वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 353 में से
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92 वैदिक वाङ्ग्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
(५) कठ शाखा। (६) कठ-कपिष्ठल-शाखा। यजुर्वेद का जो साहित्य सम्प्रति उपलब्ध है, वह निम्नलिखित है— शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित साहित्य- शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद्, ईशोपनिषद् तथा बृहदाहरण्यक ब्राह्मण। कृष्णयजुर्वेद से सम्बन्धित साहित्य- तैत्तरीय आरण्यक, तैत्तरीय उपनिषद्, मैत्रायणी उपनिषद् एवं कठोपनिषद्। इसी वेद से सम्बन्धित आठ सूत्र ग्रन्थ भी प्राप्त होते हैं जो इस प्रकार है— आपस्तम्ब कल्पसूत्र, बोधायन श्रौतसूत्र, हिरण्यकेशी कल्पसूत्र, भारद्वाज श्रौतसूत्र, मानव श्रौतसूत्र, मानव गृह्यसूत्र, वाराह गृह्यसूत्र तथा काठक गृह्यसूत्र। इन उपलब्ध शाखाओं का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है— १. वाजसनेयी शाखा- इस शाखा का सम्बन्ध शुक्लयजुर्वेद से है। इसकी संहिता में ४० अध्याय एवं १९७५ मन्त्र हैं। इन अध्यायों में प्रथम २५ अध्याय विषयवस्तु की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसमें अनेक बड़े यज्ञों से सम्बन्धित वैदिक ऋषियों की प्रार्थनाओं एवं गीतों का संग्रह है। यह शाखा सम्पूर्ण उत्तर भारत में विशेषतः प्रचलित है। दक्षिण में महाराष्ट्र तथा मद्रास में इसका किञ्चित प्रचार है। एक विभाग अनुवाकों का भी उपलब्ध होता है जिसमें कुल ३०३ अनुवाक् हैं। इनमें मन्त्रों को 'कण्डिका' संज्ञा प्रदान की गई है। ये कण्डिकाएँ ऋक् यथा यजुः में विभाजित हैं, जिनमें ऋक् पद्यमय तथा यजुः गद्यमय कण्डिकाएँ हैं। प्राचीन काल में इस शाखा के अत्यधिक प्रचार का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि महाराज जनमेजय ने अपने नाग-यज्ञ में केवल वाजसनेयी ब्राह्मणों को आमन्त्रित करके उनका सत्कार किया था। कृष्णयजुर्वेदी ब्राह्मण होने के कारण वैशम्पायन नहीं बुलाए गए। अतः जनमेजय को वैशम्पायन ने शाप दे दिया जिससे वे तक्षक नाग द्वारा ग्रसित हुए। सम्प्रति वाजसनेयी संहिता का अनेक स्थानों से प्रकाशन हो चुका है। यथा— पारडी तथा अजमेर से इसका शतपथ ब्राह्मण भी प्रकाशित हो चुका है। इस संहिता पर अनेक विद्वानों ने भाष्यों का प्रणयन किया है, जैसे— माधव, अनन्तदेव, आनन्दभट्ट, उव्वट, महीधर तथा महर्षि दयानन्द आदि। इस पर हिन्दी भाष्यों की भी रचना हो चुकी है। वे भाष्यकार हैं— स्वामी पूर्णानन्द, पं० जयदेव। २. काण्वशाखा- यह शाखा भी शुक्लयजुर्वेद से सम्बन्धित है। आजकल इस संहिता का प्रचार
CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar