वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 115 स्वरूप निम्नलिखित मन्त्रों से स्पष्ट हो जाता है। कामाग्नि से संतप्त यमी का कथन है— गर्भ॒ नु नौ॑ जनि॒ता दम्प॑ती क॒र्देव॒स्त्वष्टा॑ सवि॒ता वि॒श्वरू॑पः। नकि॑रस्य॒ प्र मि॑नन्ति व्र॒तानि॒ वेद॑ नावस्य पृ॑थि॒वी उत द्यौः॥५॥ (ऋ० १०/१०/५) अर्थात् जन्म देने वाला पिता, कन्या को पुरुष के हाथ में प्रदान करने वाला तेजस्वी सर्व उत्पादक विश्वात्मा गर्भ धारण हेतु हम दोनों नर-नारी को पति-पत्नी बनाता है। इसके विधानों को कोई नहीं मिटाता। हमारे इस पति-पत्नी भाव के करणीय कर्मों को भूमि एवं रवि भी जानते हैं। यमी ने अत्यन्त मार्मिक याचना की, किन्तु यम ऐसा सच्चा मनुष्य है जिसने संयम तथा निग्रह का व्रत ले रखा है। इसका कथन है— को अ॒स्य वे॑द प्रथ॒मस्याह्नः क ईं॑ ददर्श॒ क इ॒ह प्र वो॑चत्। बृ॒हन्मित्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑ क॒र्दु ब्रव आहनो॒ वीच्या॒ नॄन्॥ (ऋ० १०/१०/६) अर्थात् इस प्रथम दिवस के सम्बन्ध में किसे ज्ञात है? और इस गर्भ धारण होने न होने का मूल कारण कौन देखता है? इस विषय में कौन समर्थ वक्ता है? सर्वप्रेमी परभावना का तेज विशाल है कटाक्षों के बोलने वाली! स्त्री! मनुष्य को विवेक करके भी कौन भला, कब क्या कह सकता है? यम के बार-बार नकारात्मक उत्तर देने पर यमी अत्यधिक क्षुब्ध होती हुई यम को तृषातुर होकर पुरुषत्वहीन कह देती है— ब॒तो ब॑तासि यम॒ नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदाम। अ॒न्या किल॑ त्वां क॒क्ष्यै॑व यु॒क्तं परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्॥ (ऋ० १०/१०/१३) अर्थात् हे पाणिग्रहण से बद्ध! दुःख है कि तू अत्यन्त क्षीण है। तेरे मन तथा हृदय के बारे में हम अनजान रहें। क्या तुझे कोई दूसरी समर्थ नारी पेड़ की बेल के तुल्य आलिङ्गन करती है? इस श्लोक में नारी पति-हृदय के भावों की परीक्षा ले रही है। इस पर यम कहता है कि तुम किसी अन्य पुरुष का आलिङ्गन करो, जो CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar