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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय 103 क्षुद्रसूक्त तथा महासूक्त कहलाते हैं। षड्गुरुशिष्यानुसार नासदीय सूक्त के पूर्व के सूक्त महासूक्त तथा नासदीय सूक्त के अनन्तर उपलब्ध सूक्त क्षुद्रसूक्त के रूप में मान्य हैं। सूक्तों के नाम पर ही ऋषियों का नाम इसलिए पड़ गया क्योंकि ऋषि ही सूक्तद्रष्टा हैं। तत्रत्यादि ऋषियों ने द्वितीय मण्डल से नवम मण्डल तक को मध्यम का अभिधान प्रदान किया है क्योंकि वे मध्य में विद्यमान हैं। अनुक्रमणिका में प्रथम मण्डल, नवम मण्डल तथा दशम मण्डल सूक्तों के ऋषियों के साथ रमणियों के भी नाम उपलब्ध होते है। वस्तुतः रचनात्मक रूप में इन नामों की अनुक्रमणिका का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। अतः वैदिक सूक्तों के वास्तविक प्रणेता अज्ञात हैं। विषय वस्तु :- विश्व की सर्वप्राचीन रचना ऋग्वेद की विषयवस्तु अत्यन्त ही व्यापक है। यह धार्मिक स्त्रोतों की एक विशाल राशि है। भारोपीय भाषापरिवार में ऋग्वेद का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि ऋग्वेद शब्द का तात्पर्य है— ऋचाओं का ज्ञान। ऋग्वेद में हमें दो प्रकार के मन्त्र मिलते हैं, एक तो वे हैं जो कि यज्ञों एवं देवस्तुतियों के प्रयोग में आते हैं। दूसरे वे हैं जो ब्रह्मविद्या, धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक विषयों पर प्रकाश डालते हैं। ऋग्वेद में यज्ञों का महत्त्व, देवताओं की उपासना आदि विषयों का विशद विवेचन हुआ है। इसमें सृष्टि रचना, दार्शनिक विचार, पशु-पक्षी आदि से सम्बद्ध भी कुछ मन्त्र मिलते हैं। इसमें कुछ संवाद सूक्त भी हैं। प्रायः मन्त्र देवस्तुति परक ही हैं परन्तु कुछ सूक्त ऐसे भी हैं जो किसी देवता से सम्बन्धित नहीं हैं। उनका सम्बन्ध मानव जीवन तथा व्यावहारिक पक्ष से है। निरुक्तकार ने वैदिक देवताओं का विश्लेषण करके उन्हें क्रमशः पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा द्युलोक से सम्बन्धित होने के कारण तीन प्रकार का बतलाया है। अग्नि, सोम, पृथ्वी आदि देवता पृथ्वी स्थानीय हैं। इन्द्र, वायु, रुद्र आदि देवता अन्तरिक्ष स्थानीय हैं। वरुण, सूर्य, उषस् आदि देवता द्युस्थानीय हैं। इन देवताओं को भी चार भागों में विभक्त किया गया है— (१) प्राकृतिक शक्तिरूप देवता— सूर्य, इन्द्र, पूषा, सविता आदि, (२) गृहदेवता— अग्नि, सोम आदि, (३) कल्पनाजन्य देवता— श्रद्धा, मन्यु आदि, (४) गौण देवता— गन्धर्व, अप्सरा आदि।

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 104 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता ऋग्वेद में इन देवताओं की शक्ति, प्रभुता एवं ऐश्वर्य के विषय में विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है। इसमें देवताओं का चित्रण विविध आयुधों एवं वाहनों के साथ हुआ है। कहीं कहीं एकेश्वरवाद की भावना झलक रही है। ऋग्वेद में हमें अनेक देवताओं की स्तुति मिलती है। ऋग्वेदीय देवताओं में तीन देवता अपनी विशिष्टता के कारण विशेष प्रसिद्ध हैं। वे हैं— अग्नि, इन्द्र तथा वरुण। अग्नि के लिए सर्वाधिक ऋचाएँ उपलब्ध होती हैं। इन्द्र की स्तुति भी ऋग्वेद में पर्याप्त की गई है। इन्द्र से सम्बन्धित लगभग २५ सूक्त हैं। इन्द्र विजय प्रदान करने वाला है, इसलिये इसका निरूपण सर्वाधिक तेजस्वी तथा वीररस सम्पन्न मन्त्रों के द्वारा हुआ हैं। तृतीय अति प्रसिद्ध देव वरुण है। यह प्राणियों की हृदयस्थ भावनाओं का ज्ञाता है। यह प्राणियों को उनके कर्मानुसार दण्ड तथा पारितोषिक वितरित करता है। इसका चित्रण कर्मफलदाता परमेश्वर के रूप में किया गया है। अतः इसके लिए स्निग्ध तथा उदात्त ऋचाएँ प्रयुक्त हुई हैं। देवियों में उषा को अत्यन्त ही सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है। सर्वाधिक कवित्वपूर्ण एवं ललित ऋचाएँ ऊषा देवी के विषय में ही मिलती हैं। इनके अतिरिक्त जिन देवताओं की स्तुति में ऋचाएँ प्राप्त होती हैं, वे हैं— सूर्य, द्यौ, सविता, विष्णु, पूषन्, अश्विनौ, अग्नि, पर्जन्य, उषा, सोम, यम आदि। सोम का भी ऋग्वेद में पर्याप्त स्तवन हुआ है। ऋग्वेद में यम देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। द्युलोक के देवताओं में द्यौ की सर्वाधिक प्रतिष्ठा है। विष्णु की स्तुति त्रिविक्रम के रूप में की गई है। विष्णु को तीनों लोकों में व्याप्त बतलाया गया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि ऋग्वेद का मुख्य विवेच्य विषय देवताओं की स्तुति ही है। इन देवों का विशेष वर्णन वैदिक देवतावाद नामक अध्याय में किया गया है। दशम मण्डल की अर्वाचीनता :- जैसा कि पहले कहा जा चुका है दशम मण्डल अन्य मण्डलों की तुलना में नवीन माना जाता है। प्राचीनतम सूक्तों का बाहुल्य द्वितीय से सप्तम मण्डल तक प्राप्त होता है। कौन सा सूक्त अथवा मण्डल प्राचीन है और कौन सा नवीन है? इस समस्या का निश्चित समाधान सम्भव नहीं। फिर भी विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर दशम मण्डल की अर्वाचीनता को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, जो कि निम्नलिखित है— (क) भाषा पर आधृत विभिन्नता : एक मन्त्र अथवा सूक्त भाषाभेद के कारण अन्य सूक्तों से भिन्न हो, यह संभव है, किन्तु यहं अनिवार्य नहीं कि यही भाषाभेद उस मन्त्र की प्राचीनता अथवा नवीनता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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द्वितीय अध्याय 105 का निर्णायक है। सूक्तों की भाषा केवल कालभेद से ही भिन्न नहीं होती बल्कि सूक्तों के प्रादुर्भाव तथा उद्देश्य के कारण भी भाषा में भिन्नता के आदर्श विद्यमान रहते हैं। ऋग्वेदिय प्राचीनतम सूक्तों में शब्दों में रेफ का प्रयोग अधिक मिलता है। इसके विपरीत अर्वाचीन सूक्तों में रेफ के प्रयोग का लोप सा होने लगा तथा रेफ के स्थान पर लकार के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ गई। यथा— प्राचीन गौत्र मण्डलों में जल वाचक सलिल शब्द को सरिर के रूप में प्रयोग किया गया है जबकि दशम मण्डल में सलिल का ही प्रयोग हुआ है। प्राचीन तथा अर्वाचीन सूक्तों की भाषा में व्याकरण सम्बन्धी भिन्नताएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं। प्राचीन सूक्तों में पुल्लिंग अकारान्त शब्दों में प्रथमा द्विवचन के प्रत्यय के रूप में आ का प्रयोग अधिक हुआ है। जैसे— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया (ऋग्वेद १/१६१)। इसके विपरीत दशम मण्डल में पुल्लिंग, अकारान्त, प्रथमा, द्विवचन के प्रत्यय के रूप में औ का प्रयोग मिलता है। यथा— “मा वामेतौमा परेतौरिषाम्” (ऋ० १०/१७८/२), “सूर्याचन्द्रमसौधाता” (१०/१९०/३)। प्राचीन सूक्तों में क्रियार्थक क्रिया को प्रकट करने के लिए तवै, से, असे, अध्यै आदि प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं। यथा— कर्तवै, जीवसे, अवसे आदि, किन्तु दशम मण्डल में इन सबके स्थान पर मात्र तुम् के प्रयोग का आधिक्य है। यथा— कर्तुम्, जीवितुम्, अवितुम् आदि। (ख) छन्दों पर आधृत भिन्नता : भाषा के अनन्तर वैदिक सूक्तों का रचनाकाल मुख्यतः छन्दों की भिन्नता द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। वेदों में दो प्रकार के छन्द उपलब्ध होते हैं। प्रथम तो वे जो शास्त्रीय संस्कृत कविता के छन्दों से कोई साम्य नहीं रखते हैं। दूसरे वे जो शास्त्रीय संस्कृत कविता के छन्दों से साम्य रखते हैं। इस प्रकार के छन्द पूर्णतया वैदिक छन्दों की अपेक्षा अधिक ताल एवं लययुक्त होते हैं। प्राचीनतम सूक्तों में छन्दोगत विन्यास मुख्य रूप से वर्णों की संख्या पर आधारित था, किन्तु अर्वाचीन सूक्तों में प्राप्य मन्त्रों में लघु गुरु के विन्यास का भी विशेष आग्रह दृष्टिगत होता है। इससे वैदिक छन्दों के पठन-पाठन में शास्त्रीय संस्कृत के छन्दों के समान आनन्द आने लगा। छन्दों के उच्चारण में स्वर तथा लय का महत्त्व बढ़ गया। यथा— पुरुष सूक्त का अनुष्टुप् प्राचीन अनुष्टुप् न होकर वैदिक अनुष्टुप् के सदृश है। (ग) देवों पर आधृत भिन्नता : दशम मण्डल में ऐसे अनेक नवीन देवताओं का निरूपण प्राप्त होता है, जिनका

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106 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्राचीन मण्डलों में नामोल्लेख तक नहीं किया गया है। इस मण्डल में निरूपित देवों के स्वरूप में भी नवीनता है। प्राचीन कहे जाने वाले सूक्तों में उपलब्ध वरुण के स्वरूप में तथा दशम मण्डल में उपलब्ध वरुण के स्वरूप में स्पष्ट अन्तर दृष्टिगोचर होता है। पूर्वसूक्तों में वरुण समस्त विश्व के नियन्ता एवं सर्वशक्ति सम्पन्न देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं जबकि इस मण्डल में उन्हें मात्र जल का अधिपति ही वर्णित किया गया है। नूतन देवगण मानस प्रवृत्तियों के प्रतिनिधि के सदृश चित्रित किए गए हैं। यथा- श्रद्धा (ऋग्वेद १०/१५१) का अत्यन्त उत्कृष्ट वर्णन यहाँ प्राप्त होता है- श्र॒द्धया॒ग्निः समि॑ध्यते श्र॒द्धया॑ हूयते ह॒विः। श्र॒द्धां भग॑स्य मू॒र्धनि॒ वच॑सा वेदयामसि॥१॥ (ऋ० १०/१५१/१) अर्थात् श्रद्धा के द्वारा गार्हपत्यादि अग्नि-त्रय को प्रज्ज्वलित किया जाता है। श्रद्धा के द्वारा पुरोडाशादि हवियों को आहुत किया जाता है। भाव यह है कि यज्ञ करते हुए श्रद्धा से अग्नि प्रज्ज्वलित करनी चाहिए, श्रद्धा से आहुतियों को आहुत करना चाहिए। श्रद्धा के साथ यज्ञ करने पर यजमान प्रमुख ऐश्वर्य को प्राप्त करता है।“ इसी प्रकार गाय के लिए सूक्त (१०/१६९) अरण्यानी (अरण्य की देवी) तथा ज्ञान के लिए सूक्त (१०/७१) प्रयुक्त हुए हैं। ज्ञानसूक्त में ही कहा गया है कि वैदिक संहिता में चारों ऋत्विजों (होता, उद्गाता, ब्रह्मा एवं अध्वर्यु) के विशिष्ट कर्मों के लिए आवश्यक मन्त्रों का संग्रह है- ऋचां त्वः पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान्गा॑य॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु। ब्र॒ह्मा त्वो॒ वद॑ति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॒ मात्रां॒ वि मि॑मीत उ त्वः॥ (ऋ० १०/७१/११) “अर्थात् कोई विद्वान् वेद मन्त्रों के पोषण को पुष्ट करता हुआ रहता है। कोई शक्वरी नामक ऋचाओं में गाने योग्य मन्त्रों (साम) को गाता है। कोई यज्ञ का ब्रह्मा या अथर्ववेद का ज्ञाता शिल्प-विद्या को कहता है और कोई यज्ञ की विधि को विशेष रीति से बतलाता है।“ (घ) दार्शनिक तथ्यों में भिन्नता : दशम मण्डल में अनेक ऐसे सूक्त उपलब्ध होते हैं जिनमें दार्शनिक तत्त्वों का समुचित विवेचन है। इन सूक्तों में ऐसे अनेक मन्त्र दृष्टिगत होते है जिनमें आर्यों के दार्शनिक चिन्तनों की गूढ़ता तथा विकास द्योतित होता है। आर्यजनों के चिन्तन का

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 107 यही विकास दार्शनिक भिन्नता का जनक है। इस प्रकार के सूक्तों में नासदीयसूक्त तथा पुरुष सूक्त का विशेष महत्त्व है। पश्चिमी वेदज्ञों ने इस विकास को बहुदेववाद एकदेववाद—सर्वेश्वरवाद के रूप में उत्तरोत्तर विकसित बतलाया है। सर्वेश्वर-वाद का तो पुरुष सूक्त में स्पष्ट निदर्शन है। इस प्रकार दशम मण्डल का वंश मण्डल से पार्थक्य स्वयं सिद्ध है। (च) विषय की नवीनता : दशममण्डल में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विषयों से ग्रथित अनेक सूक्त प्राप्त होते हैं। कुछ सूक्तों में विवाह तथा श्राद्ध विषयों से सम्बद्ध मन्त्र हैं। जैसे— ऋग्वेद के १०/८५ सूक्त में उषा तथा सोम का विवाह वर्णित है। इस सूक्त में तत्कालीन सामाजिक दशा का सुन्दर निदर्शन है। इस सूक्त में पति-पत्नी को साथ रहने तथा सन्तानोत्पत्ति की शिक्षा दी गई है— इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृहि। ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॒॑सं सृ॑जस्वाधा जि॒व्री वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥ (ऋ० १०/८५/२७) "अर्थात् हे वधू! इस घर में तेरा प्रियभाव सन्तान से फले फूले। इस घर में गृहस्थ के कर्तव्य के लिए जागती रह। सावधानी से पति के प्रबन्ध को कर। इस पति के साथ अपने शरीर को मिला दे। पति के कार्यों में हाथ बँटा और जीर्ण हुई वृद्धि को घर में आज्ञा देती रह।" इसी सूक्त में पतिगृह में आगमन करने पर पत्नी को कल्याण युक्त, पतिप्रिया तथा वीर प्रसविनी होने की कामना की गई है। यह कामना सर्वोत्कृष्ट तथा गौरवशाली है। यह उत्तम प्रभाव की उत्पादिका है— अघो॑रचक्षुरप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒रसू॑र्देवका॑मा स्यो॒ना शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥ (ऋ० १०/८५/४४) "अर्थात् हे वधू! कठोर नेत्र वाली नहीं, किन्तु शीलयुक्त नेत्र वाली, पति को हनन करने वाली अर्थात् कष्ट देने वाली नहीं, किन्तु सुख पहुँचाने वाली प्राप्त हों। घर के पशुओं के लिए कल्याणकारिणी प्रसन्नमन सुन्दर शक्तियुक्त हों। वीर सन्तान उत्पन्न करने वाली, घर में देवर, जेठ आदि के प्रति अच्छी भावना वाली तथा देव भावना वाली, दैवीवृत्ति वाली, हमारे द्विपद और चतुष्पद के लिए शुभकारिणी हों।" CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 108 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता दशम मण्डल के कुछ सूक्तों में ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिनमें मृत्यु के पश्चात् शव संस्कार के क्रिया कर्म का विवेचन किया गया है। इन मन्त्रों से शव को भूमि में गाड़ने का संकेत प्राप्त होता है। अत्यन्त मनोहर उपमा के द्वारा इस विषय का निरूपण हुआ है- 'माता पुत्रं यथा सिचाऽभ्येनं भूमं ऊर्णुहि।' "अर्थात् जिस प्रकार माता अपने पुत्र को वस्त्र से ढक देती है, हे भूमि! तुम भी इस शव को उसी प्रकार स्वयं ढक लो।" इसी मण्डल में विभिन्न पितरों के अत्यन्त मार्मिक संकेत प्राप्त होते हैं। शव से यमलोक पहुँचने पर पितरों की संगति करने को कहा गया है। यथा- सं ग॑च्छस्व पि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ प॒रमे व्यो॑मन्। हि॒त्वायां॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चा॑ः॥ (ऋ० १०/१४/८) 'अर्थात् हे पुरुष एवं हे स्त्री! तू पालन करने वाले माता, पिता, गुरुजनों से सत्संग कर। नियन्ता जन से और सर्व उत्कृष्ट आकाश तुल्य रक्षा स्थान परमात्मा के अधीन रह कर यज्ञदानादि साधनों से सर्वदा युक्त रहे। निन्दनीय कार्य को त्याग कर बार-बार गृह को प्राप्त हो और तेजस्वी बनकर सन्तान उत्पन्न करने वाली स्त्री तथा कुलवर्धक पुत्रादि से संगति का लाभ प्राप्त कर।' इस प्रकार उपर्युक्त विभिन्न दृष्टिकोणों से मनन किए जाने पर यह सिद्ध होता है कि दशममण्डल वंशमण्डल की अपेक्षा अर्वाचीन है। दशम मण्डल की अर्वाचीनता के समर्थन में अन्य विद्वानों के मत- अनेक पाश्चात्य तथा पौरस्त्य वेदज्ञों ने दशम मण्डल को अर्वाचीन माना है। उनके अनुसार सम्पूर्ण ऋग्वेद एक ही काल में नहीं लिखा गया। कुछ प्रमुख विद्वानों की इस सम्बन्ध में उक्तियाँ निम्नलिखित हैं- (अ) गॆटे का मत- गॆटे ने अपनी पुस्तक 'Lectures on Ṛgveda' में द्वितीय से सप्तम मण्डल पर्यन्त तक मन्त्रों को वंश-मण्डल कहा है। प्रत्येक मण्डल के मन्त्रद्रष्टा एक ही ऋषि अथवा उसके वंशज हैं। उनके अनुसार- 'They are homogeneous in character and arrangement.' CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 109 (ब) ओल्डेन वर्ग का मत- इनका मत है कि वंशमण्डल की रचना के अनन्तर प्रथम तथा दशम मण्डल संलग्न किये गये। इन मण्डलों की भाषा, व्याकरण, छन्द, भाव तथा विवेच्य विषय अन्य मण्डलों की तुलना में नितान्त भिन्न तथा विकसित है। ओल्डेन वर्ग महोदय ने स्वयं कहा है- 'When we have once admitted the fact that the tenth maṇḍala of the Ṛgveda have gathered up the many periods and the original composition of the hymns was probably the work of several centuries, than we can distinguish earlier from later hymns.' (स) सुकठणकर का मत- इनका भी यही मत है कि ऋग्वेद की ऋचाओं में हम सरलता से प्राचीन तथा अर्वाचीन ऋचाओं को छांट सकते हैं क्योंकि इनकी रचना में शताब्दियों का अन्तर है। उनके अनुसार- The form in which the Saṁhitā of the Ṛgveda has comedown to us clearly shows the different hymns were composed long before. They were brought together and systematically arranged that the different portions of saṁhitā represent chronologically different stages flowed from various indications of language vocabulary, style grammar, matter and lastly ideas. The tenth maṇḍala is indeed the aggregate of supplementary hymns clearly showing their familiarity with the first nine. दशम मण्डल की अर्वाचीनता के विरोध में विद्वानों के मत- अधिकांश विद्वानों ने दशम मण्डल को अन्य मण्डलों की अपेक्षा नवीन स्वीकार किया है, किन्तु कुछ विद्वान् इस पौर्वापर्य को नहीं मानते। उनके अनुसार सम्पूर्ण ऋक्संहिता की रचना समकालिक है। इनमें पण्डित सत्यव्रत सामश्रमी तथा डॉ० कपिल देव द्विवेदी आदि प्रमुख हैं। इनके मत निम्नलिखित हैं- (क) पण्डित सत्यव्रत सामश्रमी का मत- पण्डित जी का कथन है कि ऋग्वेद के अष्टक क्रम में तो मण्डलों का नामोल्लेख तक नहीं दिखलाई पड़ता, इसलिए दशम मण्डल की रचना को अनन्तरकालीन कहना उचित नहीं है। उन्होंने अपने विचारों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 110 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

“...............दशममण्डलस्यऋक् परिशिष्ट रूपत्वं कल्पयितुं तैः भाषापार्थक्यप्रदर्शनादि स्वीकृत दशम मण्डलस्य भाषा मन्त्रार्थ गततात्पर्याणि पृथगेवेति.........किमंत्रब्रूमो वयम्? अस्मच्छुतिषुहि दशममण्डलस्य मण्डलान्तराणाञ्च भाषा एकविधैवोपलभ्यते, अस्मद्बुद्धिषु च तथैकविधमेव तात्पर्यमिति न जानीमहे केषां बुद्धिमालिन्यं केषां वा श्रवणोन्द्रिय दुष्टत्वं केषां वा हठकारित्वमिति।” वस्तुतः सामश्रमी जी का तर्क विचारणीय तथा सम्माननीय है। (ख) डॉ० कपिलदेव द्विवेदी का मत- श्री द्विवेदी जी भी मण्डलों के इस पृथकतावादी सिद्धान्त से सहमत नहीं है। इनका अभिमत है- “वास्तविकता की दृष्टि से विचार किया जाए तो पाश्चात्य विचारों में काफी थोथापन है। .....उन्होंने परकालीन अंश बताकर बात समाप्त कर दी है, परन्तु कहीं भी उसका स्पष्ट और पुष्टकाल निर्धारण नहीं किया। भाषा, व्याकरण आदि का जो तर्क उपस्थित किया जाता है, वह बहुत लचर है और परीक्षा निकष पर खरा नहीं उतरता। दशममण्डल वस्तुतः ऋग्वेद का नवनीत है। इसमें पुरातन सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं भावात्मक महत्त्व के प्रतिपादक सूक्त विशेष रूप से संग्रहीत है। वस्तुतः ऋग्वेद में पूर्वकालीन और परकालीन संग्रह जैसा कोई भेद नहीं है।” डॉ० कपिल देव जी द्विवेदी के अनुसार ऋग्वेद के संग्रह में प्रयुक्त सिद्धान्तों का विवेचन निम्नलिखित हैं- १. ऋषि परिवारों से सम्बन्धित मंत्रों को प्रधानता प्रदान की जाये। २. जहाँ पर उपर्युक्त सिद्धान्त न प्रयोग किया जा सके वहाँ विषय की समानता को मुख्यता दी जाए। ३. सोम से सम्बन्धित मंत्र सर्वाधिक है, अतः उन्हें एक स्थान पर रखा जाये। ४. जो मन्त्र ऋषिक्रम अथवा विषयक्रम में ग्रथित न किये जा सकें, उन्हें अलग ग्रन्थान्त में रखा जाये। इन विपरीत विचारों के दृष्टिगत होने पर अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सम्प्रति यह समस्या जटिल एवं विवादास्पद है, इसलिए इस विषय पर गम्भीर अध्ययन, मनन तथा पुनर्विचार की अत्यधिक आवश्यकता है। दानस्तुति- ऋग्वेद में कतिपय सूक्त तथा मन्त्र ऐसे मिलते हैं, जिन्हें दानस्तुति कहा जाता है। इन सूक्तों में धार्मिक तथा धर्महीन काव्य के मध्यम मार्ग का अवलम्बन किया गया

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द्वितीय अध्याय 111 है। इन दान स्तुतियों के स्वरूप एवं तात्पर्य के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। आधुनिक विद्वान् इन सूक्तों को किसी पुरातन राजा के विशाल दान से तृप्त ऋषि द्वारा दाता की स्तुति स्वीकार करता है। परन्तु भारतीय वेदज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार वेद में कहीं भी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है, अतः इनमें किसी व्यक्ति विशेष की दान महिमा का स्तुत्य वर्णन कहना उचित नहीं प्रतीत होता है। इस प्रकार के सूक्तों की संख्या के बारे में विद्वान् किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच सके हैं। कुछ विद्वान् इस प्रकार के सूक्तों की संख्या चालीस के लगभग बतलाते हैं। कात्यायन ने अपनी ऋक्सर्वानुक्रमणी में मात्र २२ सूक्तों में ही दान स्तुतियों का उल्लेख किया है किन्तु आधुनिक वेदज्ञों ने अत्यन्त परिश्रम करके ६८ सूक्तों में दानस्तुतियों का अन्वेषण कर डाला है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का १२६वाँ सूक्त दानस्तुति कहा जा सकता है। इन सूक्तों को विनय सूक्त अथवा याज्ञिक गीत भी कहा जा सकता है क्योंकि इनमें यज्ञ के रक्षक की विनती की गई है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में एक सूक्त में दान की महिमा का दिव्य प्रतिपादन हुआ है। इसके छठे मन्त्र के अनुसार स्वार्थ के लिये व्यय किया गया धन पाप का हेतु है- मोघमन्नं॒ विन्द॑ते॒ अप्र॑चेताः स॒त्यं ब्र॑वीमि व॒ध इत्स तस्य॑। नार्य॒मणं॒ पुष्य॑ति॒ नो सखा॑यं॒ केव॑लाघो भवति केवला॒दी।। (ऋ० १०/११७/६) "अर्थात् अनुदार चित्त वाला व्यक्ति अन्न-धन को व्यर्थ पाता है, उसका धन निरर्थक है। मैं सत्य कहता हूँ उसकी यह मृत्यु ही है। कंजूस को सैकड़ों खतरे लगे रहते हैं। वह नियामक ईश्वर को तृप्त करता है यज्ञ उपासना के द्वारा। न दान द्वारा मित्र को पुष्ट करता है। केवल अपने भोगों की पूर्ति करने वाला केवल पाप रूप होता है। भाव यह है कि केवल अपने भोग विलास में धन लगाना पाप है, यह मानव जीवन नहीं मृत्यु है।" इसी सूक्त के चौथे मन्त्र में मित्र को दान दिये जाने की अनिवार्यता का उत्तम प्रतिपादन हुआ है- 'न स सखा यो न ददा॑ति॒ सख्यै॑ सचा॒भुवे॒ सच॑मानाय पि॒त्वः। अपा॑स्मात् प्रेया॒न् न तदो॒कों अ॑स्ति पृ॒णन्त॑मन्यमरणं चिदिच्छेत्।।' (ऋग्वेद १०/११७/४)

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 112 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अर्थात् जो साथ रहने वाले, सेवा करने वाले मित्र के लिये अन्न नहीं देता है, वह सच्चा मित्र नहीं है। इससे दूर रहो। वह आश्रय नहीं है, उचित सहारा नहीं है। पालन करने वाले अन्य विरोधी के पास भी जाना चाहिये।' सम्वाद-सूक्त- ऋग्वेद में जिस प्रकार दार्शनिक सूक्त, उपनिषदों के दार्शनिक विवेचन से सम्बद्ध है, उसी प्रकार उसके कुछ सूक्त महाकाव्यों एवं नाटकों से सम्बन्ध रखने वाले हैं। इन सूक्तों में कथोपकथन की मुख्यता है तथा ये सूक्त संवादात्मक स्वरूप में कथा एवं आख्यायिकाओं के अंश हैं, इसीलिए इनको संवाद-सूक्त का नाम दिया गया है। इन सूक्तों की संख्या लगभग बीस है, जिनमें से प्रमुख ये हैं- इन्द्र वरुण सम्वाद (४/२२), यम यमी संवाद (१०/१०), वरुण-अग्नि संवाद (१०/५१), देवगण-अग्नि संवाद (१०/५२), इन्द्र-इन्द्राणी संवाद (१०/४६), उर्वशी-पुरुरवा संवाद (१०/९५), सोम सूर्या संवाद (१०/८५), सरमा-पणि संवाद (१०/१०८) आदि। इनके स्वरूप के विषय में पाश्चात्य वेदज्ञों में गहरी विप्रतिपत्ति है। वेदों तथा वैदिक साहित्य के अध्येता पाश्चात्य विद्वानों मैक्समूलर तथा ओल्डेन बर्ग के अनुसार ऋग्वेदीय संवाद सूक्तों के आधार पर ही नाट्य की उत्पत्ति हुई है। डॉ० ओल्डेनबर्ग ने ऋग्वेदीय सम्वादसूक्तों को आख्यान की संज्ञा प्रदान की है। इनके अनुसार ऋग्वेद के आख्यान मूलतः गद्य पद्य मिश्रित थे। गद्य भाग अपनी नीरसता के कारण समास हो गया, जबकि पद्य भाग ने अपनी सरसता एवं रोचकता के कारण अस्तित्व बनाये रखा। इसके विपरीत डॉ० हर्टल, श्री श्रोदर एवं डॉ० सिल्वा लेवी ने इन्हें नाटकों का अवशिष्टांश कहा है। उनके अनुसार ये धार्मिक अवसरों में अभिनीत धार्मिक नाट्य अभिनय है। तृतीय मत डॉ० विन्टरनिट्ज का है। इनके अनुसार ये सम्वाद छन्दोबद्ध प्राचीन वीर काव्य हैं तथा इनमें वर्णनात्मक एवं नाटकीय तत्त्वों का निरूपण हुआ है। विन्टरनिट्ज ने इन्हीं से अवान्तरकाल में एक ओर महाकाव्य तथा दूसरी ओर नाटकों के उत्पत्ति की सम्भावना व्यक्त की है। इन सम्वाद सूक्तों में वैदिक संस्कृति, समाज, धर्म तथा दर्शन के संकेत प्राप्त होते हैं। इनमें काव्य तत्त्व तथा सामाजिक व्यवहारिकता दोनों का उत्कृष्ट निदर्शन उपलब्ध होता है। ऋग्वेदीय सम्वाद-सूक्तों में चार सूक्तों का विशेष महत्त्व है। ये निम्नलिखित हैं- (अ) पुरुरवा-उर्वशी-सम्वाद (१०/९५) (क) यम यमी संवाद (१०/१०) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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द्वितीय अध्याय 113 (स) सरमा-पणि संवाद (१०/१०८) (द) सूर्या सूक्त (१०/८५) (अ) पुरुरवा-उर्वशी-सम्वाद - ऋग्वेद के संवाद-सूक्तों में सर्वाधिक प्रख्यात दशम मण्डल का ९५वाँ सूक्त है। १८ ऋचाओं वाले इस सूक्त में मानव पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी का संवाद है। यह कथा रोमाञ्चक प्रेम का भव्य उदाहरण है। इसमें स्वर्गलोक की सुन्दरी उर्वशी भूतल के राजा की पत्नी बनकर निरन्तर चार वर्षों तक साथ रहती है और अन्ततः गर्भवती हो जाने पर उसका साथ त्याग कर निर्मम के सदृश चल देती है। उर्वशी के विरह में पुरुरवा व्यग्र होकर ढूँढते हुए एक दिन उसे रमणीक सरोवर में जल क्रीड़ा करते हुए खोज डालते हैं। इन्हीं विषयों पर संवाद ग्रथित है। यह अत्यन्त दुर्बोध एवं क्लिष्ट है किन्तु इसके भाव स्पष्ट हैं। पुरुरवा का कथन है— ह॒ये जाये॒ मन॑सा॒ तिष्ठ॑ घो॒रे वचा॑ंसि मि॒श्रा कृ॑णवावहै॒ नु। न नौ॒ मन्त्रा॒ अनु॑दितास ए॒ते मय॑स्कर॒न्पर॑तरे च॒नाह॑न्॥१॥ (ऋ० १०/९५/१) अर्थात् हे अश्व के तुल्य बलवति, हे पुत्रोत्पन्न करने में समर्थ स्त्रीतुल्य, अपने नायक को अपने बल पराक्रम से प्रसिद्ध करने वाली या जय दिलाने वाली ! हे घोर दुष्कर संग्राम करने वाली ! तू मन को दृढ़ करके स्थिर हो। सेना व सेनापति हम दोनों परस्पर प्रतिज्ञा वचनों को करें। क्या हम दोनों की आपस की मन्त्रणाएँ भविष्यार्थ सुख प्रदान नहीं कर सकती ? उर्वशी उत्तर देती है— किमे॒ता वा॒चा कृ॑णवा॒ तवा॒हं प्राक्र॑मिषमु॒षसा॒मग्रि॑येव। पु॒रू॒रवः॒ पुन॒रस्तं॒ परे॑हि दुरा॒पना॒ वात॑इवा॒हम॑स्मि॥२॥ (ऋ० १०/९५/२) अर्थात् उषा जिस तरह से सूर्य के आगे चलती है, इसी प्रकार सेना सर्वाग्रगामी बनकर तेरे आगे चलूँ, तो इस मन्त्रणा वाणी की क्या विशेष आवश्यकता है ? हे अनेक सैन्य दल को आज्ञा देने वाले सेनापति, प्रबल कार्यों से भवनों की भाँति सदा सबका कल्याण व रक्षा करने वाले होकर मनोयोग दें। वे जरा रहित मनुष्यों का समवाय बनाने वाले, अश्वों से वेग से जाने में समर्थ, गर्जन ध्वनि से आकाश व पृथिवी में अपने सन्देश सुनाने वाले हों। उर्वशी ने प्रेम की भिक्षा के लिये याचनारत पुरुरवा की प्रार्थना को कितनी

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114 \qquad वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता निर्ममता से तिरस्कृत किया। यह वार्तालाप आगे चलता है। पुरूरवा अधिक नम्रतापूर्वक प्राचीन विषयों का स्मरण दिलाता है, किन्तु सब व्यर्थ जाता है। वह तड़फ उठता है— सु॒दे॒वो अ॒द्य प्रप॑ते॒दना॑वृ॒त्प॒रावतं॑ पर॒मां गन्त॒वा उ॑। अधा॒ शयी॑त॒ निर्ऋते॒रुप॑स्थे॒ऽधैनं॒ वृका॑ रभ॒सासो॑ अ॒द्युः॥ (ऋ० १०/९५/१४) अर्थात् यदि उत्तम विजीगिषु अरक्षित हो सुदूर परदेश को प्रस्थान करे और शत्रु सेना के निकट असावधान होकर प्रमाद करे तब बलवान् भेड़ियों की भाँति चोर, डाकू आदि शत्रुजन उसे नष्ट कर देते हैं। भाव यह है कि जो सेनानायक शत्रु-सेना के समक्ष असावधानी व प्रमाद बरतता है, वह प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ रहता है और शत्रुओं द्वारा किये जाने वाले विनाश का उत्तरदायी बनता है। इस बात पर उर्वशी ने पुरुरवा को जो उत्तर दिया है, वह अनादिकाल तक स्त्री जाति का भूषण सदृश रहेगा। उसका कथन है— पु॒रूर॑वो॒ मा मृथो॒ मा प्र प॑प्तो॒ मा त्वा॒ वृका॑सो॒ अशि॑वास उ क्षन्। न वै स्त्रैणा॑नि स॒ख्यानि॑ सन्ति साला॒वृका॑णां॒ हृद॑यान्ये॒ता॥१५॥ (ऋ० १०/९५/१५) अर्थात् हे अनेकों के शासक! तू मृत्यु को न पा, तेरा पतन न हो। अकल्याणकारी स्वभाव के व्यक्ति तुझको न खाएँ। तू स्मरण रख कि स्त्री आदि भोग्य पदार्थों के उद्देश्य से किए गए मैत्रीकार्य यथार्थ नहीं होते, वे तो वन के कुत्तों या भेड़ियों के हृदयों के सदृश छल व क्रूरतादि से परिपूर्ण होते हैं। सम्वादों में वह विषय उभरकर सामने आते हैं, जो सामान्यतया एक सच्चे प्रेमी तथा धोखेबाज प्रेयिसी के मध्य होते हैं। शतपथब्राह्मण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि ग्रन्थों में भी इस कथा का निरूपण है। किन्तु इसका श्रेष्ठ रूप महाकवि कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीय में उपलब्ध होता है। (क) यम-यमी संवाद - ऋग्वेद के दशम-मण्डल के दशम सूक्त में यम-यमी का परस्पर विलक्षण संवाद है। इसमें यमी अपने भ्राता यम को सन्तानोत्पत्ति के लिए व्यभिचारार्थ लुभाती है। वह वासना तथा कामासक्त होकर भाई का आह्वान करती है, किन्तु कोमल तथा मधुर भावना वाला भाई, बहन के इस प्रस्ताव को अस्वाभाविक कहकर ठुकरा देता है। ये सम्वाद भी दुर्गम तथा नाटकीय अधिक है। इन सम्वादों का

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 115 स्वरूप निम्नलिखित मन्त्रों से स्पष्ट हो जाता है। कामाग्नि से संतप्त यमी का कथन है— गर्भ॒ नु नौ॑ जनि॒ता दम्प॑ती क॒र्देव॒स्त्वष्टा॑ सवि॒ता वि॒श्वरू॑पः। नकि॑रस्य॒ प्र मि॑नन्ति व्र॒तानि॒ वेद॑ नावस्य पृ॑थि॒वी उत द्यौः॥५॥ (ऋ० १०/१०/५) अर्थात् जन्म देने वाला पिता, कन्या को पुरुष के हाथ में प्रदान करने वाला तेजस्वी सर्व उत्पादक विश्वात्मा गर्भ धारण हेतु हम दोनों नर-नारी को पति-पत्नी बनाता है। इसके विधानों को कोई नहीं मिटाता। हमारे इस पति-पत्नी भाव के करणीय कर्मों को भूमि एवं रवि भी जानते हैं। यमी ने अत्यन्त मार्मिक याचना की, किन्तु यम ऐसा सच्चा मनुष्य है जिसने संयम तथा निग्रह का व्रत ले रखा है। इसका कथन है— को अ॒स्य वे॑द प्रथ॒मस्याह्नः क ईं॑ ददर्श॒ क इ॒ह प्र वो॑चत्। बृ॒हन्मित्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑ क॒र्दु ब्रव आहनो॒ वीच्या॒ नॄन्॥ (ऋ० १०/१०/६) अर्थात् इस प्रथम दिवस के सम्बन्ध में किसे ज्ञात है? और इस गर्भ धारण होने न होने का मूल कारण कौन देखता है? इस विषय में कौन समर्थ वक्ता है? सर्वप्रेमी परभावना का तेज विशाल है कटाक्षों के बोलने वाली! स्त्री! मनुष्य को विवेक करके भी कौन भला, कब क्या कह सकता है? यम के बार-बार नकारात्मक उत्तर देने पर यमी अत्यधिक क्षुब्ध होती हुई यम को तृषातुर होकर पुरुषत्वहीन कह देती है— ब॒तो ब॑तासि यम॒ नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदाम। अ॒न्या किल॑ त्वां क॒क्ष्यै॑व यु॒क्तं परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्॥ (ऋ० १०/१०/१३) अर्थात् हे पाणिग्रहण से बद्ध! दुःख है कि तू अत्यन्त क्षीण है। तेरे मन तथा हृदय के बारे में हम अनजान रहें। क्या तुझे कोई दूसरी समर्थ नारी पेड़ की बेल के तुल्य आलिङ्गन करती है? इस श्लोक में नारी पति-हृदय के भावों की परीक्षा ले रही है। इस पर यम कहता है कि तुम किसी अन्य पुरुष का आलिङ्गन करो, जो CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 116 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कामोत्तेजित हो— अन्य॒मू षु त्वं य॑म्य॒न्य उ॒ त्वां परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्। तस्य॑ वा॒ त्वं मन॑ इ॒च्छा स वा॒ तवाधा॑ कृणुष्व सं॒विद॒ सुभ॑द्राम्॥ (ऋ० १०/१०/१४) अर्थात् हे विवाहित स्त्री ! तू दूसरे मनुष्य को पेड़ की बेल के समान आलिङ्गन न कर और अन्य पुरुष तुम्हारा आलिङ्गन न करें। तू उसके हृदय की इच्छा कर और वह तेरे हृदय की इच्छा करे। तू मङ्गलकारी उत्तम बुद्धि वाली सन्तान उत्पन्न कर। इसमें बहन भाई के वैवाहिक सम्बन्ध का भी निषेध है और यदि परस्पर सन्तानोत्पत्ति में शक्तिहीन हो तो अन्य पुरुष से सन्तान उत्पन्न करने की आज्ञा वेद में प्रतिपादित है। यम-यमी का सम्वाद शिव-पार्वती के सम्वाद का स्मरण दिलाता है। इसका विनियोग क्या हुआ ये अज्ञात है। (स) सोम-सूर्या सम्वाद - यह ऋग्वेद के दशम मण्डल का ८५वाँ सूक्त है। सूर्या सूर्य की बेटी है। इस सूक्त में इसकी 'उषा' संज्ञा है। इसकी सभी ४७ ऋचाएँ वैवाहिक विधि का संकेत करती है। इसकी अधिकांश ऋचाएँ गृह्यसूत्र के विवाह- प्रकरण में भी प्राप्त होती हैं। इसकी कुछ ऋचाओं में नववधू को उत्कृष्ट आशीष से युक्त किया गया है। यथा— इ॒ह प्रियं॑ प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यता॒मस्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जा॒गृहि। ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॑सं सृ॑जस्वाधा॒ जिब्री॑ वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥२७॥ (ऋ० १०/८५/२७) अर्थात् हे वधू, इस गृह में तुम्हारा प्रिय भाव सन्तान से फले-फूले। इस गृह में गृहस्थ के कर्तव्यार्थ तू जागरण कर। सावधानीपूर्वक प्रबन्ध को कर। इस पति के साथ स्वशरीर को संयुक्त कर दे। पति के कार्यों में हाथ बँटा और जीर्ण हुई वृद्धि में वृद्धि कर। घर को आदेश देती रह। (द) सरमा-पणि सम्वाद - यह ऋग्वेद के दशम मण्डल का १०८वाँ सूक्त है। इसमें इन्द्र की दूती सरमा तथा पणियों का सम्वाद चलता है। वह पणियों द्वारा अपहृत इन्द्र की गौओं को वापस लौटाने को कहती है, किन्तु वे इस विषय पर बात न करके उसे लालच देते हैं। उसे अपनी बहन बनाते हैं। किन्तु सरमा उनके बहकावे में नहीं आती। पणिगण कहते हैं— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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द्वितीय अध्याय 117 इमा गाव॑: सरमे या ऐच्छ॑: परि॑ दिवो अन्ता॑न्त्सुभगे॒ पत॑न्ती। कस्त॑ एना॒ अव॑ सृजा॒दय॑र्ध्युत्यास्माक॒मायु॑धा सन्ति ति॒ग्मा।। (ऋ० १०/१०८/५) अर्थात् हे सौभाग्यशालिनी सरमे! द्युलोक के सुदूर प्रदेशों से आगमन करती हुई तुम जिन गायों की अभिलाषा करती हो, वे गायें यह हैं। इन गायों को बिना युद्ध किए भला कौन निकाल कर (छीन कर) ले जा सकता है और हमारे शस्त्र भी तीव्र हैं। उसे प्रलोभन देते हुए पणिगण आगे कहते हैं कि हे सुभग सरमा! तुम्हारी गायों को हम लोग आपस में बाँट लेंगे— ए॒वा च॒ त्वं सर॑म आज॒गन्थे प्रबा॑धिता॒ सह॑सा॒ दैव्ये॑न। स्वसा॑रं त्वा कृणवै॒ मा पुन॒र्गा अप॑ ते॒ गवां॑ सुभगे भजाम।। (ऋ० १०/१०८/९) अर्थात् हे सरमा देवों के बल से पीड़ित होती हुई ही तुम यदि यहाँ हम लोगों के बलपुर में आ गई हो तो तुमको हम अपनी बहन बना लेते हैं। तुम पुनः वापस मत जाओ। हे सौभाग्यशालिनी सरमे! हम तुम्हारे साथ गायों का बँटवारा कर लेते हैं। सरमा-पणि सम्वाद में कुल ११ मन्त्र हैं। इन मन्त्रों में १, ३, ५, ७, ९ अर्थात् विषम संख्या के मन्त्रों में पणियों का कथन है तथा २, ४, ६, ८, १०, ११ अर्थात् सम संख्या के मन्त्रों में सरमा के उत्तर हैं। भारतीय साहित्य में संवाद-सूक्तों का महत्त्व :- ऋग्वेद के सम्वाद सूक्तों के सदृश अन्य रचनाएँ भारतीय साहित्य में अनेक स्थानों पर प्राप्त होती हैं। महाभारत, पुराणों तथा विशेषकर बौद्धसाहित्य में सम्वाद प्रधान तथा कथोपकथन प्रधान अर्द्धमहाकाव्यीय तथा अर्द्धनाटकीय रचनाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। ये प्राचीन सम्वाद-सूक्त महाकाव्य तथा नाटक दोनों प्रकार की साहित्यिक विधाओं के उद्गम स्थल हैं। इनमें नाटकीय तत्त्वों का पूर्ण समावेश दृष्टिगोचर होता है। ऋग्वेद के अनेक सम्वाद-सूक्तों ने परवर्ती संस्कृत साहित्य की कथावस्तु के रूप में प्रचुर सामग्री प्रदान की है। इस प्रकार के सम्वाद-सूक्तों में पुरुरवा-उर्वशी सम्वाद विशेष उल्लेखनीय है। पुरुरवा तथा उर्वशी की कथा का भारतीय साहित्य में बारम्बार विभिन्न स्थानों पर प्रयोग दृष्टिगोचर होता है। कृष्ण व यजुर्वेद की काठक शाखा में बौद्धायनश्रौतसूत्र में ऋग्वेद पर सर्वानुक्रमणी पर सद्गुरुशिष्य की टीका में महाभारत के परिशिष्ट स्वरूप हरिवंशपुराण में, विष्णुपुराण

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 118 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में तथा कथासरित्सागर में इस कथानक का सांकेतिक दर्शन उपलब्ध होता है। यह आख्यान ब्राह्मणग्रन्थों में भी प्राप्त होता है। इस कथानक के प्रयोग का सबसे सफल प्रयास महाकवि कालिदास ने किया है। कालिदास का नाटक विक्रमोर्वशीय इसी कथानक पर आधारित है। वेदों में अति संक्षिप्त रूप में प्राप्त इस पुरूरवा उर्वशी के सम्वाद सूक्त को कविता कामिनी के विलास कालिदास ने अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर रोचक रूप में प्रस्तुत किया है। संवाद सूक्तों के लिए इससे अधिक महत्त्व की बात अन्य क्या हो सकती है कि अनेक पाश्चात्य तथा पौरस्त्य विद्वान नाटकों की उत्पत्ति इन्हीं संवाद सूक्तों से मानते हैं। उनके अनुसार इन्हीं संवाद-सूक्तों में नाट्य के बीज अन्तर्निहित है। कालान्तर में इन्हीं बीजों के अंकुरित होने से नाट्यकला का विकास हुआ। जर्मन विद्वान् डॉ० श्रोदर के अनुसार संवाद सूक्त गायन एवं नर्तन के साथ अभिनीत किया जाते थे। ये स्वयं धार्मिक नाटक है। इनका यज्ञादि अवसरों पर गायन, नर्तन तथा वादन के साथ अभिनय किया जाता था। डॉ० हर्टल के अनुसार सम्वाद-सूक्तों में गायनार्थ एक से अधिक व्यक्ति नियोजित किये जाते थे क्योंकि एक व्यक्ति के द्वारा कथनोपकथन सम्भव नहीं। अतः ये सूक्त ही नाटकों के मूल स्रोत हैं। डॉ० कीथ का मत इसके विपरीत है। उनके अनुसार ऋग्वेद में उपलब्ध इन सम्वाद-सूक्तों का मात्र शंसज्ञ ही होता था क्योंकि ये सम्वाद-सूक्त विभिन्न प्रकार के होते हैं किन्तु पुरातत्त्व विचार है, तो किसी में ऐतिहासिक घटना वर्णित है, मूलतः इनका विषय व्यावहारिक है। डॉ० विण्डिश थोल्डन वर्ग तथा पिशेलादि विद्वानों ने इन सम्वाद सूक्तों के स्वरूप का विवेचन कुछ पृथक् ढंग से किया है। उनके अनुसार ये सम्वाद सूक्त गद्य पद्यात्मक थे जिसमें व्याख्यात्मक गद्यांश का लोप हो गया तथा ललित पद्यांश ही रह गया। इन विद्वानों ने इन्हें आख्यान की संज्ञा प्रदान की है। डॉ० विशेल का मत है कि नाटकों में गद्य पद्य दोनों का होना इन सम्वाद सूक्तों का स्पष्ट अनुकरण है। इन सम्वाद सूक्तों से तत्कालीन लोक साहित्य तथा समाज की झलक मिलने के कारण इनका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यम-यमी के सम्वाद से वैदिक काल की नैतिकता का ज्ञान होता है। पुरुरवा-उर्वशी सम्वाद में विद्याधर योनि के पात्रों का चित्रण होने से उसमें अद्भुत कथा के तत्त्वों का समावेश है। इन ऋग्वेदीय सम्वादों में अलौकिक विषयों का वर्णन, मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा के अतिरिक्त दीर्घायु, ऐश्वर्य तथा सन्तान-प्राप्ति की प्रार्थनाएँ भी विद्यमान हैं। इन आख्यानों में स्वर्ग प्राप्ति से अधिक भौतिक आवश्यकता तथा सम्पत्ति को प्राप्त करने वाली प्रार्थनाएँ हैं। इस प्रकार ऋग्वेदीय सम्वाद सूक्तों का महत्त्व बहुविध है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 119 लौकिक सूक्त :- दशममण्डल के अनेक सूक्तों में लौकिक व्यवहार से सम्बन्धित विषयों का मनोरंजक प्रतिपादन हुआ है। इन सूक्तों में अनेक सूक्तों का प्रतिपाद्य यक्ष्मा का नाश है। इसके लिये विशेष रूप से १६१वाँ तथा १६३वाँ सूक्त उल्लेखनीय है। १६२वें सूक्त में गर्भ के बाधक राक्षसों के विघ्नों के रक्षा व प्रबन्ध वर्णित हैं। यह सूक्त रक्षोहा के नाम से प्रख्यात है। ऋग्वेदीय दशममण्डलान्तर्गत १४५वें सूक्त में पत्नी द्वारा पति को प्राप्त करने का वर्णन है— इ॒मां ख॑ना॒म्योर्ष॑धिं वी॒रुधं॑ ब॒लव॑त्तमाम्। यया॑ स॒पत्नीं॑ बाध॑ते॒ यया॑ सं॒विन्द॑ते॒ पति॑म्॥१॥ (ऋ०सू० १०/१४५/१) अर्थात् मैं इस पौधे रूप अथवा विपरीतता से अवरुद्ध करने वाली अथवा विशेष की अवरोधक औषधि का खनन करती हूँ, जिससे सौत बाधा प्रदान करती है, जिससे वह पति को प्राप्त कर लेती है। इस मन्त्र में पतिकाम नारी द्वारा सपत्नी को हटाकर स्वयं अनुरूप पति पाने का वर्णन है। एक सूक्त में शत्रुओं के पलायनार्थ प्रार्थना की गई है— ऋ॒षभं मां समा॒नानां॑ स॒पत्नी॑नां विषास॒हिम्। ह॒न्तारं॒ शत्रू॑णां कृ॒धि वि॒राजं॒ गोप॑तिं ग॒वाम्॥१॥ (ऋ०१०/१६६/१) अर्थात् हे परमात्मा! मुझे एक समान आदरणीयों में श्रेष्ठ तथा शत्रुओं को विशेषतः परास्त करने में समर्थ, प्रहार करने वाले शत्रुओं का नाशक, पृथ्वियों के पृथ्वीपति तथा विशेष कान्ति सम्पन्न विभिन्न देशों का शासक बना। इस प्रकार यहाँ पर शत्रुओं को परास्त करके स्वयं शासक बनने की अभिलाषा से प्रार्थना की गई है। १०/५८ सूक्त मन आवर्तन सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। इस सम्पूर्ण सूक्त में भूमि, आकाश, सागर, उषा, पहाड़ तथा संसार भर में भ्रमण करने वाले मन को लौट आने के लिए प्रार्थना की गई है। यथा- CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 120 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता यत्त॑ य॒मं वै॑वस्व॒तं मनो॑ ज॒गाम॑ दू॒रकम्। त॒त्त आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसै॑ ॥१॥ (ऋ० १०/५८/१) अर्थात् हे मानस रोगी! जो तेरा यह मन अन्तरतम कल्पना से अत्यन्त दूर चला गया है, तुम्हारे उसको भी हम लोग यहाँ निवास करने तथा जीवन लाभार्थ पुनः लौटाते हैं। १०/९७ सूक्त की ओषधि सूक्त संज्ञा है। इसमें अनेक रोगों के नाश करने में समर्थ विभिन्न लाभदायक औषधियों का निरूपण हुआ है। इस मन्त्र में विभिन्न ओषधियों का स्पष्ट संकेत किया गया है- याः फ॒लिनी॒र्या अ॑फ॒ला अ॑पु॒ष्पा याश्च॑ पु॒ष्पिणी॑:। बृह॒स्पति॑प्रसूतास्ता नो॑ मुञ्चन्त्वं॒हस॑: ॥१५॥ (ऋ० १०/९७/१५) अर्थात् जो फल सम्पन्न हैं, जो फलहीन हैं, जो पुष्पहीन तथा पुष्पसम्पन्न हैं, वे रवि से एवं विद्वत्जनों द्वारा प्रदत्त अथवा निर्मित होकर हमें पापयुक्त कष्टों या दुःखों से छुटकारा प्रदान करें। अतः आयुर्वेद के दृष्टिकोण से इस सूक्त का विशेष महत्त्व है। कतिपय सूक्तों में राजनीतिक विषयक चर्चा दृष्टिगत होती है। इन सूक्तों में राजा की प्रशंसा में अनेक मन्त्र प्राप्त हैं। इनसे ज्ञात होता है कि उस युग में राजा का निर्वाचन होता था- अ॒भि त्वा॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि सोमो॑ अवीवृतत्। अ॒भि त्वा॒ विश्वा॑ भू॒तान्य॒भीव॒र्तो य॑थास॑सि ॥३॥ (ऋ० १०/१७४/३) अर्थात् हे महाराज! सूर्य देवता एवं चन्द्र देवता आपको आगे बढ़ावें अर्थात् नैसर्गिक शक्तियाँ आपके अनुकूल हों। समस्त प्राणिवर्ग तथा सभी प्राकृतिक पदार्थ तुम्हें आगे बढ़ावें, विजयी बनावें, जिस प्रकार से तुम विजय प्राप्त करों। इस प्रकार हम देखते हैं कि आजकल जिस समाज शास्त्र (Sociology) की सर्वत्र धूम है, चर्चा है, उसका ऋग्वेद में स्पष्ट दिग्दर्शन है। इस वैदिक बन्धुभाव की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान आकृष्ट नहीं होता। वैदिक समाजवाद वस्तुतः मानवतावाद है, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 121 जिसमें एक क्षण, एक वर्ष, एक जीवन नहीं बल्कि विशाल जीवन तथा समग्र समाज पर दृष्टि है। वैदिक सामाजिक विज्ञान दृष्टि को संकुचित नहीं अपितु विशाल बनाता है। दार्शनिक सूक्त :- ऋग्वेद में कतिपय दार्शनिकसूक्त भी प्राप्त होते हैं, जिनमें दार्शनिक विचारों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है। इन सूक्तों में आत्मा-परमात्मा, सुख-दुःख, सृष्टि की उत्पत्ति एवं ब्रह्मादि विषयों के सम्बन्ध में वैदिक ऋषियों के विचारों का स्पष्टीकरण है। अतः ये सूक्त अपनी दार्शनिक गम्भीरता तथा नूतन कल्पना के कारण विख्यात हैं। इस प्रकार के प्रमुख सूक्त निम्नलिखित हैं- (अ) नासदीय सूक्त (१०/१२९) (ब) पुरुष सूक्त (१०/९०) (स) हिरण्यगर्भ सूक्त (१०/१२१) (द) वाक्सूक्त (१०/१४५) पुरुषसूक्त को सर्वेश्वरवाद का स्थापक कहा जा सकता है। यह सूक्त अत्यन्त महनीय, गम्भीर तथा अन्यतम है। इसमें पुरुष के आध्यात्मिक स्वरूप का भव्य निदर्शन है। पुरुष के सम्बन्ध में सर्वाधिक विलक्षण बात तो यह है- पु॒रुष॑ ए॒वेदं सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भव्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥२॥ (ऋ० १०/९०/२) अर्थात् यह समस्त दृश्यमान वर्तमान विश्व पुरुष ही है। भूतकालीन तथा भविष्यकालीन विश्व भी पुरुष ही है और वह पुरुष देवों का या अमरत्व का स्वामी है, जो पुरुष अन्न अर्थात् प्राणियों के भोग्य पदार्थों के कारण बढ़ता है। यह वेदों में वर्णित सर्वेश्वरवाद का सिद्धान्त पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार आर्यों के प्रौढ़ तत्त्वचिन्तन का द्योतक है। ऋग्वेद में एक संसार के नियामक की कल्पना की गई है, जिसे सामान्यतया हिरण्यगर्भ, प्रजापति तथा पुरुष की संज्ञा से सम्बोधित किया गया है। इस सूक्त का द्रष्टाऋषि वस्तुतः निर्णय नहीं कर पाता कि किस देव का हवि से पूजन किया जाये। हिर॑ण्यग॒र्भः सम॑वर्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ आसीत्। स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ (ऋ० १०/१२१/१) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 122 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अर्थात् परमात्मा का वह हिरण्यमयगर्भ रूप सर्वप्रथम अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से भी पूर्व उत्पन्न हुआ था। उत्पन्न होते ही वह समस्त प्राणिवर्ग का एकमात्र स्वामी हो गया। वह पृथ्वी तथा द्युलोक को धारण किये हुए हैं। हम हवि के द्वारा ऐसे किस देव का पूजन करें? उक्त समस्त सूक्तों में दर्शन प्राप्त होता है, किन्तु दर्शन की पराकाष्ठा की उपलब्धि नासदीय सूक्त में होती है। इसमें ऋषि इस संसरणशील विश्व के मूल पर विचार करता है और वहाँ न पहुँचकर न प्रकाश को पाता है और न अन्धकार की सत्ता का दर्शन करता है और न अभाव का। इस सूक्त का मन्त्रद्रष्टऋषि जगत् की प्रारम्भिक स्थिति का वर्णन करता हुआ कहता है— न मृत्यु॑रासीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह॑ आसीत्प्रके॒तः। आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न परः किंच॒नास॑।। (ऋ० १०/१२९/२) अर्थात् "उस प्रलय काल में मृत्यु का अभाव था तथा अमृत का भी अभाव था। दिन का एवं रात्रि का ज्ञान भी नहीं था। वह ब्रह्मतत्त्व प्राण से युक्त, अपनी क्रिया से रहित तथा माया के साथ अविभाजित रूप में विद्यमान था। उस माया सहित ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं था और उससे परे भी कुछ नहीं था।" उपर्युक्त सूक्तों में निहित दर्शन स्वच्छ, विशद तथा स्पष्ट है। इसे समझना सुकर है, अधिक कठिन नहीं। ऋग्वेदीय प्रहेलिकाएँ :- ऋग्वेद के प्रथम मण्डलान्तर्गत १६४वें सूक्त में ऋग्वेदीय प्रहेलिकाओं के दर्शन होते हैं। इसके मन्त्रों में निगूढ़स्थित दर्शन का तो आभास लेना भी दुष्कर है। यह अस्यवामीय सूक्त कहकर पुकारा जाता है क्योंकि इस सूक्त का आरम्भ 'अस्य वामस्य पलितस्य होतुः' इन शब्दों के साथ होता हैं। ये रचनाएँ अधिकतर दुर्ज्ञेय तथा दुर्बोध्य हैं। यथा— स॒प्त यु॑ञ्जन्ति॒ रथ॒मेक॑चक्र॒मेको॒ अश्वो॑ वहति स॒प्तना॑मा। त्रि॒नाभि॑ च॒क्रम॒जर॒मन॑र्वं॒ यत्रेमा विश्वा॒ भुव॑नाधि॒ तस्थुः॑।। (ऋ० १/१६४/२) अर्थात् जहाँ एक समस्त कलाओं के भ्रमणार्थ जिसमें चक्कर है, उस विमानादि यान को सप्तनामों वाला एक अश्व तथा सात अश्व तथा अश्व के सात विभिन्न रूप CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar