भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 294

कहना होगा, और उपादान होने के कारण 'असत्' को 'सत्' कहना होगा। इसलिये क्रियाकारक कुछ भी नहीं है। अतः एक निर्विशेष, अजन्मा 'आत्मा' ही है ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी सद्बस्तु की कूटस्थता, अद्वितीयता, जो श्रुत्यादि प्रमाणों से सिद्ध है, उसकी स्व-बुद्धिभ्रम से अन्यथा कल्पना मनुष्य किया करता है, अर्थात् वह अन्यथा कल्पना पुरुषापराधनिबन्धन है। उसी को सुदृढ़ करने के लिये अब युक्ति बताते हैं। द्वैतवादी से हम पूछते हैं कि पहले यह बताओ, तुम्हारा अभिमत 'द्वैत' - उत्पद्यमान स्वभाववाला है, या अनुत्पद्यमान स्वभाववाला है अथवा उभयस्वभाववाला है ? प्रथम पक्ष का स्वीकार करना उचित नहीं होगा, क्योंकि उत्पत्ति (जन्म) तो किसी अन्य वस्तु से ही हो सकती है, अतः वह सापेक्ष है, उस कारण शुक्ति-रजतादि के समान उसमें मिथ्यात्व आ जायगा। उसी तरह द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि तब उसे नित्य मानना होगा, परिणाम यह होगा कि उसके अभाव का व्यवहार ही कभी नहीं हो सकेगा। उसी तरह तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि एक ही वस्तु परस्परविरुद्धस्वभाव वाली नहीं होती। इसी अभिप्राय को मन में रखकर चतुर्थ पक्ष को बताकर उसे भी दूषित कर रहे हैं। भवश्च अभावश्च भावाभवौ, तयोर्भावः भवाऽभवत्वम्। परस्पर विरुद्ध होने के कारण 'द्वैत' के भवाऽभवत्व (उत्पत्ति-अनुत्पत्ति) को विरोध के कारण यदि स्वीकार नहीं करते हो तो उसकी अवस्थिति अर्थात् सत्ता ही सिद्ध न हो सकेगी। उभयस्वभावविलक्षण कोई भी वस्तु नहीं हुआ करती। यदि द्वैत की उत्पत्ति कहें तो स्वतः ही जन्म होना संभव न रहने से, किसी दूसरे से ही कहना होगा। तब भी पुनः प्रश्न हो सकता है कि उस द्वैत का जन्म 'सत्' वस्तु से है, या 'असत्' वस्तु से है ? किन्तु दोनों पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि उत्पत्तिशील होने से 'सत्' विकारी होने के कारण 'असत्' सिद्ध होगा और उपादान होने के कारण असत् 'सत्' हो जायगा। अतः क्रिया-कारक कुछ भी नहीं है। तात्पर्य यह है कि एक आत्मतत्त्व ही निर्विशेष, अजन्मा है ॥ २० ॥ अकुर्वदिष्टं यदि वाऽस्य कारकं न किञ्चिदन्यन्ननु नास्त्यकारकम् । सतोऽविशेषादसत्तश्च सच्युतौ *तुलान्तयोर्यद्वदनिश्श्यान्न हि ॥२१॥ अकुर्वदिति - इस द्वैत वर्ग के कारक को यदि निष्क्रिय माना जाय तो सभी वस्तुओं को कारक कहा जा सकेगा और यदि उसे सक्रिय माना जाय तो उसका कारकत्व सिद्ध नहीं हो सकेगा, क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' दोनों ही अवस्था- ओं में समान रहेगा। यदि 'सत्' के सत्त्व की तथा 'असत्' के असत्त्व की च्युति होने पर उनका कारकत्व कहा जाय तो जिस प्रकार तराजू की डण्डी के उठने और झुकने में कौन किसका कारण है, यह निश्चय नहीं है, उसी प्रकार उनके कार्य-कारण भाव का निश्चय नहीं किया जा सकता ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि इस द्वैतवर्ग के कारक को निष्क्रिय माना जाय तो ऐसी कोई वस्तु नहीं रहती जो उसका कारक न हो सके। उस अवस्था में सभी इसके कारक हो सकते हैं, क्योंकि क्रियाहीन तो सभी वस्तु हो सकती हैं। अतः उसे यदि अन्यथा (सक्रिय) कहा जाय तो उसकी कारकता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि वह सत् और असत् दोनों ही अवस्थाओं में समान रहेगा। यदि उस 'सत्' या 'असत्' के सत्त्व या असत्त्व की च्युति होने पर उनका कारकत्व माना जाय तो जिस प्रकार तुलादण्ड के उठने और झुकने में कौन किसका कारण है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार उनके कार्य-कारण भाव का निश्चय नहीं किया जा सकता। यदि सक्रिय वस्तु को द्वैत का कारण माना जाय तो प्रश्न यह हो सकता है कि वह स्वभाव से सक्रिय है या किसी अन्य की अपेक्षा से ? यदि स्वभाव से सक्रिय है तो उसकी क्रिया नित्य होने के कारण उससे सर्वदा कार्य की उत्पत्ति होती रहेगी, और यदि अन्य किसी की अपेक्षा से उसे सक्रिय कहें तो उसके विषय में भी यही विकल्प होने के कारण अनवस्था आदि दोषों की प्राप्ति होगी। अतः वह 'सत्' हो अथवा 'असत्' दोनों ही प्रकार से उसका कारकत्व सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि सत् होने पर तो वह सर्वदा 'सत्' ही रहेगी, और 'असत्', होने पर वह सर्वदा 'असत्' ही रहेगी। यदि कार्य की उत्पत्ति के लिये उसके सत्त्व या असत्त्व की प्रच्युति स्वीकार की जाय तो उसके स्वरूप में विरूपता आ जाती है। और उस अवस्था

  • तुलां तयोः - पाठान्तरम् ।