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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 110 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता

“...............दशममण्डलस्यऋक् परिशिष्ट रूपत्वं कल्पयितुं तैः भाषापार्थक्यप्रदर्शनादि स्वीकृत दशम मण्डलस्य भाषा मन्त्रार्थ गततात्पर्याणि पृथगेवेति.........किमंत्रब्रूमो वयम्? अस्मच्छुतिषुहि दशममण्डलस्य मण्डलान्तराणाञ्च भाषा एकविधैवोपलभ्यते, अस्मद्बुद्धिषु च तथैकविधमेव तात्पर्यमिति न जानीमहे केषां बुद्धिमालिन्यं केषां वा श्रवणोन्द्रिय दुष्टत्वं केषां वा हठकारित्वमिति।” वस्तुतः सामश्रमी जी का तर्क विचारणीय तथा सम्माननीय है। (ख) डॉ० कपिलदेव द्विवेदी का मत- श्री द्विवेदी जी भी मण्डलों के इस पृथकतावादी सिद्धान्त से सहमत नहीं है। इनका अभिमत है- “वास्तविकता की दृष्टि से विचार किया जाए तो पाश्चात्य विचारों में काफी थोथापन है। .....उन्होंने परकालीन अंश बताकर बात समाप्त कर दी है, परन्तु कहीं भी उसका स्पष्ट और पुष्टकाल निर्धारण नहीं किया। भाषा, व्याकरण आदि का जो तर्क उपस्थित किया जाता है, वह बहुत लचर है और परीक्षा निकष पर खरा नहीं उतरता। दशममण्डल वस्तुतः ऋग्वेद का नवनीत है। इसमें पुरातन सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं भावात्मक महत्त्व के प्रतिपादक सूक्त विशेष रूप से संग्रहीत है। वस्तुतः ऋग्वेद में पूर्वकालीन और परकालीन संग्रह जैसा कोई भेद नहीं है।” डॉ० कपिल देव जी द्विवेदी के अनुसार ऋग्वेद के संग्रह में प्रयुक्त सिद्धान्तों का विवेचन निम्नलिखित हैं- १. ऋषि परिवारों से सम्बन्धित मंत्रों को प्रधानता प्रदान की जाये। २. जहाँ पर उपर्युक्त सिद्धान्त न प्रयोग किया जा सके वहाँ विषय की समानता को मुख्यता दी जाए। ३. सोम से सम्बन्धित मंत्र सर्वाधिक है, अतः उन्हें एक स्थान पर रखा जाये। ४. जो मन्त्र ऋषिक्रम अथवा विषयक्रम में ग्रथित न किये जा सकें, उन्हें अलग ग्रन्थान्त में रखा जाये। इन विपरीत विचारों के दृष्टिगत होने पर अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सम्प्रति यह समस्या जटिल एवं विवादास्पद है, इसलिए इस विषय पर गम्भीर अध्ययन, मनन तथा पुनर्विचार की अत्यधिक आवश्यकता है। दानस्तुति- ऋग्वेद में कतिपय सूक्त तथा मन्त्र ऐसे मिलते हैं, जिन्हें दानस्तुति कहा जाता है। इन सूक्तों में धार्मिक तथा धर्महीन काव्य के मध्यम मार्ग का अवलम्बन किया गया

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar