भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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७० उपदेशसाहस्री 'यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते१' ॥ ब्रह्मवेत्ता की यह महिमा नित्य है, जो कर्म से न तो बढ़ती है और न घटती ही है। जो पुरुष केवल आत्मा में क्रीड़ा करता है, आत्मा में तृप्त रहता है और आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष रहता ही नहीं । एवं च अज्ञान के अभाव में उसके लिये अब कुछ भी कर्तव्य नहीं है ॥ १७ ॥ अहं ब्रह्मास्मि सर्वोऽस्मि शुद्धो बुद्धोऽस्म्यतः सदा । अजः सर्वत एवाहंमजरश्चाक्षयोऽमृतः ॥१८॥ अहम् इति—मैं ब्रह्म हूँ, मैं सर्वरूप हूँ, इस कारण मैं सदा ही शुद्ध [निर्विकार] और बोध [ज्ञान] स्वरूप हूँ । मैं सब ओर से अजन्मा तथा अजर, अक्षय और अमर हूँ ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यद्यपि आत्मज्ञानी के लिये समाधि आदि कुछ भी कर्तव्य नहीं है, तथापि आत्मा में ब्रह्मत्व सम्पादन कर प्रपञ्च का विलय करना तो अभी अवशिष्ट है ही—यह शंका हो सकती है। अर्थात् परम आत्मा के ध्यान आदि से जो कृतकृत्यता होती है, वह आत्मा के ध्यान आदि से कैसे होगी ? उक्त शंका का समाधान ग्रन्थकार ने यह दिया है कि आत्मा की ब्रह्मरूपता तो नित्य सिद्ध है, अर्थात् जो आत्मा है वही परमात्मा है, ब्रह्म और आत्मा ये दो नहीं हैं, यानी अभिन्न हैं। और प्रपञ्च तो केवल अज्ञान का विलास मात्र है। अज्ञान की निवृत्ति होने के समय में ही वह प्रपञ्च, अधिष्ठान (ब्रह्म) के रूप में विलीन रहता है। अतः उस आत्मज्ञानी के लिये कुछ अनुष्ठेय (कर्तव्य) नहीं रहता । वह (मैं) सदा ही ब्रह्मरूप, सर्वरूप, शुद्ध, बुद्ध होने से बन्धहीन है। और वह (मैं) सब प्रकार से अज एवं अक्षय रहने से जन्म और क्षय के हेतु से रहित है ॥ १८ ॥ मदन्यः सर्वभूतेषु बोद्धा कश्चिन्न विद्यते । कर्माध्यक्षश्च साक्षी च चेता नित्योऽगुणोऽद्वयः ॥१९॥ मदन्य इति—अखिल प्राणियों में मेरे अतिरिक्त कोई अन्य बोद्धा नहीं है, तथा मैं ही समस्त कर्मों का द्रष्टा, साक्षी, प्रकाशक [चेता], नित्य, निर्गुण और अद्वय हूँ ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न चेतन (चैतन्य) भासता है, ऐसी स्थिति में आत्मा को 'अहं ब्रह्मास्मि' = मैं ब्रह्म हूँ—इस प्रकार पूर्णता का अनुभव कैसे हो सकता है ? अर्थात् आत्मा को ब्रह्मरूप कैसे समझ सकते हैं ? इसके उत्तर में आचार्यचरण श्वेताश्वतरोपनिषद् की एक श्रुति का अर्थ पद्य के द्वारा बता रहे हैं। श्वेताश्वतरोपनिषद् की श्रुति इस प्रकार है— “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च२” ॥ उपर्युक्त श्रुति ने यह बताया है कि एक ही चेतन (चैतन्य) समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है अर्थात् सर्वभूतान्तरात्मा है। भिन्न-भिन्न चेतन नहीं है। चेतन में जो भिन्नता भासित होती है, वह उपाधि की भिन्नता से भासित होती है; जैसे आकाश एक है तथापि घट-मठादि उपाधियों की भिन्नता से उसमें (आकाश में) भी भिन्नता भासित होने लगती है; किन्तु उपाधि के हट जाने पर उस निरुपाधिक की स्वाभाविक एकता का ज्ञान होने लगता है। अतः मेरे (चेतन के) अतिरिक्त अन्य कहीं कोई नहीं है। कर्म के कर्ता के रूप में जो लोग मुझे समझते हैं, वह उनका भ्रम है। क्योंकि मैं कर्म का कर्ता नहीं हूँ, अपितु समस्त कर्मों का द्रष्टामात्र हूँ। चेता अर्थात् विशेषतः विज्ञाता हूँ, साक्षीमात्र हूँ। अतः आत्मा में पूर्णता (ब्रह्मरूपता) का अनुभव, आत्मज्ञानी को होता रहता है ॥ १९ ॥ १. भ. गी. ३।१७ २. श्वे. उ. ६।११