भारतकोश
वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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114 \qquad वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता निर्ममता से तिरस्कृत किया। यह वार्तालाप आगे चलता है। पुरूरवा अधिक नम्रतापूर्वक प्राचीन विषयों का स्मरण दिलाता है, किन्तु सब व्यर्थ जाता है। वह तड़फ उठता है— सु॒दे॒वो अ॒द्य प्रप॑ते॒दना॑वृ॒त्प॒रावतं॑ पर॒मां गन्त॒वा उ॑। अधा॒ शयी॑त॒ निर्ऋते॒रुप॑स्थे॒ऽधैनं॒ वृका॑ रभ॒सासो॑ अ॒द्युः॥ (ऋ० १०/९५/१४) अर्थात् यदि उत्तम विजीगिषु अरक्षित हो सुदूर परदेश को प्रस्थान करे और शत्रु सेना के निकट असावधान होकर प्रमाद करे तब बलवान् भेड़ियों की भाँति चोर, डाकू आदि शत्रुजन उसे नष्ट कर देते हैं। भाव यह है कि जो सेनानायक शत्रु-सेना के समक्ष असावधानी व प्रमाद बरतता है, वह प्रजा की रक्षा करने में असमर्थ रहता है और शत्रुओं द्वारा किये जाने वाले विनाश का उत्तरदायी बनता है। इस बात पर उर्वशी ने पुरुरवा को जो उत्तर दिया है, वह अनादिकाल तक स्त्री जाति का भूषण सदृश रहेगा। उसका कथन है— पु॒रूर॑वो॒ मा मृथो॒ मा प्र प॑प्तो॒ मा त्वा॒ वृका॑सो॒ अशि॑वास उ क्षन्। न वै स्त्रैणा॑नि स॒ख्यानि॑ सन्ति साला॒वृका॑णां॒ हृद॑यान्ये॒ता॥१५॥ (ऋ० १०/९५/१५) अर्थात् हे अनेकों के शासक! तू मृत्यु को न पा, तेरा पतन न हो। अकल्याणकारी स्वभाव के व्यक्ति तुझको न खाएँ। तू स्मरण रख कि स्त्री आदि भोग्य पदार्थों के उद्देश्य से किए गए मैत्रीकार्य यथार्थ नहीं होते, वे तो वन के कुत्तों या भेड़ियों के हृदयों के सदृश छल व क्रूरतादि से परिपूर्ण होते हैं। सम्वादों में वह विषय उभरकर सामने आते हैं, जो सामान्यतया एक सच्चे प्रेमी तथा धोखेबाज प्रेयिसी के मध्य होते हैं। शतपथब्राह्मण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि ग्रन्थों में भी इस कथा का निरूपण है। किन्तु इसका श्रेष्ठ रूप महाकवि कालिदास के नाटक विक्रमोर्वशीय में उपलब्ध होता है। (क) यम-यमी संवाद - ऋग्वेद के दशम-मण्डल के दशम सूक्त में यम-यमी का परस्पर विलक्षण संवाद है। इसमें यमी अपने भ्राता यम को सन्तानोत्पत्ति के लिए व्यभिचारार्थ लुभाती है। वह वासना तथा कामासक्त होकर भाई का आह्वान करती है, किन्तु कोमल तथा मधुर भावना वाला भाई, बहन के इस प्रस्ताव को अस्वाभाविक कहकर ठुकरा देता है। ये सम्वाद भी दुर्गम तथा नाटकीय अधिक है। इन सम्वादों का

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