वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
२. अध्याय ३-४: गुरुकुल दिनचर्या, स्वाध्याय, स्मृति-संवर्धन एवं मौखिक शिक्षण विधि
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द्वितीय अध्याय 73 "तेभ्यस्तपस्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्ताग्नेर्ऋग्वेदो, वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्सामवेदः।" (श०ब्रा० ११/५२/३) अर्थात् उन सातों से तीन वेद उत्पन्न हुए, अग्नि से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ, वायु से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ तथा सूर्य से सामवेद की उत्पत्ति हुई। तथा "अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुः सामलक्षणम्॥" (मनु० २/१५१) इस प्रकार भारतीय परम्परानुसार वेदों की उत्पत्ति जगत् की संरचना के साथ हुई। (२) अर्वाचीन एवं पाश्चात्य विद्वानों का मत :- भारतीय विचारधारा तो वेदों को ईश्वरकृत मानती है किन्तु आधुनिक युग की ऐतिहासिक दृष्टि जो विकासवाद के सिद्धान्त पर विश्वास करती है, इस भारतीय विचार परम्परा को स्वीकार करने में सहमत नहीं होती। वैदिक साहित्य के अध्येता अनेक पाश्चात्य मनीषियों ने ऋग्वेद को सर्वप्राचीन मानकर उसके काल निर्धारण का प्रयत्न किया है। इन विद्वानों का विचार है कि प्रत्यक्ष तथा सबल प्रमाणों के अभाव में ऋग्वेद के समय को पूर्णतः सत्य निश्चित नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि उस अनुमान में कतिपय शताब्दियों का अन्तर रह जाय। पाश्चात्य आलोचकों का अनुकरण करने वाले भारतीय आलोचकों ने भी वेदों के काल निर्धारण का प्रयत्न किया है तथा ये ऋग्वेद के काल को पाश्चात्य आलोचकों की अपेक्षा अधिक प्राचीन समय तक खींच ले गए। इस स्थल पर ऋग्वेद की रचना के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के मतों को उद्धृत किया जा रहा है। (३) मैक्समूलर का मत :- इंग्लैण्ड की "Sacred books of the east" नामक ग्रन्थमाला के अन्तर्गत मैक्समूलर द्वारा सम्पादित ऋग्वेद (शाकल शाखा) को प्रकाशित किया गया था। यह ग्रन्थ १८५९ ई० के लगभग प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ के भूमिका भाग में मैक्समूलर द्वारा ऋग्वेद के काल को निश्चित करने का प्रयास कया गया है। इनके अनुसार ऋग्वेद की रचना १२०० वि० पूर्व में सम्पन्न हुई। अपने मत की पुष्टि करने के लिए मैक्समूलर ने कहा कि गौतम बुद्ध के समय तक वैदिकसाहित्य की रचना पूर्ण हो चुकी थी। वैदिक साहित्य को उन्होंने चार भागों
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74 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता में विभक्त किया। वे भाग हैं— छन्द, मन्त्र, ब्राह्मण एवं सूत्र। उनका कथन है कि प्रत्येक भाग के विकास का एक निश्चित समय रहा होगा। सर्वप्रथम छन्दों, तत्पश्चात् मन्त्रों, तदुपरान्त ब्राह्मणों एवं उसके बाद सूत्रों की रचना हुई। मैक्समूलर के विचार में प्रत्येक विभाग के विकास में तथा उसकी पूर्णता के लिए २०० वर्षों का समय पर्याप्त है। गौतम बुद्ध का आविर्भाव काल विक्रम से लगभग ५०० वर्ष पूर्व हुआ। अतः सूत्र काल का प्रारम्भ ६०० वि० पूर्व माना गया है। इन सूत्रों में प्रमुख रूप से श्रौत सूत्रों तथा गृह्य सूत्रों की गणना की जाती है। इन सूत्रों की रचना से २०० वर्ष पूर्व अर्थात् ८०० वि० पूर्व ब्राह्मणों की रचना हुई। इस काल में ही याज्ञिक अनुष्ठानों का विस्तार तथा उपनिषदों के आध्यात्मिक सिद्धान्त का विवेचन हुआ। उससे २०० वर्ष पूर्व मन्त्रों की रचना हुई। वेदों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है— छन्द तथा मन्त्र। मन्त्रों का विनियोग यज्ञीय अनुष्ठानों में किया जाता है, शेष छन्द हैं। मन्त्रों का निर्माण तथा विकास उससे पूर्व के २०० वर्षों में अर्थात् १२०० ई० पूर्व में हुआ। ऋग्वेद में सर्वप्राचीन छन्द तथा मन्त्र हैं। इस प्रकार ऋग्वेद का काल १२०० वि० पूर्व हुआ। इस काल-गणना के विषय में मैक्समूलर पूरी तरह स्वयं भी सन्तुष्ट नहीं थे। उनके अनुसार यह समय निर्धारण तो मात्र सम्भावना पर आधारित है क्योंकि वेदों के समय को ठीक-ठीक निर्धारित करना असम्भव सा है। वेदों का अस्तित्व इसके पूर्व का भी हो सकता है। विल्सन, कीथ, कोलब्रुक आदि पाश्चात्य मनीषियों ने ऋग्वेद की रचना के काल निर्णय के विषय में मैक्समूलर का समर्थन किया है। ऋग्वेद के काल निर्णय के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने मैक्समूलर की पद्धति को तो स्वीकार किया है, परन्तु प्रत्येक स्तर के विकास के लिए २०० वर्ष के समय को पर्याप्त नहीं माना है। सन् १८८९ ई० को भौतिक धर्म शीर्षक अपने जिफोर्ड व्याख्यानमाला के अवसर पर स्वयं मैक्समूलर ने स्पष्टतः अपने मत को एक अनुमान बतलाया तथा कहा कि विश्व की कोई भी शक्ति वेदों के काल को निर्धारित नहीं कर सकती है। ओल्डन वर्ग के अनुसार ऋग्वेद की रचना का काल २५०० ई० पूर्व का होना चाहिए। (४) ज्योतिष-सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत :- वैदिक संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर ऋतु-सम्बन्धी एवं नक्षत्र-सम्बन्धी जानकारी प्राप्त होती है। कतिपय विद्वानों ने इन ऋतु एवं नक्षत्र विषयक जानकारी का उपयोग वेदों के रचना काल को निर्धारित करने के लिए किया है। उनमें से प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 75 (क) पं० शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित का मत :- महाराष्ट्र निवासी प्रख्यात वेदज्ञ पं० शङ्कर बालकृष्ण दीक्षित ने शतपथ ब्राह्मण का एक अंश उद्धृत किया है, जिसके अनुसार इस ब्राह्मणग्रन्थ के रचनाकाल पर प्रकाश पड़ता है। इस अंश से विदित होता है कि शतपथ ब्राह्मण के रचनाकाल के समय कृत्तिकाओं को ठीक पूर्वीय बिन्दु पर उदित होने का निर्देश है, जहाँ से वे किञ्चिदपि पृथक् नहीं होती। उद्धृत अंश इस प्रकार है— ''एकं द्वे त्रीणि चत्वारीति वा अन्यानि नक्षत्राणि, अथैता एव भूयिष्ठा यत् कृत्तिका स्तद् भूमानमेव एतदुपैति तस्मात् कृत्तिकास्वादधीत। ऐता ह वै प्राच्यादिशो न च्यवन्ते, सर्वाणि ह वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यादिशयाच्यन्ते।'' (शतपथ ब्राह्मण २/१/२) आजकल कृत्तिका नक्षत्र पूर्वीय बिन्दु से किंचित् उत्तर की ओर हट कर उदित होता है। अतः दीक्षित जी की गणनानुसार कृतिका नक्षत्र में वसन्त सम्पात सम्भवतः २५०० ई० पूर्व हुआ होगा। यही शतपथ-ब्राह्मण की रचना का समय है। कृत्तिकादि नक्षत्रों का वर्णन करने वाली संहिता तैत्तरीय शतपथ-ब्राह्मण से प्राचीनतर है तथा तैत्तरीय संहिता से भी प्राचीनतर है ऋग्वेद। अतः चतुर्वेद के निर्माण में लगभग एक हजार वर्षों का समय व्यय हुआ होगा। अतः सर्वप्रथम निर्मित ऋग्वेद का निर्माण ३५०० ई० पूर्व हुआ होगा। (ख) लोकमान्य बालगंगाधर तिलक का मत :- स्वर्गीय श्री तिलक जी ने ऋग्वेद में उपलब्ध ज्योतिष विषयक घटनाओं के आधार पर वेद की रचना का सर्वप्राचीन काल ६००० ई०पू० से लेकर ४००० ई०पू० तक निर्धारित किया है। इस तिथिनिर्धारण का मुख्य आधार विभिन्न नक्षत्रों में वसन्त- सम्पात का वर्णन है। उन्होंने वैदिक काल को चार युगों में विभाजित किया है। वे चार युग निम्नलिखित हैं— (१) अदिति-काल :- इस काल की सीमा ६००० ई०पू० से लेकर ४००० ई०पू० तक है। इस काल में किंचित् गद्य में तथा किंचित् पद्य में अर्थात् गद्यपद्य मिश्रित यज्ञीय विधि वाक्यों की रचना हुई। इनकी संज्ञा निविद् है। इनमें देवताओं की संज्ञा, उनके गुणों तथा चरितों का वर्णन उपलब्ध होता है। (२) मृगशिरा-काल :- इस काल की सीमा ४००० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक है। रचना के दृष्टिकोण से इस युग का सर्वाधिक महत्त्व है। इसी युग में ऋग्वेद के अधिकांश सूक्तों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 76 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की रचना हुई। (३) कृत्तिका-काल :- इस काल की सीमा २५०० ई०पू० से लेकर १४०० ई०पू० तक है। इसी युग में चारों मन्त्र संहिताओं का सम्पादन तथा तैत्तरीय संहिता एवं शतपथ ब्राह्मणादि कतिपय ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना हुई। वस्तुतः मन्त्रों का निर्माण तो ६००० ई०पू० में ही आरम्भ हो गया था, परन्तु यज्ञीय दृष्टिकोण से उन मन्त्रों का परिमार्जन, परिष्कार तथा संकलन इसी काल में सम्पन्न हुआ- ‘‘It was at this time that the Saṁhitas were probably compiled into systematic books and attempts made to ascertain the meaning of the oldest hymns and formulae’’. (The Orion, Page 207) इसके अन्तिम भाग में वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना हुई। इसमें सूर्य एवं चन्द्र के श्रविष्ठा के आदि में उत्तर दिशा की ओर घूम जाने का वर्णन है तथा यह स्थिति गणित के आधार पर लगभग १४०० ई०पू० के निकट होती है- ‘‘प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक्। सर्वार्धे दक्षिणार्कस्तु माघ श्रवणवोः सदा॥’’ (४) अन्तिम काल :- इस काल की सीमा १४०० ई०पू० से लेकर ५०० ई०पू० तक है। इस काल में विशेष रूप से श्रौत-सूत्रों, गृह्य-सूत्रों तथा अन्य दर्शन सूत्रों का निर्माण हुआ। इसके अन्तिम भाग में वैदिक धर्म के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप बौद्ध धर्म का उदय हुआ। अन्त में स्व० तिलक जी ने विचार प्रकट किया कि यदि वेदों का निर्माण काल ४००० ई०पू० स्वीकार कर लिया जाये तो भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों के मतों का समन्वय हो जायेगा- ‘We can thus satisfactorily account for all the opinions and traditions current about the age of the Vedas amongst ancient and modern scholars in India and Europe if we place the Vedic period at about 4000 B.C. in strict accordance with the astronomical references and facts recorded in the ancient literature of India.’ तिलक की गणना प्रक्रिया :- ऋतु-चक्र, सूर्य-संक्रमण पर आधारित है। इसी के आधार पर ऋतुएँ आती जाती हैं। ऋतुएँ निरन्तर पीछे की ओर हट जाती हैं। प्रथम वर्ष का प्रारम्भ वसन्त से होता है। इस काल में वसन्त सम्पात क्रमशः जिन नक्षत्रों पर होता है, वे हैं- उत्तरा, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 77 भाद्रपद, रेवती, अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा आदि। सम्प्रति वह मीन की संक्रान्ति से प्रारम्भ होता है। इस संक्रान्ति का प्रारम्भ पूर्वा भाद्रपद के चतुर्थ चरण से होता है। शनैः शनैः नक्षत्र क्रमशः पीछे की ओर हटते गए हैं। नक्षत्रों की कुल संख्या २७ है तथा सूर्य का संक्रमण चक्र ३६० डिग्री का है। इस प्रकार प्रत्येक नक्षत्र की ३६०/२७ = १३११ डिग्री दूरी प्राप्त होती है। प्रत्येक नक्षत्रकाल क्रमानुसार अपने मूल स्थान से हटता रहता है। एक डिग्री पीछे को हट जाने में एक नक्षत्र ७२ वर्ष का समय लेता है। अतः प्रत्येक नक्षत्र अपनी १३११ डिग्री की दूरी तय करने में कुल ७२×१३११= ९७२ वर्ष का समय लेता है। इस प्रकार निष्कर्ष यह निकला कि २५०० वर्ष पूर्व वसन्त-सम्पात हुआ होगा। तिलक जी को ऋग्वेद में कतिपय ऐसे मन्त्र भी उपलब्ध हुए हैं, जिनमें मृगशिरा नक्षत्र पर वसन्त-सम्पात होने का सङ्केत मिलता है। वे मन्त्र हैं- ऋग्वेद १/३३/१२, १/८०/७, १०/८६/५। यह वसन्त-सम्पात और भी आगे पुनर्वसु तक जाता है। कृत्तिका नक्षत्र, मृगशिरा नक्षत्र से दो नक्षत्र पूर्व तथा पुनर्वसु नक्षत्र से चार नक्षत्र पूर्व है। अतः मृगशिरा पर वसन्त-सम्पात का काल ९७२×२ = १९४४ वर्ष कृत्तिका नक्षत्र के वसन्त-सम्पात के काल से पूर्व होगा। इस प्रकार मृगशिरा नक्षत्र में वसन्त- सम्पात होने का काल ४४४४ ई० पहले है। इस प्रकार तिलक जी के अनुसार वेदों का निर्माण लगभग ४५०० वर्ष पूर्व हुआ होगा। अगर पुनर्वसु नक्षत्र में वसन्त-सम्पात को माना जाय तो इस रचनाकाल में २००० वर्षों की वृद्धि और हो जायेगी। (ग) डॉ० जैकोबी का मत :- डॉ० जैकोबी जर्मनी के बोन नगर के निवासी थे। इन्होंने भी ज्योतिषीय गणना के आधार पर ऋग्वेद का काल ४५०० ई०पू० निर्धारित किया है। उनका कथन है कि कल्पसूत्रों में आए विवाह प्रकरण में ध्रुव इवस्थिरा भव वाक्य का तात्पर्य है कि उस समय ध्रुवतारा अधिक चमकीला तथा स्थिर रहा होगा। यह स्थिति २००० ई०पू० सम्भव है। कृत्तिका नक्षत्र पर वसन्त-सम्पात का उल्लेख ब्राह्मण ग्रन्थों में मिलता है। अतः गणना करने पर यह समय लगभग २५०० ई०पू० का प्रतीत होता है। इस प्रकार ब्राह्मण ग्रन्थों तथा कल्प सूत्रों का समय २७०० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक हो सकता है, इसलिये ऋग्वेद का समय इससे भी और पूर्व लगभग ४५०० ई०पू० होना चाहिये। (घ) हाग एवं आर्कविशप प्राट का मत :- हाग एवं आर्कविशप प्राट आदि विदेशी विद्वानों ने भी वेद काल निर्णय हेतु CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 78 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अपनी गणना का आधार ज्योतिष को ही बनाया है। सर्वप्रथम अपनी गणना द्वारा उन्होंने वेदाङ्ग ज्योतिष का रचना काल निर्धारित किया। यह समय ११८४ ई०पू० निश्चित किया। तत्पश्चात् इसी आधार पर ब्राह्मण ग्रन्थों का निर्माण काल १४०० ई०पू० से लेकर १२०० ई०पू० तक निश्चित किया। उनके अनुसार वैदिक संहिताओं का संकलन २००० ई०पू० से लेकर १४०० ई०पू० तक हुआ तथा मन्त्रों का रचना काल २४०० ई०पू०-२००० ई०पू० के लगभग रहा होगा। (च) पं० दीनानाथ शास्त्री चुल्लैट का मत :- पं० दीनानाथ शास्त्री चुल्लैट तथा उनके पुत्र पं० गोपीनाथ शास्त्री चुल्लैट ने भी वेद के निर्माण काल को निश्चित करने में ज्योतिष को ही अपनी गणना का आधार बनाया है। पं० दीनानाथ जी ने ज्योतिष के प्रमाण द्वारा वेदों का रचनाकाल आज से लगभग ३००००० वर्ष पूर्व निर्धारित किया है। यह निर्णय उन्होंने अपनी पुस्तक वेद- काल निर्णय में दिया है। इसी प्रकार पं० गोपीनाथ जी ने अपनी गणना अपनी पुस्तक युग-परिवर्तन में दी है। उनके अनुसार वर्तमान कला का २८वाँ कलियुग लगभग २४ वर्ष पूर्व समाप्त हो चुका है। सतयुग का आरम्भ सं० १९८१ में हुआ। यह २९वाँ सतयुग था। उनके विचार में एक चतुर्युगी १२ हजार वर्ष में पूरी होती है, न कि ४३ लाख २० हजार वर्ष में, जैसा कि अनेक विद्वान् मानते हैं। अतः गोपीनाथ जी शास्त्री के अनुसार वेदों का निर्माण काल लाखों वर्ष पूर्व ठहरता है किन्तु पाश्चात्य वेदज्ञ तथा तर्कप्रधान भारतीय वेदज्ञ इन विचारों से सहमत नहीं है। (छ) डॉ० लुडविग का मत :- जिन अनेक पाश्चात्य मनीषी तथा संस्कृत मर्मज्ञों ने वेद काल निर्णय का प्रशंसनीय प्रयास किया, उनमें डॉ० लुडविग का प्रयास भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। लुडविग जी ने भी वेदों के निर्माणकाल के सम्बन्ध में ज्योतिष का आधार ग्रहण किया। आपने इसके लिये सूर्यग्रहण को आधार मानकर इस प्रकार का एक प्रयत्न किया। ५- भाषा सम्बन्धी तथ्यों पर आधृत मत : कतिपय विद्वानों ने वेद काल निर्णय का आधार वेदों की भाषा को बनाया है। वस्तुतः भाषा ही किसी साहित्य का शरीर होती है। शरीर को देखकर शरीरधारी के समय का निर्णय दिया जा सकता है। तब निर्णय में यह विधि भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भाषा पर आधृत मत निम्नलिखित है- क- ऋग्वेदीय भाषा एवं अवेस्ताँ की तुलना : ऋग्वेद की भाषा तथा अवेस्ताँ की सर्वप्राचीन गाथाओं की भाषा में परस्पर इतना अधिक साम्य है कि यदि वेद में उपलब्ध मंत्रों में कुछ ध्वनियों का परिवर्तन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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द्वितीय अध्याय 79 कर दिया जाय तो वे मन्त्र अवेस्ताँ गाथाओं में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि अवेस्ताँ का रचना काल ईसा से ८०० वर्ष पूर्व होने के बजाय कहीं १५०० वर्ष पूर्व होता तो ऋग्वेद तथा अवेस्ताँ की भाषा में नगण्य अन्तर होता। ऋग्वेदीय भाषा एवं अवेस्ताँ की भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से भी यही परिणाम प्राप्त होता है कि वेदों की रचना लगभग २००० वर्ष ईसा के पूर्व में हुई होगी। ख- मैक्डानल का मत : मैक्डानल ने ऋग्वेद का निर्माण काल १३०० ई०पू० में निर्धारित किया है। मैक्डानल का कथन है कि आर्यों की दो शाखाएँ थीं— भारतीय और ईरानी। यह शाखाएँ १३०० ई०पू० में पृथक् हुई थी। अपने पृथक् होने के पहले ये शाखाएँ एक ही थी। इसी काल में आर्यों की भारतीय एवं ईरानी शाखाओं द्वारा ऋग्वेद का निर्माण किया गया। इसके ५०० वर्ष पश्चात् लगभग ८०० ई०पू० में अवेस्ताँ प्रणीत हुई। इनका कथन है कि जैकोबी के अनुसार यदि आर्यों की भारतीय एवं ईरानी शाखाओं के अलग होने को ४५०० ई०पू० में भी मान लिया जाय तो भी ३००० वर्षों तक इनकी भाषाएँ अपरिवर्तित ही रही होगी। १९०७ ई० में एशिया माइनर में उपलब्ध १४०० ई०पू० के अभिलेखों में मित्र, वरुण, इन्द्र नासत्यादि देवों का निर्देश उस समय दोनों शाखाओं के भाषा साम्य को प्रमाणित करता है। उसी समय के लगभग यदि दोनों शाखाओं के अलग होने को स्वीकार कर लिया जाय तो उसके कुछ समय पश्चात् होने वाले भाषागत परिवर्तन के अनुसार ऋग्वेद का निर्माण १३०० ई०पू० में हुआ होगा। छ- इतिहास सम्बन्धी तथ्यों का आधृत मत : अनेक भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने इतिहास के आधार पर वेदों का रचनाकाल निर्धारित करने का प्रयत्न किया है। इनमें से प्रमुख मत निम्नलिखित हैं— क- भण्डारकर का मत : डॉ० आर० जी० भण्डारकर ने ऐतिहासिक आधार पर वेदों के रचनाकाल को निर्धारित करने का प्रयास किया। ईशावास्योपनिषद् में असुर्या शब्द आया है। यह उपनिषद् यजुर्वेद का ४०वाँ अध्याय है। भण्डारकर जी का कथन है कि यह शब्द आसीरिया का समानार्थक है। ऋग्वेद में देवताओं तथा असुरों के युद्ध का वर्णन है। अतः असीरिया (मेसोपोटामिया) के निवासी ही वेदों में बतलाए गए असुर हैं, ये २५०० ई०पू० के लगभग भारत की ओर आये थे। अतः यजुर्वेद का निर्माण काल लगभग २५०० ई०पू० में हुआ होगा। ऋग्वेद की रचना इससे भी पूर्व हुई होगी। अतः ऋग्वेद का रचनाकाल ६००० ई०पू० में कहा जा सकता है।
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सिकन्दर के आक्रमण के समय ग्रीक के लोगों ने राजाओं की वंशावलियों का संकलन किया था। उनके अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य से पूर्व १५४ राजाओं ने ४५७ वर्ष तक शासन किया था। सम्भवतः यह समय वैदिक ही था। इससे अनेक वर्षों पूर्व ऋग्वेद का निर्माण हो चुका था। इस आधार पर ऋग्वेद के निर्माण का समय ८००० ई०पू० से ६००० ई०पू० तक हो सकता है। ख- डॉ० राधाकुमुद मुखर्जी का मत : डॉ० मुखर्जी ऐतिहासिक आधार पर ऋग्वेद का समय २५०० ई०पू० मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि- "On a modest computation we should come to 2500 B.C. as the time of Ṛgveda (Hindu civilzation-67)" ग- दि वैदिक एज के अनुसार : इस ग्रन्थ को भारतीय विद्या भवन, बम्बई ने प्रकाशित किया है। इसके अनुसार ऋग्वेद का समय १००० ई०पू० का है। इसमें लिखा है- "On linguistic ground the language of Ṛgveda, the oldest Veda, may be said to be about 1000 B.C." (Page 225) घ- अमलनेरेकर का मत : प्रसिद्ध लेखक H.G. Wells ने अपनी 'Outlines of World History' में २५०००-५०००० वर्ष पूर्व का विश्व का नक्शा दिया है। नरेकर महोदय ने इसी आधार पर ऋग्वेद का रचना काल ६६०००-७५००० वर्ष पूर्व में बतलाया है। च- प्रोफेसर लोटू सिंह का मत : प्रोफेसर लोटू सिंह ने सनातनी ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ऋग्वेद की रचना को ४ लाख ३५ हजार वर्ष पूर्व का बतलाया है। ६- शिलालेखों का आधृत मत : सन् १९०७ ई० पूर्वी एनातोलिया (वर्तमान टर्की) में बोग़ाज कोई नामक ग्राम में खुदाई करने पर डॉ० हूगोविन्कलर को एक प्राचीन शिलालेख उपलब्ध हुआ। यह शिलालेख इस विषय की पुष्टि में एक सशक्त प्रमाण है। पश्चिमी एशिया के इस खण्ड में कभी दो प्राचीन जातियाँ रहती थीं। एक थी हित्तिन्ति तथा दूसरी मितानि। इस शिलालेख पर हित्तियों तथा मितानियों के मध्य १४वीं शती ई०पू० के आरम्भ में होने वाली सन्धि का उल्लेख है। यह एक राजकीय शासनपट्ट के रूप में है। संधिलेख में शपथ ग्रहण करते हुए दोनों जातियों के राजाओं ने प्राचीन बेबिलोनिया तथा हित्ति जाति के देवताओं का आह्वान किया है। इन संरक्षक देवों की सूची में बाबुल देशीय
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 81 तथा हित्ति जाति के देवों के साथ मितानि जाति के देवों में मित्र, वरुण, इन्द्र तथा नासत्यों के नाम प्राप्त होते हैं। ये लेख १४०० ई०पू० के हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि इस समय से अत्यधिक पूर्व काल में आर्यों ने आर्यावर्त में अपने वैदिक धर्म तथा वैदिक देवताओं की कल्पना कर रखी थी। इन्हीं आर्यों की एक शाखा पश्चिमी एशिया से भारतवर्ष में आकर रहने लगी। यहीं पर उस शाखा ने अपने देवगणों तथा धर्म का अत्यधिक प्रचार किया। अतः इसी आधार पर आधुनिककालीन पाश्चात्य वेदज्ञ वेदों का काल २००० ई०पू० से लेकर २५०० ई०पू० तक निर्धारित करते हैं। इसी प्रकार वेदों के रचनाकाल को निर्धारित करने में अनेक विद्वानों ने मोहनजोदाड़ों तथा हड़प्पा में प्राप्त अभिलेखों तथा सभ्यता का आश्रय ग्रहण किया है। इन विद्वानों ने वैदिक सभ्यता को ग्रामीण सभ्यता माना है तथा सिन्धु घाटी की सभ्यता को विकसित नागरिक सभ्यता माना है। अतः नागरिक सभ्यता से ग्रामीण सभ्यता को पुरातन् सिद्ध करते हुए वेदों का काल ३००० वर्ष ईसा पूर्व निश्चित किया है। अनेक विद्वान् इस विचार से सहमत नहीं हैं कि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी तथा सिन्धु घाटी की सभ्यता से निम्न थी। अतः यह मत मान्य नहीं है। ८- भूगर्भ सम्बन्धी तथ्यों का आधृत मत : ऋग्वेद में भूगोल एवं भूगर्भ सम्बन्धी अनेक घटनाएँ उल्लिखित हैं जिनका आधार लेकर ऋग्वेद के काल को निर्धारित किया जा सकता है। अनेक विद्वानों ने ऐसा किया भी है। इनमें नारायण राव भवनराव पारंगी तथा अविनास चन्द्र व्यास आदि प्रमुख हैं। इनके मत को नीचे प्रस्तुत किया गया है— क- डॉ० अविनाश चन्द्र व्यास का मत : डॉ० व्यास ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ऋग्वैदिक इण्डिया में भूगर्भ शास्त्र तथा भूगोल के प्रमाणों के आधार पर ऋग्वेद का निर्माण काल ईसा से २५ हजार वर्ष पूर्व निश्चित किया है। इनके द्वारा किये गये प्रमुख प्रमाण निम्नलिखित हैं— (१) ऋग्वेद में सरस्वती नदी के समुद्र में गिरने का उल्लेख प्राप्त होता है— 'एका चेतत् सरस्वती नदीनाम्, शुचिर्यती गिरिभ्यः आ समुद्रात्।' (ऋ० ७/९५/२) (२) यह समुद्र उस समय राजस्थान में स्थित था। किसी भयंकर भूकम्प ने समुद्र तथा सरस्वती दोनों को नष्ट कर दिया, अतः दोनों लुप्त हो गए। (३) आर्यों के निवासस्थान सप्त सैन्धव प्रदेश के चतुर्दिकू चार समुद्र विद्यमान थे, जहाँ सम्प्रति उत्तर प्रदेश तथा बिहार है। वहाँ पर उस समय पूर्वी समुद्र की स्थिति CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 82 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता थी। पश्चिमी समुद्र आज भी वर्तमान है। उत्तरी समुद्र उत्तर में स्थित था। दक्षिण समुद्र की स्थिति राजस्थान में थी। (४) गंगा-प्रदेश, हिमालय की तलहटी तथा असम के पर्वतीय प्रदेश उस समय समुद्र के अन्दर वर्तमान थे। भूगर्भवेत्ताओं का कथन है कि यह स्थिति लगभग ईसा से २५००० वर्ष पूर्व से लेकर ५०००० वर्ष पूर्व थी। ख- नारायणरावभवनराव पारंगी का मत : ऋग्वेद के रचनाकाल को निर्धारित करने के लिये भूगर्भशास्त्र के आधार पर तर्क प्रस्तुत करने वाले विद्वानों में श्री नारायणरावभवनराव पारंगी प्रमुख हैं। इन्होंने ऋग्वेद की रचना का काल ९००० वर्ष पूर्व निश्चित किया है। ऋग्वेद में अनेक भौगोलिक स्थितियों- नदियों, समुद्रों आदि का वर्णन है। इन भौगोलिक स्थितियों का वर्णन करने वाले प्रमुख मन्त्र हैं- ऋग्वेद १०/१३६/५, ९/३३/३ तथा १०/४७/२ आदि। इन मंत्रों में जिन स्थितियों का वर्णन है, भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार इस प्रकार की भौगोलिक स्थिति ९००० वर्ष पूर्व रही होगी। इसी आधार पर श्री पारङ्गी महोदय ने ऋग्वेद की रचना का समय ९००० वर्ष पूर्व का निर्धारित किया है। विन्टरनिट्ज का मत- प्रोफेसर विन्टरनिट्ज ने ज्योतिष विद्या पर आधारित तथ्यों को ही प्रधानता दी है। उन्होंने भाषा सम्बन्धी तथ्यों पर आधारित मतों को भी निरर्थक कहा है। उनके अनुसार वेदों का रचना काल २५०० ई०पू० से लेकर ५०० ई०पू० तक है। उपसंहार अनेक विद्वानों की यह भी मान्यता है कि ऋग्वेद की रचना यद्यपि ऋषियों का ही तत्त्व दर्शन है, तथापि यह वेद भी एक ही समय में नहीं रचा गया है। ऋग्वेद के कतिपय सूक्त पश्चातवर्ती हैं। कतिपय सूक्त अवान्तरकालीन रचना है। वेदमन्त्रों की रचना की एक परम्परा रही है तथा इनकी रचना निरन्तर होती रही। कालान्तर में इनका संकलन कर लिया गया। उपर्युक्त मतों की विशाल संख्या से यह तो स्पष्ट है कि अथक परिश्रम करने पर भी वेदों की रचना का समय आज भी निर्धारित नहीं हो सका है। वस्तुतः ऋग्वेद एवं अन्य वेदों की रचना के समय को पूर्णतः निश्चित करना लगभग असम्भव सा ही है। इनके काल को निर्धारित करने में वेदज्ञों ने शताब्दियों नहीं बल्कि सहस्राब्दियों का CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 83 अन्तर किया है। इस पर भी इतना तो अवश्य निश्चित है कि वेद विश्व का अति प्राचीन साहित्य है। इनके अर्थों का पूर्णतः सत्य समझना न केवल विदेशियों के लिए अपितु भारतीय वेदज्ञों के लिये भी एक कठिन कार्य रहा है। भारतीय विचारधारा वेदों को नित्य तथा अपौरुषेय मानकर इनके काल के सम्बन्ध में विचार नहीं करती, किन्तु यह भी निश्चित है कि शीघ्र ही किसी दिन मानविकी के अध्येता इस समस्या को प्रामाणिक ढंग से अन्तिम रूप से सुलझा कर ही मानेंगे। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri चतुर्थ वेदों की शाखाएँ वैदिकवाङ्मय में 'शाखा' शब्द अत्यधिक प्रचलित है। यह शब्द आजकल के नवीन प्रचलित शब्द 'संस्करण' के अत्यधिक निकट जान पड़ता है। प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को वेद का मौखिक ज्ञान कराता था, वह शिष्य अपने शिष्यों को गुरु सदृश पुनः वेद का ज्ञान कराता था। इस प्रकार वेद सम्बन्धी ज्ञान का हर पीढ़ी में नया संस्करण हो जाता था। वस्तुतः वेदों से सम्बन्धित साहित्य को अक्षुण्ण बनाए रखने में इन ब्राह्मण-वंशों का योगदान श्लाघनीय है। उन पुरातन ब्राह्मणवंशों में परम्परा से इस कार्य हेतु जो अभिधान प्रचलित हुआ वह 'शाखा' कहलाता है। शाखाएँ :- आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द के मतानुसार शाखाएँ वेद का मूल नहीं हैं अर्थात् वास्तविक वेद नहीं है। ये तो संहिताओं के प्रवचन मात्र हैं। जिस प्रकार किसी वृक्ष की मूल शाखाएँ तथा उन शाखाओं पर पत्र, पुष्प तथा फलादि की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार वैदिकवाङ्मय रूपी वृक्ष का मूल तो चार वेद ही हैं- ऋक्, यजुः, साम एवं अथर्व, किन्तु शाखाएँ अनेक हैं; यथा- शाकल, वाष्कल, वाजसनेय, मौद तथा पैप्पलाद आदि। वृक्ष के मूल से ही विभिन्न शाखाओं के उत्पन्न होने के सदृश ये शाखाएँ भी मूल वेदों से उत्पन्न हुईं। इस बात की पुष्टि व्यासजी ने भी महाभारत में की है। अपने ग्रंथ महाभारत में उन्होंने लिखा है कि- अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवः प्रभोः। तेन भिन्नास्तदा वेदाः मनोः स्वायंभुवेन्तरे। (३४५.४२, शान्तिपर्व) अर्थात् वाग्देवी सरस्वती के सुत अपान्तरतमा ने स्वायंभुव मनवन्तर में मूल वेदों को शाखाओं में विभाजित किया। कवि जैमिनि ने भी अपनी 'पूर्वमीमांसा' में लिखा है कि 'आख्या प्रवचनात्' (१/१/३०) अर्थात् 'शाखा' अभिधान का हेतु प्रवचन ही है। जिस प्रकार वृक्ष की शाखाएँ, मूल का उपबृंहण होती है, उसी प्रकार वैदिक शाखाएँ भी मूल वेद-वृक्ष का उपबृंहण है तथा उपबृंहण शब्द प्रवचन एवं व्याख्या शब्दों का पर्याय भी है। महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार 'वेद' तो ईश्वरीय ज्ञान है। उनके मन्त्रों को प्राचीन ऋषियों ने लिखा नहीं है, अपितु अपने ध्यान नेत्रों से ईश्वरकृत मन्त्रों का CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 85 साक्षात्कार किया है। किन्तु शाखाओं के साथ यह बात नहीं है। वेद तो अपौरुषेय है किन्तु शाखाएँ पौरुषेय हैं। पतञ्जलि का कथन है कि- “न नु चोक्तं नहि छन्दांसि क्रियन्ते। नित्यानि छन्दासीति। यद्यप्यर्थोनित्यः यत्त्वसौवर्णानुपूर्वीऽसावनित्या। तद्भेदाच्च एतद्भवति काठकं, कापालकं, मौदकं, पैप्लादकं” अर्थात् वेद न तो कहे गए और न बनाए ही गए। वेद तो नित्य हैं। किन्तु जो वर्णानुपूर्वी है वह अनित्य है और वही काठक, कापालक, मौदक तथा पिप्पलाद आदि भेदों में दृष्टिगत होता है। यह भेद मन्त्रपाठ की विभिन्न विधियों में दृष्टिगोचर होता है। याज्ञिक अनुष्ठानों के समुचित सम्पादन के लिए संहिताओं का सङ्कलन हुआ। इस वैदिक पठन-पाठन को नष्ट न होने की दृष्टि से व्यासजी ने अपने चार प्रमुख शिष्यों को पढ़ाया। यह बात भागवत के अन्तर्गत स्पष्ट की गई है— ‘तत्रर्ग्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः॥ वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामृत। अथर्वाङ्गिरसामासीत् सुमन्तुर्दारुणो मुनिः॥’ ( भागवत १/४/२२) अर्थात् ऋषि ‘पैल’ को ऋग्वेद, कवि ‘जैमिनि’ को सामवेद, ‘वैशम्पायन’ को यजुर्वेद तथा ‘सुमन्तु’ मुनि को अथर्ववेद का ज्ञान कराया। इस प्रकार गुरुओं से प्राप्त ज्ञान को शिष्यों में बढ़ाते हुए इन ऋषियों ने वैदिक ज्ञान का अतिशय प्रचार किया। इसी से यह वेदवृक्ष विविध शाखाओं से युक्त होकर विशाल वट वृक्ष के सदृश बन गया। चरण :- वैदिकवाङ्मय में ‘शाखा’ शब्द के अर्थ में ही एक शब्द और भी उपलब्ध होता है, वह शब्द है— ‘चरण’। ‘मालती माधव’ के टीकाकार जगद्धर का कथन है कि ‘चरणशब्दः शाखाविशेषाध्ययनपरैकतापत्रजनसंघवाची’ अर्थात् चरण शब्द विशेष शाखा के अध्ययनकर्ता एकतापत्र मनुष्यों के समूह का वाचक है। इन शाखाओं का विस्तारपूर्वक विवेचन पुराणों एवं ‘चरणव्यूह’ आदि ग्रन्थों में देखा जा सकता है। इस शब्द की व्याख्या तथा अर्थ के विषय में अनेक विद्वानों ने विचार प्रकट किए हैं। महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार ‘गोत्रं च चरणैः सह’ अर्थात् ऋषि गोत्र का चरण से सम्बन्ध है। पं० भगवतदत्त जी के मतानुसार शाखाएँ चरणों का ही अवान्तर भाग थीं। शाकल, वाष्कल आदि चरण हैं तथा काण्व, काठक, कापालक आदि शाखाएँ हैं। कैय्यट के अनुसार भी ‘चरण शब्दः अध्ययन वचनः’ अर्थात् ऋषियों के अध्ययन CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 86 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता कर्म के अनुसार ही शाखा अन्य क्रमों से भिन्न हो गई। शाखा-भेद के कारण- मूल वैदिक संहिताओं से ही अनेक वैदिक शाखाएँ उद्भिन्न हुईं। इस शाखा-भेद का कोई निश्चित कारण नहीं है, अपितु अनेक सम्भावित कारण हैं। क्रमशः उन कारणों पर विस्तारपूर्वक विवेचन प्रस्तुत है। (अ) पाठ-भेद- 'पाठभेद' शाखाओं के भेद का एक प्रमुख कारण है। विद्वानों के मतानुसार भी मन्त्रों के पठन-पाठन की अनेक विधियाँ ही शाखाओं के भेद की जन्मदाता है। रसाचार्य, ब्रह्मवादीआचार्य 'व्याडि' ने अपनी पुस्तक 'विकृतिवल्ली' में इन विकृतियों की विस्तृत चर्चा भी की है। उन्होंने लिखा है कि— 'जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वजो, दण्डो, रथो, घनः। अष्टौविकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा मनीषिभिः॥' (विकृतवल्ली, १/५) इन आठ प्रकार की विकृतियों अर्थात् मन्त्र पाठ की शैलियों के आधार पर ही आठ प्रकार की शाखाओं का प्रचलन हुआ। (ब) देश-काल-भेद प्राचीन काल में गुरुकुलों में वेदज्ञ ऋषि अपने शिष्यों को वेद-विषयक शिक्षा देते थे। भारतवर्ष एक अत्यन्त विशाल देश था। उस समय मुद्रण सम्बन्धी सुविधा भी नहीं उपलब्ध थी। समस्त ज्ञान मौखिक था। अतः विषयों में एकरूपता सुरक्षित न रह सकी। अतः स्थान एवं काल की भिन्नता शाखाओं की भिन्नता का कारण बनी। इसी प्रकार यह वेदाध्ययन विभिन्न कालों में निरन्तर होता रहा। इन विभिन्न कालों में अनेक नूतन ऋचाओं का भी आविर्भाव हुआ। अनेक मन्त्र संहिताओं में उपलब्ध नहीं होते। अतः कालों की भिन्नता भी शाखाओं के भेदों का आधार है। इन उपर्युक्त शाखा-भेद सम्बन्धी दो कारणों से डा० मङ्गलदेव शास्त्री भी सहमत हैं। इस विषय पर उनका कथन है कि "वैदिक परम्परा में एक ऐसा समय था, जबकि अध्ययनाध्यापन का आधार केवल मौखिक था, उसी काल में एक ही गुरु के शिष्य-प्रशिष्य भारत जैसे महान् देश में फैलते हुए विशेषतः गमनागमन की उन दिनों की कठिनाइयों के कारण किसी भी पाठ को पूर्णतः अक्षुण्ण न रख सके थे। पाठ-भेद का हो जाना स्वाभाविक था— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 87 एवं वेदं तदान्यस्य भगवानृषिसत्तमः। शिष्येभ्यश्च पुनर्दत्त्वा तपस्तप्तुं गतो वनम्॥ तस्य शिष्यप्रशिष्यैस्तु शाखाभेदास्त्विमेकृताः॥ ( वायुपुराण ६१/७७) साथ ही जान बूझकर पाठ का परिवर्तन या परिवर्धन भी अवस्थाविशेष में सम्भावना से बाहर की बात नहीं है। एवं ऐसा भी समय था, जब नवीन ऋचाएँ भी बनाई जाती थीं— ‘अग्निः पूर्वेभिरृषिभिरीड्यो नूतनैरुत।’ (ऋ० १/१/२) ‘इमां प्रत्नाय सुष्टुतिं नवीयसीं वोचेयम्’ (ऋ० १०/९१/१३) इत्यादि ऋचाओं में स्पष्टतः प्राचीन और नवीन ऋषियों का और बिल्कुल नवीन बनाई हुई ऋचाओं का उल्लेख है। तभी वैदिकवाङ्मय में ऐसी भी ऋचाएँ और मन्त्र मिलते हैं, जो उपलब्ध वैदिक संहिताओं में नहीं पाए जाते। ऐसी अवस्था में पाठभेद का हो जाना असम्भावित नहीं हो सकता। अतः शाखाभेद के दो प्रमुख कारण निश्चित हुए। वे हैं— १. अध्ययन भेदाच्छाखा भेदः अर्थात् अध्ययन के भेद से शाखाभेद होना, २ देशभेदनं शाखानां व्यवस्थापनम् अर्थात् देशभेद से शाखाओं में भेद होना। इन दो प्रमुख कारणों के अतिरिक्त कतिपय ‘गौण कारण’ भी हैं, जिन्हें वेदज्ञ शाखाओं के भेदों का हेतु बतलाते हैं, वे निम्नलिखित हैं— (स) उच्चारण-भेद- कुछ सीमा तक वैदिक शाखाओं में भेद-प्रभेद के लिए वेद-मन्त्रों तथा मन्त्रगत पदों का उच्चारण-भेद भी उत्तरदायी है। बहुधा अज्ञानतावश अथवा स्वभावगत त्रुटि के कारण विभिन्न लोगों के उच्चारण में भेद होना सम्भव ही है। जैसे कि अनुष्टुप्- छारदी के स्थान पर क्वचित् अनुष्टुप शारदी का उच्चारण किया जाता है। इसी प्रकार मूर्धन्य ‘ष्’ के स्थान पर ‘ख’ का उच्चारण अच्छे पढ़े-लिखे मनुष्यों के मुख से भी सुना जा सकता है। जैसे ‘इषेत्वा’ को ‘इखेत्वा’ कहना। अतः उच्चारण-भेद भी शाखा-भेद का कारण है किन्तु यह कारण शाखा-भेद का आंशिक कारण ही है। (द) ऋषि-देवता-छंद-भेद- आचार्य शौनक ने ऋषि, देवता तथा छंदों में होने वाले भेदों को भी शाखाओं के भेदों का कारण स्वीकार किया है। उन्होंने बृहद्देवता में लिखा है— “देवताष्यार्षछन्देभ्यो वैविध्यं तस्य जायते।” अर्थात् देवता, ऋषि तथा छंदों की विविधता शाखाओं में भेद की जनक है। प्रत्येक मन्त्र के ऊपर या सूक्त के ऊपर उस CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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88 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता मन्त्र या सूक्त के ऋषि एवं छन्द का नामोल्लेख रहता है। भ्रमवश इन नामों में अन्तर भी पड़ा। यह अन्तर इसलिए पड़ा क्योंकि विभिन्न सूक्तों के मन्त्र विभिन्न ऋषियों द्वारा विभिन्न रूपों में देखे गए। इन मन्त्रों का साक्षात् सम्बन्ध देवता तथा अर्थ से होता है। अतः यह कारण सबका परस्पर भेद कराने में सहयोगी रहा। (क) मन्त्रों का व्याख्या भेद- एक-एक मन्त्र की अनेक प्रकार से व्याख्या होने के कारण भी शाखाओं में भेद हुआ है। निरुक्त में एक-एक मन्त्र के तीन-तीन अर्थों का विवेचन किया है- आदिभौतिक-अर्थ, आदिदैविक-अर्थ तथा आध्यात्मिक-अर्थ। इसके अतिरिक्त ‘सम्प्रदाय-भेद' से एक-एक मन्त्र के सात-सात अर्थ निकाले जा सकते हैं। यथा ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि', इस मन्त्र का सात प्रकार से अर्थ किया जा सकता है। अतः 'सम्प्रदाय-भेद' मन्त्रों के अर्थभेद का कारण है तथा मन्त्रों का अर्थ-भेद ही मन्त्र की विभिन्न व्याख्याओं को जन्म देता है। ये मन्त्रों की विभिन्न व्याख्याएँ ही वैदिक शाखाओं की जननी हैं। इन मतों के विपरीत पं० सत्यव्रत सामश्रमी ने ऐतरेयालोचन में लिखा है- ‘तत्वतो नहि वेदशाखा वृक्षशाखेवऽनापि नदी शाखेव, प्रत्युत् अध्येतृभेदात् सम्प्रदायभेदञ्च अध्ययनविशेष रूपैव।' अर्थात् वे वैदिक ऋचाओं को वृक्ष अथवा नदी की शाखाओं के सदृश नहीं स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार ये विशिष्ट अध्ययन के रूप हैं। वैदिकशाखाओं की कुल संख्या- महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'पस्पशाह्निक' में लिखा है कि 'चत्वारो वेदाः। साङ्गा सरहस्याः बहुधाभिन्नाः। एक शतमध्वर्युशाखाः। सहस्त्रवर्त्मा सामवेदः। एक विंशतिधावाह्वृच्यम्। नवधाथर्वणो वेदः। अर्थात् वेद चार हैं, वेदाङ्गों एवं रहस्यों के साथ अनेक रूपों में विभक्त हुए। यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १ हजार, ऋग्वेद की २१ तथा अथर्ववेद की ९ शाखाएं है। इस प्रकार भाष्यानुसार कुल शाखाएँ १०१ + १०००+ २१+९ = ११३१ हुई। ‘चरणव्यूह' की गणना इससे भिन्न है। इसके अनुसार- ‘सामवेदस्यकिलसहस्त्रभेदा आसन्। यजुर्वेदस्य षडशीतिर्भेदा, अथर्ववेदस्य नवभेदाभवन्ति' अर्थात् सामवेद की १००० शाखाएँ, यजुर्वेद की ८६ शाखाएँ होती हैं। अथर्ववेद की नौ शाखाएँ हैं। ऋग्वेद की भी २१ शाखाओं का निर्देश किया गया है। इस प्रकार कुल संख्या हुई १०००+८६+२१+९ = १११६। अन्य पुराणों तथा उपनिषदों में भी इन संख्याओं के बारे में किंचित् भिन्नता है। आर्यसमाज के प्रवर्तक
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 89 महर्षि दयानन्द भी पतञ्जलि के मत से सहमत हैं, किन्तु कुल संख्या में से चार को वे मूल वेद स्वीकार करते हैं, अतः उनके अनुसार शाखाओं की कुल संख्या ११३१-४ = ११२६ शेष रहती है। अब हम यहाँ पर चारों वेदों की विभिन्न शाखाओं का पृथक् निरूपण प्रस्तुत कर रहे हैं— ऋग्वेदीय शाखाएँ— जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है कि महाभाष्यकार पतञ्जलि ने ऋग्वेद की २१ शाखाओं का निर्देश किया है। 'चरणव्यूहकार' के अनुसार उनमें से केवल पाँच शाखाएँ ही मुख्य हैं। वे निम्नलिखित हैं— १. शाकल शाखा २. वाष्कल शाखा ३. आश्वलायन शाखा ४. माण्डूकायन शाखा ५. सांख्र्यायन शाखा जहाँ तक पुराणों का सम्बन्ध है, प्राचीन पुराणों में ऋग्वेद की २१ तथा अवान्तरकालीन पुराणों में केवल तीन शाखाओं का ही निर्देश मिलता है। आथर्वण परिशिष्ट चरणव्यूह में उपर्युक्त पाँच शाखाओं के अतिरिक्त दो शाखाओं का और नामाल्लेख हुआ है। वे नाम हैं— साध्यायन् तथा औदुम्बर। बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान में भी ऋग्वेदीय शाखाओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। उसके अनुसार पहले शाखाओं के तीन मुख्य विभाग किए गए हैं, तत्पश्चात् उन तीन भागों के कुल २५ उपविभाग किए गए हैं। तीन भाग हैं— शाकल, वाष्कल तथा माण्डव्य, जिनमें शाकल के १०, वाष्कल के ८ तथा माण्डव्य के ७ अवान्तर भाग होते हैं। वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने भी ऋग्वेद की २१ शाखाएँ मानी हैं। यहाँ ऋग्वेद की प्रमुख ५ शाखाओं के विषय में विशेष जानकारी प्रस्तुत की जा रही है— १. शाकल शाखा— ऋग्वेद की आजतक प्रचलित शाखा 'शाकल' के नाम से विख्यात है। 'कात्यायन' ने 'ऋक् सर्वानुक्रमणी' के आदि में ही लिखा है— 'अथर्ऋग्वेदाम्नाये शाकलके।' शाकल शाखा ही मूलतः ऋग्वेद है। यह दस मण्डलों में विभाजित होने के कारण निरुक्तकार द्वारा 'दशतयी' नाम से सम्बोधित की गई है। इस शाखा में कुल १०२८ सूक्त तथा १०६०० मन्त्र हैं। शाकल शाखा से सम्बन्धित उपलब्ध साहित्य निम्नलिखित है— CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 90 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता १. ब्राह्मण- ऐतरेय ब्राह्मण एवं कौषीतकि ब्राह्मण। २. आरण्यक- ऐतरेय आरण्यक एवं कौषीतकि आरण्यक। ३. उपनिषद्- ऐतरेय उपनिषद् तथा कौषीतकि उपनिषद्। ४. सूत्र- आश्वलायन श्रौतसूत्र। इसी शाखा के मन्त्र सामवेद की कौथुमशाखा, अथर्ववेद के पचासवें काण्ड तथा कृष्णयजुर्वेद में प्राप्त होते हैं। इसी कारण यह शाखा वैदिक शाखा में आदरणीय स्थान पर प्रतिष्ठित है। २. वाष्कल शाखा- यह शाखा आजकल प्राप्त नहीं होती है, किन्तु इस शाखा के विषय में यत्र तत्र सामग्री प्राप्त होती है। शाकल शाखा में अन्तिम मन्त्र 'समानीव आकूतिः' शब्दों से प्रारम्भ होता है, परन्तु वाष्कल शाखा का अन्तिम मन्त्र का प्रारम्भ 'तच्छंयोरावृणीमहे' शब्द से होता है। आचार्य शौनक ने अपना विचार प्रकट करते हुए लिखा है कि- ‘एतत् सहस्रं दश सप्त चैवाष्टावती वाष्कलकेऽधिकानि। तान्पारणे शाकले शैशिरोये वदन्तिशिष्टाऽनाखिलेषु विप्राः॥' (अनुवाकानुक्रमणी, ३६) इसके अनुसार वाष्कल शाखा में शाकल शाखा से आठ सूक्त अधिक हैं। शाकल शाखा में कुल १०१६ सूक्त हैं जबकि वाष्कल शाखा में १०२५ सूक्त हैं। इस संहिता का अन्तिम सूक्त संज्ञान सूक्त है। वाष्कल के प्रथम मण्डल के मन्त्रों में शाकल से क्रम-भिन्नता है। इसी कारण अस्त-व्यस्त ढंग से कार्य करने वाले व्यक्ति को 'वाष्कल' कहकर पुकारते हैं। ३. आश्वलायन शाखा- कवीन्द्राचार्य की सूची में आश्वलायन शाखा की संहिता तथा ब्राह्मणों का नामोल्लेख हुआ है, इससे इनके अस्तित्व की पुष्टि होती है। आजकल इस शाखा के केवल 'गृह्यसूत्र' तथा 'श्रौतसूत्र' ही प्राप्त होते हैं, जिनके नाम हैं- आश्वलायन- गृह्यसूत्र तथा आश्वलायन-श्रौतसूत्र। इसके अतिरिक्त अन्य साहित्य अप्राप्य है। ४. शाङ्खायन शाखा- इस शाखा के ब्राह्मण तथा आरण्यक उपलब्ध हैं किन्तु संहिता अनुपलब्ध है। ५. माण्डूकायन शाखा- इस शाखा का आजकल कोई भी ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri द्वितीय अध्याय 91 यजुर्वेदीय शाखाएँ महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार यजुर्वेद की १०१ शाखाएँ हैं। उन्होंने लिखा है— 'एकशतध्वर्युशाखा' प्रपञ्चहृदयकार ने भी द्वितीय प्रकरण में लिखा है— 'यजुर्वेद एकोत्तरशतधा' अर्थात् यजुर्वेद १०१ शाखाओं वाला है। महर्षि दयानन्द भी इस विषय में पतञ्जलि के मत का समर्थन करते हैं। शौनक ने 'चरणव्यूह' में इस वेद की १८६ शाखाओं का निर्देश किया है। अनेक विद्वान् यजुर्वेद की १०० शाखाएँ ही मानते हैं। सूत संहिता, ब्रह्माण्डपुराण, स्कन्दपुराण आदि में यजुर्वेद की १०९ शाखाओं का उल्लेख किया गया है। मुक्तिकोपनिषद् ने यजुर्वेद की १०७ शाखाएँ मानी हैं। यजुर्वेद की १०१ शाखाओं में अधिकांश काल के प्रवाह में नष्ट हो गई, परन्तु प्रपञ्चकार को ३६ शाखाओं की जानकारी थी। बौद्ध ग्रन्थ 'दिव्यावदान' में कठों की १०, काण्व की १०, वाजसनेय की ११, जातुकर्ण की १३, प्रोष्ठ पद की १६ अर्थात् कुल ६० शाखाओं का निर्देश प्राप्त होता है। 'आथर्वण चरणव्यूह' परिशिष्ट में यजुर्वेद की २४ शाखाओं के नाम दिए हैं जिनमें शुक्लयजुर्वेद के १० तथा कृष्णयजुर्वेद की १४ शाखाएँ हैं। वे नाम निम्नलिखित हैं। शुक्ल-यजुर्वेद की शाखाएँ— काण्व, माध्यन्दिन, जाबाल, शापेय, श्वेत, श्वेततर, ताम्रायणीय, पौर्णवत्सा, आवटिका तथा परमावटिका। कृष्ण-यजुर्वेद की शाखाएँ— हौष्याः, धौष्याः, खाडिकाः, आह्नकाः, चरकाः, मैत्राः, मैत्रायणीयाः हरिव्रिविणाः, शालायनीया, मर्चकठाः, प्राच्यकठा, कपिष्ठलकठाः, उपलाः एवं तैत्तरीयाः। इसी प्रकार शुक्लयजुर्वेदीय शाखाओं का नामोल्लेख वायुपुराण अध्याय २/६१, ब्रह्माण्डपुराण अध्याय ३५ तथा चरणव्यूह एवं प्रतिज्ञापरिशिष्ट आदि में हुआ है। इन नामों में परस्पर साम्य नहीं है। 'प्रतिज्ञापरिशिष्ट' में दी गई नामावली इस प्रकार है— जाबाला, बौधेया, काण्वी, माध्यन्दिना, शापेया, तापायनीया, कापाला, पौण्ड्रवत्सा, आवटिका, परमावटिका, पाराशरा, वैनतेया, वैधैया, कौनतेया तथा वैजवाया। आजकल शुक्लयजुर्वेद की दो तथा कृष्णयजुर्वेद की चार शाखाएँ उपलब्ध होती हैं। वे उपलब्ध शाखाओं के नाम इस प्रकार हैं— शुक्ल यजुर्वेद— (१) वाजसनेयी शाखा। (२) काण्व शाखा। कृष्ण यजुर्वेद— (३) तैत्तरीय शाखा। (४) मैत्रायणी शाखा। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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(५) कठ शाखा। (६) कठ-कपिष्ठल-शाखा। यजुर्वेद का जो साहित्य सम्प्रति उपलब्ध है, वह निम्नलिखित है— शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित साहित्य- शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद्, ईशोपनिषद् तथा बृहदाहरण्यक ब्राह्मण। कृष्णयजुर्वेद से सम्बन्धित साहित्य- तैत्तरीय आरण्यक, तैत्तरीय उपनिषद्, मैत्रायणी उपनिषद् एवं कठोपनिषद्। इसी वेद से सम्बन्धित आठ सूत्र ग्रन्थ भी प्राप्त होते हैं जो इस प्रकार है— आपस्तम्ब कल्पसूत्र, बोधायन श्रौतसूत्र, हिरण्यकेशी कल्पसूत्र, भारद्वाज श्रौतसूत्र, मानव श्रौतसूत्र, मानव गृह्यसूत्र, वाराह गृह्यसूत्र तथा काठक गृह्यसूत्र। इन उपलब्ध शाखाओं का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है— १. वाजसनेयी शाखा- इस शाखा का सम्बन्ध शुक्लयजुर्वेद से है। इसकी संहिता में ४० अध्याय एवं १९७५ मन्त्र हैं। इन अध्यायों में प्रथम २५ अध्याय विषयवस्तु की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसमें अनेक बड़े यज्ञों से सम्बन्धित वैदिक ऋषियों की प्रार्थनाओं एवं गीतों का संग्रह है। यह शाखा सम्पूर्ण उत्तर भारत में विशेषतः प्रचलित है। दक्षिण में महाराष्ट्र तथा मद्रास में इसका किञ्चित प्रचार है। एक विभाग अनुवाकों का भी उपलब्ध होता है जिसमें कुल ३०३ अनुवाक् हैं। इनमें मन्त्रों को 'कण्डिका' संज्ञा प्रदान की गई है। ये कण्डिकाएँ ऋक् यथा यजुः में विभाजित हैं, जिनमें ऋक् पद्यमय तथा यजुः गद्यमय कण्डिकाएँ हैं। प्राचीन काल में इस शाखा के अत्यधिक प्रचार का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराज जनमेजय ने अपने नाग-यज्ञ में केवल वाजसनेयी ब्राह्मणों को आमन्त्रित करके उनका सत्कार किया था। कृष्णयजुर्वेदी ब्राह्मण होने के कारण वैशम्पायन नहीं बुलाए गए। अतः जनमेजय को वैशम्पायन ने शाप दे दिया जिससे वे तक्षक नाग द्वारा ग्रसित हुए। सम्प्रति वाजसनेयी संहिता का अनेक स्थानों से प्रकाशन हो चुका है। यथा— पारडी तथा अजमेर से इसका शतपथ ब्राह्मण भी प्रकाशित हो चुका है। इस संहिता पर अनेक विद्वानों ने भाष्यों का प्रणयन किया है, जैसे— माधव, अनन्तदेव, आनन्दभट्ट, उव्वट, महीधर तथा महर्षि दयानन्द आदि। इस पर हिन्दी भाष्यों की भी रचना हो चुकी है। वे भाष्यकार हैं— स्वामी पूर्णानन्द, पं० जयदेव। २. काण्वशाखा- यह शाखा भी शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित है। आजकल इस संहिता का प्रचार
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