वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 104 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ऋग्वेद में इन देवताओं की शक्ति, प्रभुता एवं ऐश्वर्य के विषय में विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है। इसमें देवताओं का चित्रण विविध आयुधों एवं वाहनों के साथ हुआ है। कहीं कहीं एकेश्वरवाद की भावना झलक रही है। ऋग्वेद में हमें अनेक देवताओं की स्तुति मिलती है। ऋग्वेदीय देवताओं में तीन देवता अपनी विशिष्टता के कारण विशेष प्रसिद्ध हैं। वे हैं— अग्नि, इन्द्र तथा वरुण। अग्नि के लिए सर्वाधिक ऋचाएँ उपलब्ध होती हैं। इन्द्र की स्तुति भी ऋग्वेद में पर्याप्त की गई है। इन्द्र से सम्बन्धित लगभग २५ सूक्त हैं। इन्द्र विजय प्रदान करने वाला है, इसलिये इसका निरूपण सर्वाधिक तेजस्वी तथा वीररस सम्पन्न मन्त्रों के द्वारा हुआ हैं। तृतीय अति प्रसिद्ध देव वरुण है। यह प्राणियों की हृदयस्थ भावनाओं का ज्ञाता है। यह प्राणियों को उनके कर्मानुसार दण्ड तथा पारितोषिक वितरित करता है। इसका चित्रण कर्मफलदाता परमेश्वर के रूप में किया गया है। अतः इसके लिए स्निग्ध तथा उदात्त ऋचाएँ प्रयुक्त हुई हैं। देवियों में उषा को अत्यन्त ही सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है। सर्वाधिक कवित्वपूर्ण एवं ललित ऋचाएँ ऊषा देवी के विषय में ही मिलती हैं। इनके अतिरिक्त जिन देवताओं की स्तुति में ऋचाएँ प्राप्त होती हैं, वे हैं— सूर्य, द्यौ, सविता, विष्णु, पूषन्, अश्विनौ, अग्नि, पर्जन्य, उषा, सोम, यम आदि। सोम का भी ऋग्वेद में पर्याप्त स्तवन हुआ है। ऋग्वेद में यम देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। द्युलोक के देवताओं में द्यौ की सर्वाधिक प्रतिष्ठा है। विष्णु की स्तुति त्रिविक्रम के रूप में की गई है। विष्णु को तीनों लोकों में व्याप्त बतलाया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ऋग्वेद का मुख्य विवेच्य विषय देवताओं की स्तुति ही है। इन देवों का विशेष वर्णन वैदिक देवतावाद नामक अध्याय में किया गया है। दशम मण्डल की अर्वाचीनता :- जैसा कि पहले कहा जा चुका है दशम मण्डल अन्य मण्डलों की तुलना में नवीन माना जाता है। प्राचीनतम सूक्तों का बाहुल्य द्वितीय से सप्तम मण्डल तक प्राप्त होता है। कौन सा सूक्त अथवा मण्डल प्राचीन है और कौन सा नवीन है? इस समस्या का निश्चित समाधान सम्भव नहीं। फिर भी विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर दशम मण्डल की अर्वाचीनता को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, जो कि निम्नलिखित है— (क) भाषा पर आधृत विभिन्नता : एक मन्त्र अथवा सूक्त भाषाभेद के कारण अन्य सूक्तों से भिन्न हो, यह संभव है, किन्तु यहं अनिवार्य नहीं कि यही भाषाभेद उस मन्त्र की प्राचीनता अथवा नवीनता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar