उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ उपदेशसाहस्री एक अन्य प्रकार से भी इस श्लोक को लगाया जा सकता है— हे बुद्धे ! 'असदीहितात्' स्वतः स्वरूपशून्य होने के कारण देह, इन्द्रिय आदि असत् विषयों (असत् विषयों की सहायता) से अभिलषित (ईहित) दृष्ट अथवा अदृष्ट फल प्राप्त करना चाहती हो तो उससे भी शांत हो जाओ, अर्थात् जाग्रत् अवस्था में भी उसके लिए कोई व्यापार (प्रयत्न) न करो। दृष्टादृष्ट फलप्राप्ति के लिये प्रयत्न करना छोड़कर चुपचाप बैठी रहो। इतना ही नहीं, बल्कि तुम अपने स्वरूप (अविद्याजनित बुद्धिरूपकार्यता) का भी त्याग करो। और 'मायां अय'-अपनी कारण रूप 'माया' के प्रति जाओ अर्थात् अपने कारण में लीन हो जाओ। अपने कारण (माया) में जब स्थित हो जाओगी तब पुनः तुम्हें उत्पन्न होने का भय नहीं रहेगा, क्योंकि तदनन्तर 'इह' मेरे स्वरूप में ही प्रविष्ट हो जाओ अर्थात् प्रतप्त लोहे पर पतित उदकबिन्दु की तरह अपनी कार्य-कारणरूपता का त्याग कर मेरे रूप में ग्रस्त हो जाओ। 'अपने मुख में समस्त ब्रह्माण्ड को एक कौर (ग्रास) बनाकर रखने वाली मैं (बुद्धि) जब तुम्हें चलायमान कर दूँगी, तब मैं तुम्हारे द्वारा ग्रस्त कैसे हो पाऊँगी ?' यह शंका भी मत करना, क्योंकि तुम कभी भी मुझे चलायमान नहीं कर सकती। मुझे चलायमान कर देने का तुम्हें केवल भ्रम है। क्योंकि मैं 'अयमात्मा ब्रह्म'— (बृ० उ० २।५।२९) श्रुति के अनुसार सदा ही परं ब्रह्म हूँ। 'विमुक्तवत्' यह ब्रह्म का विशेषण है। यहां स्वार्थ में तद्धित प्रत्यय है। तब अर्थ होगा कि 'मैं नित्य मुक्त ही हूँ' ॥ २ ॥ सदा च भूतेषु समोऽस्मि केवलो यथा च खं सर्वगमक्षरं शिवम् । निरन्तरं निष्कलमक्रियं परं ततो न मेऽस्तीह फलं तवेहितैः ॥३॥ सदेति—नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप मैं यच्चयावत् समस्त भूतों में सदा ही समान भाव से स्थित रहता हूँ। तथा आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त, अविनाशी, कल्याणस्वरूप, निरन्तर, निष्कल, निष्क्रिय और परब्रह्मस्वरूप हूँ। अतः हे बुद्धे ! तेरी चेष्टाओं से मुझे कोई फल नहीं होना है ॥ ३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अजातवादिप्रतिपादक शास्त्र से यह बताया गया है कि परब्रह्म निर्विशेष (विशेषरहित) होने के कारण नित्य मुक्त (सदा विमुक्त) है, किन्तु प्रत्यगात्मा (जीवात्मा) तो देहादिकों में अन्वित होने से उसमें विशेषता प्रतीत होती है, ब्रह्म की तरह उसमें निर्विशेषता नहीं है। अतः उस प्रत्यगात्मा में ब्रह्मरूपता का होना कैसे संभव हो सकता है? निर्विशेष ब्रह्म की तरह यह सविशेष प्रत्यगात्मा नित्य मुक्त कैसे कहा जा सकता है? अतः ब्रह्म और आत्मा की एकता का होना कभी संभव ही नहीं। किन्तु इस प्रकार शंका करना ठीक नहीं है, क्योंकि मैं (प्रत्यगात्मा) तो 'केवल' हूँ, अर्थात् अविद्या और उसके कार्यरूप विशेषणों से रहित हूँ। समस्त भूतों में समभाव से (एक-सा) ही रहता हूँ, अर्थात् उपाधिपरामर्श (उपाधिनिर्देश) किये बिना मुझमें विशेषता का उल्लेख नहीं किया जाता। उपाधि के द्वारा ही मुझे सविशेष कहा जाता है, वास्तव में तो मैं निर्विशेष ही हूँ। अपनी निर्विशेषता में दृष्टान्त 'ख' (आकाश) का दे रहे हैं। आकाश का असंगत्व आदि तो प्रसिद्ध ही है, उसमें किसी को भी सन्देह नहीं है। 'सर्वगम्' आदि का निर्देश ब्रह्म और आकाश दोनों के लिये समान है। जब कि आकाश के समान मैं 'केवल' और समस्त भूतों में समभाव से हूँ, अतः आकाश के स्वभाव से उपमित हुआ और सर्वगम् आदि विशेषणों वाला परब्रह्म ही मैं हूँ। इस प्रकार ब्रह्मात्मैक्य का उपपादन करने का परिणाम यह है कि बुद्धि की चेष्टाओं का मुझपर कोई प्रभाव नहीं है ॥ ३ ॥ अहं ममैको न मदन्यदिष्यते तथा न कस्याप्यहमस्म्यसङ्गतः । असङ्गरूपोऽहमतो न¹ मे त्वया कृतेन कार्यं तव चाद्वयत्वतः ॥४॥ अहमिति—मैं एक हूँ, अपने से भिन्न कुछ भी मुझे इष्ट नहीं है, तथा असंग होने के कारण मैं किसी के भी अधीन नहीं हूँ, मैं असङ्गरूप हूँ, अतः हे बुद्धे ! तेरे किये हुए व्यापारों से मुझे कोई प्रयोजन नहीं है और तू भी तो अद्वय ब्रह्मरूप ही है ॥ ४ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धि कहने लगी कि हे आत्मन् ! तुम ब्रह्मरूप हो इसलिए मेरी चेष्टाओं का तुम्हें कोई उपयोग न होनेपर भी, तुम्हारे प्रति गुणभूत (अंगभूत) या प्रधानभूत बने हुए किसी तुम्हारे संबंधी को ही मेरी चेष्टा से कदाचित् १. तदन्य०—पाठान्तरम् ।