भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 107 यही विकास दार्शनिक भिन्नता का जनक है। इस प्रकार के सूक्तों में नासदीयसूक्त तथा पुरुष सूक्त का विशेष महत्त्व है। पश्चिमी वेदज्ञों ने इस विकास को बहुदेववाद एकदेववाद—सर्वेश्वरवाद के रूप में उत्तरोत्तर विकसित बतलाया है। सर्वेश्वर-वाद का तो पुरुष सूक्त में स्पष्ट निदर्शन है। इस प्रकार दशम मण्डल का वंश मण्डल से पार्थक्य स्वयं सिद्ध है। (च) विषय की नवीनता : दशममण्डल में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विषयों से ग्रथित अनेक सूक्त प्राप्त होते हैं। कुछ सूक्तों में विवाह तथा श्राद्ध विषयों से सम्बद्ध मन्त्र हैं। जैसे— ऋग्वेद के १०/८५ सूक्त में उषा तथा सोम का विवाह वर्णित है। इस सूक्त में तत्कालीन सामाजिक दशा का सुन्दर निदर्शन है। इस सूक्त में पति-पत्नी को साथ रहने तथा सन्तानोत्पत्ति की शिक्षा दी गई है— इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृहि। ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॒॑सं सृ॑जस्वाधा जि॒व्री वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥ (ऋ० १०/८५/२७) "अर्थात् हे वधू! इस घर में तेरा प्रियभाव सन्तान से फले फूले। इस घर में गृहस्थ के कर्तव्य के लिए जागती रह। सावधानी से पति के प्रबन्ध को कर। इस पति के साथ अपने शरीर को मिला दे। पति के कार्यों में हाथ बँटा और जीर्ण हुई वृद्धि को घर में आज्ञा देती रह।" इसी सूक्त में पतिगृह में आगमन करने पर पत्नी को कल्याण युक्त, पतिप्रिया तथा वीर प्रसविनी होने की कामना की गई है। यह कामना सर्वोत्कृष्ट तथा गौरवशाली है। यह उत्तम प्रभाव की उत्पादिका है— अघो॑रचक्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसू॑र्देवका॑मा स्यो॒ना शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥ (ऋ० १०/८५/४४) "अर्थात् हे वधू! कठोर नेत्र वाली नहीं, किन्तु शीलयुक्त नेत्र वाली, पति को हनन करने वाली अर्थात् कष्ट देने वाली नहीं, किन्तु सुख पहुँचाने वाली प्राप्त हों। घर के पशुओं के लिए कल्याणकारिणी प्रसन्नमन सुन्दर शक्तियुक्त हों। वीर सन्तान उत्पन्न करने वाली, घर में देवर, जेठ आदि के प्रति अच्छी भावना वाली तथा देव भावना वाली, दैवीवृत्ति वाली, हमारे द्विपद और चतुष्पद के लिए शुभकारिणी हों।" CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar