भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

३२ उपदेशसाहस्री बुद्धौ दृश्यं भवेद्बुद्धौ सत्यां नास्ति विपर्यये । द्रष्टा यस्मात्सदा द्रष्टा तस्माद्द्वैतं न विद्यते ॥ ५ ॥ बुद्धाविति—बुद्धि के रहने पर ही बुद्धि में दृश्य की प्रतीति होती है। उसके न रहने पर नहीं होती, किन्तु साक्षी आत्मा तो सर्वदा ही साक्षी रहता है। इस कारण 'द्वैत' की सत्ता नहीं है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अब प्रत्यगात्मा की अद्वितीयता को बताते हुए उसकी शुद्धता को बता रहे हैं। जाग्रत् ( जागरित ) अवस्था में अविद्या के द्वारा कल्पित ( अध्यस्त ) उस बुद्धि में आरूढ़ हुआ दृश्य ही द्वैतरूप में भासित होता है। सुषुप्ति अवस्था में बुद्धि के न रहनेपर (अविद्या के द्वारा बुद्धि के अध्यस्त न रहनेपर ) वह द्वैतरूप दृश्य नहीं रहता है। अर्थात् द्वैत की सत्ता नहीं रहती। इस व्यभिचार के कारण द्वैत की सत्ता वास्तविक नहीं है। किन्तु साक्षी सभी अवस्थाओं में सर्वदा द्रष्टा ही रहता है, दृश्य की तरह उसकी सत्ता कभी व्यभिचरित नहीं होती। एवंच प्रत्यगात्मा की सत्ता से प्रकाशमानत्व का कहीं व्यभिचार नहीं है। और प्रकाशमानता के साथ व्यभिचार होनेपर 'सत्ता' का होना कभी संभव नहीं हो सकता। तस्मात् सर्वदा प्रकाशमान न होने के कारण द्वैत की सत्ता वास्तविक नहीं है, किन्तु नित्य, शुद्ध, अद्वितीय प्रत्यगात्मा (प्रत्यक् चैतन्य) ही सर्वदा विद्यमान है ॥ ५ ॥ अविवेकात् पराभावं यथा बुद्धिरवैत्तथा। विवेकात्तु परादन्यः स्वयं चापि न विद्यते ॥ ६ ॥ अविवेकादिति—जिस प्रकार अविवेक के कारण बुद्धि को परात्मा के अभाव की प्रतीति होती थी, उसी प्रकार अब विवेक हो जाने पर उस परात्मा से भिन्न वह बुद्धि स्वयं भी नहीं रहती ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अविद्या से द्वैत की प्रतीति होती है और विद्या से द्वैत की प्रतीति नहीं होती, यह बता चुके; उसी तरह आत्मा के साथ उनका (विद्या, अविद्या का) संसर्ग न होने से प्रत्यगात्मा की शुद्धता में कोई हानि नहीं है। किन्तु वह विद्या और अविद्या साभास बुद्धि की ही हैं। द्वैत की वास्तविक सत्ता न होने से द्वैतसंसर्गकृत 'अशुद्धता' आत्मा में नहीं है, तथापि विद्या-अविद्या के सम्बन्ध होने से आत्मा में अशुद्धि हो सकती है। अविवेक उसे कहते हैं कि जहाँ भेद (विवेक) की प्रतीति (ज्ञान) नहीं हो पाती, जैसे अनात्मा (देह आदि) में आत्माभिमान (आत्मबुद्धि), अर्थात् विपर्ययज्ञान । इस अविवेक (मिथ्या ज्ञान ) के कारण असंसारी तथा सर्वसाक्षी होने के कारण अनात्मवर्ग से भिन्न उस 'पर' आत्मा के अभाव (असत्त्व) को रजस्तमोगुण की अधिकता के कारण बुद्धि ने समझा था, वैसे ही विवेक के हो जाने पर (समस्त अनात्म पदार्थों का निरसन करते हुए आत्मस्वरूप का निर्धारण होनेपर) असंसारी परमात्मा से भिन्न कोई नहीं है। यह जीवात्मा भी उससे भिन्न नहीं है। विवेक के समय 'सत्त्व' का उद्रेक हो जाता है। अतएव श्रवणादि का अनुष्ठान करते हुए ब्रह्मात्मैकत्वविषयक वेदान्तवाक्योत्पन्न उस विवेकज्ञान से परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी उसे दिखाई नहीं देता। अपने कारण सहित वह साभास बुद्धि भी अपना अस्तित्व खो बैठती है, क्योंकि उस समय सभी कुछ प्रत्यग् ब्रह्मरूप हो जाता है। एवञ्च विद्या-अविद्यारूप सम्यग् ज्ञान और भ्रान्तिज्ञान भी बुद्धि के होने के कारण आत्मा में अशुद्धि का गन्ध भी नहीं है ॥ ६ ॥ ॥ इति सप्तमं बुद्ध्यारूढप्रकरणं समाप्तम् ॥