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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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द्वितीय अध्याय 113 (स) सरमा-पणि संवाद (१०/१०८) (द) सूर्या सूक्त (१०/८५) (अ) पुरुरवा-उर्वशी-सम्वाद - ऋग्वेद के संवाद-सूक्तों में सर्वाधिक प्रख्यात दशम मण्डल का ९५वाँ सूक्त है। १८ ऋचाओं वाले इस सूक्त में मानव पुरुरवा तथा अप्सरा उर्वशी का संवाद है। यह कथा रोमाञ्चक प्रेम का भव्य उदाहरण है। इसमें स्वर्गलोक की सुन्दरी उर्वशी भूतल के राजा की पत्नी बनकर निरन्तर चार वर्षों तक साथ रहती है और अन्ततः गर्भवती हो जाने पर उसका साथ त्याग कर निर्मम के सदृश चल देती है। उर्वशी के विरह में पुरुरवा व्यग्र होकर ढूँढते हुए एक दिन उसे रमणीक सरोवर में जल क्रीड़ा करते हुए खोज डालते हैं। इन्हीं विषयों पर संवाद ग्रथित है। यह अत्यन्त दुर्बोध एवं क्लिष्ट है किन्तु इसके भाव स्पष्ट हैं। पुरुरवा का कथन है— ह॒ये जाये॒ मन॑सा॒ तिष्ठ॑ घो॒रे वचा॑ंसि मि॒श्रा कृ॑णवावहै॒ नु। न नौ॒ मन्त्रा॒ अनु॑दितास ए॒ते मय॑स्कर॒न्पर॑तरे च॒नाह॑न्॥१॥ (ऋ० १०/९५/१) अर्थात् हे अश्व के तुल्य बलवति, हे पुत्रोत्पन्न करने में समर्थ स्त्रीतुल्य, अपने नायक को अपने बल पराक्रम से प्रसिद्ध करने वाली या जय दिलाने वाली ! हे घोर दुष्कर संग्राम करने वाली ! तू मन को दृढ़ करके स्थिर हो। सेना व सेनापति हम दोनों परस्पर प्रतिज्ञा वचनों को करें। क्या हम दोनों की आपस की मन्त्रणाएँ भविष्यार्थ सुख प्रदान नहीं कर सकती ? उर्वशी उत्तर देती है— किमे॒ता वा॒चा कृ॑णवा॒ तवा॒हं प्राक्र॑मिषमु॒षसा॒मग्रि॑येव। पु॒रू॒रवः॒ पुन॒रस्तं॒ परे॑हि दुरा॒पना॒ वात॑इवा॒हम॑स्मि॥२॥ (ऋ० १०/९५/२) अर्थात् उषा जिस तरह से सूर्य के आगे चलती है, इसी प्रकार सेना सर्वाग्रगामी बनकर तेरे आगे चलूँ, तो इस मन्त्रणा वाणी की क्या विशेष आवश्यकता है ? हे अनेक सैन्य दल को आज्ञा देने वाले सेनापति, प्रबल कार्यों से भवनों की भाँति सदा सबका कल्याण व रक्षा करने वाले होकर मनोयोग दें। वे जरा रहित मनुष्यों का समवाय बनाने वाले, अश्वों से वेग से जाने में समर्थ, गर्जन ध्वनि से आकाश व पृथिवी में अपने सन्देश सुनाने वाले हों। उर्वशी ने प्रेम की भिक्षा के लिये याचनारत पुरुरवा की प्रार्थना को कितनी

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar