भारतकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

अचक्षुष्ट्वप्रकरणम् ७१ न सच्चाऽहं न चासच्च नोभयं केवलः शिवः। न मे सन्ध्या न रात्रिर्वा नाहर्वा सर्वदा दृशेः ॥२०॥ न सदिति—न मैं 'सत्' हूँ अर्थात् व्यक्तभूत [पृथ्वी, जल और तेज] स्वरूप हूँ, और न 'असत्' [वायु और आकाश—दो अव्यक्तभूत] स्वरूप हूँ, तथा न 'सदसत्' [पञ्चभूतात्मक शरीर] उभयस्वरूप हूँ। मैं तो केवल [निर्विशेष], शिव-स्वरूप [त्रिगुणातीत] हूँ। न मेरे लिये सन्ध्या है, न रात्रि है और न दिन है, क्योंकि मैं नित्यसाक्षी स्वरूप हूँ ॥ २० ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' के द्वारा प्रतिपादित आत्मा की ब्रह्मरूपता तो उचित है, क्योंकि वह (आत्मा) निर्विशेष (समस्त विशेषताओं से रहित) होने से किसी भी क्रिया में वह शेष (अंग, साधन) नहीं हो सकता—इसी अभिप्राय को पूर्वार्ध के द्वारा बताया है। इस पद्य के पूर्व अठारहवें पद्य में 'सर्वोऽस्मि' कहा था, उसे किसी अनुपपत्ति के उपस्थित होने पर सामानाधिकरण्य के अभिप्राय से समझना चाहिये। प्रत्यक्ष के योग्य मूर्त पृथिव्यप्तेजोरूप तीन भूतों को 'सत्' कहते हैं। और 'त्यत्' शब्द से निर्दिष्ट अमूर्त वाय्वाकाशात्मक दो भूतों को 'असत्' कहते हैं। तथा मूर्ताऽमूर्तात्मक भूतपञ्चक अर्थात् पञ्चभूतों के परिणामस्वरूप शरीरसंस्थान को उभय (सदसद्रूप) कहते हैं। 'तत्सर्वं नाहम्' = वह सब मैं नहीं हूँ, ऐसा कहने पर 'नेति नेति' से मुझपर आरोपित का ही निषेध होने से मेरे अतिरिक्त और मुझमें भी अन्य की सत्ता न रहने के कारण 'मैं ही यह सब कुछ हूँ'—यह उचित ही कहा गया है। 'केवल' का अर्थ सर्वविशेषशून्य और 'शिव' का अर्थ निस्त्रैगुण्य होता है। मुझमें सन्ध्या आदि कालविशेष का भी सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि मैं अलुप्तप्रकाशरूप हूँ। अथवा 'सन्ध्यादि' शब्दों से क्रमशः स्वप्न, सुषुप्ति, जागरण अवस्थाओं को समझना चाहिए। मैं तो सदैव एक-सा प्रकाशमान हूँ। अतः स्वरूपावरण-विक्षेपरूप अवस्थाएँ मुझसे कैसे सम्बन्धित हो सकती हैं ? एवञ्च सर्वविशेषशून्यता के कारण परिशुद्ध रहनेवाले मुझ आत्मा में ब्रह्मरूपता उपपन्न होती है ॥ २० ॥ सर्वमूर्तिवियुक्तं यद्यथा खं सूक्ष्ममद्वयम् । तेनाप्यस्मि विना भूतं ब्रह्मैवाहं तथाऽद्वयम् ॥२१॥ सर्वैति—जैसे आकाश सर्वविध आकारों से रहित, सूक्ष्म और अद्वितीय है, वैसे ही मैं भी अद्वय ब्रह्मरूप हूँ, और उस आकाश के विना भी विद्यमान रहता हूँ ॥ २१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसके पूर्व पद्य में बताया था कि चिदेकतान (सर्वदा एकरूपेण प्रकाशमान) निर्विशेष आत्मा, ब्रह्मरूप होने से (वह) पूर्ण है। इसी बात को दृष्टान्त के द्वारा हृदयंगम करा रहे हैं। जैसे आकाश, सभी परिच्छिन्न आकार वाले आकाशों से विलक्षण है, इस कारण वह (आकाश) सूक्ष्म लक्षित होता है, वैसे ही यह ब्रह्म, परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म तथा द्वैताभावोपलक्षित माना जाता है। एवञ्च ब्रह्म के अद्वितीय रहने से और आत्मा का उससे भेद न होने से (अनन्यता रहने से) 'ब्रह्मैवाऽस्मि'—यह अनुभव होता है। उक्त युक्ति से आत्मा की पूर्णता सिद्ध होने पर भी पुनः एक शङ्का उत्पन्न होती है कि ब्रह्म और आकाश दोनों में एक दृष्टान्त है और एक दाष्ट्रान्त है, अर्थात् दोनों में दृष्टान्त- दाष्ट्रान्तिकभाव (उपमानोपमेयभाव) है, उस कारण ब्रह्म से भिन्न आकाश की सत्ता सिद्ध होने से दोनों में भेद ही सिद्ध होता है, तब ब्रह्म को अद्वितीय कैसे कह सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आचार्यचरण इस प्रकार दे रहे हैं— 'तेनाप्यस्मि विनाभूतम्' मैं (आत्मा-ब्रह्म) उसके (आकाश के) बिना भी विद्यमान रहता हूँ। यद्यपि 'आकाश' सबसे सूक्ष्म है, व्यापक है, कल्पान्त तक स्थायी है, इसलिए व्यावहारिक दृष्टि से उसे (आकाश को) नित्य कहते हैं, तथापि कल्पान्त में आकाश की स्थिति नहीं रहती, इस कारण उसकी नित्यता वास्तविक नहीं है। वास्तविक नित्य तो ब्रह्म ही है, क्योंकि वह सृष्टि के आदि में और कल्पान्त (प्रलय) में भी अर्थात् दोनों ही समय समान रूप से वर्तमान रहता है। अतः उसके अद्वैत भाव में कोई क्षति नहीं है। उपर्युक्त पद्य में 'सूक्ष्ममद्वयम्' और 'तथाऽद्वयम्'—इस प्रकार 'अद्वय' पद की पुनरावृत्ति की शंका का निरसन इस प्रकार होगा कि प्रथम 'अद्वय' पद का सम्बन्ध 'आकाश' के साथ और द्वितीय 'अद्वय' पद का सम्बन्ध 'ब्रह्म' के साथ समझना चाहिये ॥ २१ ॥