भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 364 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 293

तृष्णाज्वरनाशकप्रकरणम् २६७ केवल 'अर्थक्रियाकारित्वाभाव' को हेतु न कहकर उसमें 'परमार्थ' विशेषण जोडकर 'परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्वाभाव' को हेतु कहें, तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्व में कोई दृष्टान्त नहीं है। अन्यथा स्थिर या क्षणिक वस्तु में परमार्थतः अर्थक्रियाकारित्व संगत नहीं है, क्योंकि अक्रिय कभी कारक नहीं हो सकता। क्रियाकार्य के प्रति भी क्रियावत्त्व यदि माना जाय तो अनवस्था दोष होगा। अतः तुम्हारे अनुमान में हेतु के दूषित रहने से उससे साध्यसिद्धि नहीं हो सकती ॥ १७ ॥ विकल्पनात्त्वाच्चापि विधर्मकं श्रुतेः पुरा प्रसिद्धेश्च विकल्पतोऽद्वयम् । न चेति नेतीति यथा विकल्पितं निषिद्धयतेऽत्राप्यविशेषसिद्धये ॥१८॥ विकल्पनादिति- यदि यह कहो कि 'आत्मा' सर्वविकल्पविशिष्ट है, क्योंकि वह समस्त विकल्पों का कारण है। किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि श्रुति प्रमाण से तथा विकल्प से पूर्व भी उसके विद्यमान रहने के कारण यह अद्वितीय आत्मा, विकल्प से भिन्न स्वभाव का है। जिस प्रकार अवशिष्ट वस्तु को बताने के लिये 'नेति-नेति' कह कर विकल्प का निषेध किया जाता है, उस तरह 'आत्मा' का निषेध नहीं किया जाता ॥ १८ ॥ हृदयस्पशिनी इस पर पूर्वपक्षी पुनः शंका कर रहा है कि जब अद्वय, समस्त विकल्पों का हेतु है, तो वह सर्व विकल्पों से युक्त हो ही जायगा। किन्तु ऐसी शंका करना उचित नहीं। क्योंकि “निष्कलं निष्क्रियम्” इस श्रुति से तथा विकल्प से पूर्व भी विद्यमान रहने के कारण अद्वितीय आत्मा विकल्प के स्वभाव से भिन्न स्वभाव का है। जिस प्रकार अवशिष्ट वस्तु की सिद्धि के लिए “नेति-नेति” वाक्य से विकल्प का निषेध किया जाता है, उस तरह अद्वय आत्मा का निषेध नहीं किया जाता। शुक्ति पर आरोपित रजत के समान प्रत्येक आरोपित वस्तु असत् होती है, तथापि उसका अधि- ष्ठान सत्य (सत्) होता है। आत्मा समस्त विकल्पों का अधिष्ठान है। अतः विकल्पमात्र मिथ्या है, अधिष्ठानस्वरूप आत्मा मिथ्या नहीं है। इसीलिए 'नेति-नेति' वाक्य से केवल आरोपित विकल्प का ही बाध किया जाता है, उसके अधिष्ठानभूत परमार्थसत्य आत्मा का नहीं ॥ १८ ॥ अकल्पितेऽप्येवमजेऽद्वयेऽक्षरे विकल्पयन्तः सदसच्च जन्मभिः । स्वचित्तमायाप्रभवं च ते भवं जरां च मृत्युं च नियान्ति संततम् ॥१९॥ अकल्पितेऽपीति- यद्यपि 'आत्मा' अकल्पित, अजन्म, अद्वय और अविनाशी है, तथापि जो मनुष्य उसमें (आत्मा में) 'सत्-असत्' कर्तृत्व की कल्पना करते हैं, वे सर्वदा स्व-बुद्धिभ्रम से कल्पित जन्म, जरा, मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं ॥ १९ ॥ हृदयस्पशिनी यथोक्त श्रुत्यर्थ में जो विकल्प करते हैं, वे अनर्थ को प्राप्त होते हैं। अर्थात् जो लोग अविकल्पित (कूटस्थ) अर्थात् भेदविकारसंसर्गशून्य अजन्म, अद्वय और अविनाशी आत्मा में सत्, असत् तथा कर्तृत्वादि की कल्पना करते हैं, वे निरन्तर तिर्यक्-मनुष्यादि योनियों के द्वारा अपने बुद्धिभ्रम से ही कल्पित जन्म, जरा एवं मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ १९ ॥ भवाभवत्वं तु न चेदवस्थितिर्न चास्य चान्यस्थिति जन्म नान्यथा । सतो ह्यसत्त्वादसतश्च सत्त्वतो न च क्रियाकारकमित्यतोऽप्यजम् ॥२०॥ भवाभवत्वमिति- कोई भी सद्वस्तु उत्पत्ति और अनुत्पत्ति दोनों से ही विलक्षण स्वभाव की नहीं हुआ करती। क्योंकि 'उत्पत्तिमत्त्व' और 'अनुत्पत्तिमत्त्व'-दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं। उस कारण 'द्वैत' के उत्पत्तिस्वरूप को यदि स्वीकार नहीं करते तो उसकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होगी। यदि उसकी उत्पत्ति मानते हैं तो उसकी उत्पत्ति किसी अन्य 'सत्' वस्तु से नहीं हो सकती, और न 'असत्' से ही हो सकती है, क्योंकि 'सत्' को विकारी होने के कारण 'असत्'