वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 86 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कर्म के अनुसार ही शाखा अन्य क्रमों से भिन्न हो गई। शाखा-भेद के कारण- मूल वैदिक संहिताओं से ही अनेक वैदिक शाखाएँ उद्भिन्न हुईं। इस शाखा-भेद का कोई निश्चित कारण नहीं है, अपितु अनेक सम्भावित कारण हैं। क्रमशः उन कारणों पर विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत है। (अ) पाठ-भेद- 'पाठभेद' शाखाओं के भेद का एक प्रमुख कारण है। विद्वानों के मतानुसार भी मन्त्रों के पठन-पाठन की अनेक विधियाँ ही शाखाओं के भेद की जन्मदाता है। रसाचार्य, ब्रह्मवादीआचार्य 'व्याडि' ने अपनी पुस्तक 'विकृतिवल्ली' में इन विकृतियों की विस्तृत चर्चा भी की है। उन्होंने लिखा है कि— 'जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वजो, दण्डो, रथो, घनः। अष्टौविकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा मनीषिभिः॥' (विकृतवल्ली, १/५) इन आठ प्रकार की विकृतियों अर्थात् मन्त्र पाठ की शैलियों के आधार पर ही आठ प्रकार की शाखाओं का प्रचलन हुआ। (ब) देश-काल-भेद प्राचीन काल में गुरुकुलों में वेदज्ञ ऋषि अपने शिष्यों को वेद-विषयक शिक्षा देते थे। भारतवर्ष एक अत्यन्त विशाल देश था। उस समय मुद्रण सम्बन्धी सुविधा भी नहीं उपलब्ध थी। समस्त ज्ञान मौखिक था। अतः विषयों में एकरूपता सुरक्षित न रह सकी। अतः स्थान एवं काल की भिन्नता शाखाओं की भिन्नता का कारण बनी। इसी प्रकार यह वेदाध्ययन विभिन्न कालों में निरन्तर होता रहा। इन विभिन्न कालों में अनेक नूतन ऋचाओं का भी आविर्भाव हुआ। अनेक मन्त्र संहिताओं में उपलब्ध नहीं होते। अतः कालों की भिन्नता भी शाखाओं के भेदों का आधार है। इन उपर्युक्त शाखा-भेद सम्बन्धी दो कारणों से डा० मङ्गलदेव शास्त्री भी सहमत हैं। इस विषय पर उनका कथन है कि "वैदिक परम्परा में एक ऐसा समय था, जबकि अध्ययनाध्यापन का आधार केवल मौखिक था, उसी काल में एक ही गुरु के शिष्य-प्रशिष्य भारत जैसे महान् देश में फैलते हुए विशेषतः गमनागमन की उन दिनों की कठिनाइयों के कारण किसी भी पाठ को पूर्णतः अक्षुण्ण न रख सके थे। पाठ-भेद का हो जाना स्वाभाविक था— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar