वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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88 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन्त्र या सूक्त के ऋषि एवं छन्द का नामोल्लेख रहता है। भ्रमवश इन नामों में अन्तर भी पड़ा। यह अन्तर इसलिए पड़ा क्योंकि विभिन्न सूक्तों के मन्त्र विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न रूपों में देखे गए। इन मन्त्रों का साक्षात् सम्बन्ध देवता तथा अर्थ से होता है। अतः यह कारण सबका परस्पर भेद कराने में सहयोगी रहा। (क) मन्त्रों का व्याख्या भेद- एक-एक मन्त्र की अनेक प्रकार से व्याख्या होने के कारण भी शाखाओं में भेद हुआ है। निरुक्त में एक-एक मन्त्र के तीन-तीन अर्थों का विवेचन किया है- आदिभौतिक-अर्थ, आदिदैविक-अर्थ तथा आध्यात्मिक-अर्थ। इसके अतिरिक्त ‘सम्प्रदाय-भेद' से एक-एक मन्त्र के सात-सात अर्थ निकाले जा सकते हैं। यथा ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि', इस मन्त्र का सात प्रकार से अर्थ किया जा सकता है। अतः 'सम्प्रदाय-भेद' मन्त्रों के अर्थभेद का कारण है तथा मन्त्रों का अर्थ-भेद ही मन्त्र की विभिन्न व्याख्याओं को जन्म देता है। ये मन्त्रों की विभिन्न व्याख्याएँ ही वैदिक शाखाओं की जननी हैं। इन मतों के विपरीत पं० सत्यव्रत सामश्रमी ने ऐतरेयालोचन में लिखा है- ‘तत्वतो नहि वेदशाखा वृक्षशाखेवऽनापि नदी शाखेव, प्रत्युत् अध्येतृभेदात् सम्प्रदायभेदञ्च अध्ययनविशेष रूपैव।' अर्थात् वे वैदिक ऋचाओं को वृक्ष अथवा नदी की शाखाओं के सदृश नहीं स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार ये विशिष्ट अध्ययन के रूप हैं। वैदिकशाखाओं की कुल संख्या- महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'पस्पशाह्निक' में लिखा है कि 'चत्वारो वेदाः। साङ्गा सरहस्याः बहुधाभिन्नाः। एक शतमध्वर्युशाखाः। सहस्त्रवर्त्मा सामवेदः। एक विंशतिधावाह्वृच्यम्। नवधाथर्वणो वेदः। अर्थात् वेद चार हैं, वेदाङ्गों एवं रहस्यों के साथ अनेक रूपों में विभक्त हुए। यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १ हजार, ऋग्वेद की २१ तथा अथर्ववेद की ९ शाखाएं है। इस प्रकार भाष्यानुसार कुल शाखाएँ १०१ + १०००+ २१+९ = ११३१ हुई। ‘चरणव्यूह' की गणना इससे भिन्न है। इसके अनुसार- ‘सामवेदस्यकिलसहस्त्रभेदा आसन्। यजुर्वेदस्य षडशीतिर्भेदा, अथर्ववेदस्य नवभेदाभवन्ति' अर्थात् सामवेद की १००० शाखाएँ, यजुर्वेद की ८६ शाखाएँ होती हैं। अथर्ववेद की नौ शाखाएँ हैं। ऋग्वेद की भी २१ शाखाओं का निर्देश किया गया है। इस प्रकार कुल संख्या हुई १०००+८६+२१+९ = १११६। अन्य पुराणों तथा उपनिषदों में भी इन संख्याओं के बारे में किंचित् भिन्नता है। आर्यसमाज के प्रवर्तक
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