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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 353 में से

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पृष्ठ 134

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106 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्राचीन मण्डलों में नामोल्लेख तक नहीं किया गया है। इस मण्डल में निरूपित देवों के स्वरूप में भी नवीनता है। प्राचीन कहे जाने वाले सूक्तों में उपलब्ध वरुण के स्वरूप में तथा दशम मण्डल में उपलब्ध वरुण के स्वरूप में स्पष्ट अन्तर दृष्टिगोचर होता है। पूर्वसूक्तों में वरुण समस्त विश्व के नियन्ता एवं सर्वशक्ति सम्पन्न देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं जबकि इस मण्डल में उन्हें मात्र जल का अधिपति ही वर्णित किया गया है। नूतन देवगण मानस प्रवृत्तियों के प्रतिनिधि के सदृश चित्रित किए गए हैं। यथा- श्रद्धा (ऋग्वेद १०/१५१) का अत्यन्त उत्कृष्ट वर्णन यहाँ प्राप्त होता है- श्र॒द्धया॒ग्निः समि॑ध्यते श्र॒द्धया॑ हूयते ह॒विः। श्र॒द्धां भग॑स्य मू॒र्धनि॒ वच॑सा वेदयामसि॥१॥ (ऋ० १०/१५१/१) अर्थात् श्रद्धा के द्वारा गार्हपत्यादि अग्नि-त्रय को प्रज्ज्वलित किया जाता है। श्रद्धा के द्वारा पुरोडाशादि हवियों को आहुत किया जाता है। भाव यह है कि यज्ञ करते हुए श्रद्धा से अग्नि प्रज्ज्वलित करनी चाहिए, श्रद्धा से आहुतियों को आहुत करना चाहिए। श्रद्धा के साथ यज्ञ करने पर यजमान प्रमुख ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।“ इसी प्रकार गाय के लिए सूक्त (१०/१६९) अरण्यानी (अरण्य की देवी) तथा ज्ञान के लिए सूक्त (१०/७१) प्रयुक्त हुए हैं। ज्ञानसूक्त में ही कहा गया है कि वैदिक संहिता में चारों ऋत्विजों (होता, उद्गाता, ब्रह्मा एवं अध्वर्यु) के विशिष्ट कर्मों के लिए आवश्यक मन्त्रों का संग्रह है- ऋचां त्वः पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान्गा॑य॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु। ब्र॒ह्मा त्वो॒ वद॑ति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॒ मात्रां॒ वि मि॑मीत उ त्वः॥ (ऋ० १०/७१/११) “अर्थात् कोई विद्वान् वेद मन्त्रों के पोषण को पुष्ट करता हुआ रहता है। कोई शक्वरी नामक ऋचाओं में गाने योग्य मन्त्रों (साम) को गाता है। कोई यज्ञ का ब्रह्मा या अथर्ववेद का ज्ञाता शिल्प-विद्या को कहता है और कोई यज्ञ की विधि को विशेष रीति से बतलाता है।“ (घ) दार्शनिक तथ्यों में भिन्नता : दशम मण्डल में अनेक ऐसे सूक्त उपलब्ध होते हैं जिनमें दार्शनिक तत्त्वों का समुचित विवेचन है। इन सूक्तों में ऐसे अनेक मन्त्र दृष्टिगत होते है जिनमें आर्यों के दार्शनिक चिन्तनों की गूढ़ता तथा विकास द्योतित होता है। आर्यजनों के चिन्तन का

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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