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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 112 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता 'अर्थात् जो साथ रहने वाले, सेवा करने वाले मित्र के लिये अन्न नहीं देता है, वह सच्चा मित्र नहीं है। इससे दूर रहो। वह आश्रय नहीं है, उचित सहारा नहीं है। पालन करने वाले अन्य विरोधी के पास भी जाना चाहिये।' सम्वाद-सूक्त- ऋग्वेद में जिस प्रकार दार्शनिक सूक्त, उपनिषदों के दार्शनिक विवेचन से सम्बद्ध है, उसी प्रकार उसके कुछ सूक्त महाकाव्यों एवं नाटकों से सम्बन्ध रखने वाले हैं। इन सूक्तों में कथोपकथन की मुख्यता है तथा ये सूक्त संवादात्मक स्वरूप में कथा एवं आख्यायिकाओं के अंश हैं, इसीलिए इनको संवाद-सूक्त का नाम दिया गया है। इन सूक्तों की संख्या लगभग बीस है, जिनमें से प्रमुख ये हैं- इन्द्र वरुण सम्वाद (४/२२), यम यमी संवाद (१०/१०), वरुण-अग्नि संवाद (१०/५१), देवगण-अग्नि संवाद (१०/५२), इन्द्र-इन्द्राणी संवाद (१०/४६), उर्वशी-पुरुरवा संवाद (१०/९५), सोम सूर्या संवाद (१०/८५), सरमा-पणि संवाद (१०/१०८) आदि। इनके स्वरूप के विषय में पाश्चात्य वेदज्ञों में गहरी विप्रतिपत्ति है। वेदों तथा वैदिक साहित्य के अध्येता पाश्चात्य विद्वानों मैक्समूलर तथा ओल्डेन बर्ग के अनुसार ऋग्वेदीय संवाद सूक्तों के आधार पर ही नाट्य की उत्पत्ति हुई है। डॉ० ओल्डेनबर्ग ने ऋग्वेदीय सम्वादसूक्तों को आख्यान की संज्ञा प्रदान की है। इनके अनुसार ऋग्वेद के आख्यान मूलतः गद्य पद्य मिश्रित थे। गद्य भाग अपनी नीरसता के कारण समास हो गया, जबकि पद्य भाग ने अपनी सरसता एवं रोचकता के कारण अस्तित्व बनाये रखा। इसके विपरीत डॉ० हर्टल, श्री श्रोदर एवं डॉ० सिल्वा लेवी ने इन्हें नाटकों का अवशिष्टांश कहा है। उनके अनुसार ये धार्मिक अवसरों में अभिनीत धार्मिक नाट्य अभिनय है। तृतीय मत डॉ० विन्टरनिट्ज का है। इनके अनुसार ये सम्वाद छन्दोबद्ध प्राचीन वीर काव्य हैं तथा इनमें वर्णनात्मक एवं नाटकीय तत्त्वों का निरूपण हुआ है। विन्टरनिट्ज ने इन्हीं से अवान्तरकाल में एक ओर महाकाव्य तथा दूसरी ओर नाटकों के उत्पत्ति की सम्भावना व्यक्त की है। इन सम्वाद सूक्तों में वैदिक संस्कृति, समाज, धर्म तथा दर्शन के संकेत प्राप्त होते हैं। इनमें काव्य तत्त्व तथा सामाजिक व्यवहारिकता दोनों का उत्कृष्ट निदर्शन उपलब्ध होता है। ऋग्वेदीय सम्वाद-सूक्तों में चार सूक्तों का विशेष महत्त्व है। ये निम्नलिखित हैं- (अ) पुरुरवा-उर्वशी-सम्वाद (१०/९५) (क) यम यमी संवाद (१०/१०) CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar