भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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२७४ उपदेशसाहस्री अन्यान्य शास्त्रों में श्रद्धा रखते हों, वे इस वेदान्तश्रवण के अधिकारी नहीं हैं । तृतीय विशेषण से यह सूचित किया है— इस वेदान्तशास्त्र पर श्रद्धा रहते हुए भी जो अपने पाण्डित्यप्रकर्ष का प्रदर्शन करने के उत्सुक हों, वे भी इस वेदान्त- श्रवण के अधिकारी नहीं हैं। अतः इस वेदान्तशास्त्र के श्रवण का अधिकार उन्हीं को है, जो केवल एकमात्र मोक्ष ही चाहते हैं, तथा इम वेदान्तशास्त्र पर ही जिनका सर्वथा विश्वास (श्रद्धा) है, और इस वेदान्तशास्त्र के अर्थ (पद-पदार्थ-सिद्धान्त) का ज्ञान प्राप्त करने की कामना (इच्छा) जिन्हें है। इन तीन विशेषणों से विशिष्ट अधिकारी शिष्यों के उपकारार्थ हम अब मोक्षसाधनोपदेशविधि का प्रतिपादन करेंगे ॥ १ ॥

तदिदं मोक्षसाधनं ज्ञानं साधनसाध्यप्रादनित्यात्सर्वस्माद्विरक्ताय त्यक्तपुत्रवित्तलोकैषणाय प्रतिपन्न- परमहंसपारिव्राज्याय शमदमदयादियुक्ताय शास्त्रप्रसिद्धशिष्यगुणसंपन्नाय शुचये ब्राह्मणाय विधिवदुपसन्नाय जातिकर्मवृत्तविद्याभिजनैः परीक्षिताय शिष्याय ब्रूयात् पुनः पुनर्यावद्ग्रहणं दृढीभवति ॥२॥

हृदयस्पर्शिनी तदिदमिति—पूर्वोक्त अर्थ का ही संक्षेप में विवरण दे रहे हैं—विधिवत् (यथाविधि) आये हुए शिष्य को मोक्षसाधनभूत ज्ञान का उपदेश देना चाहिए । इस ज्ञान से कारणरूप अज्ञान के सहित कार्यरूप संसारात्मक बन्ध की निवृत्ति होकर ब्रह्मात्मभाव का आविर्भाव होता है। किन्तु यह उपदेश उसी शिष्य में फलीभूत होगा, जो दृष्टार्थ कृषि आदि कर्मों से और अदृष्टार्थ यागादि कर्मों से निष्पन्न होनेवाले ऐहिक तथा आमुष्मिक भोग्य फलों के पाने की अभिलाषा न करता हो, अतएव शिष्य को ब्रह्मलोक तक सभी अनित्य (अशाश्वत) फलों के प्रति अनासक्त (अभिलाषशून्य= विरक्त=वीतराग) होना आवश्यक है। नैष्कर्म्यसिद्धिकार कहते हैं—“नाविरक्ताय संसारात्, नानिरस्तैषणाय च”१ इस प्रकार के विरक्त शिष्य की पहचान विरक्ति के चिह्नों से करनी चाहिये । पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा का त्याग करना ही (इसी प्रकार की किसी एषणा=इच्छा का न होना ही) विरक्ति का चिह्न है। यहाँ पर ‘एषणा’ (काम=इच्छा) शब्द से तत्प्रयुक्त प्रवृत्ति बताई गई है। जैसे—पुत्र की इच्छा से दार (पत्नी) संग्रह की प्रवृत्ति को पुत्रैषणा, कर्मानुष्ठानार्थ अपर विद्याधन और गो आदि पशुधन, इस प्रकार उभयविध धन (वित्त) संग्रह की प्रवृत्ति को वित्तैषणा, उसी प्रकार पुत्र, कर्म, अपरविद्या से साध्य इहलोक, पितृलोक और देवलोकरूप फल सम्पादन की प्रवृत्ति को लोकैषणा कहते हैं। तात्पर्य यह है कि फल-साधनों की ओर प्रवृत्ति की उत्सुकता के त्याग से ही साध्य (फल) भिलाषशून्यता का ज्ञान हो जाता है, तभी वह मोक्षशास्त्र के श्रवण का तथा मोक्षप्राप्ति का अधिकारी बन पाता है। क्योंकि उपनिषद् में कहा है— “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” - (महाना. उ. १०।५) उसी प्रकार अधिकारी शिष्य वही है, जो परमहंस संन्यासाश्रम में अवस्थित है२ । ‘परमहंस' विशेषण से कुटीचकादि स्मार्त संन्यास की व्यावृत्ति की गई है। अर्थात् द्वैताद्वैतवादियों का अद्वितीय आत्मतत्वोपदेश ग्रहण में अधिकार नहीं है। इससे मूलगत ‘मुमुक्ष' पद की व्याख्या की गई । उपर्युक्त कथन से कोई यह न समझ ले कि संन्यासाश्रम ग्रहण करने मात्र से ही अद्वितीयोपदेशश्रवण का अधिकार प्राप्त हो जाता है। श्रवणाधिकार प्राप्त करने के लिये शम-दम-दया आदि गुणों से भी युक्त होना आवश्यक है । अनात्म विषयों से अन्तःकरण की व्यावृत्ति को ‘शम' कहते हैं। बाह्येन्द्रियों के निग्रह को ‘दम' कहते हैं । प्राणिमात्र में द्रोह न रखने को ‘दया' कहते हैं । विवरण में ‘दया आदि' कहा गया है, अतः 'आदि' पद से उपति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान का संग्रह किया गया है। इससे मूलगत ‘श्रद्दधानानाम्' की व्याख्या की गई । इतने गुणों के रहने पर भी— “अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः । असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ॥” इस पारस्परिक वचनानुसार आचार्यचरण ने बताया है कि शास्त्रप्रसिद्ध अन्यान्य गुणों से भी युक्त होना आवश्यक

१. (नै० सि० ४।७१) २. “एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिश्चन्तः प्रव्रजन्ति”-(बृ. उ. ४।४।२२) तथा “तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्”—(महाना. उ. २१।२)