भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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८. मतिविलापनप्रकरणम् (पृ० ३३-३५) १. आत्मा और मन के संवाद के द्वारा मनोलय का उपदेश ... ... १-४ २. इस प्रकरण की रचना में दुःखपीड़ित लोगों के प्रति करुणा ही एकमात्र कारण है ... ... ५-६

९. सूक्ष्मताव्यापिताप्रकरणम् (पृ० ३६-४०) १. आत्मा की निरतिशय सूक्ष्मता और व्यापकता ... ... १-३ २. ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक सभी कोई 'आत्मा' के ही शरीर हैं ... ... ४-६ ३. आत्मस्वरूपज्ञान की निर्विषयता और नित्यता ... ... ७-९

१०. दृशिस्वरूपपरमार्थदर्शनप्रकरणम् (पृ० ४१-४८) १. आत्मा की निर्विषयज्ञानस्वभावता का स्वानुभव के अभिनय के द्वारा प्रकटन ... ... १-२ २. जन्म-जरा आदि विकारों के न होने से आत्मा की कूटस्थता एवं अद्वयता का उपपादन ... ... ३-९ ३. आत्मज्ञान का फल कैवल्य है ... ... १०-१२ ४. आत्मज्ञानी का स्वरूप ... ... १३-१४

११. ईक्षितृत्वप्रकरणम् (पृ० ४९-५५) १. ज्ञान-कर्मसमुच्चय मानने में अनुपपत्ति ... ... १-३ २. द्वैत (भेद) के अभाव में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध रहने से लौकिक एवं वैदिक व्यवहार के लोप हो जाने का प्रसङ्ग और उसका निराकरण ... ... ४-१४ ३. अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति कर्म से नहीं हुआ करती ... ... १५-१६

१२. प्रकाशप्रकरणम् (पृ० ५६-६४) १. साभास अन्तःकरण और आत्मा दोनों के अविवेक से यथार्थ आत्मस्वरूप का ज्ञान नहीं होता है .. १-४ २. आत्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान कराने के लिये श्रुति 'तत्-त्वम्' का उपदेश दे रही है ... ... ५-१५ ३. चित्रप्रकाश की नित्यता का उपपादन करते हुए 'आत्मा' में नियोज्यता के होने का प्रतिपादन ... ... १६-१९

१३. अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् (पृ० ६५-७३) १. आत्मा की शुद्धता और अचलता की व्यवस्था का निरूपण .... .... १-१० २. संसार से निवृत्ति के उपायों (साधनों) की शिक्षा .... .... ११-१३ ३. आत्मा के अविकारित्व का निश्चय होने पर समाधि और विक्षेप की अवस्था नहीं होती .... .... १४-१८ ४. वह एक आत्मतत्त्व ही समस्त प्राणियों के भीतर स्थित रहने से उसकी पूर्णब्रह्मरूपता का अनुभव होने का औचित्यनिरूपण .... .... १९-२४ ५. 'मैं ब्रह्म हूँ' - यह अनुसन्धान सर्वदा करते रहने का प्रोत्साहन, मुमुक्षु को गुरु देता रहे .... .... २५-२६ ६. उक्त अर्थ के ग्रहण करने योग्य मुख्य अधिकारी २७

१४. स्वप्नस्मृतिप्रकरणम् (पृ० ७४-९४) १. अन्तःकरण की अपरोक्षता और उसका फल .... .... १-१० २. आत्मा में हेयोपादेयता की कल्पना नहीं की जा सकती, यह अनुभव से भी जाना जा सकता है .... .... १०-१५ ३. चिन्मयी दृष्टि हो जाने पर स्मरण या विस्मरण भी नहीं होता है .... ... १६-१९ ४. द्रष्टा-श्रोता-मन्ता-विज्ञाता ही वह अक्षर ब्रह्म है .... ... २०-२२ ५. आत्मज्ञानी का कर्म सफल होता है, यह शंका और उसका निवारण ... ... २३-२६

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