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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 112

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ वेदों की शाखाएँ वैदिकवाङ्मय में 'शाखा' शब्द अत्यधिक प्रचलित है। यह शब्द आजकल के नवीन प्रचलित शब्द 'संस्करण' के अत्यधिक निकट जान पड़ता है। प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को वेद का मौखिक ज्ञान कराता था, वह शिष्य अपने शिष्यों को गुरु सदृश पुनः वेद का ज्ञान कराता था। इस प्रकार वेद सम्बन्धी ज्ञान का हर पीढ़ी में नया संस्करण हो जाता था। वस्तुतः वेदों से सम्बन्धित साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखने में इन ब्राह्मण-वंशों का योगदान श्लाघनीय है। उन पुरातन ब्राह्मणवंशों में परम्परा से इस कार्य हेतु जो अभिधान प्रचलित हुआ वह 'शाखा' कहलाता है। शाखाएँ :- आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द के मतानुसार शाखाएँ वेद का मूल नहीं हैं अर्थात् वास्तविक वेद नहीं है। ये तो संहिताओं के प्रवचन मात्र हैं। जिस प्रकार किसी वृक्ष की मूल शाखाएँ तथा उन शाखाओं पर पत्र, पुष्प तथा फलादि की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार वैदिकवाङ्मय रूपी वृक्ष का मूल तो चार वेद ही हैं- ऋक्, यजुः, साम एवं अथर्व, किन्तु शाखाएँ अनेक हैं; यथा- शाकल, वाष्कल, वाजसनेय, मौद तथा पैप्पलाद आदि। वृक्ष के मूल से ही विभिन्न शाखाओं के उत्पन्न होने के सदृश ये शाखाएँ भी मूल वेदों से उत्पन्न हुईं। इस बात की पुष्टि व्यासजी ने भी महाभारत में की है। अपने ग्रंथ महाभारत में उन्होंने लिखा है कि- अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवः प्रभोः। तेन भिन्नास्तदा वेदाः मनोः स्वायंभुवेन्तरे। (३४५.४२, शान्तिपर्व) अर्थात् वाग्देवी सरस्वती के सुत अपान्तरतमा ने स्वायंभुव मनवन्तर में मूल वेदों को शाखाओं में विभाजित किया। कवि जैमिनि ने भी अपनी 'पूर्वमीमांसा' में लिखा है कि 'आख्या प्रवचनात्' (१/१/३०) अर्थात् 'शाखा' अभिधान का हेतु प्रवचन ही है। जिस प्रकार वृक्ष की शाखाएँ, मूल का उपबृंहण होती है, उसी प्रकार वैदिक शाखाएँ भी मूल वेद-वृक्ष का उपबृंहण है तथा उपबृंहण शब्द प्रवचन एवं व्याख्या शब्दों का पर्याय भी है। महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार 'वेद' तो ईश्वरीय ज्ञान है। उनके मन्त्रों को प्राचीन ऋषियों ने लिखा नहीं है, अपितु अपने ध्यान नेत्रों से ईश्वरकृत मन्त्रों का CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar