उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबुद्ध्यारूढप्रकरणम् बुद्ध्यारूढं सदा सर्वं दृश्यते यत्र तत्र वा । मया तस्मात्परं ब्रह्म सर्वज्ञश्चास्मि सर्वगः ॥१॥ बुद्ध्यारूढमिति—मुझे जहाँ-तहाँ, सर्वत्र, सर्वदा बुद्धिवृत्ति पर आरूढ़ हुई ही समस्त वस्तुओं की प्रतीति हुआ करती है, अतः मैं (समस्त दृश्य प्रपञ्च से विलक्षण) सब का साक्षी, सर्वगत ब्रह्म ही हूँ ॥ १ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्वय-व्यतिरेक द्वारा पदार्थों का पर्यालोचन (शोधन) करने वाले को वाक्य से ही वाक्यार्थज्ञान होता है, इस नियम के अनुसार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस प्रकार के वाक्यार्थज्ञान का होना निश्चित है, तथापि अपने अनुभव के बलपर उसे स्पष्ट करने के लिये इस प्रकरण का आरंभ किया जा रहा है । सर्वत्र (जाग्रत् अवस्था में हो या स्वप्नावस्था में हो, इस लोक में हो या परलोक में हो) और सर्वदा, जो कुछ भी (चाहे वह अध्यात्म हो या अधिभूत हो या अधिदैव हो) प्रत्यक्ष होता है या शास्त्र के द्वारा जाना जाता है, वह सब बुद्धिगत विषय ही उपलब्ध होता रहता है। उन विषयों का प्राप्तिकर्त्ता मैं तो निर्विकार हूँ, साक्षी हूँ। निर्विशेष निर्विकार होने से मैं ही परब्रह्म हूँ। सर्व दृश्य विषयों से विलक्षण होने से ‘पर’ हूँ, और प्रपञ्चातीत होने से ‘ब्रह्म’ हूँ। सर्वार्थप्रकाशक (सर्वज्ञ) और अपरिच्छिन्न (सर्वग) हूँ ॥ १ ॥ यथात्मबुद्धिचाराणां साक्षी तद्वत् परेष्वपि । नैवापोढुं न चाऽऽदातुं शक्यस्तस्मात्परो ह्यहम् ॥२॥ यथेति—जिस प्रकार अपनी बुद्धि के स्थूल-सूक्ष्मादि देहरूप विषयों का मैं साक्षी हूँ, उसी प्रकार दूसरों के शरीरों में भी मैं उनका साक्षी हूँ। अतः सर्वगत होने के कारण मेरा ग्रहण या त्याग नहीं किया जा सकता, अतएव मैं समस्त प्रपञ्च से विलक्षण परमात्मा ही हूँ ॥ २ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा को सर्वज्ञ (सर्वार्थप्रकाशक) कहा गया है, किन्तु वह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि अन्य पुरुष की बुद्धि में स्थित वस्तु (विषय) की उपलब्धि या स्मरण किसी अन्य पुरुष को होना कभी संभव नहीं, अतः एक आत्मा में सब की बुद्धियों की अध्यक्षता का कथन संगत नहीं है। कल्पना किये हुए (कल्पित) आत्मीय संघात में बुद्धि और उसकी वृत्तियों का जिस प्रकार मैं साक्षी हूँ, उसी प्रकार परकीयत्वेन कल्पित संघात में भी तत्तद् बुद्धि और उनकी वृत्तियों का मैं ही साक्षी हूँ, क्योंकि भिन्न-भिन्न साक्षी के होने में कोई प्रमाण नहीं है। अभिप्राय यह है कि आत्मा के साथ बुद्धि का संबंध सर्वव्यवहारप्रवर्तक होने के कारण है। ऐसी आत्मबुद्धि (आत्मसंबन्धिनी बुद्धि) का प्रचार (चार) जिनमें है, ऐसे उन अध्यात्म, अधिदैवरूप स्थूल, सूक्ष्म देहों (आत्मबुद्धिचारों) का साक्षी (स्फोरक) जैसे मैं हूँ, वैसे ही परकीय बुद्धिचारों का भी मैं ही साक्षी हूँ। यही अभिप्राय श्रुति से भी अवगत होता है कि एकमात्र चिदेकरस मुझ आत्मा में ही समस्त प्रमातृतद्बुद्धितत्प्रचारगोचर प्रपञ्च कल्पित किया गया है, इस कारण मुझे ‘सर्वज्ञ’ समझना ठीक ही है। इस प्रकार से जब कि मैं सर्वसाक्षी होने के कारण और सर्वाधिष्ठान होने के कारण सर्वज्ञ और सर्वगत हूँ, अतः उसका अपोह (निराकरण) करना उचित नहीं है, अर्थात् ‘यह इसका द्रष्टा नहीं है, यहाँ वह नहीं है, ऐसा निराकरण करना किसी के द्वारा भी संभव नहीं है। इसी प्रकार ज्ञान या क्रिया के द्वारा मुझे प्रकाशित करना या उत्पन्न करना भी संभव नहीं है। क्योंकि मैं ग्राह्य-ग्राहकादि प्रपञ्च से विलक्षण हूँ, अर्थात् हानोपादानादि समस्त सांसारिक व्यवहार के परे हूँ। इसलिये मैं पर (परमात्मा) ही हूँ, क्योंकि भेद की निन्दा शास्त्र में की गई है ॥ २ ॥