भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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प्रतिपाद्यविषयानुक्रम-बोधिनी पद्यभागः १. उपोद्घातप्रकरणम् (पृ० १-१५) श्लोकसंख्या १. मंगलाचरणपूर्वक ब्रह्मविचारारंभ का समर्थन ... ... १-५ २. ज्ञान ही मोक्षप्राप्ति में एकमात्र कारण है ... ... ६-७ ३. ज्ञान-कर्मसमुच्चयवाद और उसका खण्डन ... ... ८-१५ ४. कर्मकाण्ड के अप्रामाण्य की शंका और उसका खण्डन ... ... १६-१७ ५. अविद्या की पुनः अनुत्पत्ति ... ... १८-१९ ६. किसी सहकारी की अपेक्षा के बिना ही विज्ञा (ज्ञान) मोक्ष-प्राप्ति में कारण है ... ... २०-२४ ७. ‘उपनिषद्’ शब्द के अर्थ का प्रतिपादन ... ... २५-२६ २. प्रतिषेधप्रकरणम् (पृ० १६-१८) १. वाक्य से ब्रह्मात्मज्ञान की अनुत्पत्ति की आशंका और उसका परिहार ... ... १-२ २. उत्पन्न हुए ब्रह्मात्मज्ञान के बाध की प्रत्यक्षादि प्रमाण के द्वारा शंका और उसका निरसन ... ... ३-४ ३. ईश्वरात्मप्रकरणम् (पृ० १९-२०) १. जीव-ब्रह्म दोनों का अभेद ... ... १-२ २. अभेद न मानने पर श्रुतिवाक्यों की अनुपपत्ति का प्रदर्शन ... ... ३-४ ४. तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् (पृ० २१-२३) १. संचित कर्म, प्रतिबन्धक रहने से आत्मज्ञान, मोक्ष का साधन कैसे हो सकता है—यह आशंका ... ... १-२ २. प्रारब्धकर्म का फलभोग समाप्त होने पर ज्ञान की उत्पत्ति होती है, यह समाधान ... ... ३-५ ५. बुद्धयपराधप्रकरणम् (पृ० २४-२६) १. आत्मस्वरूप का ज्ञान न हो पाने में उदङ्क की आख्यायिका का वर्णन ... ... १ २. संसारविभ्रम के होने में कारण और प्रमाण ... ... २-४ ३. मुमुक्षु को पदार्थविवेकशील होने का उपदेश ... ... ५ ६. विशेषापोहप्रकरणम् (पृ० २९-२९) १. स्थूल उपाय से पदार्थशोधन के प्रकार का उपदेश ... ... १-२ २. विशेषणों की अनात्मता ... ... ३-४ ३. आत्मा की अन्यनिरपेक्ष स्वतःसिद्धि ... ... ५-६ ७. बुद्ध्यारूढप्रकरणम् (पृ० ३०-३२) १. निर्धारित वाक्यार्थ के विषय का स्वानुभव से स्पष्टीकरण ... ... १-२ २. आत्मा में विकारित्व आदि दोषाभावों का उपपादन ... ... ३-४ ३. आत्मा का शुद्धत्व और अद्वितीयत्व ... ... ५-६