उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबुद्ध्यारूढप्रकरणम् ३१ विकारित्वमशुद्धत्वं भौतिकत्वं न चात्मनः। अशेषबुद्धिसाक्षित्वाद्, बुद्धिवच्चाल्पवेदना ॥३॥ विकारित्वमिति—आत्मा में विकारित्व, अशुद्धत्व तथा भौतिकत्व नहीं है। तथा समस्त बुद्धियों का साक्षी होने से उसमें बुद्धि के समान अल्पज्ञता भी नहीं है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्ध्यारूढ (बुद्धिगत) समस्त विषयों को यदि वह क्षेत्रज्ञ प्रकाशित करता है, तो उसे दर्शनक्रिया का कर्ता कहना होगा। कर्ता होने से उसमें विकारित्वादि दोषों का होना अपरिहार्य है, तब तो उसे 'अनात्मा' ही कहना होगा। किन्तु ऐसी आशंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि बुद्धि की तरह उसमें सावयवत्व न होने से उसे विकारी नहीं कह सकते, वह तो समस्त विकारों का साक्षी है। अतएव क्रियागुणयोगित्व (दर्शनक्रियाकर्तृत्व) उसमें न होने से उसकी अशुद्धता का भी निरसन हो जाता है। वह तो सकलगुणक्रियाविशिष्ट वस्तुओं का साक्षी है। उसी तरह रूपरहित होने से उसे भौतिक भी नहीं कह सकते। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि की तरह उस आत्मा में अल्पज्ञान (वेदना) भी नहीं है। जैसे बुद्धि को बुद्धि और उसके संसर्गादिविषयों का ही ज्ञान रहता है, वैसा आत्मा को उतना ही सीमित ज्ञान नहीं है। वह तो अशेष (समस्त) बुद्धियों का साक्षी है, इतना ही नहीं, उसके समस्त विकारों का भी वह साक्षी है। एवंच आत्मा में विकारित्व, सगुणत्व, भौतिकत्व और बुद्धि की तरह अल्पद्रष्टृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि अशेष विकारों का साक्षी होने से विकारित्व नहीं, अशेष अशुद्धियों का साक्षी होने से अशुद्धत्व नहीं, उसी तरह सगुणत्व, सदोषत्व भी नहीं है। समस्त भौतिक पदार्थों का साक्षी होने से वह भौतिक भी नहीं है। सर्व बुद्धियों का साक्षी होने से बुद्धि की तरह अल्पज्ञ भी नहीं है ॥ ३ ॥ मणौ प्रकाश्यते यद्वद्रक्ताद्याकारताऽऽतपे । मयि संदृश्यते सर्वमातपेनेव तन्मया ॥४॥ मणाविति—जिस प्रकार स्फटिक में लालिमा की प्रतीति सूर्य के प्रकाश में होती है, उसी तरह मेरी विद्या- मानता में ही बुद्धिस्थ सम्पूर्ण विषय प्रकाशित होते रहते हैं ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह क्षेत्रज्ञ आत्मा, बुद्धि की तरह अल्पज्ञ नहीं है, यह बताया। जबकि क्षेत्रज्ञ, बुद्धि के समस्त विषयों का ग्राहक है तब तो उसके लिये कोई कर्तव्य बचा ही नहीं। और उसे द्रष्टा मानने पर उसमें विकारित्व तो अर्थात् प्राप्त होता है। निष्कर्ष यह है कि यदि आत्मा को निर्विकार ही मानें तो वह सर्वार्थप्रकाशक कैसे कहा जा सकता है? इस आशंका का समाधान एक दृष्टान्त के द्वारा करते हुए 'निर्विकार' ही सर्वार्थ प्रकाशक हो सकता है यह बता रहे हैं। जैसे स्फटिकमणि में जपापुष्परूप रक्ताकारता के न रहने पर भी, वह सूर्य के प्रकाश में ही अभिव्यक्त होती है, वैसे ही सूर्यस्थानापन्न मुझ क्षेत्रज्ञ के विद्यमान रहने पर ही स्फटिकमणि के स्थानापन्न बुद्धि में जपापुष्प- रक्तता आदि के स्थानापन्न सम्पूर्ण विषय दिखलाई पड़ता है। तस्मात् आतप के समान निष्प्रकम्प मेरे द्वारा ही सब कुछ प्रकाशित किया जाता है। निष्कर्ष यह है कि सूर्यप्रकाश से लालिमा (रक्ताकारता) की प्रतीति की तरह बुद्धिस्थ सम्पूर्ण विषय क्षेत्रज्ञ के द्वारा ही प्रकाशित होने योग्य हैं। अतः क्षेत्रज्ञ का होना आवश्यक है। अतः बुद्धि की तरह वह विकारवान् नहीं है। उसके द्रष्टृत्व को सुनकर उसमें विकारित्व की शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि सूर्य के समान कुछ बिना किये ही अपने व्यापार के बिना ही केवल अपनी सन्निधिमात्र से ही उसमें सर्वविषयप्रकाशकत्व संगत हो जाता है। यदि कदाचित् द्रष्टृत्व के कारण उसके विकारी होने की आशंका से 'बुद्धि' को ही द्रष्ट्री कहें तो वह उचित न होगा। इस रीति से बुद्धि को द्रष्ट्री न मानने पर उसका (बुद्धि का) उपयोग (आवश्यकता) ही क्या है? यह शंका होना स्वाभाविक है, किन्तु उसका समाधान यह है कि 'चैतन्य' में विषयविशेष का आकार देने के लिये उसका (बुद्धिका) उपयोग होता है ॥ ४ ॥ १. ज्ञाल्य.-पाठान्तरम् ।