वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
102 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
भिन्नता के दो कारण हैं— (१) प्राचीन वैदिक विद्वानों की गणना में शाखा-भेद का होना। (२) नवीन अथवा आधुनिक विद्वानों की गणना में व्यास भ्रम। भ्रम का मुख्य कारण यह है कि ऋग्वेद में कुछ ऋचाएँ ऐसी भी है जो प्रयोग काल में द्विपदा तथा अध्ययन काल में चतुष्पदा व्यवहृत होती हैं। ऋक् सर्वानुक्रमणी में लिखा है— “द्विर्द्विपदास्त्वृचः समामनन्ति।” ऋग्वेद में कुछ ऋचाएँ ऐसी भी हैं जो सदैव द्विपदा ही रहती है, कभी भी अपने द्विपदा रूप का परित्याग नहीं करती। इन्हें नित्य द्विपदा की संज्ञा प्राप्त है। ये मात्र १७ ऋचाएँ हैं। इन्हीं नित्य-नैमित्तिक द्विपदाओं के वास्तविक रूप से अनभिज्ञ होने के कारण मैक्समूलर, मैक्डानल आदि अनेक वैदिक विद्वानों ने भी अपनी गणना में त्रुटि की है। अतः नैमित्तिक द्विपदाएँ प्रयोगकाल में १४० तथा अध्ययन काल में केवल ७० ही रह जाती हैं। मन्त्रों की बड़ी संख्या में गड़बड़ी का एक अन्य कारण भी है; कहीं-कहीं खिलमन्त्रों की गणना ऋग्वेद के मन्त्रों के साथ नहीं करते। खिलमन्त्रों की कुल संख्या ८० है। इस प्रकार ऋग्वेद की कुल ऋक् संख्या १०५५२ है किन्तु अध्ययन काल में १४० नैमित्तिक द्विपदाओं के चतुष्पदा हो जाने के कारण ऋक् संख्या १०४८२ हो जाती है। इसमें बालखिल्य मन्त्र सम्मिलित हैं।
प्राचीनतम सूक्त :- पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार ऋग्वेद के मण्डलों में प्राचीन तथा अर्वाचीन मन्त्रों का संग्रह है। प्राचीनतम सूक्त द्वितीय मण्डल से लेकर सप्तम मण्डल तक उपलब्ध होते हैं। प्रत्येक मण्डल किसी ऋषि के वंश विशेष से सम्बद्ध है। इसीलिए इन मण्डलों को वंशमण्डल (Family Book) कहते हैं। भारतीय परम्परानुसार ये ऋषि ही मन्त्रों के प्रत्यक्षकर्ता हैं। ये छह ऋषि हैं— गृत्समद द्वितीय मण्डल के, विश्वामित्र तृतीय के, चतुर्थ के वामदेव, पञ्चम के अत्रि, षष्ठ के भरद्वाज तथा सप्तम के वसिष्ठ। यही ऋषि द्वितीय से सप्तम मण्डल तक के कर्ता के रूप में मान्य हैं। अष्टम मण्डल के सूक्तों के साक्षात्कर्ता ऋषि कण्व तथा अंगिरा वंश के हैं। नवम् मण्डल में समस्त मन्त्रों का प्रतिपाद्य सोम-देवता विषयक है। सोम का एक अभिधान पवमान भी है। अतः सोम विषयक मन्त्रों के संग्रह के कारण इसे पवमान मण्डल भी कहते है। अनुमानतः द्वितीय से लेकर अष्टम मण्डल तक संग्रहीत मन्त्रों को चुनकर ग्रन्थान्त में संलग्न कर दिया गया। उसके पश्चात् ग्रन्थ के प्रारम्भ तथा अन्त में एक एक मण्डल युक्त किए गए। अतः प्रथम तथा दशम मण्डल अपेक्षाकृत नवीन हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार इन मण्डलों का संकलनकर्ता एवं विभाजनकर्ता एक ही व्यक्ति है। दशम मण्डल के ऋषि
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar