द्रष्टृ”, “विज्ञान- मानन्दम्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तम्”, “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते”, “स वा एष महानज आत्मा”, “अप्राणो ह्यमनाः”, “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”, “विज्ञानघन एव”, “अनन्तरमबाह्यम्”, “अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि”, “आकाशो वै नाम” इत्यादिश्रुतिभिः ॥७॥

हृदयस्पर्शिनी उपदिश्य चेति । ‘ब्रह्म’ शब्द से कौनसी वस्तु बताई जाती है, और उसे अद्वितीय कैसे जाना जाता है ? इस प्रश्न पर बताया जा रहा है कि पूर्वोक्त क्रम से उपदेश करने के बाद “जो आत्मा पापरहित है”, “जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है”, “जो क्षुधा और पिपासा से अतीत है”, “न कार्य है, न कारण है”, “न स्थूल है, न सूक्ष्म है”, “वह यह आत्मा ऐसा नहीं है”, “वह अदृष्ट किन्तु देखने वाला है”, “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दरूप है”, “ब्रह्म सत्य, ज्ञान, अनन्त है”, “अदृश्य और अशरीर में”, “वह यह आत्मा निश्चय ही महान् और अजन्मा है”, “यह अप्राण और अमना है”, “यह बाहर-भीतर व्याप्त और अजन्मा है”, “यह विज्ञानघन ही है”, “यह न भीतर है न बाहर”, “यह विदित और अविदित से भी अन्य है”, “आकाश ही नाम और रूप का निर्वाह करने वाला है” इत्यादि श्रुतियों से ब्रह्म का लक्षण ग्रहण करावे । अर्थात् उपदेश देने के बाद ब्रह्म का लक्षण ग्रहण करावे । ‘योऽशनायापिपासे’ इसके बाद ‘शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति’ यह शेष जोड़ा जाता है । “आनन्दम्” “अनन्तम्” दोनों जगह “ब्रह्म” इस प्रकार वाक्यशेष समझना चाहिये । इसी प्रकार सर्वत्र वाक्यों में शेष अक्षरों को परिचित श्रुतियों के अनुसार पूर्ण कराने के निमित्त जोड़ना चाहिये । ‘य आत्माऽपहतपाप्मा’३ इत्यादि प्राजापत्यवाक्य से जाग्रदादि अवस्थाओं में द्रष्टा होकर अनुगत रहने वाला अवस्थाधर्म से रहित, अशरीर, प्रिय-अप्रिय दोनों से असंस्पृष्ट प्रत्यगात्मा ही परं ज्योति अर्थात् परं ब्रह्म उपास्य है और वही ज्ञेय है, इस प्रकार प्रकरणार्थ का उपन्यास करते हुए प्रत्यग्ब्रह्मैक्य का ज्ञान करावे । जो आत्मा सर्वान्तर (सबके भीतर) है, वही बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टि (ज्ञान) का द्रष्टा, प्राणनादि व्यापार से जाना जाने वाला है, वही अशनायादि प्राणान्तः- करण शरीरधर्मों से परे साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, यह “यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म”४ इस द्वितीय वाक्य का अर्थ है । नेति- नेति इत्यादि वाक्यों का सकलदृश्यप्रविलापन पूर्वक अद्वितीय आत्मतत्त्व की सूचना देने में तात्पर्य है । “अदृष्टं द्रष्टृ”५ इत्यादि वाक्य से “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ” इत्यादि वाक्यों से एक साथ ही सर्वसाक्षिप्रत्यगात्मा ही अक्षर है, जिसमें अव्याकृत आकाश से लेकर धरित्री (पृथिवी) तक जगत् ओत-प्रोत है, यह सूचित किया गया है, अर्थात् वही तत्त्व है।

१. (मुं. उ. २।२।११) २. (ब्र. सू. १।१।११) ३. (छां. उ. ८।७।१) ४. (बृ. उ. ३।४।१) ५. (बृ. उ. ३।८।११)

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८१ यह बताया गया है। अब “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”१ यह तब बताया है कि जब “कोन्वेनं जनयेत् पुनः”१, “मर्त्यः स्विन्मृत्यना वृक्षणः कस्मान्मूलात्प्ररोहति”१ इस प्रकार पूछे गये जगन्मूलकारणत्वेन उपलक्षित के स्वरूप अर्थात् “ज्ञानानन्दलक्षणम्” इससे उपलक्षित तत्पदार्थ तत्त्व को, उसी प्रकार “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”२ इससे प्रकृत ब्रह्म के “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”३ के द्वारा बताये गये स्वरूप को बताकर “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः”४ इत्यादि वाक्य से जगत्कारण के रूप में उपलक्षित कर और उसी का सृष्ट कार्य-कारण संघात में प्रवेश बताकर “अदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्ते”५ इत्यादि से प्रपञ्च का बाध करके सर्वाधार, सर्वसाक्षी, आनन्दरूप आत्मा का “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा”६, “अथ सोऽभयं गतो भवति”७, “स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः”८ इस प्रकार तत्त्व का ग्रहण करावे ॥ ७ ॥ स्मृतिभिश्च—“न जायते म्रियते वा”, “नादत्ते कस्यचित्पापम्”, “यथाकाशस्थितो नित्यम्”, “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि”, “न सत्तन्नासदुच्यते”, “अनादित्वात्निर्गुणत्वात्”, “समं सर्वेषु भूतेषु”, “उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः” इत्यादिभिः श्रुत्युक्तलक्षणाविरुद्धामिः परमात्‍मासंसारित्वप्रतिपादनपराभिस्तस्य सर्वानन्यत्वप्रतिपादनपराभिश्च ॥८॥ हृदयस्पर्शिनी स्मृतिभिरिति—केवल श्रुतिवाक्यों से ही ब्रह्म का लक्षण ग्रहण कराना है, ऐसी बात नहीं, अपितु स्मृति- वाक्यों से भी उसका लक्षण ग्रहण कराना है। श्रुत्युक्त अर्थ में स्मृति का उदाहरण प्रतिपत्ति (ज्ञान) की दृढ़ता के लिये है। श्रुति का प्रामाण्य सिद्ध करने के लिये नहीं। श्रुतिप्रतिपादित लक्षणों से अविरुद्ध, और परमात्मा का असंसारित्व प्रतिपादन करने में तत्पर तथा उसका सबके साथ अभेद बतानेवाले ये स्मृतिवाक्य हैं। उन स्मृतिवाक्यों—“न जायते म्रियते वा”९, वह न कभी उत्पन्न होता है और न मरता है, वह किसी के पाप को ग्रहण नहीं करता, जिस प्रकार सर्वदा आकाश में स्थित वायु सर्वगत है, तू क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान, इसे न सत् कहा जाता है और न असत्, अनादि और निर्गुण होने के कारण, समस्त प्राणियों में समभाव से स्थित, उत्तम पुरुष अन्य है”—से भी ब्रह्म का लक्षण करावे ॥ ८ ॥ एवं श्रुतिस्मृतिभिर्गृहीतपरमात्मलक्षणं शिष्यं संसारसागरादुत्तितीर्षुं पृच्छेत्—कस्त्वमसि सोम्य ? इति ॥९॥ हृदयस्पर्शिनी एवमिति—इस प्रकार वाक्योपदेश से और ‘तत्’ शब्दार्थ के सूचक श्रुति-स्मृति वाक्यों के व्याख्यान से परमात्मा के लक्षण को समझनेवाले और संसारसागर से पार होने के इच्छुक शिष्य को गुरु पुनः प्रश्न करे “हे सोम्य ! तू कौन है ?” यह प्रश्न करने का कारण यह है कि अज्ञान, संशय, विपर्ययरहित बुद्धि, गुरु के द्वारा उपदिष्ट हुए अर्थ में निश्चल हो सके । शिष्य के ज्ञान की परीक्षा करने के लिए श्रुति ने भी कहा है—“यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्”१० ॥ ९ ॥ १. (बृ. उ. ३।९।२८) २. (तै. उ. १।१) ३. (तै. उ. २।१) ४. (तै. उ. २।१) ५. (तै. उ. २।७) ६. (तै. उ. २।५) ७. (तै. उ. २।७) ८. (तै. उ. २।८, ३।१०) ९. (भ. गी. २।२०) १०. (के. उ. १।२) ३६

२८२ उपदेशसाहस्री स यदि ब्रूयात्—ब्राह्मणपुत्रोऽदोनन्वयो ब्रह्मचार्यासम्, गृहस्थो वा, इदानीमस्मि परमहंस- परिव्राट् संसारसागराज्जन्ममृत्युमहाग्राहादुत्तितीर्षुरिति ॥१०॥ हृदयस्पर्शिनी सयदीति—इस प्रकार गुरु के पूछने पर यदि वह शिष्य, प्रतिपत्त्यादि दोष के प्रतिबन्धवशात् यह कहे कि मैं ब्राह्मणपुत्र हूँ, या अमुकदीक्षित कुल का हूँ, (असौ अन्वयः वंशः यस्य सः अहम् अदोनन्वयः), ब्रह्मचारी या गृहस्थ हूँ, तब आचार्य उससे कहे कि 'हूँ' न कह कर 'था' कहो। और अब मैं जन्म-मृत्युरूप नक्र, तिमिङ्गिलादि महाग्राहों से परिपूर्ण इस संसार सागर को पार करने की इच्छा से परमहंस परिव्राजक हो गया हूँ ॥ १० ॥ आचार्यो ब्रूयात्—इहैव तव सोम्य मृतस्य शरीरं वयोभिरद्यते, मृद्भावं वाऽऽपद्यते । तत्र कथं संसारसागरादुत्तर्तुमिच्छसीति* । नहि नद्या अवरे कूले भस्मीभूतो नद्याः पारं तरिष्यतीति ॥११॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—अहो, अद्यापि इसका ज्ञान देहाभिमान से प्रतिबद्ध है, अतः उसे दूर कराना चाहिये, यह विचार कर उससे आचार्य कहे—हे सोम्य ! मर जाने पर तेरे शरीर को गृध्रादि पक्षिगण यहीं भक्षण कर जायेंगे अथवा वह मृत्तिकारूप हो जायेगा। ऐसी अवस्था में तू संसार को पार करना कैसे चाहता है? क्योंकि नदी के इसी तीर पर भस्मीभूत हो जाने पर तू उसके पार नहीं जा सकता ॥ ११॥ स यदि ब्रूयात्—अन्योऽहं शरीरात् । शरीरं तु जायते, म्रियते, वयोभिरद्यते, मृद्भावमापद्यते, शस्त्राग्न्यादिभिश्च विनाश्यते, व्याधिभिश्च† युज्यते । तस्मिन्नहं स्वकृतधर्माधर्मवशात् पक्षी नीडमिव प्रविष्टः । पुनः पुनः शरीरविनाशे धर्माधर्मवशाच्छरीरान्तरं यास्यामि, पूर्वनिोडविनाशे पक्षीव नीडान्तरम् । एवमेवाह्मनादौ संसारे देवतिर्यङ्मनुष्यनिरयस्थानेषु स्वकर्मवशादुपात्तमुपात्तं शरीरं त्यजन्, नवं नवं चान्यदुपाददानः, जन्ममरणप्रबन्धचक्रे घटीयन्त्रवत् स्वकर्मणा भ्राम्यमाणः, क्रमेणेदं शरीरमासाद्य, संसार- चक्रभ्रमणादस्मान्निर्विण्णः, भगवन्तमुपसन्नोऽस्मि संसारचक्रभ्रमणप्रशमाय । तस्मान्नित्य एवाहं शरीरादन्यः—शरीराण्यागच्छन्त्यपगच्छन्ति च वासांसीव पुरुषस्येति ॥१२॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—इस प्रकार स्थूल देहाभिमान का त्याग कराने पर अपने आत्मा को उस स्थूल देह से पृथक् समझनेवाला वह शिष्य यदि कहे कि मैं तो शरीर से भिन्न हूँ, तो 'आत्मा, शरीर से भिन्न है, यह तुमने कैसे जाना ?'— ऐसा पूछने पर वह कहता है—शरीर तो उत्पन्न होता है, मरता है, पक्षियों से खाया जाता है, शस्त्र और अग्नि आदि से नाश किया जाता है तथा रोगादि से युक्त होता है। उसमें घोंसले में घुसे हुए पक्षी के समान, मैं अपने किये हुए धर्म और अधर्म के कारण प्रवेश किये हुए हूँ, तथा जिस प्रकार पहले घोंसले का नाश होने पर पक्षी दूसरे घोंसले में चला जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक शरीर का नाश होने पर मैं अपने पुण्य-पाप के अधीन पुनः-पुनः अन्य शरीर धारण कर लूँगा । उसी प्रकार इस अनादि संसार में अपने कर्मवश देवता, मनुष्य, तिर्यक् एवं नारकीय योनियों में ग्रहण किये हुए शरीरों को छोड़ता तथा अन्य नवीन-नवीन शरीरों को ग्रहण करता मैं अपने कर्म के द्वारा घटीयन्त्र के समान जन्म-मृत्युरूप चक्र में भ्रमित होता हुआ क्रमशः इस शरीर में आकर इस संसारचक्र में भ्रमण करने से खिन्न होकर अब इस संसारचक्र में भ्रमण की शान्ति के लिये आपके समीप उपस्थित हुआ हूँ, अतः मैं इस शरीर से भिन्न अर्थात् नित्य ही हूँ। क्योंकि पुरुष के वस्त्रों के समान शरीर तो आते हैं और चले जाते हैं ॥ १२ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—साधुवादीः, सम्यक् पश्यसि, कथं मृषाऽवादीः—ब्राह्मणपुत्रोऽदोनन्वयो ब्रह्मचार्यासम्, गृहस्थो वा, इदानीमस्मि परमहंसपरिव्राडिति ॥१३॥

  • उद्धर्तुं०—पाठान्तरम् । † व्याध्यादिभिश्च, व्याध्यादिभिश्च०—पाठौ ।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८३ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—यह सुनकर आचार्य शिष्य से कहे कि तुमने बहुत ठीक कहा, तुम्हारी दृष्टि ठीक है, तो तुमने असत्य क्यों कहा था कि मैं ब्राह्मण पुत्र था, अमुक गोत्र में उत्पन्न ब्रह्मचारी अथवा गृहस्थ था और अब परमहंस परिव्राजक हो गया हूँ ॥ १३ ॥ स यदि ब्रूयात् — भगवन् कथमहं मृषाऽवादिषमिति ॥१४॥ हृदयस्पर्शिनी यदि शिष्य गुरु से यह कहे कि भगवन् ! स यदीति—मैने असत्य क्या कहा था ? तो आचार्य उससे इस प्रकार कहे... ॥ १४ ॥ तं प्रति ब्रूयादाचार्यः—यतस्त्वं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारं शरीरं जात्यन्वयसंस्कारवर्जितस्यात्मनः प्रत्यभ्यज्ञासीर्ब्राह्मणपुत्रोऽदोऽन्वय* इत्यादिना वाक्येनेति ॥१५॥ हृदयस्पर्शिनी तं प्रतीति—क्योंकि तुमने 'मैं अमुक गोत्र में उत्पन्न हुआ ब्राह्मण पुत्र था' इत्यादि वाक्य से भिन्न अनात्मभूत जाति-कुल-संस्कार वाले शरीर की जाति और कुल से रहित आत्मा के स्थान में प्रत्यभिज्ञा की थी, इसलिये तुम्हारा कथन असत्य था ॥ १५ ॥ स यदि पृच्छेत्— कथं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारं शरीरं, कथं वा अहं जात्यन्वयसंस्कारवर्जितः ? इति ॥१६॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—इस पर यदि वह शिष्य पूछे कि शरीर अनात्मभूत जाति, कुल और संस्कार से किस प्रकार युक्त है और मैं किस प्रकार जाति, कुल और संस्कार से रहित हूँ ॥ १६ ॥ आचार्यो ब्रूयात् — शृणु, सोम्य, यथेदं† शरीरं त्वत्तो भिन्नं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारम्, त्वं च जात्यन्वयसंस्कारवर्जितः । इत्युक्त्वा तं स्मारयेत्—स्मर्तुमर्हसि, सोम्य परमात्मानं सर्वात्मानं यथोक्त- लक्षणं श्रावितोऽसि “सदेव सोम्येढं” इत्यादिभिः श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च, लक्षणं च तस्य श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च ॥१७॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—उसपर आचार्य को कहना चाहिये कि 'हे सोम्य ! जिस प्रकार यह शरीर (देह) तुझसे भिन्न अनात्मभूत जाति, कुल और संस्कार से युक्त है, तथा तू जाति, कुल और संस्कार से शून्य है, उसे सुन !' यह कह कर उसे स्मरण दिलावे कि हे सोम्य ! तुझे जो “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्¹”, आदि श्रुति-स्मृति वाक्यों से परमात्मा का श्रवण कराया था, सो तुझे उन लक्षणों से युक्त सबके आत्मस्वरूप परमात्मा को तथा श्रुति और स्मृतियों के अनुसार उसके लक्षण को स्मरण रखना चाहिये। इसी प्रकार “य आत्माऽपहतपाप्मा²” इत्यादि श्रुतिवाक्य तथा “न जायते³” इत्यादि स्मृतिवाक्यों के द्वारा उक्त ब्रह्म के (आत्मा के) लक्षण को याद रखना चाहिये ॥ १७ ॥ १. (छां. उ. ६।२।८) * प्रत्यभिज्ञासी ०—पाठान्तरम् । २. (छां. उ. ८।७।१) † तदेव यथेदं—पाठान्तरम् । ३. (भ. गी. २।२०)

२८४ उपदेशसाहस्री लब्धपरमात्मलक्षणस्मृतये ब्रूयात्—योऽसावाकाशनामा नामरूपाभ्यामर्थान्तरभूतोऽशरीरः, अस्थूलादिलक्षणः, अपहतपाप्मत्वादिलक्षणश्च, सर्वैः संसारधर्मैरनागन्धितः, यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म, य आत्मा सर्वान्तरः, अदृष्टो द्रष्टा, अश्रुतः श्रोता, अमतो मन्ता, अविज्ञातो विज्ञाता, नित्यविज्ञानस्वरूपः, अनन्तरः, अबाह्यः, विज्ञानघन एव, परिपूर्ण, आकाशवत्, अनन्तशक्तिः, आत्मा सर्वस्य, अशनायादि- वर्जितः, आविर्भावतिरोभाववर्जितश्च स्वात्मविलक्षणयोर्नामरूपयोर्जगद्बीजभूतयोः स्वात्मस्थयोस्तत्त्वा- न्यत्वाभ्यामनिर्वचनीययोः स्वसंवेद्ययोः सद्भावमात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वाद्व्याकर्ताऽव्याकृतयोः ॥१८॥ हृदयस्पर्शिनी लब्धेति—इसप्रकार श्रुति-स्मृतिप्रतिपादित आत्मस्वरूप का स्मरण दिलाकर शरीर की भिन्न जाति, अन्वय (कुल), संस्कार का ज्ञापन करने के लिये उसकी उत्पत्ति के प्रकार को बतावे । जिसे परमात्मा के लक्षणों का स्मरण हो आया है, उस शिष्य से यह कहे—यह जो आकाशसंज्ञक सब का आत्मा है१, वह नाम और रूप से भिन्न पदार्थ है२, तथा वह शरीररहित, अस्थूलादि लक्षणोंवाला और अपहतपाप्मादि लक्षणों वाला एवं समस्त सांसारिक धर्मों से असंश्लिष्ट है । जैसा कि श्रुति बता रही है—"जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म ही है", "जो सर्वान्तर आत्मा है," तथा "जो स्वयं न दीखने वाला किन्तु सबका साक्षी, स्वयं सुनाई न देनेवाला किन्तु सब कुछ सुनने वाला स्वयं मन का अविषय किन्तु सब कुछ मनन करनेवाला, स्वयं अविज्ञात किन्तु सबका ज्ञाता है, तथा जो नित्य विज्ञानस्वरूप है" वह अन्तरशून्य, बाह्यशून्य, विज्ञानघन आकाश के समान परिपूर्ण३, अनन्तशक्ति४, क्षुधादि से रहित, आविर्भाव-तिरोभाव- शून्य, और अचिन्त्य होने के कारण अपने में स्थित, अपने से विलक्षण, जगत् के बीजभूत, सद्-असत् से अनिर्वचनीय, स्वसंवेद्य, अव्याकृत नाम और रूपों को अपने सद्भावमात्र से अभिव्यक्त करनेवाला है। क्योंकि नामरूप में भी सत्ता तो आत्मा की ही है ॥ १८ ॥ ते नामरूपे अव्याकृते सती व्याक्रियमाणे तस्मादेतस्मादात्मन आकाशनामाकृती संवृत्ते । तच्चाकाशाख्यं भूतं, अनेन प्रकारेण, परमात्मनः संभूतं, प्रसन्नादिव सलिलान्मलमिव फेनम् । न सलिलं न च सलिलादत्यन्तं भिन्नं फेनं—सलिलव्यतिरेकेणादर्शनात्; सलिलं तु स्वच्छं, अन्यच्च* फेनान्मलरूपात् । एवं परमात्मा नामरूपाभ्यामन्यः फेनस्थानीयाभ्यां, शुद्धः प्रसन्नस्तद्विलक्षणः । ते नामरूपे अव्याकृते सती व्याक्रियमाणे फेनस्थानीये आकाशनामाकृती† संवृत्ते ॥१९॥ हृदयस्पर्शिनी ते नामरूपे इति—वे नाम और रूप अव्याकृत अवस्था में रहते हुए जब व्याकृत (व्यक्त) किये जाने लगे तब अपहतपाप्मत्वादिलक्षण अचिन्त्यशक्तिमान् सर्वज्ञ इस आत्मा से 'आकाश' नाम (वाचक शब्द) और आकाश की वाच्याकार आकृतिवाले हो गये । अर्थात् इस रीति से वे नाम और रूपव्यवहार के योग्य हो गये । तात्पर्य यह है कि १. “आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा ।"—(छां. उ. ८।१४।१) २. आकाशनाम कहने से किसी को भूताकाश की शंका न हो जाय इसलिये "आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्"—(ब्र. सू. १।३।४२) इस न्याय से उसे भूताकाश से भिन्न बताया गया है । भूताकाश नामरूपान्तःपाति होने से उनका आधारभूत आत्मा, आधेयभूत आकाश से अन्य है । असंगत्वादि के कारण आकाश से इसका साम्य होने से उसे (परमात्मा को) भी आकाश शब्द से कहा गया है, उसे गौणी वृत्ति से समझना चाहिये । ३. 'पूर्ण' कर्मणि निष्ठा प्रत्यय नहीं है, अपितु कर्तरि है । ४. "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ।"—(ऋ. सं. ६।४७।१८, श. प. ब्रा. १४।५।५।१९, तथा बृ. उ. २।५।१९, जै. उ. ब्रा. १।४४।१) * मन्यत् फेना०—पाठान्तरम् । † नामरूपाकृती—पाठान्तरम् ।

सद्रूप ब्रह्म ही मायावशात् वाच्य-वाचक के आकार में अभिव्यक्त आकाशादि शब्दार्थरूप हो गया। किन्तु चिदात्मा की अर्थात् चिद्रूप की अचित् आकाश के रूप में निष्पत्ति कैसे हुई ? इस शंका का समाधान 'स्वच्छ जल से उसके मलरूप फेन के समान' इस दृष्टान्त से हो जाता है। अतः यह ठीक ही कहा गया है कि आकाश संज्ञकभूत परमात्मा से उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार फेन, न तो जल ही है और न जल से अत्यन्त भिन्न ही है, क्योंकि उसकी जल से पृथक् उपलब्धि नहीं होती। फेन का सलिल से भेद न रहने पर सलिल का भी उससे भेद नहीं है। और मलरूप फेन से स्वच्छ जल भिन्न भी है। अतः न तो जल ही फेन है और न वह उससे भिन्न ही है, अपितु अनिर्वचनीय है। यह अनिर्वचनीयता श्रुतिप्रमाण से सिद्ध है १। उसी प्रकार फेनस्थानीय 'नाम' और 'रूप' से भिन्न परमात्मा शुद्ध और प्रसन्न है, उससे विलक्षण वे फेनस्थानीय 'नाम' और 'रूप' अव्याकृत अवस्था में रहते हुए जब व्यक्त (व्याकृत) किये जाने लगे तब उनका नाम 'आकाश' और आकाश की ही आकृति कर दी गई ॥ १९ ॥ ततोऽपि स्थूलभावमापद्यमाने नामरूपे व्याक्रियमाणे वायुभावमापद्येते, ततोऽप्यग्निभावम्, अग्नेरब्भावं, ततः पृथिवीभावम्— इत्येवंक़्रमेण *पूर्वपूर्वभावस्योत्तरोत्तरानुप्रवेशेन पञ्च महाभूतानि पृथिव्यन्तान्युत्पद्यन्ते । ततः पञ्चमहाभूतगुणविशिष्टा पृथिवी । पृथिव्याश्च पञ्चात्मिका† व्रीहियवाद्या ओषधयो जायन्ते । ताभ्यो भक्षिताभ्यो लोहितं, शुक्लं च स्त्रीपुंशरीरसम्बन्धि जायते । तदुभयमृतु- कालेऽविद्याप्रयुक्तकामखजनिर्मथनोद्भूतं मन्त्रसंस्कृतं गर्भाशये निषिच्यते । तत् स्वयोनिरसानुप्रवेशेन विवर्धमानं गर्भीभूतं नवमे, दशमे वा मासि जायते ॥२०॥ हृदयस्पर्शिनी तत इति—आकाश के रूप में स्थित वे नाम और रूप और भी अधिक स्थूल भाव में व्यक्त (व्याकृत) किये गये तब वे वायुभाव को प्राप्त हुए। यह स्थूलभाव क्या है ? स्पर्शगुण की उसमें वृद्धि हो गयी। जो नाम-रूप आकाशभाव को प्राप्त हुए थे, वे ही और अधिक व्यक्त होने पर वायुभाव को प्राप्त हो जाते हैं—इस कथन से एक विकार अन्य विकार का उपादान कारण नहीं है, इसे सूचित किया गया है। वायुभाव को प्राप्त हुए नाम-रूप को जब और अधिक व्यक्त किया तब वे अग्निभाव को प्राप्त हुए, उन्हीं को और अधिक व्यक्त करने पर वे जलभाव को प्राप्त हुए, और भी अधिक व्यक्त किये जाने पर वे पृथिवी भाव को प्राप्त हुए। इस प्रकार उनमें पूर्व-पूर्व की अपेक्षा एक-एक गुण की वृद्धिरूप स्थूलता आ गई। अर्थात् क्रमशः पूर्व-पूर्व के अनुप्रवेश द्वारा पृथिवी पर्यन्त पाँच महाभूत उत्पन्न हुए। तदनन्तर पाँचभूतों के गुणों से युक्त पृथिवी उत्पन्न हुई। पृथिवी से पञ्चीकृत भूतों द्वारा उत्पन्न व्रीहि-यवादि औषधियाँ उत्पन्न होती हैं। तथा भक्षण की हुई उन औषधियों से स्त्री और पुरुष के शरीरों से सम्बन्धित रज और वीर्य उत्पन्न होते हैं। ऋतुकाल में अविद्या प्रयुक्त कामरूप मन्थनदण्ड के मन्थन से आविर्भूत हुए वे दोनों रज और वीर्य मन्त्रों२ द्वारा संस्कारयुक्त होकर गर्भाशय में सींचे जाते हैं और पश्चात् अपनी-अपनी योनि के रसानुप्रवेश से बढ़ते हुए वे गर्भरूप में परिणत हुए रज और वीर्य नवम या दशम मास में जन्म लेते हैं ॥ २० ॥ तज्जातं लब्धनामाकृतिकं जातकमादिभिर्मन्त्रसंस्कृतं पुनःउपनयनसंस्कारयोगेन ब्रह्मचारिसंज्ञं भवति । तदेव शरीरं पत्नीसंयोगसंस्कारयोगेन गृहस्थसंज्ञं भवति । तदेव वनस्थसंस्कारेण तापससंज्ञं भवति । तदेव क्रियाविनिवृत्तिनिमित्तसंस्कारेण परिव्राट्संज्ञं भवति । इत्येवं त्वत्तो भिन्नं भिन्नजात्यन्वय- संस्कारं शरीरम् ॥२१॥ १. "वाचारंभणं विकारो नामधेयम् ।” (छां. उ. ६।१।४) २. “गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति ।” (तै. सं. १।१३)

  • भवस्य ०—पाठान्तरम् । † पञ्चात्मवयः, पञ्चात्मकाः —पाठौ ।

२८६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी तज्जातमिति—इस प्रकार उपोद्घात के रूप में शरीरोत्पत्ति को बताकर उसके आगे बताते हैं—वह उत्पन्न हुआ शरीर जातकर्मादि संस्कारों से नाम और रूप प्राप्त कर पुनः मंत्रों से संस्कृत होने पर उपनयन संस्कार के द्वारा 'ब्रह्मचारी' संज्ञा को प्राप्त करता है। पश्चात् वही शरीर पत्नी-ग्रहणरूप संस्कार के द्वार 'गृहस्थ' संज्ञा को प्राप्त करता है। पुनः वही वानप्रस्थ संस्कार के द्वारा 'वानप्रस्थ' संज्ञा को प्राप्त करता है। पश्चात् वही सर्वकर्मपरित्याग- निमित्तरूप संस्कार के द्वारा 'संन्यासी' संज्ञा को प्राप्त करता है। इस प्रकार विभिन्न जाति, कुल और संस्कारवाला यह शरीर तुझसे पृथक् है ॥ २१ ॥ मनश्चेन्द्रियाणि च *नामरूपात्मकान्येव, “अन्नमयं हि सोम्य मनः” इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२२॥ हृदयस्पर्शिनी मन इति—इसके अतिरिक्त “हे सोम्य ! मन अन्नमय ही है”१ इत्यादि श्रुतियों के अनुसार मन और इन्द्रियाँ भी नाम-रूपात्मिका ही हैं ॥ २२ ॥ कथं चाहं भिन्नजात्यन्वयसंस्कारवर्जित इत्येतच्छृणु—योऽसौ नामरूपयोर्व्याकर्ता नामरूप†- विलक्षणः, स एव नामरूपे व्याकुर्वन्-सृष्ट्वेदं शरीरं स्वयं ‡संसारधर्मवर्जितो नामरूप इह प्रविष्टोऽन्यैरदृष्टः स्वयं पश्यन्, तथाऽश्रुतः शृण्वन्, अमतो मन्वानः, अविज्ञातो विजानन्, “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते” इत्यस्मिन्नर्थे श्रुतयः सहस्रशः—“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”, “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्”, “स एष इह प्रविष्टः”, “एष त आत्मा”, “स एतमेव सीमानं विदार्येतया द्वारा प्रापद्यत”, “एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा”, “सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः” “अशरीरं शरीरेषु” इत्याद्याः ॥२३॥ हृदयस्पर्शिनी कथमिति—तुमने जो पूछा था कि मैं अनात्मभूत जाति, कुल एवं संस्कारों से रहित किस प्रकार हूँ ? उसे भी इस प्रकार सुनो—यह जो नाम-रूप के धर्मों से विलक्षण नाम-रूप को व्याकृत (व्यक्त) करने वाला है, वही नाम-रूप को व्यक्त करते हुए इस शरीर को रचकर स्वयं संस्कार और धर्मों से रहित हुआ ही दूसरों से अदृष्ट किन्तु स्वयं देखता हुआ, दूसरों से अश्रुत किन्तु स्वयं सुनता हुआ, तथा मन का अविषय होकर भी मनन करता हुआ और अविज्ञात होकर भी सबको जानता हुआ इन नाम और रूपों में प्रविष्ट हो गया है, जैसे “बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण रूपों की रचना कर उनके देव-मनुष्य आदि नाम रखकर उनके द्वारा बोलता (व्यवहार करता) हुआ स्थित रहता है”२ इस श्रुति के दृष्टान्त से उपर्युक्त कथन स्पष्ट हो जाता है। इसी अर्थ में “उसे रचकर उसी में अनुप्रविष्ट हो गया”३, “आत्मा सबके भीतर प्रविष्ट होकर सब जीवों का शासन करने वाला है”४, “वह आत्मा इस शरीर में प्रविष्ट है”५, “यह तेरा आत्मा है”६, “वह इस मूर्द्धसीमा को विदीर्णकर इसके द्वारा प्रविष्ट हो गया”७, “वह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है”८, “उस (सत्स्वरूप) देवता ने ईक्षण किया कि अहा ! मैं इन तीन (अप्, तेज और अन्न) देवताओं को प्रकाशित करूँ”९ इत्यादि सहस्रों श्रुतियाँ उपलब्ध हैं। जैसे पक्षी अपने नीड (घोसले) में प्रविष्ट होता है तो वह सबको उपलब्ध भी होता है, वैसे ही परमात्मा यदि यहाँ सर्वत्र प्रविष्ट है तो वह सबको उपलब्ध क्यों नहीं होता ? इस शंका का समाधान “अन्यैरदृष्टः” से हो जाता है। “अदृष्टो द्रष्टा”—(बृ. आ. ३।७।२३) श्रुति को मूल में अर्थतः दिया गया है ॥ २३ ॥ १. “अन्नमयं हि सोम्य मनः” (छां. उ. ६।५।४) ६. (बृ. उ. ३।७।३) २. (तै. आ. ३।१२।७) ७. (ऐ. उ. ३।१२) ३. (तै. उ. २।६) ८. (कठ उ. १।३।१२) ४. (तै. आ. ३।११) ९. (छां. उ. ६।३।२) ५. (बृ. उ. १।४।७) * रूपकाण्येव—पाठान्तरम् । † रूपधर्म वि० —पाठान्तरम् । ‡ संस्कार धर्म—पाठान्तरम् ।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८७ स्मृतयोऽपि—"आत्मैव देवताः सर्वाः"१, "नवद्वारे पुरे देही"२, "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि"३, "समं सर्वेषु भूतेषु"४, "उपद्रष्टानुमन्ता च"५, "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः"६, "अशरीरं शरीरेषु" इत्याद्याः । तस्माज्जात्यन्वयसंस्कारवर्जितस्त्वमिति सिद्धम् ॥२४॥ हृदयस्पर्शिनी स्मृतयोऽपीति—परमात्मा ही क्षेत्रज्ञ है—इस श्रुतियुक्त अर्थ को बताने के लिये स्मृतिवचनों को भी उद्धृत कर रहे हैं । "सब देवता आत्मा ही हैं"१, "नौ द्वार के पुर में देही रहता है"२, "क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान३", "सब भूतों में समानरूप से स्थित"४, "उपद्रष्टा और अनुमन्ता"५, "उत्तम पुरुष तो अन्य ही है६", "जो शरीरों में अशरीरी है७" इत्यादि स्मृतियाँ भी हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि तू जाति, कुल और संस्कारों से रहित है। 'इत्यादि' के 'आदि' शब्द से "स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्"८ को भी संगृहीत किया समझना चाहिये ॥ २४ ॥ स यदि ब्रूयात्—अन्य एवाहमज्ञः सुखी दुःखी बद्धः संसारी, अन्योऽसौ मद्विलक्षणोऽसंसारी देवः, तमहं बल्युपहारनमस्कारादिभिर्वर्णाश्रमकर्मभिश्चाराध्य संसारसागरादुत्तितीर्षुरस्मि—कथमहं स एव ? इति ॥२५॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—'परमात्मा और तू एक ही हैं—इस अभेदोपदेश से जीव को जाति, कुल, संस्कारराहित्य का निश्चय कराया गया किन्तु स्वानुभवविरोध की आशंका की जा रही है। शिष्य यदि यह आशंका करे कि मैं अज्ञानी, सुखी, दुःखी, बद्ध संसारी जीव तो अन्य हूँ, किन्तु यह असंसारी देव मुझसे भिन्न ही है। अतः मैं पूजा (बलि) उपहार और प्रणामादि के द्वारा तथा अपने वर्णाश्रमविहित कर्मानुष्ठान से उसकी आराधना करके इस संसारसागर से पार होना चाहता हूँ। मैं साक्षात् वही कैसे हो सकता हूँ? क्योंकि मैं तो अज्ञ हूँ, यह अज्ञता मेरी अनुभवसिद्ध है। और उससे विलक्षण ईश्वरतत्त्व है—यह श्रुति-स्मृतियों के द्वारा बताया गया है। अतः आत्मा और परमात्मा को अभिन्न कैसे समझा जाय ? उत्कृष्ट ईश्वर को निकृष्ट संसारी के रूप में देखने पर प्रत्यवाय भी होगा। अतः उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिये मुझे उसकी आराधना ही करना उचित होगा। उसके अनुग्रह से ही मैं संसार से मुक्त हो सकूँगा ॥ २५ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—नैवं सोम्य, प्रतिपत्तुमर्हसि—प्रतिषिद्धत्वाद्वैतप्रतिपत्तेः। कथं प्रतिषिद्धा भेदप्रतिपत्तिरित्यत आह—"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद", "ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद", "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" इत्येवमाद्याः ॥२६॥ हृदयस्पर्शिनी आचार्य इति—शिष्य की भ्रमपूर्ण आशंका को सुनकर आचार्य को कहना चाहिये कि 'हे सोम्य ! तुझे ऐसा नहीं समझना चाहिये। क्योंकि भेदज्ञान की निन्दा की गई है।' यदि कोई ऐसा आक्षेप करे कि भेद तो प्रत्यक्ष- १. ( मनुस्मृति १२।११९ ) २. ( भग. गी. ५।१३ ) ३. ( भग. गी. १३।२ ) ४. ( भग. गी. १३।२७ ) ५. ( भग. गी. १३।२२ ) ६. ( भग. गी. १५।१७ ) ७. ( सूत सं. २।११।६७ ) ८. ( ईश. उ. ८ )

२८८ उपदेशसाहस्री सिद्ध है, अतः प्रत्यक्षविरुद्ध प्रमाणान्तर से उस (भेद) का प्रतिषेध कैसे होगा ? भेदज्ञान की निन्दा इस प्रकार की गई है कि “यह परमात्मा अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, उसने कुछ नहीं जाना है। अर्थात् वह कुछ नहीं जानता है¹।” “जो ब्रह्म को आत्मा से भिन्न देखता है, ब्रह्म उसे त्याग देता है²।” “जो यहाँ (इस लोक में) नानावत् देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है³।” इत्यादि श्रुतियाँ इसमें प्रमाण हैं। तात्पर्य यह है कि असंसारी ईश्वर का प्रत्यक्ष न होने से, उसके भेद का प्रत्यक्ष भी आत्मा में हो पाना संभव नहीं है। सुखी-दुःखी आदि का आत्मा में अनुभव करना केवल भ्रम है। भ्रम होने से भेद का अध्यवसाय कर नहीं सकते। अतः अनन्यथासिद्धार्थ श्रुति के द्वारा प्रतिषिद्ध हुए भेद को प्रमाण समझना उचित नहीं है ॥ २६ ॥ एता एव श्रुतयो भेदप्रतिपत्तेः संसारगमनं दर्शयन्ति ॥२७॥ हृदयस्पर्शिनी एता इति—ये भेदप्रतिषेधक श्रुतियाँ ही भेदज्ञान से संसार की प्राप्ति को भी प्रदर्शित करती हैं। अर्थात् ऊपर उल्लिखित श्रुतियाँ केवल भेदनिषेध ही नहीं कर रही हैं, किन्तु भेददर्शी व्यक्ति के लिये अनर्थप्राप्तिरूप प्रत्यवाय की सूचना भी देती हैं। यह परमेश्वर मुझसे विलक्षण कोई अन्य ही है, और मैं भी उससे विलक्षण संसारी जीव हूँ, ऐसा समझकर जो व्यक्ति अन्य देवता की उपासना करता है, अर्थात् श्रुति का तात्पर्य भेद में होना ही समझना है, उसने सचमुच तत्त्व को नहीं जाना, यही समझना चाहिये। क्योंकि भेदज्ञान, अविद्या से हुआ करता है। भेददर्शी के लिये श्रुति ने बताया है कि “उसे देवपशुत्व की प्राप्ति होती है⁴।” पराधीनता से बढ़कर कोई दूसरा दैन्य अथवा कष्ट नहीं है। ब्रह्म, भेददर्शी के विषय में सोचता है कि यह भेददर्शी मुझ आत्मरूप को अनात्मरूप से देखता है, अतः वह उस भेददर्शी का हित नहीं करता, अर्थात् वह उससे मानो द्वेष ही करने लगता है। अर्थात् उसे तत्त्व विमुख कर देता है। 'नानेव' यहाँ पर 'इव' शब्द नानात्वदर्शन में आभासत्व सूचित करने के लिये है। वह मृत्यु से मृत्यु को अर्थात् एक संसार से दूसरे संसार को और दूसरे से तीसरे संसार को इस प्रकार अनन्तकाल तक अनर्थपरम्परा को ही प्राप्त करता रहता है ॥ २७ ॥ अभेदप्रतिपत्तेश्च मोक्षं दर्शयन्ति सहस्रशः । “स आत्मा तत्त्वमसि” इति परमात्मभावं विधाय “आचार्यवान् पुरुषो वेद” इत्युक्त्वा “तस्य तावदेव चिरम्” इति मोक्षं दर्शयन्ति अभेद- विज्ञानादेव । सत्याभिसन्धस्यातस्करस्येव दाहाद्यभावदृष्टान्तेन संसाराभावं दर्शयन्ति । भेददर्शनादसत्याभि- सन्धस्य संसारगमनं दर्शयन्ति तस्करस्येव दाहादिदृष्टान्तेन ॥२८॥ हृदयस्पर्शिनी अभेदप्रतिपत्तेश्चेति—इस प्रकार भेददृष्टि की निन्दा बताकर और अभेददृष्टि की फलवत्ता होने से उनकी प्रशंसा करते हुए वही उपादेय है। अभेदज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति को हजारों श्रुतियों ने बताया है। अन्वय- व्यतिरेक व्याप्ति दोनों में है, इसी बात को श्रुत्यर्थ के द्वारा बताते हुए उक्त अर्थ को पुष्ट कर रहे हैं। “पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्ति⁵” इस खण्ड में इस अर्थ को बताया गया है। “राजपुरुष किसी पुरुष को हाथ पकड़कर लाते हैं और कहते हैं कि इसने धन चुराया है, इसके लिये परशु तपाओ। यदि उसने चोरी की है तो वह अपने को झूठा सिद्ध १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( बृ. उ. २।४।६, ४।५।७ ) ३. ( बृ. उ. ४।४।१९, कठ उ. ४।१० ) ४. “यथा पशुरेवं स देवानाम्” ।—( बृ. उ. १।४।१०, ४।४।१९ ) ५. “पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति । स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥ अथ यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ ( छां. उ. ६।१६।२ )

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २८९ करता है और तप्त परशु को छूने से जल जाता है तथा मार दिया जाता है। किन्तु यदि उसने चोरी नहीं की है तो वह अपने को सत्यवादी सिद्ध करता है। वह उस तप्त परशु से नहीं जलता, और उसे छोड़ दिया जाता है। उसी प्रकार भेददर्शी असत्यनिष्ठ होने के कारण संसारबन्धन में बँधता है और अभेददर्शी सत्यनिष्ठ होने के कारण उससे छूट जाता है।” अभेदज्ञान के द्वारा मोक्षप्राप्ति को बताने वाली श्रुतियाँ इस प्रकार हैं— “वह आत्मा है और वही तू है¹।” इस प्रकार जीव के परमात्मभाव का विधान कर “आचार्यवान् पुरुष को ही ज्ञान होता है²।” ऐसा कहकर “उसके लिये तभी तक विलम्ब है³।” इस प्रकार अभेदज्ञान से ही श्रुतियाँ मोक्ष का प्रदर्शन कर रही हैं। तथा अचौर पुरुष के दाहादि के अभाव के समान दृष्टान्त द्वारा सत्यनिष्ठ पुरुष को संसारप्राप्ति का अभाव और चौर के दाहादि दृष्टान्त से भेददर्शी असत्यनिष्ठ पुरुष को संसार की प्राप्ति दिखलायी है ॥ २८ ॥ “त इह व्याघ्रो वा” इत्यादिना च अभेददर्शनात् “स स्वराड्भवति” इत्युक्त्वा, तद्विपरीतेन भेददर्शनेन संसारगमनं दर्शयन्ति— “अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” इति प्रतिशाखम्। तस्मान्मृषैवैवमवादी: “ब्राह्मणपुत्रोऽदोऽन्वयः संसारी परमात्मविलक्षणः” इति ॥२९॥ हृदयस्पर्शिनी अभेददर्शनादिति— सुषुप्ति में परमात्मा के साथ अभेदसम्पत्ति होने पर भी वैसा अभेदज्ञान न रहने के अपराध से ही पुनः व्याघ्रादि भाव से उठे हुए (जगे हुए) लोगों के लिये संसार का अविच्छेद बताती हुई श्रुति परमात्मा के साथ अभेद के रूप में होने वाला आत्म ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति में हेतु है--यह सूचित कर रही है। “वह यहाँ व्याघ्र अथवा⁴ (सिंह, भेड़िया, भालू, कीट, पतंग, या मच्छर) जो कुछ होता है, सुषुप्ति से जागने पर वही हो जाता है” इस श्रुति से भी अभेद ही दिखलाया गया है। तथा “वह स्वराट् (स्वतन्त्र सम्राट) हो जाता है”⁵ ऐसा कहकर उसके विपरीत “जो इससे भिन्न प्रकार से जानते हैं, उनके अधिपति दूसरे होते हैं, तथा वे क्षयशील लोकों को प्राप्त होते हैं”⁶ इत्यादि श्रुतियों द्वारा प्रत्येक शाखा में भेददर्शन के द्वारा संसार की प्राप्ति दिखलाई है। अतः तुमने यह मिथ्या ही बताया है कि ‘मैं परमात्मा से भिन्न अमुक गोत्र में उत्पन्न हुआ संसारी ब्राह्मणपुत्र हूँ’। तात्पर्य यह है कि भेददर्शन की निन्दा एवं अभेददर्शन की प्रशंसा के द्वारा जीव और ब्रह्म का अभेद निश्चित किया गया है। अतः आत्मा में ब्राह्मणत्वादि का अभिमान करना मिथ्या है, यह सिद्ध किया गया है ॥ २९ ॥ तस्मात्— प्रतिषिद्धत्वाद्द्भेददर्शनस्य, भेदविषयत्वाच्च कर्मोपादानस्य, कर्मसाधनत्वाच्च यज्ञोपवीतादेः कर्मसाधनोपादानस्य परमात्माभेदप्रतिपत्त्या प्रतिषेधः कृतो वेदितव्यः। कर्मणां तत्साधनानां च यज्ञोपवीतादीनां परमात्मऽभेदप्रतिपत्तिविरुद्धत्वात्, संसारिणो हि कर्माणि विधीयन्ते, तत्साधनानि च यज्ञोपवीतादीनि, न परमात्मनोऽभेददर्शिनः। भेददर्शनमात्रेण च ततोऽन्यत्वम् ॥३०॥ हृदयस्पर्शिनी तस्मादिति— अतः शिष्य ने पूर्वगत २५ वे वाक्य से जो यह कहा था कि ‘मैं पूजा, प्रणामादि वर्णाश्रम- विहित कर्मानुष्ठान के द्वारा परमेश्वर की आराधना करूँगा’ यह दृष्टि भी सम्यक् दृष्टि नहीं है, वह भेददृष्टि ही है, जिसका अभेदश्रुति ने बाध कर दिया है। भेददृष्टि का प्रतिषेध किया होने से और कर्मानुष्ठान भेदविषयक होने से तथा यज्ञोपवीतादि, कर्मानुष्ठान का साधन होने से परमात्मा के साथ अभेदज्ञान हो जाने पर कर्म के साधन और १. (“स आत्मा तत्त्वमसि” ।—छां. उ. ६।८।१६ ) २. “आचार्यवान् पुरुषो वेद” ।—(छां. उ. ६।१४।२ ) ३. “तस्य तावदेव चिरम्” ।— (छां. उ. ६।१४।२ ) ४. “त इह व्याघ्रो वा” ।— (छां. उ. ६।९।२ ) ५. “स स्वराट् भवति” ।—(छां. उ. ७।२५।२ ) ६. “अथ येऽन्यथाऽतो विदुरन्ये राजा नस्ते क्षय्यलोका भवन्ति” ।— (छां. उ. ७।२५।२ ) ३७

२९० उपदेशसाहस्री

कर्मानुष्ठान का भी प्रतिषेध हुआ समझना चाहिये, क्योंकि कर्म और उनके यज्ञोपवीतादि साधन परमात्मा से अभेद- ज्ञान के विरोधी हैं। कर्म और उनके साधन यज्ञोपवीतादि का संसारी पुरुषों के लिये ही विधान किया गया है। पर- मात्मा के साथ अपना अभेद देखने वाले के लिये नहीं किया गया है। संसारी जीव का तो परमात्मा से भेद है और वह भेददृष्टि के कारण ही है, वास्तविक नहीं है। क्रिया, कारक, फल आदि भेद का आश्रय किये बिना कर्म का स्वरूप ही सिद्ध नहीं हो सकता। कर्म का स्वरूप तो भेदज्ञान पर ही निर्भर है। श्रुति ने ही यज्ञोपवीत धारण आदि में कर्म की साधनता बताई है। किन्तु साध्य कर्म के अभाव में उसके साधनों का परिग्रह करना निरर्थक ही है। 'मैं ब्रह्म हूँ', और 'मैं कर्ता हूँ' इन दो विरुद्ध प्रतिपत्तियों का समुच्चय एक पुरुष में होना संभव नहीं है। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि अधिकारी के अभाव में वेदोक्त कर्मकाण्ड निराधार है, अप्रमाण है। वह जाति, कुल आदि का अभिमान रखनेवाले संसारी जीव के लिए बताया गया है। अभेददर्शी के लिए वह नहीं है ॥ ३० ॥

यदि कर्माणि कर्तव्यानि, न विनिवर्तयिषितानि, कर्मसाधनासम्बन्धिनः कर्मनिमित्तजात्या- श्रमाद्यसम्बन्धिनश्च, परमात्मन* आत्मनैवाभेदप्रतिपत्तिं नावक्ष्यत्—“स आत्मा तत्त्वमसि” इत्येवमादि- भिर्निश्चितरूपैर्वाक्यैः । भेदप्रतिपत्तिनिन्दां च नाभ्यधास्यत् ॥ ३१॥

हृदयस्पशिनी यदीति—श्रुति ने ब्रह्मात्मैक्यप्रतिपत्ति के द्वारा कर्म और उनके साधनों का जो प्रतिषेध किया, उसी को अब व्यतिरेक से बता रहे हैं। कर्तव्य कर्मों की निवृत्ति यदि श्रुति को अभीष्ट नहीं होती तो वह कर्मसाधनों से असंबन्धित तथा कर्मनिमित्तक जाति एवं आश्रमादि से असंबंधित परमात्मा का “वह आत्मा है और वह तू है¹” ऐसे निश्चित रूप वाक्यों के द्वारा आत्मा के साथ अभेद का प्रतिपादन न करती और न “यह ब्राह्मण की नित्य महिमा है²” “वह पुण्य से असंश्लिष्ट है और पाप से भी असंश्लिष्ट है³” “यहाँ चौर, अचौर हो जाता है⁴” आदि वाक्यों द्वारा भेदज्ञान की निन्दा नहीं की होती ॥ ३१ ॥

“एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य”, “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन”, “अत्र स्तेनोऽस्तेनः”—इत्यादिना कर्मासम्बन्धित्वरूपत्वं कर्मनिमित्तवर्णाद्यसम्बन्धरूपतां च नाभ्यधास्यत्, कर्माणि च कर्मसाधनानि च यज्ञोपवीतादीनि यद्यपरितित्याजयिषितानि; तस्मात्ससाधनं कर्म परित्यक्तव्यं मुमुक्षुणा—परमात्माभेददर्शनविरोधात्—आत्मा च पर एव प्रतिपत्तव्यो यथाश्रुत्युक्तलक्षणः ॥ ३२॥

हृदयस्पर्शिनी एष इति—दूसरा कारण यह भी है कि यदि श्रुति को यज्ञादि कर्म और यज्ञोपवीतादि कर्मसाधनों का त्याग अभीष्ट न होता तो वह आत्मा की कर्मासम्बन्धिरूपता तथा कर्मनिमित्तक वर्णादिसंसर्गशून्यता का वर्णन न करती । अतः मुमुक्षु पुरुष साधनसहित कर्मों का परित्याग करे, क्योंकि उनका परमात्मा के अभेदज्ञान के साथ विरोध है। अतः श्रुति के द्वारा बताये हुए लक्षणों से युक्त आत्मा को परब्रह्म ही समझना चाहिए ॥ ३२ ॥

स यदि ब्रूयात्—भगवन्, दह्यमाने छिद्यमाने वा देहे प्रत्यक्षा वेदना; अशनायादिनिमित्तं च प्रत्यक्षं दुःखं मम । परश्चायमात्मा, “अयमात्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः” †सर्वसंसारधर्मविवर्जितः श्रूयते सर्वश्रुतिषु स्मृतिषु च । कथं तद्विलक्षणोऽनेकसंसारधर्मसंयुक्तः परमात्मा-


१. (छां. उ. ६।८।७ ) २. (बृ. उ. ४।४।२३ ) ३. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ )

  • आत्म०—पाठान्तरम् । † सर्वगन्ध-रसवर्जितः०—पाठान्तरम् ।

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९१ नमात्मत्वेन मां च संसारिणं परमात्मत्वेनाग्निमिव शीतत्वेन *प्रतिपद्येय ? संसारी च सन्, सर्वाभ्युदयनिः- श्रेयससाधनेऽधिकृतः, अभ्युदयनिःश्रेयससाधनानि कर्माणि तत्साधनानि यज्ञोपवीतादीनि कथं परित्यजेयम् ? इति ॥३३॥ हृदयस्पशिनी स इति—आगम के आधार पर निरूपित किये गये ब्रह्मात्मैक्य को अब युक्ति से भी सुदृढ़ बनाने के लिए शिष्य के मुख से पुनः आक्षेप कराया जा रहा है। शिष्य गुरु से कहता है कि हे भगवन् ! देह (शरीर) के दहन या छेदन किये जाने पर जो वेदना (पीड़ा) होती है, वह तो प्रत्यक्ष है, उसी तरह क्षुधा (भूख) से होनेवाली पीड़ा (दुःख) का भी मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होता है। तथा “यह आत्मा पापशून्य, रजोरहित, मृत्युरहित, शोकहीन, क्षुधाहीन, पिपासाहीन और सब प्रकार के गन्ध और रस से रहित है”१ इस प्रकार सभी श्रुतियों और स्मृतियों में यह आत्मा ही परमात्मा रूप से सुना जाता है। ऐसी स्थिति में इन लक्षणों से रहित तथा अनेक सांसारिक धर्मों से युक्त हुआ मैं अग्नि को शीतत्व- विशिष्ट समझने के समान परमात्मा को आत्मस्वरूप से और संसारी अपने-आपको परमात्मारूप से कैसे समझूँ ? तथा संसारी होने के कारण सर्वविध अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनों में अधिकार रखता हुआ भी उन अभ्युदय और निःश्रेयस के साधनभूत कर्म एवं उनके साधनभूत यज्ञोपवीतादि को भी कैसे त्याग दूँ ? अतः ‘जीव-परमात्मानौ वस्तुतो भिन्नौ विरुद्धधर्मसंसर्गित्वात्, शीतोष्णवत्' यह आक्षेप करनेवाले शिष्य का अनुमान है। एवंच भेद तो तात्त्विक है, तब कर्म और तत्साधनभूत यज्ञोपवीतादि परित्यागात्मक संन्यास के लिए अवसर (प्रसंग) ही कहाँ है ? अर्थात् नहीं है ॥ ३३ ॥ तं प्रति ब्रूयात्—यदवोचो दह्यमाने छिद्यमाने वा देहे प्रत्यक्षा वेदनोपलभ्यते ममेति; तदसत् । कस्मात् ? दह्यमाने छिद्यमान इव वृक्ष उपलब्धुरुपलभ्यमाने कर्मणि शरीरे दाहच्छेदवेदनाया उपलभ्यमानत्वाद्दाहादिसमानाश्नयैव वेदना । यत्र हि दाहच्छेदो वा क्रियते तत्रैव व्यपदिशति दाहादिवेदनां लोकः, न वेदनां दाहाद्युपलब्धरीति । कथं क्व ते वेदनेति पृष्टः शिरसि मे वेदना, उरस्युदर इति वा, यत्र दाहादिस्तत्रैव व्यपदिशति, न तूपलब्धरीति । यद्युपलब्धरि वेदना स्यात् वेदनानिमित्तं वा दाहच्छेदादि, वेदनाश्रयत्वेनोपदिशेद्दाहाद्याश्रयवत् ॥३४॥ हृदयस्पर्शिनी त मिति—उस शिष्य से गुरु यह कहे—तुमने जो कहा कि ‘शरीर के दग्ध और छेदन किये जाने पर मुझे वेदना की उपलब्धि का प्रत्यक्ष अनुभव होता है’ किन्तु तुम्हारा यह कथन ठीक नहीं है। क्यों ठीक नहीं है ? क्योंकि दग्ध और छेदन किये जाते हुए वृक्ष के समान उपलब्धा को उपलब्ध होनेवाले उसकी उपलब्धि के कर्मभूत शरीर में ही दाह और छेदन की वेदना, उपलब्ध होने के कारण वह वेदना उन दाहादि के समान आश्रयवाली ही है। क्योंकि जहाँ दाह या छेदन किया जाता है, वहीं पर लोग उस दाहादि की वेदना का व्यपदेश (उल्लेख) किया करते हैं। दाहादि की उपलब्धि करनेवाले में नहीं। किस प्रकार ? (सो सुनो)—जब किसी से यह पूछा जाता है कि तुम्हारे कहाँ पर वेदना है ? तो ‘मेरे शिर में वेदना है अथवा हृदय में या पेट में वेदना है', इसी प्रकार जहाँ दाहादि होता है, वहीं उसकी वेदना भी वह बताता है, उस वेदना के उपलब्ध करनेवाले को नहीं बतलाता । यदि वह वेदना अथवा उसका निमित्त दाहच्छेदनादि, उपलब्धा में होता तो दाहादि के आश्रय के समान उसकी वेदना के आश्रयरूप से उसी का व्यपदेश करता। तात्पर्य यह है कि आक्षेप करनेवाले शिष्य के द्वारा उपस्थित किए गए अनुमान प्रयोग में गुरु, हेत्वसिद्धि दिखा रहे हैं। अनुमान में ‘जीवपरमात्मानौ' के द्वारा क्या उपाधिभेदविशिष्ट वस्तु का यथाप्रतिपत्ति निर्देश कर रहे हो, अथवा चैतन्यमात्राकार का निर्देश कर रहे हो ? प्रथम पक्ष में आकाशभेद के समान औपाधिक भेद वास्तविक ही १. (छां. उ. ८।१।५ )

  • प्रतिपद्येयम् ०—पाठान्तरम् ।

होने से बाध और व्यभिचार हैं। और भेदमात्र का साधन यदि कर रहे हो तो सिद्धसाधन है, इस अभिप्राय से द्वितीय पक्ष में असिद्धि है ॥ ३४ ॥

स्वयं च नोपलभ्येत चक्षुर्गतरूपवत् । तस्माद्दाहच्छेदादिसमाना श्रयत्वेनोपलभ्यमानत्वाद्दाहादि- वत्कर्मभूतैव वेदना । भावरूपत्वाच्च साश्रया तण्डुलपाकवत् । वेदनासमाना श्रय एव तत्संस्कारः स्मृति- समानकाल एवोपलभ्यमानत्वात्, वेदनाविषयः तन्निमित्तविषयश्च द्वेषोऽपि संस्कारसमाना श्रय एव । तथा चोक्तम्—

"रूपसंस्कारतुल्याधी रागद्वेषौ भयं च यत्। गृह्यते धीश्रयं तस्माज्ज्ञाता शुद्धोऽभयः सदा" ॥३५॥

हृदयस्पर्शिनी

स्वयं मिति—अन्य युक्ति भी बताते हैं—जैसे चक्षुगतरूप चक्षु के द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता, वैसे ही आत्मगत वेदना का ग्रहण भी आत्मा के द्वारा नहीं होगा, अन्यथा कर्म-कर्तृ विरोध होगा। दाह, छेदन और वेदना ये तीनों समानाश्रय हैं, ऐसा अनुभव होने से दाहादि के तुल्य उनकी वेदना भी, वेत्ता या अनुभविता की कर्मभूत ही माननी होगी। तथा वह वेदना, कार्यरूप होने से तण्डुलपाक के समान साश्रय (आश्रययुक्त) भी है। और उसके संस्कार भी वेदना के समानाश्रय ही हैं। क्योंकि उसकी उपलब्धि वेदना के समान काल (जाग्रत्-स्वप्न) में ही होती है। सुषुप्ति में नहीं होती, क्योंकि उस समय वेदना का भी अभाव रहता है। अतः संस्कार, वेदना से साथ ही रहनेवाले हैं। उस वेदना के निमित्तभूत दाहादि के प्रति जो द्वेष है, वह भी संस्कारों के समानाश्रय ही है। ऐसा कहा भी है—"नील-पीतादि रूप और उनके संस्कार और तदनुकूल जो बुद्धि, राग, द्वेष और भय हैं, वे बुद्धि के ही आश्रित दिखाई देते हैं। अतः उनका ज्ञाता (आत्मा) तो सर्वदा शुद्ध और अभयरूप है१"। अभिप्राय यह है कि आत्मा वेदनाश्रय नहीं हो सकता। यहाँ पर शंका यह की जा सकती है कि वेदना का अर्थ तो 'दुःख' है, दुःख का जड़ देह में होना तो संभव नहीं है, क्योंकि सुख- दुःखादि धर्मों में चेतनाश्रयता रहती है, यह नियम है। यदि पुनः चेतन होता हुआ भी आत्मा, वेदनाश्रय न कहा जाय तो शरीर भी अचेतन है, वह भी वेदनाश्रय नहीं होगा। बौद्धों की तरह वेदना को निराश्रय (अनाश्रय) ही माना जाय, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वह कार्यरूप है। अतः कह सकते हैं कि 'वेदना साश्रया कार्यत्वात् तण्डुल- पाकवत्'। 'कार्यत्वात्' हेतु को अप्रयोजक भी नहीं कह सकते। क्योंकि यदि वेदना को निराश्रय कहें तो उसके नष्ट होने पर संस्कार का भी अभाव होने से कालान्तर में उसका स्मरण न हो सकेगा। अथवा 'वेदना समानाश्रय एव तत्संस्कारः' कहकर हेतुसिद्धि की आशंका का भी परिहार किया जा सकता है। अर्थात् वेदना कार्यरूप न हो तो उसका संस्कार और स्मृति दोनों का होना असंभव होगा, तब कालान्तर में 'मेरे पैर में वेदना हुई थी' इत्यादि व्यवहार नहीं हो पाएगा। अथवा वेदना के साश्रय पक्ष में यदि कोई यह शंका करे कि वेदना यदि साश्रय है, तो वह आत्माश्रय ही होगी, क्योंकि उसके संस्कार-स्मृति आदि की उपलब्धि, आत्मा में ही होगी। तो इस आशंका का उत्तर देने के लिए 'वेदना समानाश्रय एव तत्संस्कारः' कहा गया है। अर्थात् यत्स्था वेदना होती है, तत्स्थ ही उसके संस्कार आदि होते हैं, अर्थात् जिसमें वेदना स्थित हो, उसी में उससे उत्पन्न हुए संस्कारादि होते हैं। वेदना, तत्संस्कार, स्मृति ये सब एकाश्रय हुआ करते हैं, ऐसा नियम है। वेदना तो उपलब्धि के कर्म में स्थित है, अतः उपलब्धा जो आत्मा है, उसमें वेदना के संस्कार को नहीं माना जा सकता। इसलिए वेदनाजन्य संस्कार को वेदनासमाना श्रय ही मानना चाहिए। क्योंकि जाग्रत्, स्वप्नावस्थारूप स्मृतिकाल में ही उसकी उपलब्धि होती है, सुषुप्ति काल में नहीं। अनुमान प्रयोग इस प्रकार होगा—'वेदनादिः अनात्माश्रयः अनात्मप्रत्ययकाल एवोपलब्धिगोचरत्वात्, देहकार्यादिवत्' । वेदना आदि के अनात्माश्रय होने में एक और भी कारण है। उस वेदना का जो निमित्त दाहच्छेद आदि है, तद्विषयक द्वेष भी संस्कारतुल्याश्रय अर्थात् अनात्माश्रय ही होगा। निष्कर्ष यह है—देह के कट जाने पर अथवा जल जाने पर 'मैं कट

१. ( उप. स. पद्य प्र. १५।१३ )

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९३ गया, मैं जल गया' इस प्रकार अपने आत्मा को देह से अभिन्न माननेवाला व्यक्ति सन्तप्त (दुःखी) होता है। छेदन या दाह से होने वाली वेदना, उसके संस्कार, स्मृति, द्वेष आदि ये सब, देह से अभिन्न आत्मा में ही उपलब्ध होते हैं। देहाभिमानरहित अवस्था में ये सब नहीं हुआ करते । देह, उपलभ्यमान होने से उपलब्धि का कर्म है। वह उपलब्धि का आश्रय नहीं है। इस कारण संघातात्मक शरीर के ही ये वेदनादि हैं, असंहत साक्षी आत्मा के नहीं । आत्मा तो नित्य शुद्ध ही है। वृद्ध लोग भी इस तरह कहते हैं—रूपादि संस्कार और तज्जन्य रागादि सब कुछ बुद्ध्याश्रित ही उपलब्ध होते हैं, अपने साक्षी के आश्रित नहीं होते । अतः ज्ञाता (आत्मा) सर्वदा शुद्ध (राग-द्वेष से रहित), अभय (संसार रहित) है ।। ३५ ।। किमाश्रयाः पुनारूपसंस्कारादय इति ? उच्यते—यत्र कामादयः । क्व पुनस्ते कामादयः ? “कामः संकल्पो विचिकित्सा” इत्यादिश्रुतेर्बुद्धावेव । तत्रैव रूपादिंसंस्कारादयोऽपि, “कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदये” इति श्रुतेः । “कामा येऽस्य हृदि श्रिताः”, “तीर्णो हि तदा सर्वान्शोकान् हृदयस्य”, “असङ्गो ह्ययम्”, “तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दाः” इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः; “अविकार्योऽयमुच्यते”, “अनादित्वान्निर्गुणत्वात्” इत्यादिभ्यः—इच्छाद्वेषादि च क्षेत्रस्यैव विषयस्य धर्मः, नात्मन इति— स्मृतिभ्यश्च कर्मस्थैवाशुद्धिः नात्मस्थेति ।।३६।। हृदयस्पशिनी किमाश्रया इति—यद्यपि वेदनादिकों का अनात्मधर्मत्व, युक्ति से तथा वृद्धसम्मति से उपपादन कर चुके हैं तथापि पुनः प्रश्नपूर्वक श्रुति के द्वारा प्रतिपादन करते हुए उसके आश्रयविशेष का निर्धारण करते हैं। रूप आदि के संस्कार ( सूक्ष्मावस्था ) आदि का आश्रय कौन है ? इस प्रकार प्रश्न करने पर उत्तर देते हैं कि 'जहाँ कामादि रहते हैं, वहीं उनके संस्कारादि भी रहते हैं। और वे कामादि कहाँ रहते हैं ? तो बताया कि "काम, संकल्प, विचिकित्सा' ( संशय )" आदि श्रुति के अनुसार बुद्धि में ही रहते हैं, और वहीं पर रूपादि संस्कार भी रहते हैं। रूप किसमें प्रतिष्ठित है ? तो बताया 'हृदय'² में । इस श्रुति के अनुसार रूपादि के संस्कार भी वहीं रहते हैं। “इसके हृदय में जो कामनाएँ आश्रित हैं",३ "जबकि यह हृदय के समस्त शोकों से पार हो जाता है",४ यह ( आत्मा ) असंग है,' " इसका यह आत्मा कामादि दोषों से रहित है"६ इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों तथा "वह अविकार्य कहा जाता है", "अनादि और निर्गुण होने के कारण"८ इत्यादि स्मृतियों से भी यही सिद्ध होता है। और इच्छा और द्वेषादि तो विषयरूप क्षेत्र के ही धर्म है, आत्मा के नहीं। अतः स्मृतियों के अनुसार यह अशुद्धि, कर्म ( विषयभूत अनात्मा ) में ही है, आत्मा में नहीं है ।। ३६ ।। अतो रूपादिंसंस्काराद्यशुद्धिसम्बन्धाभावान्न परस्मादात्मनो विलक्षणस्त्वमिति प्रत्यक्षादि- विरोधाभावाद्युक्तं पर एवात्माऽहमिति प्रतिपत्तुम्, “तदात्मानमेवावेत् अहं ब्रह्मास्मीति”, एकधैवानु- द्रष्टव्यम्”, “अहमेवाधस्तात्”, “आत्मैवाधस्तात्”, “सर्वमात्मानं पश्येत्”, “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैव”, १. ( बृ. उ. १।५।३, मै. उ. ६।३० ) २. ( बृ. उ. ३।९।२० ) ३. ( बृ. उ. ४।४।७, कठ उ. ६।१४ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ५. ( बृ. उ. ४।३।१५ ) ६. ( बृ. उ. ४।३।२१ ) ७. ( भ. गी. २।२५ ) ८. ( भ. गी. १३।३१ ) ९. “इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत् क्षेत्रं समासेन सविकार मुदाहृतम् ॥”—( भ. गी. १३।६ )

२९४ उपदेशसाहस्री “इदं सर्वं यदयमात्मा”, “स एषोऽकलः”, अनन्तरोऽबाह्यः “अनन्तरमबाह्यम्”, “स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”, ब्रह्मैवेदम् “एतया द्वारा प्रापद्यत”, “प्रज्ञानस्य नामधेयानि”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, “तस्माद्वा एतस्मात्”, “तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”, “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी”, “अशरीरं शरीरेषु”, “न जायते म्रियते वा विपश्चित्”, “स्वप्नान्तं जागरितान्तम्”, “स म आत्मेति विद्यात्”, “यस्तु सर्वाणि भूतानि”, “तदेजति तन्नैजति”, “वेनस्तत्पश्यन्”, “तदेवाग्निः”, “अहं मनुरभवं सूर्य्यश्च”, “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्”, “सदेव सोम्य”, “तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि”, इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥३७॥ हृदयस्पर्शिनी अत इति—अतः रूपादि संस्कारादि अशुद्धि का संबंध न होने से प्रत्यक्षादि प्रमाण से कोई विरोध भी नहीं है। अतः 'तू परमात्मा से भिन्न नहीं है' इस प्रकार तुझे समझना चाहिये। 'मैं परमात्मा ही हूँ' यही समझना उचित है। 'उसने आत्मा को ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ'१, “एक रूप से ही देखना चाहिये”२, “मैं ही नीचे हूँ ३ आत्मा ही नीचे है”४, “सबको आत्मस्वरूप देखे”५, “जिस अवस्था में इसे सब कुछ आत्मा ही हो जाता है”६, “यह जो कुछ है, आत्मा ही है”७, “वह यह आत्मा निष्कल है”८, “यह न अन्तर है न बाह्य है”९, “वह बाहर भीतर विद्यमान एवं अजन्मा है”१०, “यह ब्रह्म ही है”११, “इसी के द्वारा प्रविष्ट हुआ”१२, “प्रज्ञान के ही नाम है”१३, “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्तरूप है”१४ “उस इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ”१५, “उसे रचकर उसी में अनुप्रविष्ट हो गया”१६, “समस्त भूतों में एक सर्वव्यापी देव छिपा हुआ है”१७, “वह शरीरों में अशरीरी है”१८, “वह न उत्पन्न होता है, न मरता है”१९, “जो स्वप्न और जाग्रत् दोनों अवस्थाओं के पदार्थ को देखता है”२०, “वह मेरा आत्मा है, ऐसा जाने”२१, “जो समस्त भूतों को अपने में देखता है”२२, “वह गमन करता है और नहीं भी करता है”२३, “ज्ञानियों ने उसे देखा है”२४, “वही अग्नि है”२५, “मैं मनु हुआ और मैं सूर्य भी हुआ”२६, “वह जीवों के भीतर प्रविष्ट हुआ, जीवों का शासन करनेवाला है”२७, “हे सोम्य ! पहले सत् ही था”२८, “वह सत्य है, वह आत्मा है, और वही तू है”२९—इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। इस अनुच्छेद के द्वारा यह बताया गया है कि रूपादि संस्कारादि अशुद्धि का संबंध न होने के कारण ही प्रत्यक्षादि विरोध भी नहीं है। अतः तू परमात्मा से भिन्न नहीं है। इसलिये तू परमात्मा ही है। ब्रह्म को आत्मा से अभिन्न ही समझो ॥ ३७ ॥ १. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( बृ. उ. ४।४।२० ) ३. ( छा. उ. ७।२५।१ ) ४. ( छा. उ. ७।२५।२ ) ५. ( बृ. उ. ४।४।२३ ) ६. ( बृ. उ. ४।५।१५ ) ७. ( बृ. उ. २।४।६, ४।५।७ ) ८. ( प्र. उ. ६।५ ) ९. ( बृ. उ. २।५।१९, ३।८।८ ) १०. ( मुं. उ. २।१।२ ) ११. ( मुं. उ. २।२।११ ) १२. ( ऐ. उ. ३।१२ ) १३. ( ऐ. उ. ५।२ ) १४. ( तै. उ. २।१ ) १५. ( तै. उ. २।१ ) १६. ( तै. उ. २।६ ) १७. ( श्वे. उ. ६।११ ) १८. ( कठ उ. २।२२ ) १९. ( कठ उ. २।१८ ) २०. ( कठ. उ. ४।४ ) २१. ( कौ. उ. ३।८ ) २२. ( ई. उ. ५, ६ ) २३. ( महाना. उ. २।३ ) २४. ( महाना. उ. १।७ ) २५. ( बृ. उ. १।४।१० ) २६. ( बृ. उ. १।४।१० ) २७. ( तै. आ. ३।११ ) २८. ( छां. उ. ६।२।१ ) २९. ( छां. उ. ६।८।७ )

शिष्यानुशासनप्रकरणम् २९५ स्मृतिभ्यश्च 'पूर प्राणिनः सर्व एव गुहाशयस्य'१, 'आत्मैव देवताः'२, 'नवद्वारे पुरे'३, 'समं सर्वेषु भूतेषु'४, 'विद्याविनयसंपन्ने'५, 'अविभक्तं विभक्तेषु'६, 'वासुदेवः सर्वम्'७ इत्यादिभ्य एक एवात्मा परं ब्रह्म सर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तस्त्वमिति सिद्धम् ॥३८॥ हृदयस्पर्शिनो स्मृतिभ्यश्चेति — उपर्युक्त श्रुत्युक्त अर्थ का समर्थन स्मृतियों ने भी किया है। “समस्त प्राणिवर्ग एक बुद्धि स्थित आत्मा के ही शरीर हैं”१, “समस्त देवता आत्मा ही है”२, “नवद्वार के पुर में देही रहता है”३, “सम्पूर्ण भूतों में समानरूप से विद्यमान”४, “विद्या-विनय सम्पन्न ब्राह्मण में”५, “भिन्न-भिन्न प्राणियों में अभिन्नरूप से स्थित”६, “सभी वासुदेव हैं”७—इत्यादि स्मृतिवाक्यों से भी तू समस्त सांसारिक धर्मों से रहित परब्रह्मस्वरूप एक आत्मा ही है, यह स्पष्ट होता है। तात्पर्य यह है कि जितने भी प्राणी हैं, वे सब एक ही आत्मा (गुहाशय) के शरीर हैं। अतः प्रत्येक शरीर का आत्मा भिन्न नहीं हैं ॥ ३८ ॥ स यदि ब्रूयात्—यदि “भगवन् अनन्तरोऽबाह्यः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”८ कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव, सैन्धवघनवदात्मा सर्वमूर्तिभेदवर्जित आकाशवदेकरसः, किमिदं दृश्यते, श्रूयते वा, साध्यं साधनं वा साधकश्चेति श्रुतिस्मृतिलोकप्रसिद्धं वादिशतविप्रतिपत्तिविषयमिति ॥३९॥ हृदयस्पर्शिनी स यदीति—यदि वह शिष्य पुनरपि यह कहे कि हे भगवन् ! यदि अन्तर-बाह्य से रहित, बाहर-भीतर विद्यमान एवं अजन्मा तथा पूर्णतया प्रज्ञानघन ही सैन्धवघन के समान सम्पूर्ण मूर्त भेदों से रहित आकाश के समान एकरस आत्मा है, तो श्रुति-स्मृति और लोक में प्रसिद्ध तथा शतशः वादियों के विवाद का विषयभूत यह साध्य, साधन और साधकरूप भेद कैसा देखा-सुना जाता है ? अर्थात् ब्रह्मात्मैकत्व यद्यपि श्रुति-स्मृति और न्याय से सिद्ध किया गया है, तथापि लौकिक-वैदिक व्यवहार का उससे विरोध दिखाई देता है। लोकव्यवहार में गृह, क्षेत्र, कोश आदि 'साध्य', उसके प्राप्ति का साधन प्रतिग्रह- सेवा, विजय, युद्ध आदि, और उसके साधक —अधिवर्ग ब्राह्मणादि दिखाई देते हैं। उसी तरह वैदिक व्यवहार में स्वर्ग आदि—साध्य, उसका साधन—याग आदि, और उसके साधक—इच्छुक जन होते हैं। इस प्रकार ऐहलौकिक और पारलौकिक निर्दिष्ट त्रिक सुनाई पड़ते हैं ३९ ॥ आचार्यो ब्रूयात्—अविद्याकृतमेतद्यदिदं दृश्यते, श्रूयते वा, साध्यं साधनं साधकश्चेति । परमार्थतस्त्वेक एवात्मा अविद्यादृष्टेरेनेकवदवभासते*—तिमिरदृष्ट्याऽनेकचन्द्रवत् । “यत्र वा अन्यदिव स्यात्”९, “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति”१०, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति”१०, “अथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्...अथ यदल्पं तन्मर्त्यम्”११ इति, “वाचारम्भणं विकारो १. (आपस्तंबीयत अध्यात्म पटल-४) २. (मनु. १२।११९) ३. (भ. गी. ५।१३) ४. (भ. गी. १३।२७) ५. (भ. गी. ५।१८) ६. (भ. गी. १८।२०) ७. (भ. गी. ७।१९) ८. (बृ. उ. ४।३।३१) ९. (बृ. उ. २।४।१४, ४।५।१५) १०. (बृ. उ. ४।४।१९, कठ. उ. ४।१०) ११. (छां. उ. ७।२४।१)

  • दाभासते०—पाठान्तरम् ।