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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 85 साक्षात्कार किया है। किन्तु शाखाओं के साथ यह बात नहीं है। वेद तो अपौरुषेय है किन्तु शाखाएँ पौरुषेय हैं। पतञ्जलि का कथन है कि- “न नु चोक्तं नहि छन्दांसि क्रियन्ते। नित्यानि छन्दासीति। यद्यप्यर्थोनित्यः यत्त्वसौवर्णानुपूर्वीऽसावनित्या। तद्भेदाच्च एतद्भवति काठकं, कापालकं, मौदकं, पैप्लादकं” अर्थात् वेद न तो कहे गए और न बनाए ही गए। वेद तो नित्य हैं। किन्तु जो वर्णानुपूर्वी है वह अनित्य है और वही काठक, कापालक, मौदक तथा पिप्पलाद आदि भेदों में दृष्टिगत होता है। यह भेद मन्त्रपाठ की विभिन्न विधियों में दृष्टिगोचर होता है। याज्ञिक अनुष्ठानों के समुचित सम्पादन के लिए संहिताओं का सङ्कलन हुआ। इस वैदिक पठन-पाठन को नष्ट न होने की दृष्टि से व्यासजी ने अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढ़ाया। यह बात भागवत के अन्तर्गत स्पष्ट की गई है— ‘तत्रर्ग्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः॥ वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामृत। अथर्वाङ्गिरसामासीत् सुमन्तुर्दारुणो मुनिः॥’ ( भागवत १/४/२२) अर्थात् ऋषि ‘पैल’ को ऋग्वेद, कवि ‘जैमिनि’ को सामवेद, ‘वैशम्पायन’ को यजुर्वेद तथा ‘सुमन्तु’ मुनि को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। इस प्रकार गुरुओं से प्राप्त ज्ञान को शिष्यों में बढ़ाते हुए इन ऋषियों ने वैदिक ज्ञान का अतिशय प्रचार किया। इसी से यह वेदवृक्ष विविध शाखाओं से युक्त होकर विशाल वट वृक्ष के सदृश बन गया। चरण :- वैदिकवाङ्मय में ‘शाखा’ शब्द के अर्थ में ही एक शब्द और भी उपलब्ध होता है, वह शब्द है— ‘चरण’। ‘मालती माधव’ के टीकाकार जगद्धर का कथन है कि ‘चरणशब्दः शाखाविशेषाध्ययनपरैकतापत्रजनसंघवाची’ अर्थात् चरण शब्द विशेष शाखा के अध्ययनकर्ता एकतापत्र मनुष्यों के समूह का वाचक है। इन शाखाओं का विस्तारपूर्वक विवेचन पुराणों एवं ‘चरणव्यूह’ आदि ग्रन्थों में देखा जा सकता है। इस शब्द की व्याख्या तथा अर्थ के विषय में अनेक विद्वानों ने विचार प्रकट किए हैं। महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार ‘गोत्रं च चरणैः सह’ अर्थात् ऋषि गोत्र का चरण से सम्बन्ध है। पं० भगवतदत्त जी के मतानुसार शाखाएँ चरणों का ही अवान्तर भाग थीं। शाकल, वाष्कल आदि चरण हैं तथा काण्व, काठक, कापालक आदि शाखाएँ हैं। कैय्यट के अनुसार भी ‘चरण शब्दः अध्ययन वचनः’ अर्थात् ऋषियों के अध्ययन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar