भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 271

तत्त्वमसिप्रकरणम् २४५ हृदयस्पर्शिनी पुनरपि एक जिज्ञासा जागरित होती है कि लोकव्यवहार में सर्वत्र यह नियम देखा जाता है कि वाक्य में प्रथमतः उद्देश्य रखा जाता है, पीछे विधेय रखा जाता है । “यच्छब्दः योगः प्राथम्यमित्याद्युद्देश्यलक्षणम् । तच्छब्द एवकारश्च स्यादुपादेयलक्षणम्¹ ।। इस न्याय में प्रथमनिर्दिष्ट उद्देश्य और चरमानिर्दिष्ट उपादेय (विधेय) होता है। प्रकृत में उसका पालन नहीं हुआ है। ‘तत्त्वमसि’ वाक्य में ‘तत्’ पद जो विधेय है, उसका प्रथम निर्देश हुआ है। और ‘त्वम्’ पद जो उद्देश्य है, उसका पश्चात् निर्देश हुआ है। अर्थात् ‘तत्त्वम्’ में तदर्थ का प्राथम्य सुनाई देता है और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ में त्वमर्थ का प्राथम्य ज्ञात हो रहा है। अतः उद्देश्य-विधेय के नियम की यहाँ रक्षा नहीं हो पायी। तब सिद्धान्ती उत्तर देते हैं कि वेद में पाठक्रम के अनुसार अर्थ करने का ही कोई नियम नहीं है। पाठक्रम की अपेक्षा अर्थक्रम की प्रबलता मानी गई है। अतः अनेक स्थलों में अर्थक्रम के अनुसार ही अनुष्ठान किया जाता है। 'आहर पात्रम्', 'पात्रमाहर' के समान अर्थ- नियम की विवक्षा की गई है। अन्वय-व्यतिरेक प्रमाण के द्वारा अर्थ के अनुसार अन्वय किया जाता है। 'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि वाक्यों में यह 'त्वम्' 'अहम्' आदि पद पहले और 'तत्' 'ब्रह्म' आदि पद पीछे रहने से वाक्य बनाता है। अतः पश्चात् अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा वाक्यार्थ का ज्ञान होता है। क्योंकि पाठ का नियम न रहने पर भी 'प्रसिद्ध- मुद्दिश्य अनूद्य अप्रसिद्धो बोध्यते'—इस न्याय से प्रसिद्धार्थक त्वम्, अहम् आदि पदों को पहले और ‘इदम्’ अप्रसिद्धार्थक ब्रह्म, सत् आदि पदों को पश्चात्—इस रीति से विन्यस्त किये गये को वाक्य कहा जा सकता है—इस प्रकार अन्वय- व्यतिरेक के द्वारा जानकर पश्चात् वाक्यार्थ का बोधन (ज्ञान) अर्थात् त्वमर्थ की तदर्थात्मता का ज्ञान हो सकता है ।। १७७ ।। वाक्ये हि श्रूयमाणानां पदानामर्थसंस्मृतिः ।। १७८।। वाक्ये इति—वेदवाक्य में जो श्रूयमाण पद हैं, उनमें अर्थस्मृतिरूप नियम नहीं है। वहाँ अर्थ के अनुसार पदों की संगति लगानी होती है ।। १७८ ।। हृदयस्पर्शिनी क्योंकि वाक्य के अन्तर्गत श्रुत हुए पदों का अर्थस्मृतिरूप नियम नहीं है। वहाँ अर्थ के अनुसार पदों की संगति लगाई जाती है ।। १७८ ।। यदा नित्येषु वाक्येषु पदार्थस्तु विविच्यते । वाक्यार्थज्ञानसंक्रान्त्यै तदा प्रश्नो न युज्यते ।। १७९।। यदेति—जब वाक्यार्थ के ज्ञान का संचार करने के लिये नित्यवाक्य में प्रयुक्त पद के अर्थ का विवेचन कर दिया जाता है, तब शिष्य का कोई प्रश्न करना उचित नहीं है ।। १७९ ।। हृदयस्पर्शिनी कोई प्रश्नकर्ता पुनः कहता है कि ‘तू ब्रह्म है’—इस प्रकार गुरु के उपदेश करने पर भी शिष्य कह सकता है कि 'मैं तो परिच्छिन्न हूँ', तब मैं अपरिच्छिन्न तथा नित्य ब्रह्म कैसे हो सकता हूँ ?—इस स्थिति में केवल वाक्यार्थ मात्र से पदार्थज्ञान की उत्पत्ति कैसे मानी जा सकती है ? अतः तदन्यथानुपपत्त्या कहा जा सकता है कि वाक्य, साक्षात् बोध- जननसमर्थ नहीं है। इस पर सिद्धान्ती उत्तर देता है कि जिस समय गुरु, वाक्य के पदों का वास्तविक अर्थ बताकर शिष्य के अन्तःकरण में वाक्यार्थ का संचार कर देता है, उस समय शिष्य को पुनः कोई शंका नहीं हो सकती। शंका १. वरदराज ने अवयव निरूपण के प्रसंग पर ‘तार्किकरक्षा’ नामक ग्रन्थ में इस कारिका को उद्धृत किया है। विद्यारण्य ने भी ‘विवरण प्रमेय संग्रह’ में सू. १ के द्वितीय वर्णक में इसे उद्धृत किया है।