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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

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द्वितीय अध्याय 103 क्षुद्रसूक्त तथा महासूक्त कहलाते हैं। षड्गुरुशिष्यानुसार नासदीय सूक्त के पूर्व के सूक्त महासूक्त तथा नासदीय सूक्त के अनन्तर उपलब्ध सूक्त क्षुद्रसूक्त के रूप में मान्य हैं। सूक्तों के नाम पर ही ऋषियों का नाम इसलिए पड़ गया क्योंकि ऋषि ही सूक्तद्रष्टा हैं। तत्रत्यादि ऋषियों ने द्वितीय मण्डल से नवम मण्डल तक को मध्यम का अभिधान प्रदान किया है क्योंकि वे मध्य में विद्यमान हैं। अनुक्रमणिका में प्रथम मण्डल, नवम मण्डल तथा दशम मण्डल सूक्तों के ऋषियों के साथ रमणियों के भी नाम उपलब्ध होते है। वस्तुतः रचनात्मक रूप में इन नामों की अनुक्रमणिका का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। अतः वैदिक सूक्तों के वास्तविक प्रणेता अज्ञात हैं। विषय वस्तु :- विश्व की सर्वप्राचीन रचना ऋग्वेद की विषयवस्तु अत्यन्त ही व्यापक है। यह धार्मिक स्त्रोतों की एक विशाल राशि है। भारोपीय भाषापरिवार में ऋग्वेद का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि ऋग्वेद शब्द का तात्पर्य है— ऋचाओं का ज्ञान। ऋग्वेद में हमें दो प्रकार के मन्त्र मिलते हैं, एक तो वे हैं जो कि यज्ञों एवं देवस्तुतियों के प्रयोग में आते हैं। दूसरे वे हैं जो ब्रह्मविद्या, धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक विषयों पर प्रकाश डालते हैं। ऋग्वेद में यज्ञों का महत्त्व, देवताओं की उपासना आदि विषयों का विशद विवेचन हुआ है। इसमें सृष्टि रचना, दार्शनिक विचार, पशु-पक्षी आदि से सम्बद्ध भी कुछ मन्त्र मिलते हैं। इसमें कुछ संवाद सूक्त भी हैं। प्रायः मन्त्र देवस्तुति परक ही हैं परन्तु कुछ सूक्त ऐसे भी हैं जो किसी देवता से सम्बन्धित नहीं हैं। उनका सम्बन्ध मानव जीवन तथा व्यावहारिक पक्ष से है। निरुक्तकार ने वैदिक देवताओं का विश्लेषण करके उन्हें क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा द्युलोक से सम्बन्धित होने के कारण तीन प्रकार का बतलाया है। अग्नि, सोम, पृथ्वी आदि देवता पृथ्वी स्थानीय हैं। इन्द्र, वायु, रुद्र आदि देवता अन्तरिक्ष स्थानीय हैं। वरुण, सूर्य, उषस् आदि देवता द्युस्थानीय हैं। इन देवताओं को भी चार भागों में विभक्त किया गया है— (१) प्राकृतिक शक्तिरूप देवता— सूर्य, इन्द्र, पूषा, सविता आदि, (२) गृहदेवता— अग्नि, सोम आदि, (३) कल्पनाजन्य देवता— श्रद्धा, मन्यु आदि, (४) गौण देवता— गन्धर्व, अप्सरा आदि।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar