भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 326

३०० उपदेशसाहस्री तं गुरुहवाच—शृणु वत्स; न तवायं स्वभावः किंतु नैमित्तिकः ।।४६।। हृदयस्पर्शिनी तमिति—दुःखानुभव करना आत्मा का स्वभाव नहीं है—इस अस्वभाव पक्ष का अवलम्बन करके गुरु उत्तर देते हैं कि हे शिष्य ! तू भय मत कर। सुनो, यह तुम्हारा स्वभाव नहीं है, किन्तु वह तो तुम्हें निमित्तवश प्राप्त हुआ है ।। ४६ ।। इत्युक्तः शिष्य उवाच—किं निमित्तम् ? किं वा तस्य निवर्तकम् ? को वा मम स्वभावः ? यस्मिन्निमित्ते निर्वर्तिते नैमित्तिकाभावः रोगनिमित्तनिवृत्ताविव रोगी स्वभावं *प्रतिपद्येयेति ।।४७।। हृदयस्पर्शिनी इत्युक्त इति—गुरु के द्वारा आश्वासन प्राप्त किया हुआ शिष्य बोला कि निमित्त की निवृत्ति हुए बिना नैमित्तिक की आत्यन्तिक निवृत्ति होना संभव नहीं है, क्योंकि जब तक उसके स्वरूप का ज्ञान न हो, तब तक उसका परिहार नहीं हो सकता। इस कारण शिष्य पूछ रहा है कि वह निमित्त क्या है ? और उसका निवर्तक कौन है ? और मेरा स्वभाव क्या है ? तथा जिस निमित्त के निवृत्त होने पर इस नैमित्तिक दुःख का अभाव (निवृत्ति) हो जायगा। जैसे रोगी, रोग के निमित्त की निवृत्ति होने पर स्वास्थ्यलाभ करता है, वैसे ही दुःख के निमित्त की निवृत्ति होने पर जिस स्वभाव को मैं प्राप्त होऊँगा, वह मेरा स्वभाव क्या है ? ।। ४७ ।। गुरुरुवाच—अविद्या निमित्तं; विद्या †तस्या निवर्तिका । अविद्यायां निवृत्तायां तन्निमित्ता- भावान्मोक्ष्यसे जन्ममरणलक्षणात्संसारात्, स्वप्नजाग्रद्दुःखं च नानुभविष्यसीति ।।४८।। हृदयस्पर्शिनी गुरुहरिति—शिष्य के द्वारा पूछे गये प्रश्न के अनुसार उसके स्वरूप को बताने के लिये उत्तर दे रहे हैं। गुरु बोले—दुःखप्राप्ति के होने में निमित्त अविद्या है। उसकी निवृत्ति करानेवाली विद्या है। अविद्या के निवृत्त होने पर तन्निमित्तक (उसके कारण होनेवाले) संसार का अभाव हो जाने से तू जन्म-मरणरूप संसार से मुक्त हो जायेगा। तब स्वप्न और जाग्रत् अवस्था में उत्पन्न होनेवाले दुःखों का अनुभव नहीं कर पायेगा। अर्थात् स्वप्न-जागरित दुःख का आत्मधर्मत्वेन तुझे अनुभव नहीं होगा ।। ४८ ।। शिष्य उवाच—का ‡सा अविद्या ? किंविषया वा ? विद्या च काऽविद्यानिवर्तिका यया स्वभावं प्रतिपद्येय ? इति ।।४९।। हृदयस्पर्शिनी शिष्य इति—स्वरूपतः अवगत हुए पदार्थों के सम्बन्ध में अधिक विशेषज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से शिष्य पूछ रहा है। शिष्य बोला—वह अविद्या क्या है ? और उसका विषय क्या है ? अर्थात् वह किसको विषय करती है। तथा वह विद्या क्या है ? जिसके द्वारा मैं अपने स्वभाव को प्राप्त कर सकूँगा। अर्थात् जाग्रदादि अवस्थाओं में भी दुःखानुभवहीन ऐसे आत्मतत्त्व को प्राप्त कर पाऊँगा ।। ४९ ।। गुरुहवाच—त्वं परमात्मानं सन्तमसंसारिणं संसार्यहमस्मीति विपरीतं प्रतिपद्यसे, अकर्तारं सन्तं कर्तेति, अभोक्तारं सन्तं भोक्तेति, विद्यमानं चाविद्यमानमिति— इयमविद्या ।।५०।। हृदयस्पर्शिनी गुरुहरिति—तुम्हारे स्वरूप की आवरणविपर्ययाध्यासलक्षण जो अविद्या है, वह तुम्हारी स्वरूपाश्रयविषया है। अर्थात् कार्यद्वारा अविद्या को दिखाते हुए आत्मा ही उस अविद्या का विषय है। विद्या ही आत्मस्वभाव को बताती हुई उसकी निवर्तिका होती है। गुरु बोले—तुम असंसारी परमात्मा होते हुए अपने को 'मैं संसारी हूँ' ऐसा

  • प्रतिपद्यत, प्रतिपद्येयम् इति—पाठौ । † तस्य—पाठान्तरम् । ‡ साऽवविद्या—पाठान्तरम् ।
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