भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

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(कथञ्चित्) कोई उपयोग हो जाय ? इसप्रकार बुद्धि के कहनेपर प्रत्यगात्मा ने उत्तर दिया कि हे बुद्धे ! इस रीति से भी तुम्हारी चेष्टाओं का उपयोग होना संभव नहीं है । क्योंकि मैं एकाकी ही हूँ, वास्तव में मुझ चित्स्वरूप का कोई सजातीत, विजातीय, स्वगतभेद भी नहीं है । अतः न मेरा कोई गुणभूत (अंग) है और न ही कोई प्रधानभूत (अंशी) है, जिसका मैं अंग बनूँ, अर्थात् न मेरा कोई अंग है और न मैं किसी का अंग हूँ। क्योंकि मैं असंगरूप हूँ, इसलिये मुझे तेरी चेष्टाओं से कोई प्रयोजन नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि तुम स्वयं भी तो नहीं हो; जब स्वयं तुम ही नहीं, तब तुम्हारी चेष्टाएँ और उनका फल तो दूर ही रहा। तुम तो मेरे स्वरूप (ब्रह्मात्मैक्य) के अज्ञान से कल्पित हो। मेरा स्वरूप ही तो तुम्हारा अधिष्ठान है, उस अधिष्ठान से तुम अतिरिक्त नहीं हो। उपकार्योपकारक भाव (अंगांगिभाव) तो भेद होनेपर (दो वस्तुओं में) होता है, अभेद में (एक वस्तु में) नहीं। इसलिये व्यर्थ की कल्पनाएं मत करो, शान्त हो जाओ । मुझ प्रत्यगात्मा में तुम्हारा शान्त होना ही उचित है ॥ ४ ॥ फले च हेतौ च जनो विषक्तवान् इति प्रचिन्त्याहमतो विमोक्षणे । जनस्य संवादमिमं प्रक्लृप्तवान् स्वरूपतत्त्वार्थविबोधकारणम् ॥५॥ फलेचेति-सर्वसाधारण अज्ञानी लोग कार्य-कारण रूप (फल-हेतुरूप) संसार में विशेष (अधिक) आसक्त हैं, यह सोचकर उन्हें इस आसक्ति से छुड़ाने के लिये मैंने आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध कराने वाले 'आत्म-बुद्धि संवाद' प्रकरण की रचना की है ॥ ५ ॥ हृदयस्पर्शिनी पाठकों के मन में यह जिज्ञासा हो सकती है कि भगवत्पूज्यपाद आर्चायचरण तो स्वयं कृतार्थ हैं, तब इस प्रकरणग्रन्थ के लिखने की उन्हें क्या आवश्यकता पड़ी ? उन्हें ख्याति (लोकैषणा) की अपेक्षा (इच्छा) तो थी नहीं । इस जिज्ञासा के समाधानार्थ ही कहा जा रहा है कि स्वानुभवसिद्ध अर्थ के आविष्कारक इस प्रकरणग्रन्थ की रचना में उनकी प्रवृत्ति होने का एकमात्र कारण 'दुखी लोगों को देखकर हृदय में उमड़नेवाली करुणा' ही है, ख्याति (लोकप्रसिद्धि) प्राप्त करना नहीं¹ । यह अज्ञानीवर्ग हेतुफलात्मक संसार में अत्यधिक आसक्त है, यह सोचकर उस अज्ञानीवर्ग को इस संसार (पुनरपि जननं पुनरपि मरणम्) से मुक्त कराने के लिए 'मत्यात्मसंवाद' रूप ग्रन्थ का प्रणयन (रचना) श्री आचार्यचरण ने किया है। इस संवाद के द्वारा आत्मा के नित्यचैतन्यस्वरूप की ब्रह्मता का सुस्पष्ट बोध हो जाता है। पदार्थविवेक के द्वारा यह संवाद ही आत्मा के स्वरूप में ब्रह्मरूपता का ज्ञान कराने में कारण है। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म दोनों का स्वरूप एक ही है। आत्मा और ब्रह्म भिन्न-भिन्न नहीं हैं ॥ ५ ॥ संवादमेतं यदि चिन्तयेन्नरो विमुच्यतेऽज्ञानमहाभयाद्गमात् । विमुक्तकामश्च तथा जनः सदा चरत्यशोकः सम आत्मवित्सुखी ॥६॥ संवादमिति-यदि मनुष्य इस संवाद का निरन्तर चिन्तन करता रहे तो वह अज्ञानरूप महान् भय की प्राप्ति से मुक्त हो सकता है, और तब समस्त कामनाओं से मुक्त हुआ वह मनुष्य सदा शोकरहित, समदर्शी, आत्मज्ञ और सुखी होकर अपने ब्रह्मस्वरूप में ही विचरता (रममाण) रहता है ॥ ६ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की ब्रह्मात्माधिगति में हेतुभूत यह संवाद है। अतः साध्य-साधनपर्यावर्तलक्षण संसार से मुक्ति की इच्छा करने वाले को इस संवाद का चिन्तन बराबर करते रहना चाहिये, जिससे ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति होगी, तब वह जीवित रहता हुआ ही कृतकृत्य हो जायगा । संसाररूप महान् भय के हेतुभूत अज्ञान से छुटकारा पा सकेगा । जब अज्ञानरूप कारण की निवृत्ति हो जायगी तब कार्य की निवृत्ति होना अर्थात् ही सिद्ध है। तब वह बन्धप्रतिभास- रहित होकर जीवित रहता हुआ भी अपने ब्रह्मस्वरूप में विचरण करता हुआ (रममाण रहता हुआ) कृतकृत्य हो जाता है। अतः मुमुक्षु को इस संवाद का अनुसन्धान निरन्तर करते रहना चाहिए ॥ ६ ॥ ॥ इति अष्टमम्मतिविलापनप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. नै. सि. १।६ ]