भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

२४६ उपदेशसाहस्री तो तभी तक होती है, जब तक उसे पदार्थ का बोध नहीं होता है। पदार्थ का बोध हो जाने पर शिष्य को कोई शंका नहीं रहती ॥ १७९॥ अन्वयव्यतिरेकोक्तिः पदार्थस्मरणाय तु । स्मृत्यभावे न वाक्यार्थो ज्ञातुं शक्यो हि केनचित् ॥१८०॥ अन्वयेति—श्लोक १७७ 'इदं पूर्वमिदं' में अन्वय-व्यतिरेक के विषय में जो बताया गया है, वह पदों के अर्थ का स्मरण रखने के लिये कहा गया है। क्योंकि उनके स्मरण के बिना कोई भी व्यक्ति वाक्यार्थ को जानने में समर्थ नहीं हो सकता क्योंकि वाक्यार्थ का बोध तो पदों के अर्थज्ञान की स्मृति पर ही निर्भर रहता है ॥ १८० ॥ हृदयस्पर्शिनी पदार्थतत्व से अनभिज्ञ पुरुष ही प्रश्न करता है। जो अभिज्ञ है, उसके सभी प्रश्न शान्त हो जाते हैं। पूर्वगत १७७ वे श्लोक में अन्वय-व्यतिरेक के सम्बन्ध में जो कहा गया है, वह पदों के अर्थों को स्मरण रखने के लिये कहा गया है, क्योंकि उनकी स्मृति के बिना वाक्य का अर्थ किसी के समझ में नहीं आ सकता। अवान्तर वाक्य और तदनुकूल तर्क के द्वारा आत्मानात्म-विवेचन ही पूर्वोक्त अन्वय-व्यतिरेक शब्द से कहा गया है। लोकानुभव से यह स्पष्ट है कि पदार्थस्मृति ही पदोपस्थापित वाक्यार्थ का ज्ञान कराने में कारण हुआ करती है ॥ १८० ॥ तत्त्वमस्यादिवाक्येषु त्वंपदार्थाविवेकतः । व्यज्यते नैव वाक्यार्थो नित्यमुक्तोऽहमित्यतः ॥१८१॥ तत्त्वमिति—'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में 'त्वम्' पदार्थ का विवेक न होने से 'मैं नित्य मुक्तस्वरूप हूँ'—यह वाक्यार्थ अभिव्यक्त नहीं हो पाता ॥ १८१ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक न होने के कारण 'मैं नित्य मुक्त स्वरूप हूँ' यह वाक्यार्थ अभिव्यक्त नहीं हो पाता। इसलिये 'त्वं' पदार्थ के विवेक करने में अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिये ॥१८१॥ अन्वयव्यतिरेकोक्तिस्तद्विवेकाय नान्यथा । त्वंपदार्थविवेके हि पाणावर्पितबिल्ववत् ॥१८२॥ अन्वयेति—अन्वय-व्यतिरेक का जो उल्लेख किया गया था, वह उसी का विवेक कराने के लिये ही है, उसका कोई अन्य प्रयोजन नहीं है। 'त्वम्' पदार्थ का विवेक हो जाने पर हथेली पर रखे हुए बिल्व फल के समान...॥ १८२॥ वाक्यार्थो व्यज्यते चैवं केवलोऽहंपदार्थतः । दुःखीत्येतदपोहेन प्रत्यगात्मविनिश्चयात् ॥१८३॥ वाक्यार्थ इति—वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हो जाती है। 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार के प्रत्यय का 'अहम्' पद के अर्थ से बाध हो जाने पर प्राप्त हुए प्रत्यगात्मा का निश्चय हो जाता है ॥ १८३॥ हृदयस्पर्शिनी उपर्युक्त अन्वय-व्यतिरेक का उल्लेख उसी का विवेक कराने के लिये है, किसी अन्य प्रयोजन के लिये नहीं है। 'त्वं' पद के अर्थ का विवेक हो जानेपर 'अहं' के अर्थ से 'मैं दुःखी हूँ' इस प्रकार के प्रत्यय का बाध कर देने पर प्राप्त हुए प्रत्यगात्मा के निश्चय से हथेली पर रखे हुए बेलफल के तुल्य वाक्यार्थ की अभिव्यक्ति हो जाती है। 'तत्त्वमसि' महावाक्य का श्रुत अर्थ तो अखण्डार्थ है, अर्थात् माया और अज्ञान के संसर्ग से रहित ब्रह्म और आत्मा की एकता है, तथा अश्रुत अर्थ 'संसर्गादि' है, जिसमें जीव और ईश्वर की स्वरूपगत एकता न होकर केवल चैतन्यरूप से उनकी समानता स्वीकार की जाती है ॥ १८२-१८३ ॥