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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

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द्वितीय अध्याय 105 का निर्णायक है। सूक्तों की भाषा केवल कालभेद से ही भिन्न नहीं होती बल्कि सूक्तों के प्रादुर्भाव तथा उद्देश्य के कारण भी भाषा में भिन्नता के आदर्श विद्यमान रहते हैं। ऋग्वेदिय प्राचीनतम सूक्तों में शब्दों में रेफ का प्रयोग अधिक मिलता है। इसके विपरीत अर्वाचीन सूक्तों में रेफ के प्रयोग का लोप सा होने लगा तथा रेफ के स्थान पर लकार के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ गई। यथा— प्राचीन गौत्र मण्डलों में जल वाचक सलिल शब्द को सरिर के रूप में प्रयोग किया गया है जबकि दशम मण्डल में सलिल का ही प्रयोग हुआ है। प्राचीन तथा अर्वाचीन सूक्तों की भाषा में व्याकरण सम्बन्धी भिन्नताएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं। प्राचीन सूक्तों में पुल्लिंग अकारान्त शब्दों में प्रथमा द्विवचन के प्रत्यय के रूप में आ का प्रयोग अधिक हुआ है। जैसे— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया (ऋग्वेद १/१६१)। इसके विपरीत दशम मण्डल में पुल्लिंग, अकारान्त, प्रथमा, द्विवचन के प्रत्यय के रूप में औ का प्रयोग मिलता है। यथा— “मा वामेतौमा परेतौरिषाम्” (ऋ० १०/१७८/२), “सूर्याचन्द्रमसौधाता” (१०/१९०/३)। प्राचीन सूक्तों में क्रियार्थक क्रिया को प्रकट करने के लिए तवै, से, असे, अध्यै आदि प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं। यथा— कर्तवै, जीवसे, अवसे आदि, किन्तु दशम मण्डल में इन सबके स्थान पर मात्र तुम् के प्रयोग का आधिक्य है। यथा— कर्तुम्, जीवितुम्, अवितुम् आदि। (ख) छन्दों पर आधृत भिन्नता : भाषा के अनन्तर वैदिक सूक्तों का रचनाकाल मुख्यतः छन्दों की भिन्नता द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। वेदों में दो प्रकार के छन्द उपलब्ध होते हैं। प्रथम तो वे जो शास्त्रीय संस्कृत कविता के छन्दों से कोई साम्य नहीं रखते हैं। दूसरे वे जो शास्त्रीय संस्कृत कविता के छन्दों से साम्य रखते हैं। इस प्रकार के छन्द पूर्णतया वैदिक छन्दों की अपेक्षा अधिक ताल एवं लययुक्त होते हैं। प्राचीनतम सूक्तों में छन्दोगत विन्यास मुख्य रूप से वर्णों की संख्या पर आधारित था, किन्तु अर्वाचीन सूक्तों में प्राप्य मन्त्रों में लघु गुरु के विन्यास का भी विशेष आग्रह दृष्टिगत होता है। इससे वैदिक छन्दों के पठन-पाठन में शास्त्रीय संस्कृत के छन्दों के समान आनन्द आने लगा। छन्दों के उच्चारण में स्वर तथा लय का महत्त्व बढ़ गया। यथा— पुरुष सूक्त का अनुष्टुप् प्राचीन अनुष्टुप् न होकर वैदिक अनुष्टुप् के सदृश है। (ग) देवों पर आधृत भिन्नता : दशम मण्डल में ऐसे अनेक नवीन देवताओं का निरूपण प्राप्त होता है, जिनका

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