भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

२४४ उपदेशसाहस्री 'विमतं अखण्डार्थनिष्ठम्, उपाधिपरामर्शमन्तरेणाविभाव्यमानभेदवस्तुनिष्ठत्वात् 'सोऽयं देवदत्तः', खं छिद्रम्' इत्यादि वाक्यवत् ॥ १७३ ॥ नवबुद्ध्यपहाराद्धि स्वात्मानं दशपूरणम् । अपश्यञ्ज्ञातुमेवेच्छेत् स्वमात्मानं जनस्तथा ॥१७४॥ नवेति—'हम नौ मनुष्य हैं'—इस भ्रान्त बुद्धि से (यथार्थ ज्ञान के न रहने से) दशम संख्या की पूर्ति करने वाले स्वयं अपने को वह जानना चाहता है। क्योंकि वह अपने-आप को ही भूल बैठा था ॥ १७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी वाक्य की अखण्डार्थनिष्ठता रहने पर भी केवल उसमें ही उसका तात्पर्य (पर्यवसान) मानना उचित नहीं है। क्योंकि केवल ज्ञानमात्र से फलप्राप्ति नहीं होती। अतः यत्नान्तर का अन्वेषण करना चाहिये, इसलिये क्रिया- पर्यवसायिता क्यों नहीं मानी जाती ? उत्तर देते हैं कि जो अर्थ जिज्ञासित रहता है, उसी अर्थ की कल्पना की जाती है। जिज्ञासित अर्थ को छोड़कर अर्थान्तर में तात्पर्य की कल्पना यदि की जायेगी तो अबुभुत्सित अर्थ होने से वाक्य ही अप्रमाण हो जायेगा। 'हम नौ मनुष्य हैं' इस बुद्धि के भ्रम से यथार्थ ज्ञान तिरोहित हो जाने से दशम संख्या की पूर्ति करनेवाला व्यक्ति स्वयं अपने को न जानने के कारण उसे केवल जानना ही चाहता है। उसके अतिरिक्त और कुछ करना नहीं चाहता। इस दृष्टान्त के अनुसार मुमुक्षु व्यक्ति भी स्वयं अपने को किसी कारण से भूल गया था, अतः उसे केवल जानना ही चाहता है, जिससे भ्रम दूर हो जाय। एवंच भ्रमनिवृत्तिरूप फल के लिये ही वह केवल अपने आप को जानना ही चाह रहा है। अतः क्रियापरत्व की कल्पना करने का अवसर ही कहाँ है ? ॥ १७४ ॥ अविद्याबद्धचक्षुष्ट्वात्कामापहृतधीः सदा । विविक्तं दृशिमात्मानं नैक्षते दशमं यथा ॥१७५॥ अविद्याबद्धेति—अपना ही विस्मरण होने से जैसे दसवें व्यक्ति का ज्ञान नहीं हुआ था, वैसे ही अनादि अविद्या के द्वारा विवेकदृष्टि के आच्छादित होने के कारण नानाविध कामना (तृष्णा) ओं से कुण्ठित बुद्धि वाला पुरुष, दृश्य वर्ग से पृथक्भूत ज्ञानस्वरूप आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाता ॥ १७५ ॥ दशमस्त्वमसीत्येवं तत्त्वमस्यादिवाक्यतः । स्वमात्मानं विजानाति कृत्स्नान्तःकरणेक्षणम् ॥१७६॥ दशमस्त्वमिति—'दशमस्त्वमसि' के समान 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य से मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण अन्तःकरण के साक्षी आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है ॥ १७६ ॥ इदं पूर्वमिदं पश्चात् पदं वाक्यं भवेदिति । नियमो नैव वेदेऽस्ति पदसाङ्गत्यमर्थतः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां ततो वाक्यार्थबोधनम् ॥१७७॥ इदमिति—'तत्त्वमसि', 'अहं ब्रह्मास्मि' इन वाक्यों में 'त्वम्', 'अहम्' आदि पदों को पहले और 'तत्' 'ब्रह्म' आदि पदों को पीछे रखकर वाक्य बनाया जाता है। तब अन्वय-व्यतिरेक से वाक्यार्थ का बोध होता है। किन्तु व्यावहारिक नियम के अनुसार 'उद्देश्य' को पहले और 'विधेय' को बाद में रखा जाता है। किन्तु 'तत्त्वमसि' वाक्य में विधेय जो 'तत्' पद है, उसे पहले रखा गया है, और उद्देश्य जो 'त्वम्' पद है, उसे बाद में रखा गया है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि 'पाठक्रम' की अपेक्षा 'अर्थक्रम' को प्रबल मानने का सिद्धान्त मीमांसा शास्त्र ने बताया है। अतः अन्वय-व्यतिरेक रूप प्रमाण के सहारे उनका अर्थ के अनुसार अन्वय समझना चाहिये ॥ १७७ ॥