भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६९ में यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि वह अवस्थाच्युति और कार्य की उत्पत्ति, एक काल में होती है या क्रम से होती है ? इसमें भी प्रथम पक्ष उचित नहीं है, क्योंकि तराजू के पलड़ों के झुकने-उठने में जैसे यह नहीं कहा जा सकता कि कौन किसका कारण है, उसी प्रकार उनके कार्य-कारणभाव का निश्चय नहीं हो सकता, और यदि द्वितीय पक्ष माना जाय तो अनवस्था दोष होगा, क्योंकि अवस्थाच्युति भी एक कार्य ही है, अतः उसे भी पहले ऐसी ही अवस्थाच्युति की आवश्यकता होगी ॥ २१ ॥ न चेत्स इष्टः सदसद्विपर्ययः कथं भवः स्यात्सदसद्द्वयस्थितौ । विभक्तमेतद्द्वयमप्यवस्थितं न जन्म तस्माच्च मनो हि कस्यचित् ॥२२॥ न चेदिति—यदि ‘सत्’ और ‘असत्’ का विपर्यय ( वैपरीत्य ) अभीष्ट नहीं है, तो उनके स्वरूप निश्चित रहने के कारण 'द्वैत' की उत्पत्ति कैसे होगी ? क्योंकि 'सत्' और 'असत्' दोनों ही परस्परसंसर्गरहित होकर ही स्थित हैं। इसलिये हे मन ! किसी की भी उत्पत्ति का होना संभव नहीं है ॥ २२ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तु की अवस्थान्तरापत्ति को स्वीकार करके हमने यह कहा था, वास्तव में तो सत् या असत् का अवस्थान्तर होना उपपन्न नहीं है, इस कारण किसी में भी कार्यता-कारणता नहीं है। यदि सत् और असत् का इस प्रकार विपरीतभाव को प्राप्त होना अभिष्ट नहीं है, तो सत् और असत् का स्वरूप निश्चित रहते हुए द्वैत की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? क्योंकि ये सत् और असत् दोनों ही परस्परसंसर्गशून्य रहते हुए स्थित हैं। इसलिये हे मन ! किसी की भी उत्पत्ति संभव नहीं है ॥ २२ ॥ अथाऽभ्युपेत्याऽपि भवं तवेच्छतो ब्रवीमि नार्थस्तव चेष्टितेन मे । न हानवृद्धी न यतः स्वतोऽसतो भवोऽन्यतो वा यदि वाऽस्तिता तयोः ॥२३.। अथेति—हे मन ! यद्यपि तेरे जन्म ( उत्पत्ति ) को मान भी ले तो भी मैं यह बता रहा हूँ कि जन्म की इच्छा करने वाले तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन (हानि-लाभ) नहीं है, क्योंकि 'आत्मा' में जिनकी स्वयं सत्ता नहीं है, उन हानि-लाभों ( प्रयोजनों ) का होना, किसी अन्य कारण से संभव नहीं है। यदि आत्मा में उनकी सत्ता हो तो भी तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि जिस किसी का जन्म (उत्पत्ति) हो भी, तथापि ब्रह्मभूत हुए मेरी कोई क्षति या वृद्धि नहीं है। अरे मन ! तेरी उत्पत्ति (जन्म) स्वीकार करके भी मैं यह कह सकता हूँ कि जन्म (उत्पत्ति) की इच्छा रखनेवाले तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन (हानि-लाभ) नहीं है। क्योंकि आत्मा में अविद्यमान हानि या वृद्धि (लाभ) का उद्भव (उत्पत्ति) होना स्वतः या अन्य किसी हेतु से भी संभव नहीं है। और यदि आत्मा में उनकी सत्ता हो भी, तथापि तेरी चेष्टा से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २३ ॥ ध्रुवा ह्यनित्याश्च न चान्ययोगिनो मिथश्च कार्यं न च तेषु युज्यते । अतो न कस्यापि हि किञ्चिदिष्यते स्वयं च तत्त्वं न निरुक्तिगोचरम् ॥२४॥ ध्रुवेति—स्थिर और अस्थिर ( क्षणिक ) वस्तुओं ( पदार्थों ) का न तो किसी अन्य से सम्बन्ध होता है, और न परस्पर ही सम्बन्ध रहता है। तथा उनमें किसी कार्य का होना भी संभव नहीं है। अतः कोई किसी का सम्बन्धी नहीं है। अधिक क्या कहें, स्वयं 'आत्मा' भी वाक्य का विषय नहीं है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी हीयमान और उपचीयमान वस्तुओं का आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है, इस कारण भी हानि-वृद्धि का आत्मा में होना संभव नहीं है।