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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 353 में से

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पृष्ठ 115

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 87 एवं वेदं तदान्यस्य भगवानृषिसत्तमः। शिष्येभ्यश्च पुनर्दत्त्वा तपस्तप्तुं गतो वनम्॥ तस्य शिष्यप्रशिष्यैस्तु शाखाभेदास्त्विमेकृताः॥ ( वायुपुराण ६१/७७) साथ ही जान बूझकर पाठ का परिवर्तन या परिवर्धन भी अवस्थाविशेष में सम्भावना से बाहर की बात नहीं है। एवं ऐसा भी समय था, जब नवीन ऋचाएँ भी बनाई जाती थीं— ‘अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत।’ (ऋ० १/१/२) ‘इमां प्रत्नाय सुष्टुतिं नवीयसीं वोचेयम्’ (ऋ० १०/९१/१३) इत्यादि ऋचाओं में स्पष्टतः प्राचीन और नवीन ऋषियों का और बिल्कुल नवीन बनाई हुई ऋचाओं का उल्लेख है। तभी वैदिकवाङ्मय में ऐसी भी ऋचाएँ और मन्त्र मिलते हैं, जो उपलब्ध वैदिक संहिताओं में नहीं पाए जाते। ऐसी अवस्था में पाठभेद का हो जाना असम्भावित नहीं हो सकता। अतः शाखाभेद के दो प्रमुख कारण निश्चित हुए। वे हैं— १. अध्ययन भेदाच्छाखा भेदः अर्थात् अध्ययन के भेद से शाखाभेद होना, २ देशभेदनं शाखानां व्यवस्थापनम् अर्थात् देशभेद से शाखाओं में भेद होना। इन दो प्रमुख कारणों के अतिरिक्त कतिपय ‘गौण कारण’ भी हैं, जिन्हें वेदज्ञ शाखाओं के भेदों का हेतु बतलाते हैं, वे निम्नलिखित हैं— (स) उच्चारण-भेद- कुछ सीमा तक वैदिक शाखाओं में भेद-प्रभेद के लिए वेद-मन्त्रों तथा मन्त्रगत पदों का उच्चारण-भेद भी उत्तरदायी है। बहुधा अज्ञानतावश अथवा स्वभावगत त्रुटि के कारण विभिन्न लोगों के उच्चारण में भेद होना सम्भव ही है। जैसे कि अनुष्टुप्- छारदी के स्थान पर क्वचित् अनुष्टुप शारदी का उच्चारण किया जाता है। इसी प्रकार मूर्धन्य ‘ष्’ के स्थान पर ‘ख’ का उच्चारण अच्छे पढ़े-लिखे मनुष्यों के मुख से भी सुना जा सकता है। जैसे ‘इषेत्वा’ को ‘इखेत्वा’ कहना। अतः उच्चारण-भेद भी शाखा-भेद का कारण है किन्तु यह कारण शाखा-भेद का आंशिक कारण ही है। (द) ऋषि-देवता-छंद-भेद- आचार्य शौनक ने ऋषि, देवता तथा छंदों में होने वाले भेदों को भी शाखाओं के भेदों का कारण स्वीकार किया है। उन्होंने बृहद्देवता में लिखा है— “देवताष्यार्षछन्देभ्यो वैविध्यं तस्य जायते।” अर्थात् देवता, ऋषि तथा छंदों की विविधता शाखाओं में भेद की जनक है। प्रत्येक मन्त्र के ऊपर या सूक्त के ऊपर उस CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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