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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

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द्वितीय अध्याय 111 है। इन दान स्तुतियों के स्वरूप एवं तात्पर्य के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। आधुनिक विद्वान् इन सूक्तों को किसी पुरातन राजा के विशाल दान से तृप्त ऋषि द्वारा दाता की स्तुति स्वीकार करता है। परन्तु भारतीय वेदज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार वेद में कहीं भी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है, अतः इनमें किसी व्यक्ति विशेष की दान महिमा का स्तुत्य वर्णन कहना उचित नहीं प्रतीत होता है। इस प्रकार के सूक्तों की संख्या के बारे में विद्वान् किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच सके हैं। कुछ विद्वान् इस प्रकार के सूक्तों की संख्या चालीस के लगभग बतलाते हैं। कात्यायन ने अपनी ऋक्सर्वानुक्रमणी में मात्र २२ सूक्तों में ही दान स्तुतियों का उल्लेख किया है किन्तु आधुनिक वेदज्ञों ने अत्यन्त परिश्रम करके ६८ सूक्तों में दानस्तुतियों का अन्वेषण कर डाला है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का १२६वाँ सूक्त दानस्तुति कहा जा सकता है। इन सूक्तों को विनय सूक्त अथवा याज्ञिक गीत भी कहा जा सकता है क्योंकि इनमें यज्ञ के रक्षक की विनती की गई है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में एक सूक्त में दान की महिमा का दिव्य प्रतिपादन हुआ है। इसके छठे मन्त्र के अनुसार स्वार्थ के लिये व्यय किया गया धन पाप का हेतु है- मोघमन्नं॒ विन्द॑ते॒ अप्र॑चेताः स॒त्यं ब्र॑वीमि व॒ध इत्स तस्य॑। नार्य॒मणं॒ पुष्य॑ति॒ नो सखा॑यं॒ केव॑लाघो भवति केवला॒दी।। (ऋ० १०/११७/६) "अर्थात् अनुदार चित्त वाला व्यक्ति अन्न-धन को व्यर्थ पाता है, उसका धन निरर्थक है। मैं सत्य कहता हूँ उसकी यह मृत्यु ही है। कंजूस को सैकड़ों खतरे लगे रहते हैं। वह नियामक ईश्वर को तृप्त करता है यज्ञ उपासना के द्वारा। न दान द्वारा मित्र को पुष्ट करता है। केवल अपने भोगों की पूर्ति करने वाला केवल पाप रूप होता है। भाव यह है कि केवल अपने भोग विलास में धन लगाना पाप है, यह मानव जीवन नहीं मृत्यु है।" इसी सूक्त के चौथे मन्त्र में मित्र को दान दिये जाने की अनिवार्यता का उत्तम प्रतिपादन हुआ है- 'न स सखा यो न ददा॑ति॒ सख्यै॑ सचा॒भुवे॒ सच॑मानाय पि॒त्वः। अपा॑स्मात् प्रेया॒न् न तदो॒कों अ॑स्ति पृ॒णन्त॑मन्यमरणं चिदिच्छेत्।।' (ऋग्वेद १०/११७/४)

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar