भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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कूटस्थाऽद्वयात्मबोधप्रकरणम् सुखमासीनं ब्राह्मणं ब्रह्मनिष्ठं कश्चिद्ब्रह्मचारी *जन्मरमरणलक्षणात् संसारात्निर्विण्णो मुमुक्षुः विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ—भगवन्, कथमहं संसारान्मोक्षिष्ये† शरीरेन्द्रियविषयवेदनावाञ् जागरिते दुःख- मनुभवामि, तथा स्वप्नेऽनुभवामि, पुनः पुनः सुषुप्तिप्रतिपत्त्या विश्रम्य विश्रम्य जाग्रत्स्वप्नयोर्दुःखमनु- भवामि—किमयमेश मम स्वभावः ? किंवाऽन्यस्वभावस्य सतो नैमित्तिकः ? इति । यदि अयमेव स्वभावः, न मे मोक्षाशा; स्वभावस्यावर्जनीयत्वात् । अथ नैमित्तिकः, निमित्तपरिहारे स्यान्मो- क्षोपपत्तिः ॥४५॥ हृदयस्पर्शिनी सुखमासीनमिति—पूर्व प्रकरण में गुरु ने शिष्य को बताया कि तू इन स्थूल और सूक्ष्म दोनों देहों के अभिमान का त्याग करके अपने को ब्रह्मरूप समझ । ब्रह्मस्वरूप के विपरीत जो कुछ भी है, वह सब अविद्याकृत है । अब अब्रह्मस्वरूप की अविद्यात्मकता और आत्मा कूटस्थ होने के कारण उसकी स्वतःसिद्ध ब्रह्मरूपता का उपपादन करने के लिये प्रकरणान्तर का आरंभ करनेवाले ग्रन्थकार संन्यास ग्रहण किये हुए मुमुक्षु के लिये विधि के द्वारा वेदान्तवाक्यश्रवण की सूचना देते हुए शिष्य के प्रश्न को उपस्थित कर रहे हैं । एक समय सुखपूर्वक बैठे हुए एक ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण के समीप जन्म-मरणरूप संसार से विरक्त हुआ कोई मोक्षेच्छु ब्रह्मचारी (ब्रह्मविचारतत्पर) यथा- विधि प्राप्त होकर पूछने लगा, कि हे भगवन् ! शरीर, इन्द्रिय और विषय से उत्पन्न होनेवाली वेदना से ग्रस्त (पीड़ित) हुआ मैं, इस संसार से किस प्रकार मुक्त हो सकूँगा ? ग्रन्थकार ने 'ब्राह्मण' शब्द का प्रयोग किया है, उससे यह स्पष्ट है कि आपातकाल को छोड़कर अन्य समय में ब्राह्मणेतर वर्ण (अब्राह्मण) से उपदेश ग्रहण न करे । गुरु के साथ 'ब्रह्मनिष्ठ' विशेषण को जोड़कर यह सूचित किया है कि उसी गुरु में शिष्य प्रतिबोधन का सामर्थ्य होता है, अन्य किसी में वह सामर्थ्य नहीं होता । 'कश्चित्' शब्द से पूर्वोक्त गुणगणों से युक्त, सुपरीक्षित शिष्य बताया गया है । 'कश्चित्' कहकर उपदेश ग्रहण के समय उसकी एकाकिता को सूचित किया है । 'ब्रह्मचारी' उसे कहते हैं, जो प्रत्यक्- तत्त्वरूप ब्रह्म में विचरण करता रहता है—'ब्रह्माणि प्रत्यक्तत्त्वे चरितुं विचरितुं शीलमस्यास्तीति ब्रह्मचारी ।' 'ब्रह्मचारी' कहकर 'नित्याऽनित्यवस्तुविवेक' को प्रदर्शित किया है । मैं सुषुप्ति के प्राप्त होते रहने से बीच-बीच में विश्राम लेता हुआ जाग्रत् में और स्वप्नावस्था में पुनः-पुनः दुःख का अनुभव करता रहता हूँ । क्या यही मेरा स्वभाव है ? अथवा मेरा कोई अन्य स्वभाव होता हुआ भी मुझे वह निमित्तवश प्राप्त हुआ है ? यदि वह मेरा स्वभाव ही है, तब तो उससे मेरे छुटकारे की कोई आशा नहीं है । क्योंकि स्वभाव की निवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि स्वभाव की निवृत्ति से तो वस्तु की ही निवृत्ति हो जाती है । जैसे उष्णता (अग्नि का स्वभाव) की निवृत्ति होने से अग्नि की भी निवृत्ति हो जाती है । कहते भी हैं कि 'स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते' । यदि केवल निमित्तवश (नैमित्तिक) वह प्राप्त हुआ है, तो उस निमित्त की निवृत्ति होने पर उस दुःख से छुटकारा मिलना संभव हो सकता है । 'भगवन्' से लेकर 'नैमित्तिक' तक शिष्य ने प्रश्न किया है । उसमें 'संसारमोक्षविषयक' एक प्रश्न है, और दूसरा प्रश्न—दुःखा- नुभव के आत्मस्वभावत्व विषयक है । प्रथम प्रश्न के करने में निमित्त है—'शरीर-इन्द्रिय विषयनिमित्त वेदनानुभव को ही संसार कहते हैं, तद्वान् होता हुआ मैं इस संसार से कैसे मोक्ष पा सकूँगा ?' और द्वितीय प्रश्न के करने में निमित्त है—'जागरित में दुःख का अनुभव करता हूँ । पुनः पुनः सुषुप्ति की प्राप्ति से बीच-बीच में विश्राम पाकर जाग्रत्-स्वप्न में दुःख का अनुभव होने से और सुषुप्ति में तत्तद् दुःखों का आत्मा में अनुभव न होने से शिष्य के मन में संशय उत्पन्न हुआ है । गुरु के समीप मुमुक्षु शिष्य की उपसत्ति यथाविधि बताई गई है । क्योंकि मुण्डक श्रुति कह रही है—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्सम्त्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्' ॥ ४५ ॥ १. (मुं. उ. १।२।१२)

  • जन्म-जरा-मरण—पाठान्तरम् । † रान्मोक्ष्ये—पाठान्तरम् ।