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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

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पृष्ठ 121

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द्वितीय अध्याय 93 दक्षिण में अधिक है जबकि ऋषि कण्व उत्तर भारत के निवासी थे। उनका आश्रम 'मालिनी' नदी के तट पर था। यह नदी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में 'मालन' के नाम से अब भी एक छोटी नदी के रूप में उपलब्ध है। यह शाखा उत्तर भारत में व्यास थी, इस बात का प्रमाण इसी संहिता के एक मन्त्र में उपलब्ध होता है। इस मन्त्र में कुरु तथा पञ्चालदेशीय राजाओं का उल्लेख है 'एष वः कुरवो राजा, एष पाञ्चालो राजो।' इसके पश्चात् इसका एक सुन्दर संस्करण मद्रास से प्रकाशित हुआ। श्रीमान् सातवलेकर जी ने औंध से इसका प्रकाशन किया। इस शाखा के अनुयायियों के उत्तरभारत में न मिलने के प्रमुख कारणों में एक तो यह है कि इनका सम्बन्ध पाञ्चरात्रों से है। ये पाञ्चरात्र वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित है। जब वृष्णिवंशी, कृष्ण के साथ दक्षिण चले गए, उसी समय इस शाखा के सभी अनुयायी भी वहाँ पहुँच गए। ३. कठ शाखा- यजुर्वेद की २७ शाखाओं में कठशाखा का विशिष्ट स्थान है। पुराणों में काठक लोगों को 'माध्यम' कहा गया है। अतः अनुमानतः कठानुयायी मध्यप्रदेश के निवासी थे। पतञ्जलि का इसी शाखा से सम्बन्ध था। उन्होंने महाभाष्य में लिखा है- 'ग्रामे ग्रामे काठकं कापालकं च प्रोच्यते' अर्थात् काठक तथा कापालक शाखाएँ गाँव गाँव में पढ़ी जाती थी। आजकल इस संहिता का अध्ययन करने वाले शून्य सदृश हैं। कुछ लोगों के मतानुसार काठक शैव थे तथा आज भी कश्मीर में मिलते हैं। कठ संहिता में पाँच खण्ड हैं- इठिमिका, मध्यमिका, ओरिमिका, याज्यानुवाक्या तथा अश्वमेधाद्यनुवचन। इन खण्डों को स्थानकों में विभाजित किया गया है। इस शाखा में कुल ४० स्थानक, ८४३ अनुवाक, १३ अनुवचन, ३०९१ मन्त्र तथा मन्त्र-ब्राह्मणों की कुल संख्या १८००० है। इनमें इठिमिका के १८ स्थानक हैं, जिनमें पुरोडाश, पशुबन्ध तथा राजसूयादि याज्ञिक क्रियाओं का विवेचन है। मध्यमिका के १२ स्थानकों में सावित्री तथा स्वर्गादि का विवरण है। ओरिमिका में १० स्थानक हैं, जिनमें सत्र, प्रायश्चित्ति, चातुर्मास्य, सौत्रामणियज्ञ वर्णित हैं। 'अश्वमेधाद्यनुवचन' में १३ अनुवचन प्राप्त होते हैं। काठक संहिता की एक हस्तलिखित प्रति भारत से जर्मनी पहुँच गई तथा वहीं १९१० ई० में इसका प्रकाशन हुआ। इसके सम्पादक श्री श्रोदर महोदय थे। भारत मे सन् १९४३ ई० में स्वाध्याय मण्डल की ओर से इसका एक संस्करण प्रकाशित किया गया। डा० कालेण्ड द्वारा भी कठ संहिता के एक भाग का प्रकाशन कराया जा चुका है।

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar